Saturday, September 16, 2017

योगीराज में पिटनेवाली पुलिस इनकाउंटर भी कर सकती है?

सरकार में आने से पहले योगी आदित्यनाथ और बीजेपी ने अखिलेश राज की बिगड़ी क़ानून व्यवस्था को मुद्दा बनाया था। दम भरा था कि सरकार में आते ही सब बदल देंगे। गुंडे-माफिया यूपी छोड़कर भाग जाएंगे। लेकिन हुआ इसके उलट। गुंड-मवाली थाने में घुसकर पुलिसवालों को पीटते हैं। हद तो तब हो गई जब बिजनौर में ऑन ड्यूटी रोड पर एक सब इंस्पेक्टर का गला काट दिया गया। क़ानून का ख़ौफ़ कितना है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाइए कि सड़क पर भी लोग खाकीवालों को गिरा-गिराकर मारने से नहीं डरते। पुलिस की बस वहीं चलती है, जो ग़रीब हैं या फिर जिनकी कोई पहुंच नहीं है। सरकारी आंकड़ों में ना तो मर्डर कम हुए हैं। ना रेप की संख्या में गिरावट आई है। ना डाका पडना कमा हुआ है और ना ही दंगे फसादों में कमी आई है।


मज़े की बात है कि मोदी के मंत्री इन बढ़ते आंकड़ों पर बेशर्मी भरे बयान दे रहे हैं। दावा कर रहे हैं कि पहले की सरकारों में थानों में शिकायत ही दर्ज नहीं होती थी। इसलिए अपराध के आंकड़े कम दिखाई देते हैं। अब योगीराज में हर किसी की सुनवाई होती है। इसलिए अपराधों की संख्या ज़्यादा दिखलाई देती है। इस तरह का कुतर्क करनेवाले मंत्री भूल जाते हैं कि यूपी में केवल अखिलेश, मायावती और मुलायम की ही सरकारें नहीं रही हैं। रामबाबू गुप्ता, कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह की भी सरकारें रही हैं।

ख़ैर आलम ये है कि कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने में लगे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हांफ रहे हैं। उधर उनकी पुलिस भी हांफ रही है। अपराधियों के डर से और अपनी पीठ थपथपाने के लिए आंकड़ों की बाज़ीगरी दिखाने में। यूपी पुलिस दावा कर रही है कि पिछले 6 महीने में यानी योगीराज में अपराधी थर-थर कांपने लगे हैं। उन्हें डर है कि पुलिस कहीं सड़क पर ही इंसाफ ना कर दे। छंटे हुए बदमाशों को इनकाउंटर में मारकर ना गिरा दे। दावा किया जा रहा है कि सीएम योगी के निर्देश के बाद पिछले 6 महीने में मुठभेड़ में 15 इनामी अपराधियों को मार गिराया। वहीं 84 अपराधी गोली लगने से घायल हुए। सीएम के इसी निर्देश पर कार्रवाई करते हुए पुलिस अपराधियों पर कहर बनकर टूटी है।
लेकिन सच्चाई ये है कि प्रदेश में बढ़ते अपराध ने आम जनमानस का जीना दुश्वार कर रखा है। कई सरकारें आई और गई। लेकिन राहत नहीं मिली। बस मुलम्मा बदलता रहा। सच ये भी है कि पहले की किसी भी सरकारों ने इनकाउंटर की खुली छूट नहीं दी गई। लेकिन अब इनकाउंटर की छूट है।

