Saturday, April 10, 2010

आक्रामक ममता बनर्जी को भी कोई नाथ सकता है


दूसरों के नाम में दम भरनेवाली तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी के भी नाक में कोई दम भर सकता है। ये बात अब साबित हो गई है। जादवपुर से तृणमूल कांग्रेस के सांसद कबीर सुमन ने ममता का जीना मुहाल कर दिया है। पहली बार नहीं है जब कबीर सुमन ने बीच बाज़ार में ममता की पगड़ी उछाली हो। हर बार ममता शर्मसार हुई हैं। लेकिन ममता इतनी लाचार हैं कि वो कबीर सुमन के ख़िलाफ कोई कड़ा फ़ैसला नहीं कर सकतीं। यहां तक कि न डांट सकती हैं और झिड़क सकती हैं। ममता बनर्जी अपने सांसद कबीर सुमन को लेकर केवल सुबक सकती हैं। वो अभी सबके सामने नहीं। अकेले में। हैरानी की बात है कि दूसरों को रूलाने का माद्दा रखनेवाली ममता बनर्जी इतनी लाचार क्यों हैं? आख़िर ये कबीर सुमन कौन सी बला है?

जावपुर संसदीय क्षेत्र से इस बार के लोकसभा चुनाव में कबीर सुमन जीत कर आए हैं। उन्होने सीपीएम के दिग्गज सुजन चक्रवर्ती को लगभग 56 हज़ार वोटों से हराया है। जीत के अंतर को देखकर लग सकता है कि कबीर सुमन खेले खाए राजनेता हैं, जिन्होने सीपीएम को दिग्गज को हराया। इस दिग्गज की पश्चिम बंगाल में वैसी ही छवि है, जैसे की बिहार में शहाबुद्दीन या उत्तर प्रदेश में अतीक़ अहमद की है। लेकिन असलियत तो ये है कि कबीर सुमन कोई राजनेता नहीं हैं। पहली बार उन्होने चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से चुनाव जीत गए। दरअसल कबीर सुमन एक पत्रकार थे, एक रंगकर्मी हैं और एक गायक हैं। गायक के तौर पर पूरे पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय हैं। जब वो गाते हैं, तब ज़माना उन्हे ग़ौर से सुनता है। जब बांग्ला अख़बार के लिए पत्रकारिता करते थे, तब से उनकी ममता बनर्जी से जान-पहचान हुई। लेकिन सिंगूर- नंदीग्राम आंदोलन के समय कबीर सुमन और लोकप्रिय हुए। अपने गानों से उन्होने राज्य की वाम मोर्चा सरकार की बखिया उधेड़ दी। इस आंदोलन की अगुवाई ममता बनर्जी कर रही थीं। आंदोलन में कई पत्रकार, साहित्यकार, रंगकर्मी , नाट्यकर्मी भी शामिल थे। ममता ने लोकसभा का टिकट पकड़ाया और वो लोकप्रियता की ट्रेन पकड़कर दिल्ली पहुंच गए।

कबीर ने फिर इस्तीफा दिया है। इससे पहले भी इस्तीफा दिया था। लेकिन इस बार माज़रा कुछ और है। जावपुर विश्वविद्यालय के छात्र नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे आपरेशन ग्रीन हंट का विरोध कर रहे थे। इसके लिए वो जगह- जगह पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इन छात्रों ने आपरेशन ग्रीन हंट का इसलिए भी विरोध किया क्योंकि पुलिस की गोलियों से विश्वविद्यालय के मेघावी छात्र अभिषेक की मौत हो गई। अभिषेक नक्सली हो गया था। नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन के समय वो सक्रिय रूप से भाग लिया। इसी दौरान वो नक्सिलयों के क़रीब आया। अपने प्रताप और ज्ञान से कुछ ही दिनों में किशनजी का ख़ास बन गया। अभी हाल ही में जब मिदनापुर में आपरेशन ग्रीन हंट के दौरान कोबरा की टीम और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई। उसमें विक्रम नाम के नक्सली के मारे जाने की ख़बर आई। ये विक्रम कोई और नहीं बल्कि अभिषेक ही था। नक्सलियों ने उसे विक्रम नाम दिया था।

छात्रों के इस आंदोलन में कबीर सुमन भी कूद पड़े। उन्होने भी छात्रों के साथ सुर में सुर मिलाकर आपरेशन ग्रीन हंट बंद करने की मांग कर दी। ये ज़िद उन्होने अपनी पार्टी की मुखिया ममता बनर्जी से भी कर दी। लेकिन ममता की मुश्किल ये कि सीपीएम और लेफ्ट ने पहले ही उन पर नक्सली समर्थक होने का आरोप लगाया है। अगर वो अपने सांसद की बात मानकर केंद्र से ऐसी कोई बात करती हैं तो साफ-साफ तौर पर साबित हो जाएगा कि वो नक्सिलयों से हमदर्दी रखती हैं। ऐसे में सीपीएम और लेफ्ट पार्टियां माइलेज लेने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेंगी। दूसरी परेशानी ये कि केंद्रीय गृह मंत्री बेहद ईमानदारी से नक्सलियों के ख़िलाफ़ आपरेशन ग्रीन हंट चलाए हुए हैं। उन्होने साफ तौर पर कहा है कि जह तक नक्सली हिंसा और हथियार छोड़ कर नहीं आते, तब तक उनसे कोई बातचीत नहीं होगी।

ज़ाहिर है कि ममता बनर्जी अपने सांसद की बात नहीं मान सकती। सांसद भी अपनी बात से टस से मस होने को तायार नहीं। उन्होने एसएमएस से इस्तीफा भेज दिया। शायद लोकतंत्र में पहली बार किसी सांसद ने एसएमएस से इस्तीफा भेजा होगा। छात्रों की मीटिंग में उन्होने एलान कर दिया कि उन्होने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी। क्योंकि पार्टी नक्सिलयों के खिलाफ हो रही हिंसा को नहीं रूकवाना चाहती। शायद पहली बार ममता ने सार्वजनिक तौर पर अपनी झल्लाहट दिखाई। ममता ने अपने सांसद को सेंसलेस करार दिया। ममता ने अपनी मजबूरी को रोना रोया। ममता दुहाई दे रही हैं कि कबीर के भेजे में बुद्धि डालने के लिए वो दादा प्रणब मुखर्जी के दर पर भी गईं। लेकिन कबीर के भेजे में कुछ नहीं आया।

हैरानी इस बात की है कि जिस दादा से दीदी की नहीं बनती। वो उस दादा के पास क्या सोच कर गई ? पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे में भी दादा-दीदी ख़ूब झगड़े थे। दीदी का आरोप था कि सीपीएम को फायदा पहुंचाने के लिए दादा टिकट बंटवारे में खेल कर रहे हैं। चुनाव के बाद ऐसा क्या हो गया कि दादा सीपीएम को नुक़सान पहुंचाने वाले प्राणी बन गए ? दूसरी बात ये कि कबीर सुमन अगर बिफरते हैं तो क्या वो सरकार के ख़िलाफ बिफरते हैं? जवाब है नहीं। वो अपनी पार्टी में बग़ावत कर रहे हैं। अपनी पार्टी के मुखिया के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। फिर किस हैसियत से दीदी कबीर को लेकर दादा के पास गईं ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका जवाब फिलहाल दीदी के पास नहीं है।

कबीर सुमन शांत प्रजाति के प्राणी नहीं हैं। इससे पहले भी उन्होने एक बार इस्तीफा दिया था। इस्तीफे से दीदी के पसीने छूट गए थे। कबीर सुमन ने आरोप लगाया था कि तृणमूल कांग्रेस का हर छोटा बड़ा नेता घूसखोर हो गया है। अदना से अदना कार्यकर्ता भी काम के बदले में घूस खा रहा है। ममता ईमानदारी का ढोल बंला में पीट रही हैं। सभाओं और जलसों से ये साबित करने पर तुली हैं कि लेफ्ट फ्रंट की सरकार ने पिछले तीस सालों में पश्चिम बंगाल को बेच खाया है। ममता के इस मुहिम को उनके ही सांसद पलीता लगा रहे हैं। कबीर सुमन के बयान से ऐसा लगता है कि सरकार में शामिल हुए अभी तृणमूल कांग्रेस के जुमा-जुमा चार ही दिन हुए हैं और ये लोग अभी से ही देश को लूट रहे हैं।

