Monday, May 30, 2011

हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौक़े पर पत्रकार और मीडिया कर्मी की परिभाषा तय हो

आज यानी 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है। कम से कम आज के दिन ये बहस ज़रूर होनी चाहिए थी कि आज हिंदी पत्रकारिता किस मोड़ पर है। ज़रूरी नहीं कि इस विषय पर चर्चा के लिए सुनामधन्य पत्रकार अपने न्यूज़ चैनलों पर आदर्श पैकेजिंग ड्यूरेशन के तहत 90 सेकेंड की स्टोरी ही दिखाते या अधपके बालों वालों धुरंधरों को बुलाकर बौद्धिक जुगाली करते या फिर हिंदी पत्रकारिता की आड़ में अंग्रेज़ी पत्रकारिता को कम और पत्रकारों को ज़्यादो कोसते। टीवी वालों को क्या दोश दें । बौद्धिक संपदा पर जन्मजात स्वयंसिद्ध अधिकार रखनेवाले प्रिंट के पत्रकारों ने भी डीसी, टीसी तो छोड़िए , सिंगल कॉलम भी इस दिवस की नहीं समझा। कहीं कोई चर्चा नहीं कि क्या सोचकर पत्रकारिता की शुरूआत हुई थी और आज हम कर क्या रहे हैं।
ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी, तकवी शकंर पिल्ले, राजेंद्र माथुर,सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय की ज़माने की पत्रकारिता की कल्पना करना मूर्खता होगी। लेकिन इतना तो ज़रूर सोचा जा सकता है कि हम जो कर रहे हैं , वो वाकई पत्रकारिता है क्या। सब जानते हैं कि भारत में देश की आज़ादी के लिए पत्रकारिता की शुरूआत हुई। पत्रकारिता तब भी हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा कई भाषाओं में होती थी। लेकिन भाषाओं के बीच में दीवार नहीं थी। वो मिशन की पत्रकारिता थी। आज प्रोफोशन की पत्रकारिता हो रही है। पहले हाथों से अख़बार लिखे जाते थे। लेकिन उसमें इतनी ताक़त ज़रूर होती थी कि गोरी चमड़ी भी काली पड़ जाती थी। आज आधुनिकता का दौर है। तकनीक की लड़ाई लड़ी जा रही है। फोर कलर से लेकर न जाने कितने कलर तक की प्रिटिंग मशीनें आ गई हैं। टीवी पत्रकारिता भी सेल्युलायड, लो बैंड, हाई बैंड और बीटा के रास्ते होते हुए इनपीएस, विज़आरटी, आक्टोपस जैसी तकनीक से हो रही है। लेकिन आज किसी की भी चमड़ी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। शायद चमड़ी मोटी हो गई है।
आख़िर क्यों अख़बारों और समाचार चैनलों से ख़बरों की संख्या कम होती जा रही है। इसका जवाब देने में ज़्यादातर कथित पत्रकार घबराते हैं। क्योंकि सत्तर –अस्सी के दशक से कलम घिसते –घिसते कलम के सिपाही संस्थान के सबसे बड़े पद पर बैठ तो गए लेकिन कलम धन्ना सेछ के यहां गिरवी रखनी पड़ी। कम उम्र का छोरा ब्रैंड मैनेजर बनकर आता है और संपादक प्रजाति के प्राणियों को ख़बरों की तमीज़ सिखाता है। ज़रूरी नहीं कि ब्रैंड मैनेजर पत्रकार हो या इससे वास्ता रखता हो। वो मैनेजमैंट पढ़कर आया हुआ नया खिलाड़ी होता है। हो सकता है कि इससे पहले वो किसी बड़ी कंपनी के जूते बेचता हो। तेल, शैंपू बेचता हो। वो ख़बर बेचने के धंधे में है। इसलिए उसके लिए ख़बर और अख़बार तेल , साबुन से ज़्यादा अहमियत नहीं रखते। वो सिखाता है कि किस ख़बर को किस तरह से प्ले अप करना है। सब बेबस होते हैं। क्योंकि सैलरी का सवाल है। ब्रैंड मैनेजर सेठ का नुमाइंदा होता है। उसे ख़बरों से नहीं, कमाई से मतलब होता है। अब कौन पत्रकार ख़्वामखाह भगत सिंह बनने जाए।
कुछ यही हाल टीवी चैनलों का भी है। ईमानदारी से किसी न्यूज़ चैनल में न्यूज़ देखने जाइए तो न्यूज़ के अलावा सब कुछ देखने को मिल जाएगा। कोई बता रहा होगा कि धोना का पहले डेढ़ फुट का था अब बारह इंच का हो गया है। ये क्या माज़रा है – समझने के लिए देखिए ..... बजे स्पेशल रिपोर्ट। कोई ख़बरों की आड़ में दो हीरोइनों को लेकर बैठ जाता है और दर्शकों को बताता है कि देखिए ये पब्लिसिटी के लिए लड़ रही हैं। ये लेस्बियन हैं। ये लड़ाई इस उम्मीद से दिखाई जाती है ताकि दर्शक मिल जाए और टीआरपी के दिन ग्राफ देकर लाला शाबाशी दे। कोई किसी ख़ान को लेकर घंटो आफिस में जम जाता है। सबको पता है कि उसकी फिल्म रिलीज़ होने वाली है। ये सब पब्लिसिटी का हिस्सा है। लेकिन वो अपने धुरंधरों के साथ जन सरोकार वाले पवित्र पत्रकारिता की मिशन में लगा होता है।
इसमें कोई शक़ नहीं कि हिंदी पत्रकारिता समृद्ध हुई है। इसकी ताक़त का दुनिया ने लोहा माना है। अंग्रेज़ी के पत्रकार भी थक हार कर हिंदी के मैदान में कूद गए। भले ही उनके लिए हिंदी पत्रकारिता ठीक वैसे ही हो, जैसा कहावत है- खाए के भतार के और गाए के यार के। लेकिन ये हिंदी की ताक़त है। लेकिन इस ताक़त की गुमान में हमने सोचने समझने की शक्ति को खो दिया। एक साथ, एक ही समय पर अलग अलग चैनलों पर कोई भी हस्ती लाइव दिख सकता है। धरती ख़त्म होनेवाली है- ये डरानेवाली लाल- लाल पट्टी कभी भी आ सकती है।
ये सच है कि एक दौर था जब अंग्रेजी की ताक़त के सामने हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की मानी जाती थी। मूर्धन्य लोग पराक्रमी अंदाज़ में ये दावा करते थे- आई डोंट नो क , ख ग आफ हिंदी बट आई एम एडिटर आफ..... मैगज़िन। लेकिन तब के हिंदी के पत्रकार डरते नहीं थे। डटकर खड़े होते थे और ताल ठोककर कहते थे- आई फील प्राउड दैट आई रिप्रजेंट द क्लास आफ कुलीज़ , नॉट द बाबूज़। आई एम ए हिंदी जर्नलिस्ट। व्हाट वी राइट, द पीपुल आफ इंडिया रीड एंड रूलर्स कंपेल्स टू रीड आवर न्यूज़। आज इस तरह के दावे करनेवाले पत्रकारों के चेहरे नहीं दिखते। लालाओं को अप्वाइनमेंट लेकर आने को कहनेवाले संपादक नहीं दिखते। नेताओं को ठेंगे पर रखनेवाले पत्रकार नहीं मिलते। कलम को धार देनेवाले पत्रकार नहीं मिलते । आज बड़ी आसानी से मिल जाते हैं न्यूज़रूम में राजनीति करते कई पत्रकार। मिल जाते हैं उद्योगपतियों के दलाली माफ कीजिएगा संभ्रात शब्दों में लाइजिंनिंग करनेवाले पत्रकार। नेताओं के पीआर करते पत्रकार। चुनाव में टिकट मांगनेवाले पत्रकार। ख़बर खोजनेवाले पत्रकारों को खोजना आज उतना ही मुश्किल है, जितना कि जीते जी ईश्वर से मिल पाना। इसलिए आज 30 मई के दिन हिंदी पत्रकारिता के मौक़े पर ऐसे पत्रकारों को नमन करें , जिन्होने हिंदी को इतनी ताक़त दी कि आज हम अपनी दुकान चला पा रहे हैं। बेशक़ इसके लिए हमें रोज़ी रोटी और पापी पेट की दुहाई देनी पड़ी। लेकिन आज भी शायद हिंदी पत्रकारिता को बचाए रखने का रास्ता बचा हुआ है। खांटी पत्रकारिता करनेवालों को हम आदर सहित हिंदी पत्रकार कहें और दूसरे लंद फंद में लगे सज्जनों को मीडियाकर्मी कहकर पहचानें और पुकारें।