20 मार्च से 14 सितंबर तक के यूपी पुलिस के आंकड़ों पर नजर डालें तो अपराधियों के साथ पुलिस की कुल 420 मुठभेड़ हुई है। इनमे शामली में 4, आजमगढ़ में 3, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में 2-2 अपराधी मारे गए है। मेरठ में सबसे ज़्यादा 9 अपराधी मारे गए है। जिसके बाद अपराधियों में दहशत फैल गई है। राजधानी में हुई एक मुठभेड़ में भी इनामी बदमाश मारा गया। इस दौरान 88 पुलिसकर्मी भी घायल हुए। योगी सरकार के करीब 6 माह के कार्यकाल में 1106 अपराधी गिरफ्तार किए गए, जिनमें 868 कुख्यात अपराधी हैं। अब तक 54 अपराधियों पर रासुका और 69 पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है। बहरहाल, आंकड़े तो चीख चीखकर कह रहे हैं कि यूपी में क़ानून व्यवस्था की मौजूदा हालत द्रौपदी की तरह ही है।

Friday, September 15, 2017

जनता के बीच जाने से डरते हैं बीजेपी के जनसेवक

हमारे संविधान ने संसद या विधानसभा में जाने के लिए दो ही रास्ते दिए हैं। संसद के लिए लोकसभा और राज्यसभा और राज्यों में विधानसभा और विधान परिषद। लोकसभा और विधानसभा के लिए जनता अपना सांसद और विधायक चुनती है। जबकि राज्यसभा के लिए राज्यों के विधायक और विधान परिषद के लिए राज्यों में अलग अलग नियम हैं। यूपी विधान परिषद के लिए नगरपालिकाओं के सदस्य, जिला बोर्डों, दूसरे प्राधिकरणों के सदस्यों और शैक्षिक संस्थाओं आदि से जुड़े लोग एमएलसी चुनते हैं। विधानपरिषद और राज्यसभा को अपर हाउस कहा जाता है। लेकिन राजनीति में इसे चोर दरवाज़ा कहते हैं। ये माना गया है कि जिस नेता की ज़मीनी पकड़ नहीं है या वो लोकप्रिय नहीं है तो उसकी पार्टी उसे पिछले या चोर दरवाज़े से सदस्य बनवाती है।

अब आते हैं मुद्दे की बात पर। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्रियों केशव मौर्या और दिनेश शर्मा, मंत्री मोहसिन रज़ा और स्वतंत्र देव सिंह एमलएसी चुन लिए गए। इसके लिए कुछ सपाइयों को तोड़ना पड़ा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये खेल क्यों खेला गया? बीजेपी ने अपने बड़े नेताओं के लिए चोर दरवाज़ा क्यों खोला? राजनीति के जानकार बताते हैं कि विभिन्न सूत्रों से बीजेपी की मातृ संगठन आरएसएस के पास पुख़्ता जानकारी है कि तीन सालों में केवल बातें बनाकर नरेंद्र और अमित शाह ने जनता का मूड खराब कर दिया है। यूपी एक बड़ा राज्य है। वहीं मोदी और शाह के गृह राज्य में भी विधानसभा के चुनाव होने हैं। पटेलों और हार्दिक पटेल समेत आप ने हवा ख़राब कर रखी है। ऐसे में अगर योगी, मौर्या या शर्मा चुनाव हार जाते तो बड़ा रिस्क हो जाता। देश में गंदा संदेश जाता है। इसलिए इन्हें पिछले दरवाजे से लाया गया। यही नहीं लंबे समय तक गुजरात में मोदी के गृह मंत्री रहे अमित शाह को भी आनेवाले विधानसभा चुनाव में लड़ने रोका गया। उन्हें भी चोर दरवाज़े से राज्यसभा लाया गया।

राजनीति के जानकारों में ये चर्चा का विषय है कि 2014 लोकसभा चुनाव में 80 में से 73 सीटें जीतने वाली बीजेपी अब लोकसभा की एक सीट पर भी चुनाव लड़ने से क्यों बचना चाहती है। वहीं, विधानसभा चुनाव में बंपर जीत हासिल करने के बाद 5 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने से क्यों डर रही थी। सूत्रों का कहना है कि गुजरात चुनाव से पहले किसी भी सूरत में बीजेपी माहौल खराब नहीं करना चाहती है यही वजह है कि बीजेपी के तमाम दिग्गज जनसेवक किसी भी चुनाव से भाग रहे है।

Thursday, September 14, 2017

क्या मोदी का जादू अब हो रहा है बेअसर?

