Tuesday, November 17, 2009

नोएडा से चलनेवाली मेट्रो के क़िस्से


मेट्रो रेल इनदिनों नोएडा भी आने जाने लगी है। इसी के साथ मेट्रो में तरह तरह के प्रजाति के प्राणियों के दर्शन होने लगे हैं। उनकी हरकतें कई बार हंसाती हैं, कई बार गुदगुदाती हैं और कई बार खीज पैदा करती हैं। नियमित मेट्रो में सफर के दौरान कई बातें अक्सर मैंने नोट की है, जिसे मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।
मेट्रो रेल शुरू होते ही नोएडा के लोगों को अचानक लगा कि वो अब अमेरिका और इंग्लैंड के वासी हो गए हैं। सिटी सेंटर से मेट्रो रेल जब रवाना होती है तब उसमें कई तरह की सवारी होती है। कई ऐसे परिवार होते हैं, जिनके लिए मेट्रो से सफर करना हवाई जहाज़ के बराबर है । इनमें मध्यम वर्गीय परिवार है, निम्न मध्यम वर्गीय भी है और उच्च वर्गीय भी। सब एक साथ एक ट्रेन के एक कोच में। बस कपड़े लत्ते से फर्क़ कर लीजिए। उच्च मध्यम वर्गीय के पुरूष कैपरी, बारमुडा या फिर ट्रैक सूट में। हाथ में अंग्रेज़ी को कोई मोटी सी उपन्यास। महिलाएं जींस टीशर्ट के अलावा सलवार कुर्ता या फिर साड़ी में लखदख। सम कुछ चमचमाती हुई। उंगलियों में हीरे की कई सारी उंगुठियां। गले में चमकता हीरा। बातचीत में हिंदी के शब्दों से नफरत। बोटनिकल गार्डन से ऐसे ही एक बुज़ुर्ग, एक युवा, एक युवती और दो बूढ़ी महिलाएं। रेल के पहले कोच में इंटर करते हैं। बाई तरफ बोर्ड लगा है- विकलांग, बुजुर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षित। इस तरह की आरक्षित वाली कई सीटें हैं। ये सीटें लगभग खाली हैं। लेकिन उनकी नज़र जाती है अनारक्षित सीटों पर। सीट पर कोई दैनिक आफिस यात्री बैठा है। बुज़ुर्ग उससे कहता है – प्लीज़ , नाऊ यू गेट अप। उसने पूछा –क्यों? जवाब- कॉज़, आई एम ओल्ड यार। जस्ट सी, व्हाट रिटेन आन योर बैक सीट- प्लीज आफर दिस सीट हू नीड। अंग्रेज़ी में अकबकाया वो दैनिक यात्री खड़ा हो जाता है और अंग्रेज़ी पढ़ने और पढ़ाने वाले सारे लोग एक एक करके सबको खड़ा कर बैठ जाते हैं। अब इनकी बातचीत शुरू होती है। आई जस्ट पार्कड माई कार एट रजिंदर प्लेस। वी ओल्ड पिपुल कैन अल्सो इंजोय द राइड न। ये सुनकर युवती खिलखिला पड़ती है। संभवत ये युवती उनकी बहू या बेटी है। तभी फ्रेंच कट युवक अपने ब्लैक बेरी से फोन करता है- ओह पापा- फक। आई फॉरगेट टू कैरी में कैम। यू डू वन थिंग । व्हाट विच कैमरा ? पापा, यू आर सो डंब। यू रिमेंमबर दैट नाइट वेन आई वाज़ स्लीपिंग एंड यू टोल्ड मी दैट यू गॉट द कैमरा। आई कैप्ट इन योर वार्डरोब। ओह , या या । दैट्स राइट। प्लीज़ कीप विद यू । आई वैल टेक इट लेटर आन। बाई । अब बारी है बूढ़ी महिलाओं की । सी वी आर गोइग बैक टू होम। लैट्स गो टू बाराखंबा । वी वैल हैव सम समोसाज़। दैट ब्यॉय मेक वैरी टैस्टी समोसाज़। एंड यू नो दे सर्व सिज़लिंग सॉस चटनीज़ अल्सो। लेट्स गो देयर। बुज़ुर्ग ने हामी भर दी।
इसी कोच में नोएडा के कुछ मध्यम परिवार के लोग हैं और कुछ मनचले लड़के भी। कपड़े –लत्तों से लड़के काफी मार्डन लग रहे हैं। लेकिन सबके जूते एक जैसे हैं। इन लड़कों की नज़र अचानक एक विदेशी जोड़े पर पड़ गई। इन आठ दस लड़कों ने लड़के-लड़की को फोटो खिंचाने के लिए धर लिया। वो चीख रहे हैं- हे वाट यू आर डूइंग। डोट टच मी। कीप अवे। छोरे चीख रहे हैं- भइइ, फोटू ही तै खिचवाणी है। सब एक साथ ठहाके भी मार रहे हैं। सारे लोग देख रहे हैं। लेकिन कोई जा नहीं रहा। बस सब फुसफुसा रहे हैं- नवादा –होशियारपुर के जाट गूर्जर के छोरे होंगे। तब तक ये लड़के दोनों पर काबू कर लेते हैं और दनादन कई फोटो खींच लेते हैं। सबेस ज़्यादा फोटो लड़की के साथ खिंचवाई गई। फिर वो सेक्टर 18 के स्टेशन पर फतर गए।
एक परिवार मध्यम वर्गीय है। देख के लगता है कि खाने पीने की कमी नहीं होगी। ये परिवार मेट्रो की सुंदरता की तारीफ सुरू कर देता है। इस अंदाज़ में मेट्रो के पीआरओ भी तारीफ नहीं कर पाएंगे। देख भाई, पिलाटफारम कित्ता चमक रहा है सै। भाई, साफ सफाई कराण वास्ते लोगण को लगा रखा सै। ई दरवज्जा ते देख णा, कोई दब दुबा न जाव्वै।
इन गप्प सड़ाक्कों के बीच ट्रेन मयूर विहार मेट्रो स्टेशन पहुंच जाती है। सूट-बूट और ब्रीफकेस के साथ सैकड़ों लोग सवार होते हैं। ट्रेन में अब तिल रखने की ज़रूरत नहीं। बस जो जहां है, वहीं खड़ा है। टस से मस नहीं हो सकता। ट्रेन अब यमुना बैंक से आगे बढ़ चुकी है। बीच के किसी स्टेशन से सवार हुए तीन चार लड़के एक दूसरे की ज्ञान बढ़ाने में लग जाते हैं। एक- यहीं से मेट्रो का केबल चोरी हो गया था। दूसरा- अबे फेंक मत। तुझे कैसा पता ? पहली बार तो तू हम लोग के साथ जा रहा है। पहला- नहीं यार, पेपर में ख़बर आई थी। चोरों ने केबल चोरी कर ली थी। पूरी देश की अर्थवव्यस्था गड़बड़ा गई थी। दूसरा- देश की अर्थव्यवस्था कैसे गड़बड़ाई बे? तेरे को कैसे मालूम? पहला- अर्थिंग का केबल चोरी हुआ था न। इंद्रप्रस्थ स्टेशन आने तक अब सारे लोगों की आवाज़ दब जाती है। सुनाई देता केवल शोर। भई, थोड़ा आगे बढ़ो। घुसने तो दो। हां भई, उतर जाना प्रगति मैदान । रोक थोड़ी न रखा है। थोडा और आगे खिसको। पीछे वाला अलग आवाज़ लगा रहा है- क्या आपको प्रगति मैदान उतरना है ? नहीं तो फिर आग क्यों खड़े हैं? पीछे जाइए। उतरने दीजिए। मेट्रो की ये ट्रेन द्वारका की ओर चल पड़ती है।