विधानसभा चुनाव सिर पर है। आज कबीर सुमन चीख रहे हैं। साबित करने में लगे हैं कि जिस नक्सिलयों की मदद से दिल्ली में दीदी की पार्टी राज पाट कर रही है। आज उसी नक्सलियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। इस प्रताड़ना में ममता बनर्जी भी शरीक हैं। वो चाहें तो मनमोहन सरकार को रोक सकती हैं। लेकिन सत्ता की मलाई खाने में लगी ममता को अब नक्सिलयों की फिक्र कहां। दूसरी तरफ , सुमन ये भी साबित करने में लगे हैं कि तृणमूल कांग्रेस के नेता भ्रष्ट हो गए हैं। मंत्री से लेकर संतरी तक रिश्वत खा रहा है। ऐसे में विधानसभा चुनाव में ममता को अपनी साख बचाए रखना बेहद मुश्किल लग रहा है। क्योंकि सीपीएम उनके ही सांसद के बयान को लेकर जनता के बीच जाएगी। हंसते हुए कहेगी कि ये आरोप सीपीएम का नहीं है। ये आरोप उस आदमी का है, जो वर्षों तक ममता के साथ रहा है। ममता की पार्टी का सांसद रहा है। ऐसे मं ज़रूरी है कि बंगाल जीतने का सपना पालनेवाली ममता समय रहते कबीर को क़ाबू कर लें।