Monday, May 2, 2011

लादेन ने उतार दिया पाकिस्तान का मुखौटा


मरते –मरते ओसामा बिन लादेन ने पाकिस्तान का मुखौटा उतार दिया। अमेरिकी ड्रोन हमले में लादेन उस जगह पर मारा गया, जहां पर पाकिस्तान हुकूमत का एक छत्र राज है। पाकिस्तान अब ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि राजधानी इस्लामाबाद से लगभग साठ किलोमीटर दूर पर बसे शहर अबोटाबाद पर क़बालियों का क़ब्ज़ा है। पाकिस्तान दुनिया से अपना असली चेहरा छिपाए घूम रहा था। वो ताल ठोंककर दावा कर रहा था कि वो आतंकवाद का ख़ात्मा करना चाहता है। वो अपनी सरज़मीं का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने देगा। यही दुहाई देकर पाकिस्तान अरसे से अमेरिका से तोल मोल कर अपनी माली हाली हालत को बचाए रखे हुए था।
भारत बार- बार दुनिया को पाकिस्तान का असली चेहरा दिखा रहा था। लेकिन अपने आका अमेरिकी की मेहरबानियों से पाकिस्तान अपने काले चेहरे पर परदा डाल लेता था। अमेरिकी नेता भी भारत आकर भारत की बात करते थे और पाकिस्तान पहुंचते ही उनका सुर बदल जाता था। फिर भी भारत ने हिम्मत नहीं हारी। धीरज और सब्र के साथ अमेरिका को समझाने में लगा रहा कि वो जिस पाल पोस रहा है, वो काला नाग है। एक दिन वो उसी को डस लेगा।
मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद बारत ने पूरी दुनिया को सबूत दिए कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ हैं। लेकिन पाकिस्तान ये दुहाई देता रहा कि वो खुद आतंकवादी से लड़ रहा है। वो दूसरे मुल्क में कैसे दहशतगर्दी फैला सकता है। भारत ने फिर कहा कि इकलौते ज़िंदा पकड़े गए आतंकवादी अजमल क़साब का नाता पाकिस्तान से है। भारत के इस बयान के बाद एक पाकिस्तानी चैनल भी क़साब के घर को दिखाया। उसके मां बाप से बात की। लेकिन पाकिस्तान इस सच को मानने के लिए राज़ी ही नहीं हुआ। वो अपने आका अमेरिका के क़दमों में गिरकर यही रोना रोत रहा कि मुंबई हमले से उसका कोई वास्ता नहीं हैं।
मुंबई हमले ही नहीं, कांधार प्लेन हाईजैक के आतंकवादी भी पाकिस्तान में छुट्टे घूम रहे हैं। मज़हब की आड़ में लोगों को भारत के ख़िलाफ भड़का रहे हैं। उनकी तस्वीरें, उनके भाषण भारत ने पाकिस्तान को दिए। लेकिन पाकिस्तान ने इसे भी मानने से इनकार कर दिया। बात बात परक सच पर परदा डालने में माहिर पाकिस्तान अब किस मुंह से कहेगा कि दुनिया का सबसे ख़रतनाक आतंकवादी उसके देश में कैसे छिपा बैठा था। क्या उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को ख़बर तक नहीं थी। क्या ऐसा मुमक़िन है कि खुफिया एजेंसी को भनक तक न हो या सरकार को इसका अहसास तक न हो। ओसामा जिस जगह पर मारा गया, वो फौजी इलाक़ा है। क्या फौज की इजाज़त के बग़ैर लादेन वहां बस सकता था? अगर फौज को अपने रिहाइशी इलाक़े के बारे में भी जानकारी नहीं थी तो फिर वो सरहद पार की जानकारी कैसे रखती होगी? पाकिस्तान सरकार हर आरोप से इनकार करेगी। लेकिन इस सच को दफन नहीं किया जा सकता कि लादेन की मौत उस ठोर पर हुई है, जहां चांद- सितारे वाला सब्ज़े रंग का परचम लहराता है। इस परचम के अंदर क़ैद है पाकिस्तान का असली चेहरा, ख़ूनी चेहरा, दहशतगर्द चेहरा, जो अब तक अमेरिका को मासूम नज़र आता था। लेकिन क्या इसके बाद भी अमेरिका को पाकिस्तान का चेहरा मासूम नज़र आएगा?