बीजेपी परिवार, एनडीए परिवार और संघ परिवार में इनदिनों बस ही ही चर्चा है। सबकी ज़ुबान पर बस एक ही बात कि नरेंद्र मोदी क जलवा कम हो रहा है। हाल में कुछ ऐसी घटनाएं लगातार घटी हैं, उसके बाद इन बातों को और दम मिलने लगा है। जिस आरएसएस के गढ़ यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी में बीजेपी की छात्र इकाई एबीवीपी कभी नहीं हारी, वो बुधवार को चुनाव हार गई। उससे एक दिन पहले जेएनयू के नतीजे आए। वहां भी एबीवीपी का सूपड़ा साफ हुआ। जब दोनों हार का पोस्टमॉर्टम किया गया तो नतीजा यही निकला कि इस हार के लिए मोदी ज़िंम्मेदार हैं। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उपाध्यक्ष शहला रशीद, उमर खालिद समेत कई छात्र नेता मोदी सरकार और बीजेपी की तीखी आलोचना करते रहे हैं। डीयू में वामपंथी छात्र संगठन मजबूत नहीं हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा बीजेपी और एबीवीपी के खिलाफ बनाये गये माहौल का सीधा फायदा कांग्रेस के छात्र संगठन को हुआ है।

ये भी माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने तीन साल के कार्यकाल में लगातार विश्वविद्यालयों में होने वाले विवादों को लेकर आलोचनाओं से घिरती रही है। देश के शीर्ष संस्थानों में छात्रों ने बीजेपी के खिलाफ आक्रोश जताया। हैदराबाद विश्विद्यालय, जादवपुर विश्वविद्लाय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय इत्यादि में किसी न किसी मुद्दे पर छात्र और प्रशासन आमने-सामने आया। हर संस्थान में बीजेपी के प्रति सहानुभूति के कारण एबीवीपी ने प्रशासन का पक्ष लिया। ऐसे में माना जा रहा है कि आम छात्रों के मन में एबीवीपी से नाराजगी है। एबीवीपी की हार की एक वजह नरेंद्र मोदी सरकार की शिक्षा नीति भी मानी जा रही है। मोदी सरकार ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट), एमफिल-पीएचडी की सीटें, शैक्षणिक संस्थानों के वित्त पोषण, उनकी स्वायत्तता से जुड़े जो फैसले किए उससे आम छात्रों और अध्यापकों में नाराजगी है।

वहीं आरएसएस ने भी साफ कह दिया है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अगली बार मोदी चुनाव जीत कर आए ही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बीजेपी को नरेंद्र मोदी सरकार की घटती लोकप्रियता के प्रति सचेत किया है। आरएसएस ने अपने विभिन्न संगठनों से फीडबैक लेने के बाद आर्थिक सुस्ती, बेरोजगारी और नौकरियां जाने, नोटबंदी की विफलता और किसानों की बदहाली जैसे मुद्दों की वजह से आम लोगों में निराशा और नाराज़गी है। आरएसएस ने मोदी सरकार से कहा कि उसके कार्यकर्ताओं के अनुसार आम लोग मोदी सरकार के बारे में असुविधाजनक सवाल और बहस कर रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार की सहयोगी शिवसेना बात-बात पर मोदी का मुखौटा उतार देती है। आज ही जब मोदी ने बुलेट ट्रेन का शिलान्यास किया तो शिवसेना ने साफ कह दिया कि बुलेट की तरह झूठ बोलते हैं। ये तमाम तरह की बातों से एक बात तो साफ है कि अब पहले की तरह मोदी की राह आसान नहीं है। ना ही सरकार में, ना ही संगठन या परिवार में और ना ही आनेवाले चुनाव में। इसलिए ये कहा जा सकता है कि मोदी का जलवा कम तो ज़रुर हुए हैं। लेकिन जनता की नज़र में मज़बूर विरोधी नेता कोई नहीं दिख रहा। 

