Thursday, February 14, 2008

लेकिन ममता बनर्जी पागलपंथी करती रहेंगी

बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी एक बार फिर दहाड़ने लगी हैं। लेकिन इस दहाड़ में ख़ौफ़ कम और मिमयाना ज़्यादा है। स्थानीय निकायों के चुनाव प्रचार में निकली ममता बनर्जी के बयान से ये मतलब साफ निकलता है कि उन्होने अब तक जो कुछ भी किया है , वो एक हद तक पागलपन ही था। पश्चिम बंगाल के एक गांव में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी सभा में उन्होने जो कुछ भी कहा, वो अक्षरश लिख रहा हूं। मैं ये सनक और पागपन तब तक बंद नहीं करूंगी , जब तक सूबे से सीपीएम का सफ़ाया नहीं हो जाता।
क्या ममता बनर्जी इस पागलन के ज़रिए राज्य का विकास चाहती हैं ? क्या वो चाहती हैं कि राज्य से ग़रीबी मिटे ? क्या वो अपनी इस सनक से राज्य को भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त बनाना चाहती हैं ? या उनका इरादा किसी भी तरह एक बार सूबे की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना है ? ज़ाहिर है कि डॉक्टर ममता बंधोपाध्याय ये कतई नहीं कहेंगी कि उनकी नीयत में खोट है। वो ख़ुद को राम कृष्ण परमहंस की तरह बैरागी ही बताएंगी। लेकिन सच क्या है ?
ममता बनर्जी एक तरफ़ ये कहती हैं कि सत्तानशीं सीपीएम और लेफ्ट की थैली में गुंडों और मवालियों की भरमार है। लेकिन क्या ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस दूध की धुली है? उत्तर 24 परगना के भाटपाड़ा से उनकी पार्टी से जो विधायक महोदय चुनकर आए हैं, उन पर कितने तरह के गंभीर आरोप हैं। हद तो ये है कि पार्टी के पुराने नेता विकास बौस की हत्या के पीछे उनका हाथ है। ये आरोप सीपीएम या लेफ्ट ने नहीं बल्कि विकास बोस की विधवा ने ही लगाए थे। विधायक महोदय पर रंगदारी , जबरन वसूली , हत्या और न जाने कितने तरह के इल्ज़ाम हैं। इंटाली विधनासभा क्षेत्र में पकड़ रखनेवाले उनकी पार्टी के नेता की इमेज बिहार - यूपी के महाबली नेताओं से की जाती है। क्या ममता बनर्जी अब ये मुहावरा सुनाएंगी कि लोहे को लोहा ही काटता है ?