Saturday, April 30, 2011

समय कितना जल्दी बीत जाता है-"है न मां"

1 मई - इसे पूरी दुनिया मज़दूर दिवस के तौर मनाती है। छात्र और युवा राजनीति के दौरान मैंने भी वर्ग संघर्ष को लेकर ख़ूब नारे लगाए थे। लोगों को याद दिलाता था कि बुर्जुआ और सामंत कभी भी मेहनतकश मज़दूरों को उनका हक़ नहीं देता। ये लाल रंग का झंडा केवल रंग नहीं है। ये झंडा ख़ून से सना हुआ है। ये झंडा इंक़लाब की याद दिलाता है- उठो, बढ़ो और पूंजीपंतियों से अपना हक़ छीन लो। ये लड़ाई आज भी जारी है। लेकिन इस तारीख़ के साथ एक और भी याद जुडी़ हुई है। मेरे हाथ में अब लाल झंडा तो नहीं है लेकिन मेरा दिल लहुलूहान है। 1 मई 2007 - इसी दिन मैंने अपनी मां को खोया। लंबी बीमारी, जो डायबटीज़ ने उन्हे दी, के बाद वो मज़दूर दिवस के दिन हमें अकेला छोड़ गईं। समयचक्र को देखता हूं तो किसी अदृश्य शक्ति का अहसास होता है। 14 जुलाई 1996 को बाबा यानी दादाजी का देहांत हुआ। अगले ही साल 27 जून 1997 को पापा का देहावसान हुआ। इनकी मौत के सदमे से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि ठीस दस साल बाद एक बार फिर मौत ने चुपके से दस्तक दी। वो दिन था- 1 मई 2007। हैरानी की बात है कि एक न्यूज़ चैनल की नौकरी छोड़ने के बाद दूसरी नौकरी पर जाना था। वो चौनल एक बिल्डर का था। बात पक्की हो चुकी थी। दूसरी नौकरी ज्वाइन करने से पहले मैंने घूमने फिरने का कार्यक्रम बनाया। अचानक एक ज्योतिष से मुलाक़ात हुई। उन्होने बताया कि वो चैनल आपके लिए शुभ नहीं है। क्योंकि वो चैनल ही शुभ नहीं है। क्योंकि आप उसे ज्वाइन कर चुके हैं इसलिए आपका जीवन ख़तरे में हैं। या तो किसी हादसे में आपकी मौत होगी या फिर आपकी मौत तभी टलेगी जब कोई आपका बेइंतहा क़रीबी वो मौत अपने सिर ले ले। नई नई शादी हुई थी। बहुत छोटा बच्चा था। मैंने सोचा - कौन है वो जो मेरी मौत को अपने सिर लेगा। फिर मैंने ज्योतिष की बात को यूं ही मानकर पहले दिन नौकरी के लिए घर से निकल पड़ा। सोसाइटी के गेट के बाहर पहुंचते ही हादसे का शिकार हो गया। सुब सुबह नशे में चूर एक महिला रॉंग साइड से फुल स्पीड कार लिए चली आ रही थी। संभलने से पहले कार मेरे ऊपर से गुज़र चुकी थी। होश आया तो ख़ुद को फॉर्टिस अस्पताल में पाया। आंख के ठीक ऊपर चश्मे का एक शीशा आधा अंदर धंसा हुआ था। डॉक्टर मुझे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। कॉस्मेटिक सर्जन डॉक्टर दुधानी एमआरआई का कराने की सलाह दे रहे थे। उन्हे डर था कि कहीं ब्रेन स्ट्रोक न हो गया हो। वो साथियों से कह रहे थे कि अगर ये होश खो बैठा तो बहुत मुश्किल होगी। आंख खोलते ही वो तरह तरह के सवाल पूछने लगे। सर्जरी के बाद डॉक्टरों ने मुझे फिट घोषित कर दिया। एलान कर दिया कि मौत टल चुकी है। लेकिन इसके हफ्ते भर बाद ख़बर आई कि मां नहीं रहीं। देखो मां, मेरी मौत तो तुम अपने सिर ले गई। देखते ही देखते चार साल बीत गए न! हर बार तुम्हे डांटता था कि फलां काम करने के लिए तुमसे किसने कहा था। कुछ हो जाता तो। आज जो होना था, वो हो चुका है। लेकिन अफसोस तुम्हे डांट नहीं पा रहा हूं। वरना कहता- क्या ज़रूरत थी तुम्हे ये सब करने की। लेकिन शायद यही नियति है। क्योंकि ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है।





















yahoo detector, limewire

Wednesday, November 3, 2010

बचपन की बातें................