Wednesday, September 13, 2017

घूसखोरी पर मोदी के दावे की हवा निकाल रहे हैं योगी के मंत्री

आपको याद होगा कि इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खम ठोककर कहा था कि वो इस देश से भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाकर दम लेंगे। देश में काला धन वापिस आएगा। सबके बैंक खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख आएंगे। वग़ैरह वग़ैरह। वैसे बातें तो उन्होंने ख़ूब की हैं और भी बात ही बनाते हैं। लेकिन आपको याद दिला दें कि देश के प्रधानमंत्री ने देश की जनता के सामने शपथ ली थी कि ना तो वो खाएंगे और ना ही किसी को खाने देंगे। आज उनका यही नारा उनकी पार्टी, उनके नेताओं और मंत्रियों को याद दिलाना चाहता हूं। सच्चाई तो ये है कि भले ही नारा लग जाए कि जो 70 सालों में नहीं हुआ, वो अब हो रहा है। देश बदल रहा है। देश चमक रहा है। देश में मोदी और यूपी में मोदी मिलकर सब बदल डालेंगे। लेकिन कड़वी सच्चाई तो यही है कि आज भी कुछ नहीं बदला।

इस देश में आज भी बिना घूस दिए मकान का नक्शा पास नहीं होता। बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट नहीं बनता। एफआईआर की कॉपी पाने के लिए मुंशी या दीवान की हथेली गर्म करनी पड़ती है। नौकरी के लिए मंत्री या अधिकारी को रिश्वत देनी पड़ती है। बच्चे के एडमिशन के लिए डोनेशन देना पड़ता है। अस्पतालों में एडमिशन और अच्छे इलाज के लिए या तो पैरवी करानी पड़ती है या फिरमुस्कुराते हुए गांधी जीको नज़र करना पड़ता है। सड़क बनाने और ठेका पाने में वही पुराना खेल चल रहा है।
हां, जब पीएम ने कहा था कि ना खाऊंगा तो ना खाने दूंगा तो मेरे जैसे न जाने कितने लाखों करोड़ों लोगों के मन में उम्मीद जगी थी। हां, देश का मुखिया ही ठान ले, इरादा कर ले। तो वाकई वो काम हो कर रहेगा। लेकिन आज ये बेहद अफसोस के साथ कह रहा हूं कि देश की जनता फिर छली गई है। क्योंकि देश के सबसे बड़े प्रदेश यानी योगी आदित्यानाथ वाले उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ही खुल्लमखुल्ला मोदी के बयान को रद्दी की टोकरी में डालने का काम कर रहे हैं। सार्वजनिक मंचों से ठेकेदारों और अफसरों को कह रहे हैं कि रिश्वत खाइए। लेकिन कम खाइए। ठीक वैसे ही घूस खाइए जैसा कि दाल में नमक मिलाया जाता है। ये बात उन्होंने हरदोई में कही। ठीक डिप्टी सीएम साहेब। ये यूपी आपकी है। ये देश आपका है। ये अधिकारी-बाबू आपके हैं। ये ठेकेदार आपके हैं। सरकार आपकी है। उन्मादी मुट्ठी भर भीड़ आपकी है। भक्तजन आपके हैं। सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलनेवाले भी आपके हैं। आपकी जो मर्जी में आए कीजिए। या तो दाल में नमक मिलाइए या फिर दाल में पूरी नमक ही डाल दीजिए। आपसे सवाल पूछकर देशद्रोही होने की हिमाकत भला कौन करे।

राहुल की साफगोई से BJP को क्यों लगती हे तेज़ मिर्ची?

