Wednesday, February 6, 2008

छोड़ दे आंचल , ज़माना क्या कहेगा

बात बहुत छोटी सी है। बात बहुत छोटे से मुद्दे की है। बात मेरे जैसे छोटी सोच वाले लोगों की है। ये छोटी सी बात मेरे दिल में नश्तर की तरह चुभती है। सोचा क्यों न नश्तर चुभोकर सारे मवाद बाहर निकाल दूं। इसलिए ये बात आपके सामने पेश कर रहा हूं। अगर बुरी लगे तो ंमुझ जैसे लाखों -करोड़ों गंवई-देहाती लोगों की सोच को माफ कर देना। अगर कहीं से भी , रत्ती भर जायज़ लगे तो इस पर ग़ौर करें। ये अब गुज़रे ज़माने की बात हो गई है। कभी आंचल, दुप्पटा या चुन्नी का इस्तेमाल आंखों की हया से परदा करने का था। लेकिन पता नहीं आंखें बेहया हो गईं, या फिर ज़माने ने हमें बेहया कर दिया कि बग़ैर दुप्पटे को किसी कन्या को देखने के बाद हमारी आंखे हया तलाशने लगती हैं। आप कह सकते हैं कि ब्लैक माइंड आलवेज़ थिंक ब्लैक थिंग। अब आंखे हैं तो सड़क पर चलते हुए टकरेंगे ही। बस में सफ़र करेंगे तो साथी पर नज़र जमेंगी ही। लेकिन अपन ठहरे गंवार और देहाती । क्या जाने फ़ैशन की बातें। ज़्यादातर जो लड़कियां अपन को दिखती हैं , वो बहुत पहले दुप्पटे को अपनी ज़िदगी से विदा कर चुकी हैं। वो परम आधुनिक कपड़ों में दिखती हैं। लिवाइस, ली कूपर, वरसाचे, गुची, जिवो और न जाने कैसे कैसे नाम बताती हैं, जिस मैं तो क्या तो मेरे मरहूम अब्बा भी कभी न सुने हों। ख़ैर, टी शर्ट भी तरह तरह की। तरह तरह की आकृतियां बनीं हुईं। तरह तरह के हरफ़ ख़ुदे हुए। एक टी शर्ट देखी। सीने पर उभरी मध्यमा ऊंगली कन्या की नज़रों से होते हुए आसमान से आंखे मिला रही है। साथ में अंग्रेज़ी में ये भी लिखा है- F…। मतलब तो कन्या ही जानें या वो जिसे इसका मतलब पहले से पता है। एक और टी शर्ट की बानगी देखिए- Single, but not available। और देखिए - BIG ENOUGH FOR YOU,Wanna PLAY with me?- जनाब टी शर्ट पर लिखा है तो पढ़ने के लिए ही लिखा होगा। जी भर कर बांचिए। फोटू देखिए। तरह तरह के आकार और प्रकार देखिए। शायद इसलिए दप्पटा नहीं है ताकि आप इसे पढ़ सकें और जी भरकर देख सकें। आंखों में हया आ जाए तो मध्य प्रदेश सरकार का विज्ञापन याद करें- आंखे फाड़ फाड़ देखो। हद तो देखिए कि कमबख़्त टी शर्ट रह रहकर तंग रकती है। रह रह कर सिकुड़ जाती है। बिचारी को बार बार खींच कर नीचे कर लेती है। आख़िर लज्जा ही तो नारी का गहना है। अब गहना उसकी है तो हिफ़ाज़त भी तो वही करेगी न। आ गई न शर्म. कर ली न आंखें नीचे। अब तो जी चाहता है कि आंखें फोड़ लूं। नज़रें नीची क्या हुईं। शर्म से गड़ गया। क्योंकि टी शर्ट के बाद अब डेनिम की पतलून चुहलबाज़ी करने लगी। रह रह कर सरक रही थी। अंर्तवस्त्र के कुछ हिस्से बाहर निकलकर नैना मिलाने को बेताब थे। इस नामुराद को बाद में पता चला कि नैना मिलाने का ये लेटेस्ट फैशन है। ख़ैर, कुछ ऐसी भी टकरती हैं जो पूरब है और न पच्छिम। वो पहनती तो सलवार कुर्ता ही हैं लेकिन दुप्पटे को ओढ़ने की बजाए कंधों पर टांग लेती हैं। मैने किसी से पूछा कि भाई साहब - ये कौन सा फैशन है। तो उनका जवाब था - BMT। मैने कहा कि इस फैशन का नाम तो पहली बार सुना है। उन्होने बताया- BEHANJI TURNING MOD। कहा कि - दादा बाबू - कोलकाता से बाहर निकलो। ये बड़ा शहर है। लोगो की सोच बड़ी है। दिल बड़ा है। सबकुछ बहुत बड़ा है। छोटी सोच से बाहर निकलो अगर बड़े शहर में रहना है तो। मैं उधेड़बुन में था। मेरा साथी गाते हुए कनॉट प्लेस की गलियों में खो गया- कब तक जवानी छुपाओगी रानी, कब तक क्वारों को तरसाओगी रानी...
मैं सोचने लगा कोलकाता का वो दिन.... क्या मारवाड़ी, क्या बंगाली और क्या बिहारी. क्या अमीर और क्या ग़रीब- जब सबकी बहन -बेटियां घर की दहलीज़ लांघती थीं तो सिर पर आंचल और सीने पर दुप्पटा होता था। शायद तभी ये गाना बहुत चला था- छोड़ दो आंचल , ज़माना क्या कहेगा। अब ज़माना क्या कहेगा और क्या कर लेगा जब आंचल ही न हो।

2 comments:

राज भाटिय़ा said...

आप लिखते बहुत अच्छा हे ओर सच भी,आप के अगले लेख का इन्तजार रहेगा,
कौन कहता है कि आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।
बहुत खुब
धन्यवाद

रवीन्द्र रंजन said...

बहुत अच्छा बहुत सच्चा लिखा है आपने। पहली बार पढ़ा आपको। अब पढ़ते रहेंगे। हमेशा।