Monday, January 18, 2010

सोनिया का त्याग मजबूरी थी और ज्योति बाबू का त्याग आदर्श


अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि ज्योति बसु को इतिहास किस तरह से याद करेगा। क्योंकि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु के व्यक्तित्व बहुत सारे आयाम हैं। इनमें से किसी एक को केंद्र में रखकर ज्योति बसु का ख़ाका तैयार करना आसान नहीं है। ज्योति बसु के व्यक्तित्व, प्रशासन और पार्टी में में नेतृत्व क्षमता का आंकलन करना सहज नहीं है। लेकिन इतना तो तय है कि इतिहास के पन्नों में वो प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकरानेवाले पहले और आख़िरी राजनेता के तौर पर याद किए जाएंगे। वैसे प्रधानमंत्री की कुर्सी तो सोनिया गांधी ने भी ठुकराई। लेकिन उसकी तुलना ज्योति बसु से नहीं की जा सकती। क्योंकि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री को लेकर विरोध था। सोनिया ने बेशक़ प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकराई हो। लेकिन उन्हे मालूम था कि इस पद के लिए उनके सामने कई ब्रेकर हैं। कभी पार्टी के अंदर ही विदेशी मूल का मुद्दा झेल चुकी सोनिया गांधी विपक्ष के भी निशाने पर थीं। लेकिन ज्योति बाबू के सामने कोई अवरोध नहीं था। वो चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे। दुनिया कुर्सी के पीछे भागती है और ज्योति बसु के पीछे प्रधानमंत्री की कुर्सी भाग रही थी। लेकिन पार्टी के अनुशासन में बंधे ज्योति बसु ने मोह तजना ही बेहतर समझा।
देश अभी खिचड़ी सरकार का अनुभव ले रहा था। इस तरह का अनुभव देश ने मोरारजी देसाई और चरण सिंह के भी दौर में देखा था। लेकिन 1996 का दौर काफी बदल चुका था। देश ने दो और समाजवादियों की खिचड़ी सरकार का अनुभव हासिल कर लिया था। विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों से जी खट्टा हो चुका था। देवेगौड़ा की मजबूरियों को भी लोगों ने देखा। ऐसे में सबको समझ में आया कि अगर ज्योति बसु के हाथ में देश की कमान दी जाए तो वो आसानी से सरकार चला लेंगे। लोगों को ये भरोसा उनके मुख्यमंत्रित्व काल से हो गया था। जब कई पार्टियों की मिल जुली सरकार कुछ ही महीने में भरभरा जाती थीं। तब ये बंगाल का लाल बड़ी शान से कई पार्टियों की बाहें थामें नया रेकॉर्ड बना रहा था। ये हुनर ज्योति बसु में ही था कि आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक औऱ सीपीआई को साथ लेकर बग़ैर किसी टांय-टांय के सरकार चला लें। ज्योति बसु की इस इमेज के लिए प्रमोद दास गुप्ता, सरोज मुखर्जी, शैलेन दासगुप्ता औऱ अनिल बिश्वास ने भी ख़ूब मेहतन की। ज्योति बसु का क़द संगठन से भी बड़ा बनाने की कोशिश हुई। लेकिन जिस पार्टी ने ज्योति बसु की इमेज पार्टी से भी बड़ा करने के लिए दिन- रात एक की, उसी पार्टी ने रातों –रात अपने महानायक दो देश की सत्ता की सबसे बड़ी कुर्सी ठुकराने को कहा। ज्योति बसु में भी इतना सत्साहस था कि उन्होने पार्टी के आदेश को सिर माथे से लगाया। लेकिन साथ ही चेता भी दिया कि पार्टी ने ऐतिहासिक भूल की है।
ज्योति बसु की फितरत थी सत्ता से टकराने की। उनकी ये ख़ासियत थी कि सत्ता से टकराने के बावजूद सत्ताधारी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनसे सलाह लेने के लिए चल कर आते भी थे। ज्योति बसु से पहले और बाद में ये सुख किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को नसीब नहीं हुआ है। देश में चाहें इंदिरा गांधी की सरकार रही हो, राजीव गांधी की रही हो, नरसिम्हा राव की रही हो या फिर वीपी सिंह या चंद्रशेखर की सरकार रही। सबको कभी न कभी ज्योति बसु के पास चल कर आना ही पड़ा है।
टकराने की ये आदत ज्योति बसु की बहुत पुरानी रही है। 1957 से लेकर 1967 तक के दौरान टकराने की शैली ने उनका क़द बाक़ी नेताओं से बड़ा कर दिया था। कांग्रेस से अलग होने के बाद बनी मिली जुली सरकार में उन्हे पहली बार मंत्री बनने का सुख मिला। पद मिला श्रम मंत्री का। श्रम की अहमियत को ज्योति बाबू ने ख़ूब समझा। मंत्री होने के बावजूद ज्योति बाबू ने उद्योगपतियों को नकले कस दी। मेहनतकश मज़दूरों के हक़ की लड़ाई लड़ी। ज्योति बाबू की पहचान घेराव मंत्री की हो गई। इसके बाद अगली सरकार में उनका विभाग बदला दिया गया। उन्हे परिवहन मंत्री बनाया गया। परिवहन मंत्री बनने के बाद कोलकाता ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का नक्शा बदलने की बीड़ा उठाया। राज्य आज भी उस परिवहन आंदोलन को याद करता है। सोच आगे की थी इसलिए सत्ता से टकराने में कभी हिचकिचाए नहीं। राजीव गांधी सरकार से हल्दिया पेट्रो केमिकल्स के लिए मदद मांगी। अपने समय की दूरगामी और अतिमहात्वाकांछी अभियान था। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने राज्य की वान मोर्चा सरकार को मदद करने से मना कर दिया। इसके बाद ज्योति बाबू ने जो कर दिखाया, उसे देखकर कांग्रेस भी शर्मिंदा हुई। इस परियोजना के लिए ज्योति बसु ने लोगों से मदद की अपील की। लोगों ने ख़ून बेचकर सरकार को पैसा दिया। सरकारी और ग़ैर सरकारी कर्मचरारियों के एक दिन की पगार दी। आख़िरकार हल्दिया पेट्रोकेमिकल बन कर तैयार हो गया। ये अलग बात है कि वो ज्योति बाबू के सपने को साकार नहीं कर सका।
टकराने की इसी आदत से बंगाल मीडिया का एक बड़ा तबका उनसे खुश नहीं रहता था। ज्योति बसु ने कभी इसकी परवाह भी नहीं की। ज्योति बसु का मानना था कि उनका राफ्ता जनता से है। ऐसे में उन्हे किसी को माध्यम बनाने की ज़रूरत नहीं है। ज्योति बसु का यही बेबाकीपन मीडिया का सालता रहा। मीडिया ने ज्योति बसु की आलोचना करने का कोई मौक़ा गंवाया भी नहीं। अस्सी के दशक के आख़िरी दिनों की बात है। बंगाल के एक बहुत बड़े अख़बार घराने के एक पत्रकार संस्थान से अलग होने के बाद अपना एक अख़बार शुरू किया। धीरे-धीरे अख़बार चल पड़ा। इस अख़बार ने नारा ही दिया था कि वो केवल भगवान से डरता है। अख़बार ने सरकार, सीपीएम और ख़ास तौर पर ज्योति बसु को निशाना बनाना शुरू किया। आज की एक महिला केंद्रीय मंत्री तबके कांग्रेस नेता सुब्रतो मुखर्जी नामक बरगद के सहारे बेल बनकर फल फूल रही थीं। अख़बार का उस नेत्री के साथ अच्छा राफ्ता बन गया। बात जब हद से आगे बढ़ गई तब ज्योति बसुने ख़ुलासा किया कि बड़े घराने के अख़बार समह से निकलने के बाद वो पत्रकार-संपादक महोदय उनके पास मदद मांगेन आए थे। उन्होने उसे सस्ती दर पर न केवल सरकारी ज़मीन दी। बल्कि प्रिटिंग प्रेस खोलने के लिए बैंक से लोन दिलाने में मदद भी की। ज्योति बसु के इस बयान के बाद अख़बार ने माना कि वो मुख्यमंत्री के पास मदद के लिए गया था। लेकिन पत्रकारिता के उद्देश्य से न भटकने की बात की। वो अख़बार 1987 से लगातार हर बार वाममोर्चा के हारने और महिला नेता के मुख्यमंत्री बनने की मुहिम छेड़ता है। ज्योति बसु के निधन के बाद भी उस अख़बार ने पहले पन्ने पर ये सवाल खड़ा किया कि सीपीएम को अब आक्सिजन कौन देगा ? क्योंकि ज्योति बसु के आक्सिजन से पार्टी चलती थी। ज्योति बसु भी आख़िरी के सत्रह दिनों आक्सिजन के सहारे ज़िंदा रहे।
मीडिया के इसी रोल से ज्योति बसु लगातार चिढ़ते रहे। एक बार सार्वजनिक मंच से उन्होने मीडिया के लिए अपशब्द कहे थे। मीडिया को बहुत बाद में अहसास हुआ कि उन्होने संस्कृत में उन्हे अपशब्द कहे हैं। एक बार ऐसे ही एक महिला नेता राइटर्स बिल्डिंग पहुंच गई। तब वो केंद्र में राज्य मंत्री थीं। सचिवालय पहुंचकर उन्होने हंगामा शुरू कर दिया। एक सीनियर आईपीएस अफसर ने रोकने की कोशिश की तो मंत्री का हूल देते हुए उसे थप्पड़ मार दिया। मीडिया का एक भी कैमरा मार खाते अफसर के लिए नहीं चमका। लेकिन जब उस अफसर ने महिला मंत्री की पिटाई शुरू की तो दनादन फ्लैश चमकने लगे। आपा खो चुके अफसर ने मीडिया को भी नहीं बख़्शा। बहुतों के हाथ –पैर टूटे। मीडिया ने सरकार से माफी मांगने को कहा। दी –तीन दिनों तक धरना-प्रदर्शन भी किया। लेकिन सरकार ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया।
ज्योति बाबू ने व्यक्तिगत जीवन में समझौता नहीं किया। ज्योति बसु ने कभी धर्म-कर्म में यक़ीन नहीं किया। वो धर्म के विरोधी नहीं थे। लेकिन कट्टर धार्मिकता के घोर विरोधी थे। एक बार उनकी पत्नी कमला बोस ने तारकेश्वर जाकर पूजा करने की ठानीं। ज्योति बसु ने उन्हे रोका नहीं। लेकिन सरकारी गाड़ी देने से मना कर दिया। कमला बसु को लोकल ट्रेन से तारकेश्वर जाकर पूजा करनी पड़ी। अख़बारों ने इस बात को ख़ूब उछाला कि कॉमेरेड ज्योति बसु की पत्नी ने पूजा की। लेकिन किसी अख़बार ने ये नहीं छापा कि मुख्यमंत्री की पत्नी लाल बत्ती वाली या किसी और गाड़ी से तारकेश्वर क्यों नहीं गई ?
ज्योति बाबू पर मीडिया ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का कोई मौक़ा भी नहीं छोड़ा। सबेस पहले तो ये अभियाना चलाया गया कि पूरे राज्य को कॉमरेड बनाने का बीड़ा उठानेवाले ज्योति बसु अपने इकलौते बेटे को कॉमेरड क्यों नहीं बना पाए ? चंदन बसु क्यों उद्योगपति बन गए ?
हद तो तब हो गई जब राज्य के लोक निर्माण मंत्री और आरएसपी नेता जतिन चक्रवर्ती ने आरोप लगा दिया कि ज्योति बसु की जानकारी में बंगाल लैंप घोटाला हुआ है। मीडिया महीनों बसु के पीछे पड़ा रहा। रोज़ नए-नए घोटाले खोजे जाने लगे। लेकिन बसु ने सफाई नहीं दी। विधानसभा के अंदर तब के कांग्रेस नेताओं (अब के तृणमूल नेताओं ) ने हंगामा किया। ज्योति बसु सयंत रहे। लेकिन जब कांग्रेस विधायकों का शोर कम नहीं हुआ तो उन्होने सदन के अंदर साफ-साफ कहा कि अंदर आपलोग मेरे बेटे के लिए हंगामा करते हो। बाहर उससे दोस्ती निभाते हो। उन्होने सख़्त लहज़े में कहा कि उन्हे मालूम है कि चंदन बसु के साथ कौन-कौन नेता कहां शाम गुज़ारता है। लेकिन वो बोलेंगे नहीं। इतना सुनता ही विधानसभा में सन्नाटा पसर गया। एक दिन ज्योति बसु ने जतिन चक्रवर्ती को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया। जतिन उर्फ जैकी दा ज्योति बाबू के अच्छे दोस्तों में से थे। मरने से पहले उन्होने एक इंटरव्यू में साफ कहा कि बंगाल लैंप घोटाले में ज्योति बाबू का कोई लेना –देना नहीं था। उनका बेटा टेंडर भरने आया था। वो उसे बचपन से जानते हैं। उन्होने चंदन बसु को टेंडर दिलाने में मदद की। लेकिन ये सब ज्योति बसु की जानकारी या निर्देश के बग़ैर हुआ। यानी जो दाग़ मीडिया ने ज्योति बाबू पर लगाए थे, उसे जैकी दा ने जाते-जाते साफ कर दिया।
ज्योति बाबू उत्तर चौबीस परगना के सतगछिया विधानसभा से लगातार चुनाव जीतते रहे। ममता बनर्जी ने कई बार उन्हे अपने ख़िलाफ लड़ने के लिए दक्षिण कोलकाता बुलाया। लेकिन ज्योति बाबू ने इसका जवाब देना भी ज़रूरी नहीं समझा। ममता ने अपनी सबसे ख़ासम ख़ास सहेली सोनल को सतगछिया से मैदान में उतार दिया। सोनल के उम्मीदवार बनने के बाद ज्योति बसु ने बयान दिया कि अब वो प्रचार करने भी नहीं जाएंगे। अब जनता को तय करना है कि वो किसे अपना नुमाइंदा बनाना चाहती है। ममता और कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं ने सतगछिया में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया। नतीजे चौंकाने वाले आए। इतनी कोशिश के बाद भी ममता की ख़ास सहेली बहुत भारी मतों के अंतर से चुनाव हार गई थीं।
भारतीय राजनीति में कई कारणों से ज्योति बाबू को हमेशा याद किया जाएगा। जिस राज्य में जहां कभी कांग्रेस का एक छत्र राज होता था। उस राज्य से कांग्रेस का नामो निशान मिट गया। कांग्रेस को वो राज हासिल करने के लिए ममता बनर्जी का सहारा लेना पड़ रहा है। ये वही ममता हैं, जो कभी बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं। ज्योति बाबू एक ईमानदार राजनेता और मुख्यमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे, जिन्होने एक पैसा भी अपने लिए नहीं बनाया। ज्योति बाबू प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकराने के लिए भी याद किए जाएंगे। क्योंकि उनका त्याग यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से बिलकुल अलग था।