आज हम बात करेंगे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अमेरिका में दिए गए साफगोई से। राहुल गांधी ने पहली बार माना कि साल 2012 के आसपास कांग्रेस दंभ में चूर थी। इसलिए सत्ता पंजे से फिसल गई। राहुल जिस समय की बात कर रहे हैं, जब दौरान सोनिया की पार्टी पर मजबूत पकड़ थी। उन्होने साफ कहा कि पार्टी में पूरी तरह से फेरबदल करने की ज़रुरत है। राहुल की साफगोई देखिए कि साफ कहा कि नरेंद्र मोदी बहुत हुनरमंद है। वो बोलते बहुच अच्छा है। वो उनसे भी बेहतर बोलते हैं।  वो जानते हैं कि भीड़ में जो तीन-चार तरह के अलग-अलग समूह हैं उन तक संदेश को कैसे पहुंचाया जाए। इस वजह से उनका संदेश ज्यादा लोगों तक पहुंच पाता है। इसके बाद राहुल ने मोदी पर चुटकी भी ली। राहुल गांधी ने नोटबंदी के फैसले की जमकर निंदा की। राहुल ने बताया कि नोटबंदी की वजह से जीडीपी में 2 फीसद की गिरावट आई। भारत में नई नौकरियां बिलकुल पैदा नहीं हो रही हैं। वहीं आर्थिक विकास की रफ्तार भी नहीं बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था को लेकर किए गए कुछ गलत फैसलों की वजह से किसानों की आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। राहुल ने ये भी कहा कि आज के दौर में नफरत और हिंसा की राजनीति हो रही है।


लेकिन यही बात बीजेपी को नागवार गुज़री। मंत्री स्मृति ईरानी ने इसे देश के अपमान से जोड़ दिया। कहने लगीं कि राहुल ने विदेश की धरती पर ये सब बोलकर भारत की नाक कटवा दी। वो भूल गए कि वोटर तो भारतीय ही हैं। वंशवाद को लेकर राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि उनकी पार्टी में परिवारवाद नहीं है। लेकिन राहुल का ये अमेरिका दौरा एक असफल वंश के तौर पर देखा जाना चाहिए।

राहुल के जीएसटी और नोटबंदी पर उठाए गए सवाल का जवाब देते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि 'कांग्रेस के नेतृत्व में जीएसटी की विफलता इस बात का संकेत थी कि कांग्रेस ने किसी भी राजनीतिक दल को विश्वास में नहीं लिया और न ही राज्यों का विश्वास जीत पाई। अगर राहुल गांधी सुनने के आदी होते तो जीएसटी यूपीए सरकार में ही लागू हो जाता। मैंने दोनों पक्षों की बात आपके सामने रखी। अगर पोस्टमार्टम करें तो कहीं से भी राहुल गलत नहीं दिखते। उन्होंने सही कहा कि सत्ता में रहने पर घमंड आ जाता है। ये बात उन पर लागू होती है और आने वाली सरकारों पर भी।