बंगाल में बेरोज़गारी है। भूखमरी की नौबत है। गांव- देहात के किसान भूख से बिलबिला रहे हैं। परिवार दाने -दाने को मोहताज़ है। घर में फूटी कौड़ी नहीं है। ममता बनर्जी के व्यावसायी भाई अमित बनर्जी ने ऐसे कितने परिवारों को अपनी जेब से मदद की है ? ममता बनर्जी इन मुद्दों को लेकर कितनी बार मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री से मिली हैं ? बात बात पर चौरंगी जाम कर देनेवाली ममता ने इन मुद्दों को लेकर कितनी बार धरना - प्रदर्शन किया है ?
नेशनल सेंपल सर्वे आर्गनाइज़ेशन के हालिया सर्वे में बंगाल की दुर्दशा ज़ाहिर होती है। बंगाल के गांवों के 10.6 फीसदी आबादी को भरपेट खाना नसीब नहीं हुआ। ये सर्वे पिछले साल के दिसंबर, जनवरी, फरवरी, मार्च और अप्रैल महीने के हैं। हालात तो पड़ोसी राज्यों असम और उड़ीसा की भी कमोबेश यही है। सर्वे रिपोर्ट चौंकने पर मजबूर करती है क्योंकि गांवों में साल के कुछेक महीने यही तस्वीर होती है। बंगाल के गांवों में पूरे साल 1.3 फीसदी आबादी को पूरे साल भरपेट खाना नसीब नहीं होता। हज़ारों परिवार ऐसे हैं, जिन्हे पूरे साल चावल के अलावा कुछ नसीब नहीं होता। मछली के लिए शौक़ीन माने जाने वाले ये बंगाली परिवार हाट बाज़ारों में ही मछली देखकर पेट भर लेते हैं। चावल के साथ दाल तो बहुत दूर की बात है। अगर गांव का ज़मींदार मेहरबान हो जाए तो खेतों से हरी सब्ज़ियां भी उन्हे कभी कभी नसीब हो जाती हैं। हरी सब्ज़ियों में भी वो सब्ज़ियां नहीं , जिन्हे हम नियमित तौर पर खाते हैं। उन्हे पोई साग मिल जाती है। लौकी के पत्ते मिल जाते हैं। केले का तना मिल जाता है, जिसे वो तरकारी बना लेते हैं। कभी - कभी बांस के कोपलों की भी तरकारी नसीब हो जाती हैं। नहीं तो पूरे साल पांथा भात .या मांड़ भात पर गुज़ारा करना होता है। अगर आप इन गांवों में जाकर चावल की क्वालिटी देख लें तो हैरानी में पड़ जाएंगे। बेहद मोटी और लाल रंग की होती है। लेकिन उनके नसीब में यही है। चावल को कुछ देर में पानी में भिगोकर रखते हैं। फिर कुछ घंटों बाद नमक मिलाकर का लेते हैं।
ये बंगाल की तस्वीर है। इस आइने को ममता बनर्जी पूरे देश को दिखाने का साहस करें। राज्य का भला हो जाएगा। जब लोग भूखे और नंगे होंगे तो मजबूरी में उन रास्तों पर चल पड़ेंगे , जिन पर उन्हे नहीं चलना चाहिए। ममता बनर्जी एक बार दास कैपिटल पढ़ लें, राज्य का भला हो जाएगा।