12 comments:

Sachi said...

सुन्दर, संस्मरण शैली में लिखा गया लेख | इतनी विविधताओं को देखने के कारण ही मुझे अपने देश से लगाव है, मगर जब ब्लू लाइन में जेब कट जाती है, या कोई घड़ी मार लेता है, तो रोना भी आता है|

Yogesh Gulati said...

बातचीत में हिंदी के शब्दों से नफरत। very nice! lekin thoda jaldi khatm kar diya aapane. aage ki kahani ka intzar rahega.

सुलभ सतरंगी said...

बहुत भीड़ है भाई. इ मेट्रो तो अभी और गुल खिलायेगा. वैसे आपके संस्मरण रोचक और सोचनीय हैं.

-Sulabh Jaiswal

MAYUR said...

achhi shaili hai bhaiya hame to bahut pasand aaya ye vivran

indramani said...

bahut pasand aaya. achchha sasmaran hai. likhte rahiye aur battte rahiye. www.indramanijharkhand.blogspot.com

बी एस पाबला said...

हा हा!
मज़ेदार

सोचा तो था कि अपनी दिल्ली यात्रा के समय इसी रूट पर किए गए मेट्रो सफर की यादें लिखूँगा
लेकिन ...

बी एस पाबला

sa said...

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Anonymous said...

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amy said...

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santosh chaudhary said...

its really atractive and whatever you have written may be correct people will remember his greatness and they will miss him

all bangalian are missing him so much

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Pratul Vasistha said...

manoranjak aur kaafi chitratmak prastuti hai.