Tuesday, November 17, 2009

नोएडा से चलनेवाली मेट्रो के क़िस्से


मेट्रो रेल इनदिनों नोएडा भी आने जाने लगी है। इसी के साथ मेट्रो में तरह तरह के प्रजाति के प्राणियों के दर्शन होने लगे हैं। उनकी हरकतें कई बार हंसाती हैं, कई बार गुदगुदाती हैं और कई बार खीज पैदा करती हैं। नियमित मेट्रो में सफर के दौरान कई बातें अक्सर मैंने नोट की है, जिसे मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।
मेट्रो रेल शुरू होते ही नोएडा के लोगों को अचानक लगा कि वो अब अमेरिका और इंग्लैंड के वासी हो गए हैं। सिटी सेंटर से मेट्रो रेल जब रवाना होती है तब उसमें कई तरह की सवारी होती है। कई ऐसे परिवार होते हैं, जिनके लिए मेट्रो से सफर करना हवाई जहाज़ के बराबर है । इनमें मध्यम वर्गीय परिवार है, निम्न मध्यम वर्गीय भी है और उच्च वर्गीय भी। सब एक साथ एक ट्रेन के एक कोच में। बस कपड़े लत्ते से फर्क़ कर लीजिए। उच्च मध्यम वर्गीय के पुरूष कैपरी, बारमुडा या फिर ट्रैक सूट में। हाथ में अंग्रेज़ी को कोई मोटी सी उपन्यास। महिलाएं जींस टीशर्ट के अलावा सलवार कुर्ता या फिर साड़ी में लखदख। सम कुछ चमचमाती हुई। उंगलियों में हीरे की कई सारी उंगुठियां। गले में चमकता हीरा। बातचीत में हिंदी के शब्दों से नफरत। बोटनिकल गार्डन से ऐसे ही एक बुज़ुर्ग, एक युवा, एक युवती और दो बूढ़ी महिलाएं। रेल के पहले कोच में इंटर करते हैं। बाई तरफ बोर्ड लगा है- विकलांग, बुजुर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षित। इस तरह की आरक्षित वाली कई सीटें हैं। ये सीटें लगभग खाली हैं। लेकिन उनकी नज़र जाती है अनारक्षित सीटों पर। सीट पर कोई दैनिक आफिस यात्री बैठा है। बुज़ुर्ग उससे कहता है – प्लीज़ , नाऊ यू गेट अप। उसने पूछा –क्यों? जवाब- कॉज़, आई एम ओल्ड यार। जस्ट सी, व्हाट रिटेन आन योर बैक सीट- प्लीज आफर दिस सीट हू नीड। अंग्रेज़ी में अकबकाया वो दैनिक यात्री खड़ा हो जाता है और अंग्रेज़ी पढ़ने और पढ़ाने वाले सारे लोग एक एक करके सबको खड़ा कर बैठ जाते हैं। अब इनकी बातचीत शुरू होती है। आई जस्ट पार्कड माई कार एट रजिंदर प्लेस। वी ओल्ड पिपुल कैन अल्सो इंजोय द राइड न। ये सुनकर युवती खिलखिला पड़ती है। संभवत ये युवती उनकी बहू या बेटी है। तभी फ्रेंच कट युवक अपने ब्लैक बेरी से फोन करता है- ओह पापा- फक। आई फॉरगेट टू कैरी में कैम। यू डू वन थिंग । व्हाट विच कैमरा ? पापा, यू आर सो डंब। यू रिमेंमबर दैट नाइट वेन आई वाज़ स्लीपिंग एंड यू टोल्ड मी दैट यू गॉट द कैमरा। आई कैप्ट इन योर वार्डरोब। ओह , या या । दैट्स राइट। प्लीज़ कीप विद यू । आई वैल टेक इट लेटर आन। बाई । अब बारी है बूढ़ी महिलाओं की । सी वी आर गोइग बैक टू होम। लैट्स गो टू बाराखंबा । वी वैल हैव सम समोसाज़। दैट ब्यॉय मेक वैरी टैस्टी समोसाज़। एंड यू नो दे सर्व सिज़लिंग सॉस चटनीज़ अल्सो। लेट्स गो देयर। बुज़ुर्ग ने हामी भर दी।
इसी कोच में नोएडा के कुछ मध्यम परिवार के लोग हैं और कुछ मनचले लड़के भी। कपड़े –लत्तों से लड़के काफी मार्डन लग रहे हैं। लेकिन सबके जूते एक जैसे हैं। इन लड़कों की नज़र अचानक एक विदेशी जोड़े पर पड़ गई। इन आठ दस लड़कों ने लड़के-लड़की को फोटो खिंचाने के लिए धर लिया। वो चीख रहे हैं- हे वाट यू आर डूइंग। डोट टच मी। कीप अवे। छोरे चीख रहे हैं- भइइ, फोटू ही तै खिचवाणी है। सब एक साथ ठहाके भी मार रहे हैं। सारे लोग देख रहे हैं। लेकिन कोई जा नहीं रहा। बस सब फुसफुसा रहे हैं- नवादा –होशियारपुर के जाट गूर्जर के छोरे होंगे। तब तक ये लड़के दोनों पर काबू कर लेते हैं और दनादन कई फोटो खींच लेते हैं। सबेस ज़्यादा फोटो लड़की के साथ खिंचवाई गई। फिर वो सेक्टर 18 के स्टेशन पर फतर गए।
एक परिवार मध्यम वर्गीय है। देख के लगता है कि खाने पीने की कमी नहीं होगी। ये परिवार मेट्रो की सुंदरता की तारीफ सुरू कर देता है। इस अंदाज़ में मेट्रो के पीआरओ भी तारीफ नहीं कर पाएंगे। देख भाई, पिलाटफारम कित्ता चमक रहा है सै। भाई, साफ सफाई कराण वास्ते लोगण को लगा रखा सै। ई दरवज्जा ते देख णा, कोई दब दुबा न जाव्वै।
इन गप्प सड़ाक्कों के बीच ट्रेन मयूर विहार मेट्रो स्टेशन पहुंच जाती है। सूट-बूट और ब्रीफकेस के साथ सैकड़ों लोग सवार होते हैं। ट्रेन में अब तिल रखने की ज़रूरत नहीं। बस जो जहां है, वहीं खड़ा है। टस से मस नहीं हो सकता। ट्रेन अब यमुना बैंक से आगे बढ़ चुकी है। बीच के किसी स्टेशन से सवार हुए तीन चार लड़के एक दूसरे की ज्ञान बढ़ाने में लग जाते हैं। एक- यहीं से मेट्रो का केबल चोरी हो गया था। दूसरा- अबे फेंक मत। तुझे कैसा पता ? पहली बार तो तू हम लोग के साथ जा रहा है। पहला- नहीं यार, पेपर में ख़बर आई थी। चोरों ने केबल चोरी कर ली थी। पूरी देश की अर्थवव्यस्था गड़बड़ा गई थी। दूसरा- देश की अर्थव्यवस्था कैसे गड़बड़ाई बे? तेरे को कैसे मालूम? पहला- अर्थिंग का केबल चोरी हुआ था न। इंद्रप्रस्थ स्टेशन आने तक अब सारे लोगों की आवाज़ दब जाती है। सुनाई देता केवल शोर। भई, थोड़ा आगे बढ़ो। घुसने तो दो। हां भई, उतर जाना प्रगति मैदान । रोक थोड़ी न रखा है। थोडा और आगे खिसको। पीछे वाला अलग आवाज़ लगा रहा है- क्या आपको प्रगति मैदान उतरना है ? नहीं तो फिर आग क्यों खड़े हैं? पीछे जाइए। उतरने दीजिए। मेट्रो की ये ट्रेन द्वारका की ओर चल पड़ती है।

Thursday, August 13, 2009

मीडिया ने देश में क्यों फैलाया स्वाइन फ्लू का डर ?