Sunday, September 3, 2017

राजनाथ ने मिर्ज़ापुरिया दिमाग़ से किया मोदी-शाह को चित्त

नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल विस्तार से कंबल ओढ़कर घी पीनेवाली राजनीति की पोल खुल गई। साबित हो गया कि पार्टी विद ए डिफरेंस यानी सबसे अलग दिखने का दावा करने वाली पार्टी में भी उसी तरह की घटिया राजनीति होती है, जो दूसरे पार्टिंयों में देखकर बीजेपी कोसती है। आइए आपको बताते हैं कि इस फेरबदल के पीछे की राजनीति।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मिलकर सरकार का चेहरा बदलने का फैसला किय। क्योंकि ये दोनों नेता जानते हैं कि इन तीन सालों में वो ऐसा कुछ भी नहीं कर पाए हैं, जो वादा करके आए थे। ना काला धन आया। ना महंगाई घटी। ना भ्रष्टाचार ख़त्म हुआ। ना बेरोज़ागरी मिटी। ना नौजवानों और ना किसानों के चेहरों पर मुस्कुराहट आई। तीन साल बीत गए। डेढ़-दो साल बचे हैं। लिहाज़ा छवि चमकाने की कोशिश हुई। दोनों ने इस फेरबदल के बहाने बड़े नेताओं के क़द को भी छोटा करने का फैसला कर लिया। जो नेता अगले लोकसभा चुनाव में मोदी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते थे, उन्हें ठंडे बस्ते में लगाने का फैसला कर लिया। तय कर लिया कि नीतिन गडकरी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, उमा भारती और राजनाथ सिंह को हाशिए पर डाल दिया जाए।
लेकिन इस राजनीति की भनक राजनाथ को लग गई। यूपी और वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे राजनाथ सिंह ने मिर्ज़ापुरिया खोपड़ी लगाई। जेटली, सुषमा और गडकरी से बात हो गई। तय किया गया कि मथुरा में संघ के सम्मेलन में वो नहीं जाएंगे। साफ संदेश देंगे कि वो नाराज़ हैं और संगठन में आने को तैयार हैं। सरकार में नंबर दो की हैसियत रखनेवाले राजनाथ यूपी के सीएम रह चुके हैं। दो-दो बार बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं। अगर मोदी ने विभाग बदला तो वो संगठन में आने को तैयार हैं। लेकिन अपनी पुरानी हैसियत पर। यानी मोदी के आंखों के तारे अमित शाह को आरएसएस अध्यक्ष पद से हटाकर सरकार में भेजे और उन्हे कुर्सी दिलवाए। अगर ऐसा भी होता तो बतौर अध्यक्ष राजनाथ – शाह की कान गर्म करते रहते। क्योंकि संविधान में साफ है कि मंत्रिमंडल का प्रधान यानी प्रधानमंत्री अपनी पार्टी अध्यक्ष का आदेश मानने को मजबूर है। राजनाथ का खेल संघ को पता चला। तय किया गया कि केवल जेटली से रक्षा मंत्रालय लिया जाए। वैसे भी जेटली इसे पसंद नहीं कर रहे थे। शाह और मोदी संघ की ये सलाह मानने को मजबूर हुए। लेकिन फिर भी एक दांव खेल दिया। दोनों जानते हैं कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कई लोग पीएम देखना चाहते हैं। आगे ख़तरा हो सकता है। इसलिए धीरे से ऐसे आदमी को मंत्री बनाया, जिससे योगी का 36 का आंकड़ा है। गोरखपुर वाले शिव प्रताप शुक्ल को वित्त राज्य मंत्री बनाकर योगी को संदेश दे दिया। एक समय था जब गोरखपुर में केवल हरिशंकर तिवारी और शिव प्रताप की तूती बोला करती थी। लेकिन जब योगी सांसद बने तो उन्होंने इन दोनों ब्राह्मणों को किनारे लगा दिया। बारह साल तक शिव प्रताप को गोरखपुर छोड़कर रहना पड़ा। अब आप समझ सकते हैं कि दोनों के रिश्ते कैसे होंगे। 


Saturday, August 26, 2017

हरियाणा में हिंसा का नंगा नाच के लिए तीन ज़िम्मेदार

हरियाणा जिस तरह से पूरी तैयारी के साथ अराजकता, हिंसा और क़त्ल ओ ग़रद का नज़ारा नज़ीर बनाकर देश में पेश किया गया, उसके लिए देश कभी बीजेपी और मोदी सरकार को माफ नहीं करेगा। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी किसी कोर्ट ने किसी भी प्रधानमंत्री को काम-काज करने क शऊर बताया हो। ये नज़ीर भी इस सरकार ने पेश कर दी। निर्दोषों की लाश, चीख-पुकार, आग-धुंए का गुबार देखने के बाद पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट को कहना पड़ा कि प्रधानमंत्री जी आप इस देश के पीएम हैं। बीजेपी के नहीं। पंचकूला और हरियाणा भी इसी देश का हिस्सा है।
इन लाशों के ढेर पर मेरी नज़र में तीन दोषी बैठे हैं। पहला, खुद रेप कांड का आरोपी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरुमीत राम रहीम सिंह इंसां है। दूसरी बीजेपी के नेता और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर हैं, जिनका पालन-पोषण संघ की शाखा में हुआ है। तीसरे दोषी इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने अपने आंखों के सामने ये सब होते देखा। घटना की निंदा कर अपना राजधर्म पूरा कर लिया।