मेरे एक बहुक पुराने मित्र है कपिल बत्रा। लगभग एक दशक हो गए उनसे मिले हुए। लेकिन उनकी याद बहुत आती है। सुना है आजकल मुंबई में बसते हैं। बड़े चौनलों के लिए मल्टीकैम का सारा बोझ उटाते हैं। ये बहुत कम लोगों को याद होगा कि ये वही कपिल बत्रा हैं जो न्यूज़ एंकर हुआ करते थे। ये ज़ी टीवी के पहले न्यूज़ बुलेटिन की एंकरिंग कर चुके हैं। आज उनके पुराने खतो किताबत को खंगाला। भुली बिसरी बातें यादें आईं। उनका ये संवाद आज बी ज़ेहन में गूंजता है- जब सूरत ढल जाती है तब सीरत काम आता है। इसलिए टीवी के पत्रकारों तकनीकी तौर पर मज़बूत होना चाहिए। पता नहीं टीवी के तकनीक को कितना सीख पाया हूं और कितना साध पाया हूं। लेकिन कपिल बत्रा के साथ मेरे खतो किताबत के कुछ अंश पेश कर रहा हूं।

शायद ज़िंदगी बदल रही है!!
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया
बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता
क्या क्या नहीं था वहां,
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप",
"विडियो पार्लर" हैं,
फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है...
जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लम्बी हुआ करती थीं...
मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,
वो लम्बी "साइकिल रेस",
वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है
और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है..
जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती
बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना,
वो लड़कियों की बातें,
वो साथ रोना...
अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है?
जब भी "traffic signal" पे मिलते हैं
"Hi" हो जाती है,
और अपने-अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दीवाली, जन्मदिन और नए साल पर
बस SMS आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..
जब मैं छोटा था,
तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग,
पोषम पा, कट केक,
टिप्पी टीपी टाप.
अब internet, office,
से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है.
जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है..
जो अक्सर क़ब्रिस्तान के बाहर
बोर्ड पर लिखा होता है...
"मंजिल तो यही थी,
बस जिंदगी गुज़र गई मेरी
यहाँ आते आते"
ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है...
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है..
अब बच गए इस पल में..
तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं..
कुछ रफ़्तार धीमी करो,
मेरे दोस्त,
और इस ज़िंदगी को जियो...
खूब जियो मेरे दोस्त,
और औरों को भी जीने दो...
चलो दोस्ती के नाम ही सही
इंसानियत की ख़ातिर ही सही
इस दीवाली पर एक दीया
दोस्ती के भी नाम जलाएं
आओ फिर से दोस्ती के दीप जलाएं
इस दीवाली को पहले की तरह
खुशहाल बनाएं
सभी को ज्योतिपर्व मुबारक हो