जिसे भी हल्का सा बुख़ार हो, बदन में दर्द हो, एक –दो बार उल्टी हो गई हो, आंखों में जलन हो, खांसी हो रही हो और हो सकता है कि नाक भी बह रही हो- पक्का मानिए स्वाइन फ्लू हो गया है। इन लक्षणों को डॉक्टर बेशक़ स्वाइन फ्लू न मानें लेकिन हमारी मीडिया ने इन लक्षणों को स्वाइन फ्लू मान लिया है। इस देश में कुछ अख़बारों और न्यूज़ चैनलों ने स्वाइन फ्लू का ऐसा हौव्वा खड़ा किया है, मानों पूरे देश में महामारी फैल गई हो। हर आदमी डरा सा नज़र आता है। इन लक्षणों में एक भी लक्षण दिखते ही वो डॉक्टरों के पास भागा-भागा जाता है सिर्फ ये पता लगाने के लिए उसे स्वाइन फ्लू है या नहीं?
बीते शुक्रवार को बेटे को बुखार हुआ। पेट में दर्द भी था। एक दो बार उल्टी- दस्त की शिकायत भी हो चुकी थी। इस तरह से वो पहले भी बीमार पड़ता था। मैं उसे चैरीकॉफ और NICE सिरप देता था। वो ठीक हो जाता था। इस बार मैंने इन दवाओं को खुद देने का ज़ोखिम नहीं उठाया। डॉक्टर के पास ले गया । डॉक्टर ने फिर यही दवाएं लिखीं। मैंने डॉक्टर से परेशान होकर पूछा कि लक्षण तो स्वाइन फ्लू से मिलते –जुलते हैं। तो फिर आप टेस्ट क्यों नहीं करते ? डॉक्टर ( जो मेरे घनिष्ठ मित्र भी हैं) ने कहा कि ज़रूरत पड़ी तो जांच भी कर लूंगा। मंगलवार तक बेटा ठीक हो गया। मंगलवार को ही ये लक्षण मुझमें दिखने लगे। एक अंतर ये था कि बदन में बहुत दर्द था। मैं फिर उसी डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने वाइरल की रूटीन दवाएं दीं। मैं भी एक दो दिन में ठीक हो गया। लेकिन इन दो –चार दिन मैं स्वाइन फ्लू के आतंक से परेशान रहा।
अब नज़ारा सरकारी अस्पताल का। रविवार को केंद्रीय गृह स्वास्थ्य मंत्री श्री ग़ुलाम नबी आज़ाद का बयान आ गया कि कोई भी प्राइवेट अस्पताल जांच से मना नहीं कर सकते। मैंनें अपने डॉक्टर को ये बताया। वो मुस्कुराए। बोले – मीडिया का होकर भी नेताओं का बयान नहीं समझते। क्या किसी मंत्री के कह देने भर से इलाज शुरू हो जाएगा। हम क्या कर सकते हैं- हद से हद सबसे पहले आशोलिशन वार्ड बना देंगे। नर्सों और डॉक्टरों को ट्रेनिंग दे देंगे। लेकिन टेस्ट के लिए जो किट चाहिए – वो कहां से आएगा ? वो हमें केवल सरकार ही दे सकती है। अभी तक ये सरकार ने हमें ये नहीं बताया है कि एक किट पर कितना ख़र्च आएगा ? क्या सरकार इस बीमारी को महामारी मानकर कोई सब्सिडी देगी ? अभी तक सरकार से किसी निजी अस्पताल का इस बाबत कोई तालमेल नहीं हुआ है। फिलहाल इसका टेस्ट केवल सरकारी अस्पतालों में ही हो सकता है। अब देखिए नोएडा का सरकारी अस्पताल।
नोएडा के सेक्टर 39 का सरकारी अस्पताल। दिल्ली के सरकारी अस्पताल इसके सामने फोर्टिस या अपोलो और मैक्स की तरह नज़र आते हैं। अस्पताल में भारी भीड़। इतनी भीड़ शायद कभी होली – दीवाली के समय ट्रेन के लिए होती होगी। अस्पताल में ही पता चला कि वैसे तो आम तौर पर इस अस्पताल में पास-पड़ोस के गांवों के लोग दिखाने आते हैं। पहली बार इस अस्पताल परिसर में बड़ी-बड़ी गाड़ियां और बड़े लोग नज़र आ रहे हैं। जान-पहचान निकालने के बाद चौकानेवाले तथ्य सामने आए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि सुबह 9 से 11 बजे के बीच वो अमूमन 700 मरीज़ों को देख रहे हैं। सबकी ज़िद है कि स्वाइन फ्लू टेस्ट करो। लक्षण सबके सामान्य वायरल के हैं। अस्पताल में स्वाइन फ्लू जांचने के लिए केवल 22 किट हैं। इन 22 किट में से किसको-किसको जांचा जाए। किट ख़त्म हो जाए तो फिर कहां से आए। लिहाज़ा डॉक्टरों ने जुगाड़ निकाल लिया है। अभी तक ज़्यादातर मरीज़ों को नहीं मालूम कि इसकी जांच कैसे होती है। डॉक्टर अपने हिसाब से जाच कर मरीज़ों को संतुष्ट कर देते हैं।
आख़िर , हमारे देश में स्वाइन फ्लू को लेकर इतना भय क्यों हैं ? ये मीडिया की देन है और मीडिया अपनी इस नकारात्मक भूमिका से बाग भी नहीं सकता। हर एक घंटे पर ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी- अभी –अभी पुणे में स्वाइन फ्लू से 1 और की मौत। ये लाल पट्टी देख-देखकर लोगों का लाल खून सफेद पड़ गया है। तरह –तरह के डॉक्टरों को पकड़ कर स्टूडियों में बिठा रखा है। बताते कम हैं और डराते ज़्यादा है। ये डॉक्टर और चैनल ये नहीं बताते कि जहां से बीमारी शुरू हुई, वहां कितने लोग मरे। कितनी बीमार हुए और कितने ठीक हुए। अगर ये बता दिया को दुकान नहीं बंद हो जाएगी?
स्वाइन प्लू की शुरूआत अमेरिका से हुई। मेक्सिको से शुरू हुई यह बीमारी अब तक दुनिया के 167 देशों में फैल चुकी है। अब शुरूआत अमेरिका से । अमेरिका में लगभग 6500 लोगों को स्वाइन फ्लू हुआ। इस फ्लू की वजह से लगभग 436 लोगों की मौत हुई। यानी 6064 लोग इस स्वाइन फ्लू से बच कर निकले। अर्जेटीना में 7 लाख 60 हजार लोगों को स्वाइन फ्लू हुआ। केवल 337 लोगों की मौत हुई। संक्रमण और मौत के बीच का अंतर देखिए। आस्ट्रेलिया में करीब 25 हजार लोगों को स्वाइन फ्लू है। केवल 85 लोगों की मौत हुई है। ब्रिटेन में एक लाख से ऊपर लोगों को ये बीमारी हुई है और केवल 36 लोगों की मौत हुई है। भारत में अभी स्वाइन फ्लू केस की संख्या एक हज़ार के पार भी नहीं हुई है। मौत की भी संख्या 17 है। फिर भी हाय तौबा। आख़िर इस भय का वातावरण पैदा करने वाले कौन लोग हैं ? इससे उनके क्या फायदा है ? किसी को डराने का सुख तो केवल सैडिस्ट नेचर में होता है। क्या इस नेचर के लोग भय का माहौल पैदा कर रहे हैं ? या फिर इसके पीछे विशुद्ध धंधे और मुनाफे का खेल है। डराओ और पैसे बनाओ ?

Friday, July 3, 2009

रेल बजट से साबित हुआ ममता और लालगढ़ का रिश्ता


पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट को झटका देने का तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और रेल मंत्री ममता बनर्जी कोई भी मौक़ा नहीं छोड़ रही। चाहें इसके लिए उन्हे रेल बजट की ही आड़ क्यों न लेनी पड़े। इसमें कोई शक़ नहीं कि तैंतीस साल बंगाल में राज कर रहे लेफ्ट फ्रंट को ममता बनर्जी लगातार पानी पिला रही हैं। हालिया लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा का क़िला ढ़हाने के बाद ममता ने नगरपालिकाओं के भी चुनाव में वाम मोर्चा को पटखनी दी हैं। लेकिन वाम मोर्चा को हाशिए पर लाने और मुख्यमंत्री बनने की छटपटाहट में रेल बजट का इस्तेमाल करना कहां तक सही है।
रेल मंत्री के रेल बजट को ग़ौर से देखिए- पता चलेगा कि ममता ने कितने प्यार से अपने विरोधियों की रेल बनाई है। ममता का खेल समझने से पहले एक बार रेल मंत्रालय का हिसाब किताब समझ लेते है। देश में कुल 6909 रेलवे स्टेशन हैं। इनमें से 1721 स्टेशन कंप्यूटर से जुड़े हुए हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि इन 1721 स्टेशनों पर ही कंप्यूटर से रिज़वर्शन होता है। आधुनिक भारत में बाक़ी 5188 रेलवे स्टेशनों का हाल राम भरोसे हैं। सवाल ये है कि इन 5188 स्टेशनों के मुसाफिर भी बाक़ी मुसाफिरों की तरह किराया देते हैं। लेकिन उन्हे वो सुविधाएं स्टेशनों पर नहीं मिलती, जिसका फायदा बाक़ी के स्टेशनों के मुसाफिर उठाते हैं। यानी आज़ादी के 62 साल बाद भी देश के 5188 रेलवे स्टेशनों की हालत वैसी ही है, जैसा कि अंग्रेज़ छोड़ गए थे।
अब रेल का ख़र्चा पानी का हाल समझ लेते हैं। रेलवे कर्मचारियों की तनख़्वाह की हम बात नहीं करेंगे। न ही उनको मिलने वाले डीए की। हम बात करेंगे साल में एक बार मिलनेवाली सुविधा की। रेल मंत्रालय अपने हरेक कर्मचारी को साल में एक बार फ्री पास देता है, जिसमें वो अपने परिवार के साथ यात्रा कर सकता है। रेलवे के क़रीब साढ़े तेरह लाख कर्मचारी हैं। एक कर्मचारी के परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं तो ये संख्या 54 लाख होती है। साल में एक बार रेलवे के ख़र्चे पर ये परिवार घूमने आता-जाता है। अब इसमें उन लोगों की संख्या भी जोड़ लें, जो रेलवे के कर्मचारी तो नहीं हैं लेकिन हमारे और आपके टैक्स के पैसे से घूमते हैं। सांसद, पूर्व सांसद, विधायक और पूर्व विधायक को फ्री में एसी क्लास से आने जाने का पास मिलता है। इस पास के सहारे ये माननीय पत्नी या पति और अपने एक सहायक के साथ सफर करते हैं। अगर टिकट वेटिंग लिस्ट में है तो हेडक्वार्टर कोटा की मेहरबानी से जनरल कोटा का हक़ मारकर माननीय का टिकट कनफर्म कर दिया जाता है। ऐसी सहूलियत पुलिसवालों को है। हम इसमें देश को आज़ाद कराने वाले परवानों को नहीं जोड़ रहे । क्योंकि सहीं मायनों में वो इसके हक़दार हैं। इस आंकड़ों को जोड़ें तो पाएंगे लगभग 65 लाख लोग हर साल रेल के पैसे पर देश घूमते हैं।
अब बात फिर से ममता के खेल की। ममता ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की है कि जिससे देश के लोगों को बुरा लगे। क्योंकि ममता ने गुढ की भेली में लपेटकर कुनैन की गोली दी है। अब आपको समझ में आसानी से ये बात आएगी, जिस देश में 5188 स्टेशनों पर मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, उसे ममता कैसे आदर्श स्टेशन बनाएंगी ? दूसरी बात ये कि दो बार पहले रेल बजट पेश कर चुकीं ममता ने असलियत देश के लोगों से छुपाई क्यों ?