Wednesday, February 6, 2008

छोड़ दे आंचल , ज़माना क्या कहेगा

बात बहुत छोटी सी है। बात बहुत छोटे से मुद्दे की है। बात मेरे जैसे छोटी सोच वाले लोगों की है। ये छोटी सी बात मेरे दिल में नश्तर की तरह चुभती है। सोचा क्यों न नश्तर चुभोकर सारे मवाद बाहर निकाल दूं। इसलिए ये बात आपके सामने पेश कर रहा हूं। अगर बुरी लगे तो ंमुझ जैसे लाखों -करोड़ों गंवई-देहाती लोगों की सोच को माफ कर देना। अगर कहीं से भी , रत्ती भर जायज़ लगे तो इस पर ग़ौर करें। ये अब गुज़रे ज़माने की बात हो गई है। कभी आंचल, दुप्पटा या चुन्नी का इस्तेमाल आंखों की हया से परदा करने का था। लेकिन पता नहीं आंखें बेहया हो गईं, या फिर ज़माने ने हमें बेहया कर दिया कि बग़ैर दुप्पटे को किसी कन्या को देखने के बाद हमारी आंखे हया तलाशने लगती हैं। आप कह सकते हैं कि ब्लैक माइंड आलवेज़ थिंक ब्लैक थिंग। अब आंखे हैं तो सड़क पर चलते हुए टकरेंगे ही। बस में सफ़र करेंगे तो साथी पर नज़र जमेंगी ही। लेकिन अपन ठहरे गंवार और देहाती । क्या जाने फ़ैशन की बातें। ज़्यादातर जो लड़कियां अपन को दिखती हैं , वो बहुत पहले दुप्पटे को अपनी ज़िदगी से विदा कर चुकी हैं। वो परम आधुनिक कपड़ों में दिखती हैं। लिवाइस, ली कूपर, वरसाचे, गुची, जिवो और न जाने कैसे कैसे नाम बताती हैं, जिस मैं तो क्या तो मेरे मरहूम अब्बा भी कभी न सुने हों। ख़ैर, टी शर्ट भी तरह तरह की। तरह तरह की आकृतियां बनीं हुईं। तरह तरह के हरफ़ ख़ुदे हुए। एक टी शर्ट देखी। सीने पर उभरी मध्यमा ऊंगली कन्या की नज़रों से होते हुए आसमान से आंखे मिला रही है। साथ में अंग्रेज़ी में ये भी लिखा है- F…। मतलब तो कन्या ही जानें या वो जिसे इसका मतलब पहले से पता है। एक और टी शर्ट की बानगी देखिए- Single, but not available। और देखिए - BIG ENOUGH FOR YOU,Wanna PLAY with me?- जनाब टी शर्ट पर लिखा है तो पढ़ने के लिए ही लिखा होगा। जी भर कर बांचिए। फोटू देखिए। तरह तरह के आकार और प्रकार देखिए। शायद इसलिए दप्पटा नहीं है ताकि आप इसे पढ़ सकें और जी भरकर देख सकें। आंखों में हया आ जाए तो मध्य प्रदेश सरकार का विज्ञापन याद करें- आंखे फाड़ फाड़ देखो। हद तो देखिए कि कमबख़्त टी शर्ट रह रहकर तंग रकती है। रह रह कर सिकुड़ जाती है। बिचारी को बार बार खींच कर नीचे कर लेती है। आख़िर लज्जा ही तो नारी का गहना है। अब गहना उसकी है तो हिफ़ाज़त भी तो वही करेगी न। आ गई न शर्म. कर ली न आंखें नीचे। अब तो जी चाहता है कि आंखें फोड़ लूं। नज़रें नीची क्या हुईं। शर्म से गड़ गया। क्योंकि टी शर्ट के बाद अब डेनिम की पतलून चुहलबाज़ी करने लगी। रह रह कर सरक रही थी। अंर्तवस्त्र के कुछ हिस्से बाहर निकलकर नैना मिलाने को बेताब थे। इस नामुराद को बाद में पता चला कि नैना मिलाने का ये लेटेस्ट फैशन है। ख़ैर, कुछ ऐसी भी टकरती हैं जो पूरब है और न पच्छिम। वो पहनती तो सलवार कुर्ता ही हैं लेकिन दुप्पटे को ओढ़ने की बजाए कंधों पर टांग लेती हैं। मैने किसी से पूछा कि भाई साहब - ये कौन सा फैशन है। तो उनका जवाब था - BMT। मैने कहा कि इस फैशन का नाम तो पहली बार सुना है। उन्होने बताया- BEHANJI TURNING MOD। कहा कि - दादा बाबू - कोलकाता से बाहर निकलो। ये बड़ा शहर है। लोगो की सोच बड़ी है। दिल बड़ा है। सबकुछ बहुत बड़ा है। छोटी सोच से बाहर निकलो अगर बड़े शहर में रहना है तो। मैं उधेड़बुन में था। मेरा साथी गाते हुए कनॉट प्लेस की गलियों में खो गया- कब तक जवानी छुपाओगी रानी, कब तक क्वारों को तरसाओगी रानी...
मैं सोचने लगा कोलकाता का वो दिन.... क्या मारवाड़ी, क्या बंगाली और क्या बिहारी. क्या अमीर और क्या ग़रीब- जब सबकी बहन -बेटियां घर की दहलीज़ लांघती थीं तो सिर पर आंचल और सीने पर दुप्पटा होता था। शायद तभी ये गाना बहुत चला था- छोड़ दो आंचल , ज़माना क्या कहेगा। अब ज़माना क्या कहेगा और क्या कर लेगा जब आंचल ही न हो।