Monday, October 4, 2010

सोनिया के वंशवाद से लालू का वंशवाद अलग कैसे


ये सवाल पिछले पंद्रह सत्रह सालों से मेरी ज़ेहन में कौंध रहा है कि आरजेडी के अध्यक्ष और गंवई नेता लालू प्रसाद यादव क्यों मीडिया की आंखों की किरकिरी हैं। मुसीबत ये कि लालू कुछ करे तो मीडिया पीछे पड़ जाए। लालू कुछ न करें तो भी मीडिया ने उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाए। लालू शुरू से ही मीडिया की आंखों की किरकिरी रहे हैं। ये अलग बात है कि लालू ने कारनामे इतने बड़े -बड़े किए कि मीडिया उन्हे दिखाने और छापने के लोभ से बच नहीं पाया। हंसोड़ अंदाज़ में दिया गया लालू का पंद्रह सेकेंड की बाइट बुलेटिन की टीआरपी को सेसेंक्स की तरह उछाल देता था। लालू प्रसाद ने अपने ओजस्वी बेटे तेजस्वी के हवाले अपनी रीजनीति की विरासत दी तो हंगामा बरप गया। सबने चीखना शुरू कर दिया कि बिहार में लालटेन के लेकर चलनेवाले लालू प्रसाद को अपना राजनीतिक वारिस नहीं मिला। सब साथ छोड़कर जा रहे हैं। यहां तक सगे साले भी पिंड छुड़ा चुके हैं। इसलिए लालू ने तेजस्वी को अपना वारिस घोषित किया।
क्या लालू को इतना हक़ नहीं है कि वो अपने बेटे को वारिस घोषत कर सकें। इससे पहले भी जब वो अपनी पत्नी राबड़ी को बिहार की मुख्यमंत्री बनाया था, तब भी बावेला हुआ था। आखिर ये बावेला उस समय मीडिया क्यों नहीं काटता , तब दूसरे राजनेता अपने नाती-पोतों तक को अपना वारिस घोषित करते हैं ? तब मीडिया को क्यों सांप सूघ जाता है? क्या कभी मीडिया ने ये सवाल खड़ा किया कि किस योग्यता के आधार पर सोनिया गांधी अपने राजकुंवर राहुल गांधी को देश का राज पाट सौंपने जा रही हैं। राहुल में ऐसी क्या काबिलियत दिखी कि वो देखते ही देखते पार्टी के महासचिव बन गए। लोकतंत्र ने राहुल गांधी को ऐसी कौन सी चाबी दे दी है कि वो गंभीर मुद्दे पर प्रधानमंत्री से मिलते हैं। और जो सलाह देकर आते हैं, उसकी घोषणा प्रधानमंत्री कर देते हैं ? क्या खुद सोनिया गांधी राजनीतिक विरासत की थाती नहीं खा रही हैं? अगर वो स्वर्गीय राहुल गांधी की पत्नी या फिर इंदिरा गांधी की बहू नहीं होतीं तो भारतीय राजनीति में उनकी हैसियत क्या होती ? फिर राहुल बाबा की हैसियत क्या होती? राहुल की तरह ही वरूण गांधी भी नेहरू गांधी परिवार के चिराग हैं। उन्हे क्यों नहीं देश का नगीना माना जाता है। क्या केवल इसलिए कि उनकी मां मेनका के साथ उनकी सास इंदिरा की कभी नहीं पटी। क्या इसलिए कि इंदिरा ने उन्हे राजनीतिक विरासत के साथ साथ घरेलू विरासत से भी अलग कर दिया था? क्या मीडिया ने मान लिया है कि राहुल की तुलना में वरुण की योग्यता कम है ? अगर ऐसा है तो मीडिया ने इसके लिए क्या पैमाना तय किया?
जब तथाकथित जगत के ताऊ देवीलाल ने अपने जीते जी चौधरी ओम प्रकाश चौटाला को हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाया तो मीडिया को वंशवाद क्यों नहीं दिखा। जब शेख अब्दुल्ला ने फारूक को वारिस बनाया तब भी मीडिया चुप था। फारूक ने उमर को वारिस घोषित किया , तब भी मीडिया चुप था। अब फारूक और उमर दोनों ही सत्ता की मलाई चाट रहे हैं। माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया राजनीतक वल्दीयत को संभाल रहे हैं। जितिन प्रसाद के बेटे जितेन प्रसाद भी सत्ता के वारिस हैं। मुरली देवड़ा के बेटे मिलिंद भी सत्ता सुख भोग रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा के बेटे दीपेंदर भी सत्ता सुख ले रहे हैं। ऐसे सैकड़ों नाम हैं। लेकिन इन नामों पर मीडिया की नज़र नहीं जाती। मीडिया की नज़र जाती है कि मुलायम सिंह ने कैसे राम गोपाल, शिवपाल, अखिलेश और डिंपल को राजनीति में उतारा। लालू प्रसाद कैसे अपने बेटे को तैयार कर रहे हैं रामविलास पासवान कैसे बिहार चुनाव में चिराग़ का इस्तेमाल करेंगे। आखिर मीडिया को क्यों इस तरह के नेताओं पर नज़र रहती है। क्या इसलिए कि वो दलित और पिछड़े हैं, और इन्ही की लड़ाई लड़ते हैं। वंशवाद के विरोध की राजनीति कर राजनीति में मक़ाम हासिल किया। या फिर मीडिया आज भी जातिवादी सोच से बाहर नहीं निकल पाया है। वो राहुल की विरारत में स्वातसुखाय का अहसास पाता है।