ममता ने यात्री किराया या माल भाड़ा नहीं बढ़ाया। आम आदमी ये सुनकर ही मंहगाई के इस दौर में राहत की सांस लेगा। मज़दूर तबका भी ख़ुश हो ले। गांव-देहात से शहर-महानगरों में चाकरी करनेवाले मज़दूर 299 रूपए में 1500 किलोमीटर तक और 399 रूपए देकर 3500 किलोमीटर तक सफऱ कर सकता है। पंद्रह सौ रूपए महीना कमाने वाला आदमी पच्चीस रूपए की पास पर रोज़ाना सौ किलोमीटर तक सफर कर सकता है। ममता की ये पहल क़ाबिल ए तारीफ हैं। लेकिन रेलवे का टिकट या पास देनेवाला बाबू उस मज़दूर से मज़दूर होने का पहचान पत्र मांगे तो वो क्या दिखाएगा ? क्या देश में मज़दूरों के लिए मज़दूरी कार्ड है? इस देश में ऐसे अनगिनत स्टेशन हैं, जहां दिन में कुल दो बार कोई ट्रेन आती या जाती हैं। ऐसे में पंद्रह सौ रूपए महीने कमानेवाला मज़दूर उस पास को लेकर कहां मज़दूरी करने जाएगा और कब घर लौटकर आएगा ?
युवा भी खुश होगा। युवाओं के लिए नई ट्रेन चलेगी। लेकिन युवाओं के लिए अलग से ट्रेन क्यों चलाई जा रही है – ये समझ से परे हैं। क्या इस यूथ ट्रेन में युवा डांस करते हुए चलेंगे ? या फिर इस ट्रेन में पब, मॉल या हॉल जैसी कोई सुविधा होगी ? या फिर ममता ने ये मान लिया है कि देश का नौजवान बूढ़े औऱ प्रौढ़ लोगों के साथ सफऱ करने में असहज महसूस करता है या फिर उसे तकलीफ होती है।
ममता बनर्जी ने कहा है कि 375 स्टेशनों को आदर्श स्टेशन बनाया जाएगा, इसमें से तीन सौ नौ स्टेशनों की पहचान कर ली गई है। ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन भाषण में वो पहले ही कह गई है कि इन स्टेशनों पर शौचालय और बैठने के इंतज़ाम के साथ मूलभूत सुविधाएँ दी जाएंगी। ममता ने जिन स्टेशनों की पहचान की है, उसका नाम सुनेंगे तो आप चकरा जाएंगे। कोलकाता और बंगाल का एक भी स्टेशन और हॉल्ट ममता ने नहीं छोड़ा है। इस योजना का दुखद पहलू ये है कि वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री रहने के बाद भी ममता बनर्जी अपने शहर के स्टेशनों को शौचालय या मुसाफिरों के बैठने की जगह का इंतज़ाम नहीं करा सकीं ? हम ये सवाल ममता से कोलकाता से मुत्तलिक पूछ रहे हैं , पूरे बंगाल को लेकर नहीं। ममता के इस आदर्श स्टेशनों में आदि श्पतोग्राम, आगरपाड़ा, अलीपुरद्वार, कालना, बागबाज़ार, बैरकपुर, बेलगाछिया, बैद्यबाटी, चंदननगर, बैंडेल, बर्दवान, आसनसोल आदि हैं। अगर इस सूची को ध्यान से पढ़ें तो 309 में से सवा सौ से ज्यादा नाम बंगाल के हैं। ममता जिन वजहों का हवाला देकर इन स्टेशनों को आदर्श बनाने का दावा कर रही हैं, वो केवल और केवल वोट बैंक की राजनीति है। इन सारे स्टेशनों को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। कोलकाता के दोनों बड़े स्टेशनों सियालदाह और हावड़ा को वो विश्वस्तरीय बना रहीं हैं। बाकी बचे तीन बड़े स्टेशन आसनसोल, दुर्गापुर और रानीगंज में वो तमाम सुविधाएं पहले से हैं, जिसकी कमी दूर करने की बात ममता कर रही हैं। बाक़ी जितने स्टेशनों का वो नाम ले रही हैं वो हावड़ा और सियालदाह रूट के लोकल स्टेशन हैं। इन स्टेशनों पर मुसाफिरख़ानों की ज़रूरत तो होती नहीं हैं। बैठने की जगह और शौचालय बहुत पहले ग़नी ख़ान चौधरी दे गए हैं। बाक़ी कई ऐसे स्टेशनों के नाम हैं, जो स्टेशन नहीं हाल्ट हैं। यानी ममता इन स्टेशनों के सुधार के नाम पर लोकल लोगों को दिहाड़ी देंगी। ताकि वो जनसभाओं में दावा कर सकें कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हर हाथ को काम दिया है। सरकारी पैसा पानी की तरह उनके लिए बहाया है।
आख़िर में बात ममता और लालगढ़ के रिश्तों की। वाम मोर्चा पहले से ही आरोप लगा रहा है कि ममता बनर्जी के नक्सलियों से रिश्ते हैं। ममता की शह पर वो आतंक फैला रहे हैं। लेकिन सत्ता की ऐसी मजबूरी होतीं है कि राज्य सरकारों की बात कई बार केंद्र को सुनाई नहीं देती। बंगाल में हावड़ा में पहले से ही रेल काऱखाना है। ममता ने कहा कि रेल को ख़ूबसूरत डिब्बों की ज़रूरत है। ख़ूबसूरत डिब्बों के नाम पर कल तक जर्मनी से डिब्बे मंगाने वाले मंत्रालय ने देश में ही डिब्बा बनाने का फैसला कर लिया। लेकिन इसमें ममता को कर्नाटक से लेकर बिहार तक में कोई संभावना नज़र नहीं आईं। उन्होने इस काम के लिए लालगढ़ में कारखाना बनाने के एलान कर दिया। अब लालगढ़ में ज़मीन आसमान से तो आएगी नहीं। वो किसानों से ज़मीन लेंगी। यानी इस मोर्चे पर ममता सिंगूर और नंदीग्राम की नीति को छोड़ देंगी। यहां सेज़ बनाने पर उनका विरोध नहीं हैं। इस इलाक़े में ज़मीनें लालगढ़ के लोगों की हैं। जब वो ज़मीनें देंगे तो सरकारी मुआवज़ा पाएंगे। फिर रेल कोच फैक्ट्री में काम करेंगे। ममता चाहतीं तो कोलकाता से सटे मध्यमग्राम, श्रीरामपुर, चंदनगर, भद्रेश्वर में रेल फैक्ट्री बनवा सकती थीं। लेकिन उन्होने चुना लालगढ़ को ही। इसी लालगढ़ में लालक़िला को ध्वस्त करने का अरमान छिपा है और छिपा है नक्सलियों से राजनीतिक दलों के रिश्ते। ये रिश्ते अब गुमनमी में नहीं हैं।