Wednesday, January 23, 2008

ऐसे समाज पर थू है

देश में ईमानदारी हो। सब लोग अच्छे हों। सब एक दूसरे का ख़्याल रखें। एक दूसरे के सुख दुख में साथ दें। ये बातें सुनने में कितनी अच्छी लगती हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है। आज सुबह बस से नोएडा से दिल्ली आ रहा था। श्रमजीवी लोगों के वाहन यानी 355 नंबर की बस से सवार था। बारह -बाइस चौराहे पर पहुचने पर एक मेहनतकश बालक हारमुनियम के साथ सवार हुआ । हाड़ कंपा देनेवाली सर्दी थी। लोग कई कई स्वेटर ताने बैठे थे। वो नन्हा बालक एक मामूली सी कमीज़ में था। आदत और मजबूरी ने मानो उसे लौह पुरूष बना दिया था।
बाहर बर्फीली हवाएं चल रही थीं। लोग बाग टोपियों सेसे कान ढकें ढके हुए थे। फिर भी हवाएं उनकी हड्डियां गला रही थीं। लिहाज़ा लोगों ने बस की खिड़कियां बंद कर दीं। बालक ने मौक़ा देखकर गाना छेड़ दिया- इश्क़ मासूम है....। आवाज़ लरज़ रही। आवाज़ थरथरा रही थी। आंखों में में याचना थी। उसे लगा कि लोग उस पर रहम खाएंगे। क्योंिक ज़्यादातर लोग सूट बूट और टाई में थे। महंगे महंगे स्वटरों में थे। पढ़े लिखे और दिलवाले लोग लगे। गाना बंद कर उसने अपनी पेटी समेट ली।

इस हुनर के बदले वो लोगों से बख़्शीश की उम्मीद करने लगा। लेकिन उसे मिलने लगी औरझिड़क और गालियां। अबे, परले हट जा। रोज़ रोज़ मुंह उठाए भीख मांगने ला आता है। मां बाप भी साले कैसे हैं। पैदा करके सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ देते हैं। एक मैडम ने तो आपा ही खो दिया। क्योंकि उस बालक की पेटी से उनका मेकअप ख़राब हो गया था। बस में बैठे बैठे वो कजरा लगा रही थी। वो आंखों से फैल कर गालों तक लग गया। मानों - जमाने की नज़र न लगे। मैडम को ये बात ख़ल गई। सन आफ बीच कहने में उन्हे कोई बुराई न लगी।
मैडम ने कोई ग़लत बात नहीं की थी। मैं भी ग़रीब हूं। समझ सकता हूं कि इस तरह के पढ़े लिखे लोग ग़रीबों के बच्चे और सूअर के बच्चे में कोई फर्क़ नहीं करते । आख़िर हैं तो दोनों प्राणी ही। बच्चा बस से उतर गया। उसकी हथेली में चंद सिक्के खनक रहे थे। इन पैसों में कुछ सिक्के दो तीन देहातियों और एक श्रमजीवी पत्रकार का था। जो ख़ुद इन दिनों फाकांनशीं के दौर में बस से सफ़र कर रहा हैं। बच्चे की ज़ुबान पर एक बार फिरवही गाना था- इश्क़ मासूम है....