लालू प्रसाद दरअसल आजकल राजनीति के बियाबान में हैं। जब सत्ता के आभामंडल के पायदना थे, तब चाटुकार पत्रकारों की होड़ लगी रहती है। प्रणामा पाति करने के लिए रोज़ दर्जनों पत्रकार सलामी देते थे। अब ये दीगर बात है कि सत्ता में लालू की हैसियत वैसी ही गई है जैसे कि सब्ज़ी बनने के बाद तेजपत्ते की होती है। लालू को तब से करीब से देख रहा हूं, जब उन पर स्वर्गीय चंद्रशेखर का हाथ था। हांलाकि कई दिग्गज पत्रकार मानते हैं कि लालू को लालू बनाने में देवीलाल का हाथ था। नब्बे की दशक की बात है । दलित औऱ बुज़ुर्ग नेता राम सुंदर दास और लालू के बीच बिहार के मुख्यमंत्री के लिए जंग थी। ये जंग लालू ने जीती और पंद्रह सालों तक बिहार का राज पाट किया। इस राज पाट के दौरान बिहार का विकास हुआ या विनाश- ये बहस का मुद्दा है। लेकिन ये तो साफ है कि इन पंद्रह सालों तक लालू का करिश्मा सिर चढ़कर बोला।
पंद्रह सालों तक राज पाट करना बच्चों का खेल नहीं है। लालू ने इस करिश्में को करके दिखाया। बिहार के पिछड़े और दलितों को एक आवाज़ दी, नई ताक़त दी। बाबरी कांड के बाद लालकृष्ण आडवाणी की रथ को रोककर मुस्लिमों का विश्वास जीता। मंडल कमीशन लागू कर जब वी पी सिंह ने देवीलाल को साधने की कोशिश की तो लालू दीवार के साथ खड़े हो गए। भाषणों में सवर्णों के खिलाफ आग उगलने लगे। खुलेआम भूरा बाल साफ करने की चेतावनी देने लगे। भूरा बाल यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला। बिहार में जो पिछड़से सदियों से अगड़ों के पिच्छलग्गू बने हुए थे, उनको ताकत दी। इस दौरान अंग्रेजी दां लोग जिनती आलोचना लालू की करते थे, लालू उनते ही यकीन के साथ पिछड़ों को समझा लेते थे कि ये उनका नहीं , उन लोगों का अपमान है। लेकिन यही लालू से चूक भी हो गई। देखते ही देखते अगड़ी जातियां लालू प्रसाद के खिलाफ लामबंद हो गईं। उनके साथ केवल मुसलमान और यादव रह गए। सत्त्ता मद में चूर लालू में आक्रामकता आ गई। गरूर भी आ गया। बिहार भूलकर लो केंद्र की सरकार बनवाने और गिराने लगे। केंद्र की राजनीति के लिए वो अपनी पत्नी के हवाले बिहार का राजपाट कर गए। पत्नी आई तो साथ में दो भाई भी सक्रिय हो गए। बिहार में जंगलराज का आरोप लगने लगा। अपराधी सक्रिय हो गए। रोज़गार के लिए नौजवान बिहार छोड़ने लगे। ऐसे में लालू की इमेज को जबरदस्त धक्का लगा।
ख़ैर सवाल ये नहीं है कि लालू ने अपने बाद अपना राज पाट अपनी पत्नी राबड़ी के हवाले क्यों किया। क्योंकि ये परंपरा कांग्रेस में पहले से चली आ रही है। सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष इसलिए नहीं बनी कि उन्होने समाज का कोई बहुत बड़ा काम किया था। वो केवल इसलिए कांग्रेस की अध्यक्ष बनी क्योंकि राजीव गांधी की पत्नी थी। राहुल गांधी भी इसलिए सांसद और महासचिव बने क्योंकि वो सोनिया और राजीव के बेटे थे। फिर लालू के बेटे तेजस्वी को वारिस घोषित कर दिया। फिर इतना कोहरमा क्यों ? भारती राजनीति में लालू पहले आदमी तो नहीं है , जो इस तरह की खानदानी परंपरा क़ायम कर रहे हैं और न ही लोकतंत्र के आखिरी पहरूए। फिर इतना बवाल क्यों ? क्यों नहीं जिस तरह से राहुल बाबा के लिए जयकारा लग रहा है। वैसे ही तेजस्वी के लिए लगे। बाक़ी दोनों की क़िस्मत का फैसला जनता जनार्दन के हाथों में छोड़ दें।