Thursday, July 2, 2009

मां, माटी और मानुष की वजह से लेफ्ट की मिट्टी दरकी


लोकसभा चुनाव के बाद नगरपालिका, पंचायत और परिषद के चुनावों में भी वाम मोर्चा को मुंह की खानी पड़ी है। लोकसभा की तरह कई नगरपालिका भी वाम मोर्चा के हाथ से ऐसे निकले, जैसे कि मुट्ठी से रेत सरकती है। वाम मोर्चा सकते में हैं, सदमें में हैं। वहीं, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन जश्न में डूबा है। अब सवाल ये कि क्या मतदाताओं ने एक बार फिर वाम मोर्चा को नकारा है और तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन को जनादेश दिया है। या फिर लोगों की जो नाराज़गी है, उसे अभी तक लेफ्ट दूर नहीं कर पाई है और एक के बाद एक धक्के खा रही है।
पश्चिम बंगाल में सोलह नगरपालिकाओं के लिए चुनाव हुए। इसमें से तेरह नगरपालिकाओं पर ममता बनर्जी और साथियों का झंडा लहराया। इसके साथ ही इन तेरह नगरपालिकओं से वाम मोर्चा का झंडा बेरंग होकर उतर गया। पिछले तैंतीस साल से बंगाल पर राज कर रही लेफ्ट पार्टियां केवल तीन नगरपालिकाओं पर लाल झंडा लहराने में क़ामयाब हुई है। विरोधियों के क़ब्ज़े से लेफ्ट केवल जलपाईगुड़ी की मालबाज़ार नगरपालिका ही छीन सकी है। लेकिन लेफ्ट को ये जीत भी बेहद मामूली सीट से नसीब हुई है। इस नगरपालिका पर पिछले दस साल से बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस का राज था। पिछले चुनाव में लेफ्ट और गठबंधन को बराबर सीटें मिली थीं। इसके बाद लॉटरी के ज़रिए सत्ता तय की गई और ये लॉटरी गठबंधन के हाथ लगीं। इस बार भी मालबाजार नगरपालिका में लेफ्ट पार्टी को केवल एक वार्ड के ज़रिए सत्ता हाथ लगी है। पंद्रह वार्डों में से आठ पर लेफ्ट को और सात वार्ड पर कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस को जीत मिली है। इसके अलावा गंगारामपुर और राजारहाट-गोपालपुर नगरपालिका पर लेफ्ट को जीत नसीब हुई है। जबकि दमदम, दक्षिण दमदम, उलबेड़िया, आसनसोल, मध्यमग्राम, महेशतला, सोनारपुर –राजपुर नगरपालिका वाम मोर्चा के हाथ से निकल गए।
अगर हम हर नगरपालिका, पंचायत और परिषद के नतीजों को तफसील से देखें तो साफ पता चलता है कि लेफ्ट फ्रंट को जहां भी जीत मिली है, वो बेहद मामूली अंतर से हैं। जबकि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस गठबंधन को हर जगह अप्रत्याशित जीत मिली है। अपवाद के तौर पर दक्षिण दिनाजपुर की गंगापुर नगरपालिका में 18 सीटों में से लेफ्ट को 12 और गठबंधन को 6 सीटों पर जीत मिली है। जबकि राजराहट-गोपालपुर में 35 वार्ड में से लेफ्ट को 19 और कांग्रेस –तृणमूल गठबंधन को 15 वार्डों पर जीत नसीब हुई है। एक वार्ड से निर्दल जीता है। यानी साफ तौर पर ये नगरपालिका भी लेफ्ट के हाथ से जाते-जाते बची है।
हैरानी की बात है कि उत्तर चौबीस परगना के तीनों नगरपालिका लेफ्ट के हाथ से फिसल गए। जबकि इस ज़िले में सीपीएम के दिग्गज सुभाष चक्रवर्ती, नेपाल देब भट्टाचार्य, असीम दासगुप्ता, अमिताभ नंदी जैसे दिग्गज नेता हैं। लेकिन लाल क़िला को भरभराने से नहीं रोक पाए। दक्षिण दमदम के 35 वार्डों में से लेफ्ट को केवल 11 वार्डों पर जीत मिली है। जबकि गठबंधन को 24 वार्डों पर जीत मिली है। दमदम के 22 वार्डों में से तृणमूल को 13 और लेफ्ट को केवल 9 वार्डों पर जीत मिली है। मध्यमग्राम नगरपालिका के 25 वार्डों में से 18 पर कांग्रेस और तृणमूव कांग्रेस जीती है। महानगर से दूर दराज ज़िलों की बात करें तो उत्तर दिनाजपुर के इस्लामपुर नगरपालिका के 17 में से 13 वार्ड पर गठबंधन जीता है और लेफ्ट को तीन वार्डों से संतोष करना पड़ा है।
आख़िर लेफ्ट के नसीब में अब हार क्यों लिखी है। लोकसभा चुनाव में बात समझ में आ रही है कि नंदीग्राम के तूफान ने वाम मोर्चा के तंबू को उखाड़ फेंका था। आइला तूफान को बीते अब ख़ासा समय हो गया, फिऱ भी लेफ्ट अपनी वजूद नहीं बचा पा रहा। जीत के जश्न में डूबे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेता इसे मां, माटी और मानुष की जीत बता रहे हैं। अगर इसका राजनीतिक मतलब निकालें तो जिन तीन बिंदुओं पर लाल क़िला खड़ा था, वो तीनों बिंदु अब उसके विरोधियों के हाथ में हैं। महानगर कोलकाता और या दूर –दराज़ का कोई गांव- हर जगह से महिलाओं के साथ बलात्कार और दुराचार की ख़बरें आती रहती हैं। महिलाओं के ख़िलाफ हो रहे अत्याचार परिवारों को लेफ्ट से दूर करने का काम किया है। दूसरा बिंदु ये है कि बरगा आंदोलन के बाद लेफ्ट ने गांवों और किसानों का दिल जीत लिया था। शहरी मतदाता भले ही तर्कों के आधार पर वाम को ख़ारिज कर देता था। लेकिन केत खलिहान की भावनाएं लेफ्ट के साथ होती थीं। लेफ्ट नारा भी देता था कि वो निरपेक्ष नहीं वो मेहनती मानुषों के पक्ष में हैं। लेकिन सिंगुर के बाद लेफ्ट सरकार की खेत खलिहानों और किसानों के लेकर नीति को पोल खुल गई। सर्वहारा के नारे पर टिका वाम के लिए अब सर्व हारा ही हो गया है। तीसरा बिंदु मानुष का है। यानी गांव हो या शहर – हर जगह लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। बेरोज़गारी बढ़ी है। राज्य सरकार रोज़गार देने में असफल रही है। कभी जूट और सूती मिलों के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश तक में मशहूर रहे राज्य में एक-एक कर सारे कारखाने बंद होते गए। रोज़गारों से रोज़गार छिनें और नए बेरोज़गारों की संख्या लगातार बढ़ती गई। पूरे देश में उत्तम शिक्षा के लिए मशहूर राज्य में शिक्षा का राजनीतिकरण हुआ। ये तमाम वजहें , जिनकी वजह से लेफ्ट को नुक़सान उठाना पड़ा। लोकसभा चुनाव में जब तृणमूल के सुलतान अहमद ने उलबेड़िया में हन्नान मोल्ला को हराया या फिर हावड़ा से अंबिका बनर्जी जीते या दमदम से पुराने कांग्रेसी सौगत राय ने अमिताभ नंदी को हराया तो समीक्षा में बात निकलकर सामने आई कि लोगों के मन लेफ्ट के लिए ग़ुस्सा था। वो लोकसभा में फूटा है। कांग्रेस और तृणमूल कहने लगे कि अब बारी विधानसभा की है। लेकिन एक तबका ये मानता रहा कि लोगों के दिल में जो गुबार था , वो निकल चुका है। लेफ्ट को इस हार से सबक मिली है। लेकिन नगरपालिका के चुनावों ने साबित कर दिया है कि लेफ्ट के लिए खोई हुई ज़मीन हासिल करना अब बेहद चुनौतीभरा काम है।