Thursday, November 8, 2007

ख़बरदार, जो वेश्या कहा

बिहार में अब वेश्या को वेश्या कहना महंगा पड़ेगा। वर्दी और डंडे के जो़र पर अच्छों -अच्छों को लाइन पर लानेवाली पुलिस भी अपनी आदत बदलेगी। आइंदा से जब वो वेश्याओं को गिरफ्तार करेगी, तो थाने में उसके साथ बहुत अच्छा बर्ताव करेगी। हो सकता है कि बिहार पुलिस वेश्याओं की ख़ातिरदारी करते मिले। पुलिस को ये सब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हुक़्म पर करना पड़ेगा। पक्के समाजवादी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने के लगभग ढाई साल बाद वेश्याओं का ख़्याल आया। नीतीश कुमार का कहना है कि कोई शौक़ से वेश्या नहीं बनती। ग़रीबी, मजबूरी औऱ दबंगों की वजह से उन्हे देह का धंधा करना पड़ता है। इसलिए अब जब भी पुलिस वेश्याओं को पकड़े तो उन्हे आरोपी न बनाए। उन्हे पीड़ित बताए। क्योंकि तमाम तरह की पीड़ाओं को झेलकर ही वो देह का सौदा करने पर मजबूर हुई है। इसलिए पुलिस उसे वेश्या न माने। वेश्याओं का दर्द सीने में दबाए नीतीश कुमार का ये बयान उन वेश्याओं की मांग से ज़्यादा दमदार और मार्मिक है, जो देहव्यापार को मज़दूरी का दर्ज़ा देने की मांग करती आ रही हैं और संसद से लेकर सड़क तक पर आंदोलन कर ही है।
नीतीश कुमार ने सही फरमाया है। कोई शौक़ से देह व्यापार का अपराध थोड़े ही करता है। ठीक वैसे ही, जैसे कि कोई चोरी शौक़ से नहीं करता। तफरीह के लिए डाका नहीं डालता। प्यास बुझाने के लिए किसी का ख़ून नहीं बहाता । सबकी अपनी- अपनी मजबूरियां होती हैं। सबकी मजबूरियों को बिहार पुलिस समझे। ताकि देश के बाक़ी राज्यों को सबक मिले। सरकारें समझें कि अपराधी के अपराध के पीछे छिपे सामाजिक मजबूरी को समझें। उस मजबरी को दूर करें। अपराध ख़ुद ब ख़ुद ख़त्म हो जाएगा।
नीतीश कुमार जानते हैं कि गांधीगिरी का उनका ये तरीक़ा देसी राजनीति की कीचड़ में फंसकर गंदा हो जाएगा। इसलिए उन्हे इसे अमल में लाने के लिए उन्हे फिरंगियों की ज़रूरत आन पड़ी। यूनाएटेड आफिस आन ड्रग्स एंड क्राइम की मदद से उन्होने नई शुरूआत की है। मानव तस्करी निरोध कोषांग बना दिया है। शुरूआत कोषांग पटना, गया और मुज्जफरपुर से होगी। सफलता मिलने पर पूरे सूबे में काम करेगा। नीतीश कुमार को उम्मीद है कि वेश्यावृति ख़्तम करने का उनका ये फार्मूला जब हिट होगा तो पूरे देश में इसे लागू किया जाएगा। जिस तरह से रेल मंत्री रहने के दौरान किए गए काम काज की आज भी तारीफ होती है । ठीक वैसे ही वेश्यावृति मिटान में उनके योगदान को याद रखा जाएगा। नीतीश जी की जय हो। धन्य हैं अपने नीतीश बाबू जी की।

Wednesday, November 7, 2007

मित्रों, फिर आई है दीवाली। इस दीवाली में मुझे एक पुराना मुखड़ा याद पड़ा। सोचा , क्यों न दीवाली के बहाने अपने मित्रों को इस गीत की फिर से याद दिला दूं। हरियाली और रास्ता फिल्म में मुकेश औऱ लता मंगेशकर ने इसे गाया था। शायद , ये गीत दिल के उस कोने को छू जाए, जहां अब भी कोई टीस हो। बोल कुछ इस तरह से हैं....

मुकेश-
लाखों तारे आसमान में
एक मगर ढूंढे ना मिला
देखें दुनिया की दीवाली
दिल मेरा चुपचाप जला
दिल मेरा चुपचाप जला
लता-
लाखों तारे आसमान में
एक मगर ढूढें ना मिला
एक मगर ढूंढे ना मिला
मुकेश
क़िस्मत का है
नाम मगर है
कम है ये दुनियवालों का
फूंक दिया है चमन हमारे ख़्वाबों औऱ ख़्यालों का
जी करता है ख़ुद ही घोंट दें
अपने अरमानों का गला
देखें दुनिया की दीवाली
दिल मेरा चुपचाप जला
दिल मेरा चुपचाप
लता
सौ सौ सदियों से लंबी ये
ग़म की रात नहीं ढलती
इस अंधियारे के आगे अब
ऐ दिल की एक नहीं चलती
हंसते ही लुट गई चांदनी
और उठते ही चांद ढला
देखें दुनिया की दीवाली
दिल मेरा चुपचाप जला
दिल मेरा चुपचाप जला
मुकेश
मौत है बेहतर इस हालत से
नाम है जिसका मजबूरी
लता
कौन मुसाफिर तय कर पाया
दिल से दिल की ये दूरी
मुकेश
कांटों ही कांटों से गुज़रा
जो राही इस राह चला
देखें दुनिया की ये दीवाली
दिल मेरा चुपचाप जला
दिल मेरा चुपचाप जला
लता
लाखों तारे आसमान में
एक मगर ढूंढे ना मिला
देखें दुनिया की दीवाली
दिल मेरा चुपचाप जला
दिल मेरा चुपचाप जला