Saturday, June 26, 2010

आज तेरह बरस हो गए.............


बड़े ग़ौर से सुन रहा था ज़माना तुमको, तुम्ही सो गए दास्तां कहते-कहते
ये शब्द मेरे पिता जी के हैं। पापा की मौत के बाद उनके मुहं से यही निकला था। लोग कहते हैं कि वक़्त सारे घाव भर देता है। लेकिन मैं इसका जीता जागता गवाह हूं। घाव कभी नहीं भरते। जिस पर बीतती है , वही जानता है। हमारे परिवार में ऐसा कोई दिन या लम्हा न होगा, जब परिवार का हर सदस्य उन्हे याद नहीं करता होगा। मेरे परिवार की नियती हो गई है कि मई, जून और जुलाई के महीनों से डर कर रहें। ये महीने हमारे लिए वज्रपात ले कर आते हैं। 1 मई 2007 को मेरी मां का देहांत हुआ। 1 जून 2010 को मेरी दादी जी (आजी) का देहांत हुआ। 14 जुलाई 1996 को दादाजी( बाबा)हमें छोड़कर गए। 27 जून 1997 को पापा चल बसे। पिता जी भी काफी बूढ़े हो चले हैं।
ये दर्द समझना इतना आसान नहीं है। जिस आदमी के सामने उसका छोटा भाई गुज़र गया हो, पत्नी गुज़र गई हो। मां-बाप न हो। वो कितना तन्हा महसूस करता होगा, क्योंकि वो अपने पूरे जीवन में इन्ही चारों पर न्यौछावर रहा। सच मानिए तो मुझे अब किसी त्यौहार या उत्सव में कोई आनंद नहीं आता। सब फीका सा लगता है। पता नहीं क्यों हर त्यौहार और उत्सव पर बीते दिनों की हर छोटी बड़ी बातें दिमाग़ में घूमने लगती हैं। न्यूज़ चैनलों में मैं अब तक बहुत नाट्य रूपांतरण और फ्लैश बैक बहुत दिखाया है। मुझे क्या पता था कि मेरी ही ज़िंदगी में ये असलियत कर तरह चस्पां हो जाएंगी। मेरा परिवार बहुत सिकुड़ गया है।
याद आती हैं कई बातें। लोगों के दिलासे-वादे, अपनापन, पृतभाव का प्रेम- फ्लैश बैक की तरह दिमाग़ में घूमती हैं। पापा के चौथ के बाद पिताजी को कोलकाता लौटना था। राजधानी से रिज़र्वेशन कराया। स्टेशन पर तीन लोग उन्हे छोड़ने आए। उनमे से एक समाजवादी नेता( जब वो मंत्री थे) के बहुत क़रीबी थे। बाक़ी दो सज्जन नामचीन संपादक थे। तीनों ने मुझे समझाया। कहा- हम लोग तुम्हारे साथ हैं। कभी जीवन में ज़रूरत पड़े तो ख़ुद को अकेला मत पाना। हम साथ खड़े मिलेंगे। बहुत पुरानी बात नहीं है। कुछ बरस पहले एसपी सिंह की टीम के एक सदस्य भी मेरे साथ काम करते थे। पद-प्रतिष्ठा में समकक्ष ही थे। लेकिन भौक्काल में नंबर वन। मेरे सामने ही लाला जी को वो बड़ी -बड़ी गोलियां देते थे कि पेट में दर्द होने लगता था। ख़ैर उनकी मेहरबानी से मैं पैदल हुआ। नौकरी की तलाश में था। प्लेटफार्म वाले संपादक बड़े चैनल में बडे़ ओहदे पर थे। मैंने उनको फोन किया। ये सोचकर नहीं कि नौकरी चाहिए। बल्कि 1997 वाले भाव को याद कर। उन्होने कई बार बुलाया। उन्हे सब पता था कि मैं बेरोज़गार हूं, नौकरी की तलाश में हूं। नौकरी का भरोसा भी दिया। लेकिन ये दिलासा बस भरोसा बनकर रह गया। उनका दो नंबरी हमेशा मुझे कहता था कि सीधे बात क्यों नहीं करते। सबको रख रहे हैं। हर बार मैं यही कहता था कि उन्हे सब मालूम है। सुविधानुसार वो ज़रूर देखेंगे। ये विश्वास लेकर चल रहा था। नौकरी उन्होने दिल खोलकर बांटी। नौकरी पानेवालों की योग्यताओं और अनुभव पर नहीं जाऊंगा। लेकिन अफसोस तो अफसोस ही होता है, जब पीड़ा दिल को छू गई हो। लेकिन उन पर से विश्वास आज भी नहीं डोला है। जिन लोगों ने मुझे दिलासा और भरोसा दिया था, आज भी उनके साथ मैं ईमानदारी से भावनात्माक और रागात्मक तौर पर जुड़ा हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि वो लोग काफी भले हैं।
ख़ैर व्यक्तिगत जीवन पर आता हूं। पत्रकारिता में आने का जुनून पापा को देख कर ही पैदा हुआ। लेकिन वो हमेशा इसके विरोधी रहे। वो हमेशा कहते थे कि पत्रकारिता का स्वरूप बदल रहा है। कुछ और करो। रेलवे की नौकरी ही कर लो। लेकिन मेरे पर तो महान पत्रकार बनने का भूत सवार था। एक तरह से बाग़ी बनकर पत्रकार बन गया। पापा को अच्छा नहीं लगा। लेकिन उन्होने मेरी भावना को भी समझा। उन्हे मुझसे कहा कि अगर पत्रकारिता ही करना चाहते हो तो फिर जामिया से कोर्स करो। मैंने पलटकर जवाब दिया कि टाटा-बिड़ला ने न तो एमबीए की पढ़ाई की थी और न ही धर्मवीर भारती से लेकर एमजे अकबर और आपने पत्रकारिता को कोर्स किया है। उन्होने मेरी बात को धैर्य से सुना। उन्होने एक बात बहुत धीरज के साथ मुझसे कही- पत्रकारिता में कुंठित हो जाओगे। बहुत कुछ बदल गया है। आज मुझे लगता है कि उन्होने भविष्य की पत्रकारिता को समय से भांप लिया था। किसी और से भेल ही न की हो, लेकिन हमारे बीच जो नाता था, उसमें वो बेबाकी से सच कह गए थे। क्योंकि पत्रकारिता का जो मौजूदा चेहरा और स्वरूप है, वो किसी से छिपा नहीं है।
घर पर कई बार रविवार और धर्मयुग के पन्ने पलटता हूं। उनके कई लेख देखता हूं। डाकू घनश्याम पर उदयन शर्मा का लेख पढ़ता हूं। आज के दौर के पत्र -पत्रिकाओं के साथ न्यूज़ चैनल देखता हूं। कई बार ख़ुद से पूछता हूं कि क्या मैं यही पत्रकारिता करने के लिए अपनों से लड़ा था। पत्रकारों के स्वभाव , गुण, चित्त , मनोदशा, आकांक्षा और फितरत को पढ़ने की कोशिश करता हूं तो बार बार यही सवाल उभरता है। ऐसे में मैं अपने बेटे अंश सुरेंद्र के साथ खेलता हूं। उसकी तरफ देखता हूं। मन ही मन बुदबुदाता हूं। कहता हूं- सब कर रहे हैं तो तुम क्या राजा हरिशचंद्र हो? फिर कहता हूं- बेटा , कर ले अब नौकरी। घर चला ले। देश बदलने का सपना छोड़। यहां तो सब ऐसे ही चलता है। तुम रहो या न रहो- देश ऐसे ही चलता रहेगा। इसलिए अब मुझे बड़ा चैनल -छोटा चैनल, बड़े पद या छोटे पद की चिंता ही नहीं होती। शायद लोग हंसे। लेकिन सच है कि मेरे मन बस यही भाव है- चाह गई, चिंता गई, मनुवा बेपरवाह। जिनको कछु न चाहिए, वो साहन के साह।

Tuesday, May 4, 2010

कांग्रेस क्यों झेल रही है ममता बनर्जी को ?