हरियाणा, पंजाब और दिल्ली का बच्चा-बच्चा जानता था कि डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां के कोर्ट में पेश होने पर क्या-क्या हो सकता है। मीडिया और कोर्ट ने कई दिनों पहले ही इसकी आशंका जताकर सरकार को आगाह कर दिया था। लेकिन सरकार कान में तेल डालकर सोई रही।  सरकार इस क़दर हालात को नहीं संभाल पाई कि कोर्ट को कहना पड़ा कि जमा हो चुके लाखों डेरा समर्थकों को खदेड़ने में विफल डीजीपी को तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए। लेकिन कोर्ट से फटकार सुनने के बाद भी सरकार बेशर्मी पर उतारू रही। गृह सचिव अच्छे काम काज के लिए डीजीपी की पीठ थपथपाते रहे।
वोटों के लिए कोई सरकार किसी यौन अपराधी से इस तरह जुड़ सकती है, विश्वास नहीं होता। चुनाव से पहले डेरा प्रेमियों का वोट पाने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ही रेपिस्ट राम के दर तक हो कर आ चुके हैं। वो भी तब जब उनकी पार्टी से चुनकर प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी ने उसके खिलाफ सीबीआई को लगाया था। क्या मोदी और शाह राजनीति के इतने कच्चे खिलाड़ी हैं कि वो रेपिस्ट राम का करतूत नहीं जानते थे। साध्वियों को दर्द नहीं समझते थे। कहने में शर्म आती है लेकिन ये सच है कि सत्ता और वोट की लालच में दोनों ने धृतराष्ट्र बनने में ही भलाई समझी। हरियाणा सरकार, तमाम मंत्री और खुद मुख्यमंत्री सरकार के दरबार में शीश नवाने जाते ही रहते हैं। समझ में नहीं आता कि वोट बैंक का ऐसा आपराधिक मोह हमारी राजनीति को कहां ले जाएगा?
राम रहीम इसलिए इतना ताक़तवर, असरदार और दमदार बन पाया क्योंकि हर राजनीतिक पार्टी उसके चरणों में लोटती रही। पहले कांग्रेस ने ये नाटक किया। फिर ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल ने किया। अकालियों ने भी वही किया। वहीं काम अब वो पार्टी कर रही है, जो दावा करती है कि देश में आज वो सब हो रहा है, जो पहले साठ सालों में नहीं हुआ। देश बदल रहा है। अच्छे दिन आनेवाले हैं। ।

देश हरियाणा की हिंसा और निर्दोष नागरिकों की सड़कों पर प्रदर्शन के दौरान हत्या का घिनौना चेहरा  देख चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि मनोहर लाल खट्‌टर को बर्खास्त कर दें। खट्‌टर को चाहिए कि जाने से पहले डीजीपी को बर्खास्त कर दें। ये मांग उठने भी लगी है। इसमें राजनीति नहीं देखी चाहिए। सत्रह साल पहले जिस तरह से गुजरात दंगे के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म की याद दिलाते हुए बर्ख़ास्तगी की कार्रवाई शुरु की थी। बेशक़ लाल कृष्ण आडवाणी ने बचा लिया था। आज वही मंज़र ख़ुद मोदी के सामने हैं। आज वो प्रधानमंत्री हैं। खट्टर मुख्यमंत्री हैं। प्रधानमंत्री राजधर्म की नसीहत दे रहे हैं। देश की आंखें खुल चुकी हैं। प्रधानमंत्री जी अब आप भी आंखें खोलिए।