Saturday, November 3, 2007

फिर छिड़ी है बहस ज़िम्मेदारी की

एक प्राइवेट चैनल पर दिल्ली की स्कूल टीचर उमा खुराना को स्कूली छात्राएं सप्लाई करनेवाली पिंप की तरह दिखाया गया था। बाद में रिपोर्टर के पकड़े जाने पर खुलासा हुआ कि उमा खुराना को फर्ज़ी फंसाया गया है। मामला अदालत में है। लेकिन अदालत ने इस बारे में जो टिप्पणी की है, उससे प्राइवेट चैनल वालों के पेशानी पर बल पड़ गए हैं। अदालत ने पूछा है कि इस गड़बड़झाले के लिए चैनल को क्यों नहीं ज़िम्मेदार माना जाए। आख़िर चूक संपादकीय प्रबंधन की भी तो है। अदालत ने उस दिल्ली पुलिस को भी जवाब तलब किया है कि उसने इस बारेमें चैनल और उसके संपादकीय विभाग के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की है।
हमेशा आपके साथ रहने का दावा करनेवाली दि्लली पुलिस ने अपनी जांच में उमा खुराना को बेक़सूर पाया। पुलिस की नज़र में रिपोर्टर और उसकी सहेली दोषी है। लेकिन पुलिस की जांच रिपोर्ट में इतना बचपना क्यों है कि उसे चैनल के बड़े अधिकारियों की ग़लती नज़र नहीं आती। प्राइवेट चैनल हो या सरकारी - हर जगह हर ख़बर की स्कैनिंग के लिए टीम होती है। ये नियम इस चैनल पर भी लागू है। चैनल के संपादकीय नीति की कमान ऐसे अनुभवी पत्रकार के हाथ में है, जो कुल जमा बारह साल के अनुभव को सफेद बालों वाले पत्रकारों के अनुभव से तौलता है और अपने अनुभव को हमेशा बीस पाता है। कभी मॉडलिंग की दुनिया में हाथ पैर पटक चुके इस पत्रकार ने पुलिस के सामने भोला भाला बयान दिया कि उसे उसके रिपोर्टर ने गुमराह किया। पुलिस भी इतनी भोली कि उसके बयान को बेदवाक्य की तरह सही मान लिया। लेकिन इस भोलेपन ने परदे के पीछे ऐसे कुछ सवाल छोड़ दिए हैं, जिसका जवाब पाना इस स्टिंग आपरेशन की सच्चाई जानने के लिए ज़रूरी है।
अगर दोष सिर्फ उस रिपोर्टर का था तो फिर चुपके से उस पत्रकार से इस्तीफा क्यों मांग लिया गया, जिसकी नज़र में ये स्टिंग आपरेशन सही था। जिसने इस ख़बर को चलाने में अहम भूमिका निभाई थी। चंद दिनों में वो मन से क्यों उतर गया। चैनल प्रमुख की बात थोड़ी देर के लिए सच मान लेते हैं । फिर चैनल प्रमुख ये बात बताएं कि चैनल के दफ्तर में ऐसे लोगों की भीड़ क्यों जुटाई गई है जो डेस्क संभालते हैं। अगर रिपोर्टर की कोई