ममता बनर्जी ने कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया है। ममता ने बग़ैर लाग- लपेट के आरोप लगाया है कि कांग्रेस की नीयत ठीक नहीं है । वो सीपीएम को फायदा पहुंचा रही है। ये समझ में नहीं आता कि ममता बार –बार कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाती हैं। फिर भी कांग्रेस झेल रही है। जबकि कांग्रेस का दावा है कि मनमोहन सिंह की सरकार मजबूरी की नहीं मज़बूती की सरकार है। पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस पर आरोप लगाए हैं। लेकिन कांग्रेस की घिघ्घी बंधी हुई है। सोनिया गांधी के इशारे पर कभी अहमद पटेल मनाने जाते हैं तो कभी केशव राव चिरौरी करने जाते हैं। लेकिन ममता ने सबको एक ही लाठी से हांक कर भगा दिया।
कोलकाता और पश्चिम बंगाल के नगर निगमों के चुनाव को लेकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में तलवारें खिंच गईं। बंगाल में ममता की पिछलग्गू बनी कांग्रेस ज़्यादा सीटों की मांग करने लगी। लेकिन ममता ज़्यादा दरियादिली दिखाने के मूड में नहीं थी। उन्होने कांग्रेस को झिड़क दिया। कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी। इसके बाद ममता ने डंके की चोट पर एलान कर दिया कि राज्य में दोनों पार्टियों का गठबंधन टूट गया है। साथ ही ममता ने कई चौंकानेवाली बातें भी कह दीं। इन बातों को सुनकर ऐसा लगता है कि केंद्र में ममता और सोनिया गांधी की निभ कैसे रही है।
ममता ने मीडिया के सामने आपना दिल खोल कर रख दिया। ममता ने दावा किया कि केंद्र में गठबंधन को बचाए रखने के लिए वो रोज़ ज़हर का घूंट पी रही हैं। ममता का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण को लेकर उनकी नीति साफ है। नंदीग्राम और सिंगूर के समय इसके लिए उन्होने हड़ताल भी की थी। लेकिन मनमोहन सरकार उनकी नीति के खिलाफ है। केंद्र की सरकार भी राज्य की वाम मोर्चे की सरकार की तरह काम कर रही है। अब ये समझ से परे हैं कि मनमोहन सरकार भूमि अधिग्रहण के लिए वाम मोर्चा की नीति पर चल रही है। कांग्रेस गुप-चुप तरीक़े से सीपीएम की मदद भी कर रही है। तो फिर ममता क्यों नीलकंठ बन हुई हैं। क्यों नहीं वो केंद्र से अलग हो जा रही हैं। मंत्रिमंडल से बाहर हो कर भी तो सरकार चलाई जा सकती है। या फिर वो मंत्री की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रही हैं।
क्या वजह है कि ममता बनर्जी केंद्र में गठबंधन नहीं तोड़ पा रही हैं लेकिन राज्य में एक झटके से रिश्ते तोड़ने का एलान करती हैं। क्या राज्य की कांग्रेस और केंद्र की कांग्रेस अलग –अलग है । ममता बनर्जी ने जो अपनी भड़ास निकाली है, वो कांग्रेस के लिए ख़तरमाक संकेत है। ममता का आरोप है कि वो केंद्र में अपमानित हो रही हैं। मंत्रिमंडल में उनका कोटा पूरा नहीं किया गया। ममता की राजनीति करने की अपनी शैली है। ये शैली आक्रामक है। इसी शैली के तहत उन्होने कांग्रेस को याद दिलाना नहीं भूलीं कि केंद्र में कांग्रेस की अकेले की सरकार नहीं है। मनमोहन सिंह की इस सरकार को करूणानिधि और ममता बनर्जी ही आक्सिजन दे रहे हैं। वरना ये सरकार बेमौत मारी जाती। ममता का हुंकार ख़तरनाक संकेत देता है। ममता बेलौस होकर कहती हैं कि जब तक उनके आत्मस्मान पर चोट नहीं पहुंचती , तब तक मनमोहन सिंह की सरकार को कोई ख़तरा नहीं है।
हैरानी इस बात की है कि ममता खुद अलग अलग बयान दे रही हैं। एक तरफ आरोप लगा रही हैं कि भूमि अधिग्रहण को लेकर केंद्र और वाम मोर्चा की सरकार में कोई अंतर नहीं है। दूसरा आरोप लगा रही हैं कि कांग्रेस सीपीएम का साथ दे रही है। तीसरा आरोप लगा रही हैं कि केंद्र में मंत्रियों का उनका कोटा पूरा नहीं हुआ। चौथा आरोप लगा रही हैं कि वो केंद्र की गठबंधन को बचाए रखने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं। इसलिए सब कुछ सह रही हैं। फिर कहती हैं कि जब तक आत्मसम्मान पर चोट नहीं हुआ तब तक सरकार को कोई ख़तरा नहीं है। सवाल ये है कि पहले की सभी आरोपों को पलभर के लिए सच मान लिया जाए तो फिर आत्मसम्मान पर चोट पहुंचाने के और कौन से तरीक़े बचे हैं। क्या ममता इतनी नादान हैं कि उन्हे कुछ समझ में नहीं आ रहा। या उन्हे अच्छी तरह से मालूम है कि उनके समर्थन वापिसी से सरकार का बाल भी बांका नहीं होने वाला। समर्थन देने के लिए बहुतेरी पार्टियां बैठी हुई हैं। अगर वो सरकार से बाहर हो गई तो राज्य में उनका खेल ख़त्म हो जाएगा। जनता में जो भरोसा बना है कि राज्य सरकार की कान उमठेने के लिए ममता केंद्र पर जब तब दबाव डलवा सकती हैं। अगर वो गठबंधन और मंत्रिमंडल से बाहर हो गईं तो किस दम पर वो सीपीएम नेताओं को हूल देंगी।
दरअसल नगम निगम चुनाव में ममता बनर्जी ने सीट बंटवारों को जानबूझ कर मुद्दा बनाया। ये ममता बनर्जी की राजनीति का हिस्सा है। ममता बनर्जी नहीं चाहतीं कि राज्य में उनकी पिछलग्गू बनी कांग्रेस की ताक़त और हैसियत न बढ़े। ममता बनर्जी का इरादा आनेवाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कम से कम सीटें देने का है। ममता को मालूम है कि अगर नगर निगम चुनाव में उन्होने कांग्रेस को मनमर्ज़ी की सीटें दे दीं। तो फिर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हक़ से भी ज़्यादा सीटें मांगेंगी। इसके अलावा मनमर्ज़ी की सीटों के लिए सुब्रतो मुखर्जी से लेकर प्रणब मुखर्जी तक दबाव बनाएंगे। इसलिए ममता ने कांग्रेस को ज़ोर का झटका धीरे से दिया है। ममता को मालूम है कि कांग्रेस के बग़ैर वो अधूरी हैं। कांग्रेस को भी मालूम है कि ममता के बिना उसकी राजनीतिक हैसियत न के बराबर है। क़यास से ये लगाया जा सकता है कि नगर निगम चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच फिर से गोटी सेट हो जाएगी। क्योंकि विधानसभा चुनाव में दोनों को वोट प्रतिशत का खेल मालूम है। ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस से फिर हाथ मिलाएंगे। उन्हे तब आत्मसम्मान की चिंता नहीं होगी।