Wednesday, July 1, 2009

आयोगों के ज़रिए सरकारें करती हैं लीपापोती


बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड को लेकर लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप दी। अभी किसी को नहीं मालूम कि इस रिपोर्ट में क्या है ? आयोग ने क्या सिफारिश की है ? लेकिन इस रिपोर्ट को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। इसका राजनीतिक पहलू समझने से पहले एक बार इस आयोग के बारे में समझ लें। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के दस दिन के बाद केंद्र सरकार ने 16 दिसंबर 1992 को लिब्राहन आयोग का गठन किया। सरकार ने तीन महीने के भीतर जांच रिपोर्ट देने को कहा था। यानी आयोग को 16 मार्च 1993 तक अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपना था। लेकिन आयोग को ये काम करने में सत्रह साल लग गए। इसी के साथ इस आयोग ने भारत में एक रिकार्ड भी क़ायम कर लिया है। देश में सबसे ज़्यादा समय तक काम करने का रिकार्ड अब लिब्राहन आयोग के नाम है। इस आयोग को 48 बार एक्सटेंशन यानी विस्तार दिया गया। आयोग ने एक सौ दो लोगों ,जिनमें आरोपी भी शामिल हैं, के बयान लिए। 399 बार सुनवाई की। सरकार के दस करोड़ रुपए के ख़र्चे पर अपनी रिपोर्ट सत्रह साल बाद सरकार को सौंप दी। बताया जाता है कि आयोग ने चार साल पहले ही रिपोर्ट तैयार कर ली थी। लेकिन सौंपी अब है। इसकी वजह तो नहीं मालूम। लेकिन एक बात सबको मालूम है कि जस्टिस लिब्राहन और आयोग के वकील अनुपम गुप्ता के बीच छत्तीस का आंकड़ा था और वो बाद में आयोग से अलग भी हो गए थे।
अब बात इस रिपोर्ट की राजनीति की। हिंदुत्व की लहर पर सवार होकर सत्ता सुख पा चुकी बीजेपी क्या इस रिपोर्ट से सांसत में हैं ? ऊपर से देखने में एक बार ऐसा महसूस तो हो सकता है। क्योंकि बीजेपी और उसकी परिवार के कई दिग्गज आरोपी हैं। लेकिन सच ये नहीं है। सच तो ये है कि राजनीतिक भंवर में फंसी बीजेपी के लिए ये रिपोर्ट आक्सिजन जैसा है। याद करें चुनाव से पहले हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी का हालत सांप –छुछुंदर जैसी थी। बीजेपी तय नहीं कर पा रही थी कि वो हिंदुत्व की लहर पर सवार हो या फिर सूडो सेक्युलर की छवि के साथ मैदान में उतरे। वरूण गांधी के विवादास्पद बयान के बाद कई दिनों तक बीजेपी के दिग्गज नेताओं की दुविधा पूरे देश ने देखा है। चुनाव के बाद बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी ने स्वीकार किया था कि देश दो दलीय राजनीति की तरफ बढ़ा है और मतदाताओं ने बीजेपी को खारिज किया है।
बीजेपी को अच्छी तरह से मालूम है कि चुनाव में हुए घाटे की भरपाई इसी रिपोर्ट से संभव है। अगर किसी आरोपी के ख़िलाफ सरकार कार्रवाई करेगी तो सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा होगा। चुनाव के समय विकास के नाम पर एकजुट हुए मतदाता पोलोराइज़ेशन के इस दौर में फिर से धर्म के नाम पर बंटेगें।
रिपोर्ट पेश होने के बाद बीजेपी नेताओं और बीजेपी से अलग हो चुके नेताओं के बॉडी लेंग्वेज पर ग़ौर कीजिए। हालिया मध्य प्रदेश चुनाव में गोते खाने के बाद बीजेपी में लौटने की राह तक रही उमा भारती फिर से फायर ब्रांड मुद्रा में आ गईं। सत्रह साल पहले की तस्वीर सबको याद होगी, जिसमें मस्जिद टूटने के बाद उमा भारती बीजेपी के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी के साथ गलबहियां करते देखी गई थीं। उमा भारती ताल ठोंककर सरकार को चुनौती दे रही हैं कि उन्हे सरेआम सूली पर लटाकाया जाए। उमा भारती दावा कर रही हैं कि वो मस्जिद गिराए जाने की ज़िम्मेदारी एक अच्छे सेनापति की तरह लेने को तैयार हैं। कल तक यही उमा भारती और बीजेपी के दिग्गज दावा कर रहे थे कि जो कुछ भी हुआ , साज़िश के तहत नहीं हुआ। ये घटना अप्रत्याशित थी।
रिपोर्ट पेश होते ही बीजेपी के दिग्गज अरूण जेटली, राजनाथ सिंह आदि लालकृष्ण आडवाणी से मिले। ज़ाहिर इस रिपोर्ट के असर को लेकर रणनीति बनी होगी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद इस रिपोर्ट को फुल टॉस बॉल की तरह लिया। सीना तानकर कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने। साथ ही लगे हाथ आयोग की उम्र पर सवाल खड़े कर दिए। मांग कर डाली की कि इसकी भी जांच होनी चाहिए। ये मांग करते समय शायद रविशंकर प्रसाद ये भूल गए कि इस दरम्यान बीजेपी ने भी छह साल तक शासन किया है। भव्य मंदिर बनाने की बात करते समय ये भी भूल गए कि उनकी सरकार के दौरान अयोध्या में राम मंदिर की लड़ाई लड़नेवाले पुराने साधू परमहंस ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। सरकार ने विशेष दूत भी भेजा था और लालकृष्ण आडवाणी ने एनडीए के एजेंडे में राम मंदिर न होने की बात कर विवाद से पल्ला झाड़ लिया था। कांग्रेस भी इस पर राजनीति करने का मौक़ा नहीं छोड़ रही। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बीजेपी नेताओं का नाम लिए बग़ैर राशन पानी लेकर धावा बोल दिया। दावा करने लगे कि दोषियों के ख़िलाफ सरकार किस तरह का कार्रवाई का इरादा रखती है। उनका ये दावा अंतर्मन से कम राजनीतिक दिल से ज़्यादा लगता है।
बीजेपी और कांग्रेस नेताओं के बयानबाज़ी के विशुद्ध तौर पर राजनीतिक मतलब है। बीजेपी चाहती है कि इस मुद्दे पर उनके नेताओं को घसीटा जाए। उनके नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की बात हो और शहीदी मुद्रा में आकर राजनीतिक लाभ कमाएं। वहीं , कांग्रेस भी इसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिए अल्पसंख्यक राजनीति की मौक़ा नहीं छोड़ रही। लेकिन उसे बहुसंख्यक वोट खोने का भी डर सता रहा है। कांग्रेस को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर उसने इस रिपोर्ट पर कार्रवाई शुरू की तो घाटा कांग्रेस को होगा और लाभ बीजेपी को। इसलिए बयानबाज़ियों से काम चला लिया जाए। अल्पसंख्यकों को फिर से ये अहसास कराया जाए कि सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस अब भी उनके साथ खड़ी है।
अब सवाल ये है कि सरकार आयोग की सिफारिशों पर क्या करेगी। चूंकि अपने देश का राजनीतिक इतिहास रहा है कि कोई भी जांच कमीशन ईमानदार जांच के लिए नहीं गठित की जाती। उसका इस्तेमाल राजनीतिक मतलबों के लिए होता है। इन आयोगों को बनाने वालों की नीयत और मंशा शुद्ध तौर पर राजनीतिक होती हैं। इसलिए आयोगों की रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। आज़ादी के बाद से लेकर अब तक कई रिश्वत कांड को लेकर आयोग बने। लेकिन आज एक बार भी ऐसा नहीं सुनने में आया कि दोषी को कड़ी सज़ा मिली है। ऐसा ही मामला जैन हवाला कांड में भी हुआ। नानवटी आयोग ने गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी सरकार को क्लीन चिट दी। सिख विरोधी दंगों के आरोपी अब भी सज़ा नहीं पाए हैं। दरअसल , सरकार चाहें जिस किसी भी पार्टी की हो, वो आयोगों के ज़रिए लीपापोती करती है। सच पर परदा डाला जाता है। अरसा ग़ुज़रने पर लोगों के ज़ख़्म खुद ही सूख जाते हैं। नेताओं के बिरादरी को मालूम है कि जनता की याददाश्त कमज़ोर होती है और वो इसी का फायदा उठाते हैं। भले ही इससे लोकतंत्र की साख पर बट्टा लगे।