भी स्टोरी इन लोगों की जानकारी या मर्ज़ी के बग़ैर एयर हो रही है तो ऐसे लोगों की टोली क्या आफिस में एसीकी हवा खा रही है। फॉक्स चैनल का स्लोगन - वी रिपोर्ट , यू डिसाइड का स्लोगन हिंदी में अनुवाद कर - ख़बर हमारी , फैसला आपका का नारा बुलंद करनेवाले क्या कर रहे हैं। भूत प्रेत और नाग नागिन का डांस दिखाने के एक्सपर्ट पत्रकारों की नज़रें इतनी कमज़ोर है कि इस स्टिंग आपरेशन के होनेवाले डंक के असर के मर्म को नहीं समझ पाए। या फिर सस्ती लोकप्रियता औऱ जल्दी आगे बढ़वने की होड़ में एक महिला टीचर की बदनामी करने से भी नहीं घबराए। हर ख़बर पर जनता का मत लेनेवाले मूर्धन्य पत्रकार ये बता सकते हैं कि उनकी बचकानी हरकत से उमा खुराना की जो बदनामी हुई है, जो किरकिरी हुई है, उसकी भरपाई कैसे होगी। फर्ज़ी ख़बर को देखकर उमा खुराना की पिटाई करनेवाले औऱ सरेआम कपड़े नोंचनेवाले ये बता सकते हैं कि क्या माफी मांग लेने या दूसरे के मत्थे ठीकरा फोड़ देने से उमा खुराना को जो जगहंसाई हुई है, वो वापिस हो जाएगी। नहीं लगता कि प्रबुद्ध, मूर्धन्य और अनुभव के बोझ तले उन पत्रकारों में इतनी सत्सहास है कि वो एयर पर बार बार दोहराएं कि हमारी ग़लत ख़बर की वजह से उमा खुराना को तकलीफ हुई है। बदनामी हुई है। जगहंसाई हुई है। पिटाई हुई है।कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाना पड़ा है। नौकरी गंवानी पड़ी है। उसे अपनी ईमानदारी के लिए हर चौखट पर सबूत पेश करना पड़ रहा है। हम माफी मांगते हैं। हम शर्मिंदा है। हमने उमा तुझे जीते जी मार दिया। महिला का सबसे बड़ा गहना - इज्ज़त को हमने तार तार कर दिया। हमें अब शर्म आती है। आइंदा हम ये नही कहेंगे कि ख़बरों से खेलना कोई बच्चों का खेल नहीं है। क्योंकि इस ख़बर में बचपने से ज़्यादा अपराध था। हम विज्ञापन से होनेवाली महीने- दो महीने की कमाई तुम्हारे हवाले कर रहे हैं। हम श्रमजीवी पत्रकार, जिनके कंधे पर नैतिकता की ज़िम्मेदारी है, हम उसे समझते हैं। श्रम से कमाई गई रक़म का एक हिस्सा आपके हवाले कर रहे हैं। हम उस रूतबे को वापस तो नही कर सकते लेकिन माली तकलीफ को दूर कर सकते हैं। लेकिन क्या अनुभवों के बोझ तले दबे पत्रकारों की ये टोली ऐसा कोई क़दम उठाएगी। बहस खुली है। क्योंकि यहां सवाल जनमत का है ।

Monday, October 29, 2007

मोदी पर कौन कसेगा लगाम ?

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी इतने बेलगाम कैसे हैं ? ये बात सबको मालूम है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। लेकिन अकेले मोदी समाज को तोड़ रहे हैं। देश की गंगा जमुनी तहज़ीब को आग लगा रहे हैं। जा़हिर भले ही न हो लेकिन ये सच है कि मोदी को पाल पोस कर बड़ा करनेवाले लौह पुरूष भले ही पिघल गए हों लेकिन समय के साथ साथ इस देश में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनकर आया मुख्यमंत्री चट्टान की तरह अडिग हो गया है। उसका इरादा समाज के उस हिस्से को काट कर अलग कर देना है. जो बरसों से हमारे साथ रचे बसे हैं। इस मुख्यमंत्री का इरादा शरीर के उस हिस्से को काटकर निकाल देना है, जिसके बाहर निकलते ही दिल की धड़कन थम जाए और मरघट में बैठकर अट्टाहास करे। दुनिया को ये बता सके कि वो अपने दम पर आत्मा को मर सकता है। शरीर को निर्जीव कर सकता है। क्योंकि वो बेलगाम है। उसकी लगाम थामनेवाले धृतराष्ट्र हो चुके हैं। अंधे, गूंगे और बहरे हो गए हैं।
गुजरात दंगा भड़काने की साज़िश , क़त्लेआम की प्लानिंग , बलात्कार, मुसलमानों को जि़ंदा फूकने की प्लानिंग को उजागर करतनेवाली स्टिंग आपरेशन की भनक लगते हैं लोकतंत्र की दुहाई देनेवालों ने नादिरशाही रवैया अपना लिया है। सरकार के इशारे पर नाचनेवाले पुलिस अफसरों और सफेदपोश बाबुओं ने कुछ घंटे के लिए पूरे गुजरात में कुछ न्यूज़ चैनलों का टेलीकास्ट रूकवा दिया। अगर सरकारी बाबुओं की बात अगर लोकल केबल वाले नहीं सुनते तो उन्हे हिंदी क़ौम का ग़द्दार कहकर मौत के घाट उतार दिया जाता । मोदी सरकार की इस कोशिश को कुछ जायज़ भी ठहराने लगते । आख़िर सवाल हिंदुत्व और उसके नए महानायक की है।
पांच करोड़ गुजरात के लोगों का नारा देकर नरेंद्र मोदी ने एक तरह से गुजरात को देश से काटने का काम किया है। इस मुख्यमंत्री को देश की चिंता नहीं। इस मुख्यमंत्री को समाज की चिंता नहीं। इस मुख्यमंत्री को का़नून की परवाह नहीं। अगर ऐसा होता तो ट्रेन एक्सिडेंट से लेकर प्राकृतिक आपदा पर कांग्रेस सरकार से इस्तीफा की मांग करनेवाली बीजेपी इस मुख्यमंत्री से इस्तीफा ले चुकी होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बात बात पर महापुरूषों की मिसाल देनेवाली पार्टियों के लोग लाल बहादुर शास्त्री से सबक ले चुके होते।
हर साल देश के किसी बड़े शहर में करोड़ों रूपए फूंककर हिंदुत्व की राजनीति करनेवाली पार्टी की चिंतन बैठक में तानाशाही , बेगुनाहों के ख़ून और बलात्कार पर भी चिंता होती। लेकिन नहीं। इतिहास गवाह है कि देश के प्रधानंमत्री ने गुजरात दंगों के बाद जब मोदी की आलोचना की तो उसके बचाव के लिए लौह पुरूष आगे आए। मुंबई अधिवेशन में प्रधानंम्तरी तनहा नज़र आए। इस मुद्दे पर पार्टी में उन्हे घेर लिया गया था। शायद बीजेपी आलाकमान को मालूम है कि समाज के एक वर्ग को नरेंद्र मोदी एंग्री यंग मैन लगने लगा है। समाज को तोड़नेवालों , मासूमों का ख़ून बहानेवालों, घूंघट में रहनेवाली औरतों को बेपरदा देखनेवालों, इंसान को ज़िंदा जलाकर मज़ा लूटनेवालों और परपीड़ा का सुख लेनेवालों की क़ौम में ये तानाशाह पूजा जाने लगा है। दंगों के बाद हुए चुनाव में मिली जीत से बड़े नेताओं को ये यक़ीन हो गया है कि अगर सत्ता की मलाई खानी है तो इस तानाशाह को बेलगाम करना होगा। हर ग़लत काम में उसके साथ उठकर खड़ा होना होगा। लेकिन ऐसा सोचनेवाले नेता शायद ये भूल रहे हैं कि इस देश में अकेला गुजरात राज्य नहीं हैं। संदेश ग़लत जा रहा है। सत्ता में आने के बाद अयोध्या में राम मंदिर बनाने का वादा करनेवालों ने सत्ता में आते ही कैसा राम को भूला दिया , ये बात देश की जनता भूली नहीं है। याद पड़ता है अयोध्या आंदोलन के समय का बीजेपी को वो नारा- जो कहते हैं, सो करते हैं। अब तो ये साबित हो चुका है कि बीजेपी की आदत बस यही है। जो कहते हैं, सो करते हैं। कह के फिर मुकरते हैं।