Tuesday, June 24, 2008

मैं इस विलाप में शामिल नहीं हूं- एस.पी.सिंह


सवाल- आप प्रिंट मीडिया से एलेक्ट्रानिक मीडिया में आ गए हैं। अपनी उपस्थिति में कैसा अंतर पाते हैं?जवाब- किसी माध्यम या संस्थान में निजी उपस्थिति का क़ायल मैं कभी नहीं रहा। मैंने जहां भी काम किया, टीम वर्क की तरह काम किया। अख़बार में भी जब मैं था तो पहले पन्ने पर दस्तख़त करके कुछ भी लिखकर छपने की वासना मुझमें नहीं रही। हिंदी में तो इसकी परंपरा ही रही है। मैं भी चाहता तो ऐसा अक्सर कर सकती था। अब टेलीविज़न के लिए काम करना मुझे रास आ रहा है। बतैर प्रोफेशन मैं यहां पहले से ज़्यादा संतुष्ट हूं। क्योंकि यहां लफ़्फ़ाज़ी और छल की गुंजाइश नहीं है। आलस्य और मिथ्या पत्रकारिता यहां नही चल सकती। जैसा कि कुछ लोग अनजान सूत्रों के हवाले से कुछ भी लिखते रहे हैं। यहां तो आप जो कुछ भी आप टिप्पणी करते हैं, उसे दिखाना पड़ता है। ये बात अलग है कि यहां ग्लैमर ज़्यादा है।

सवाल- आजकल हिंदी अख़बारों पर संकट की हर जगह चर्चा हो रही है। आपको क्या लगता है ? जवाब- ये उनके गोर अज्ञान की अभिव्यक्ति है। हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग चल रहा है। हिंदी और भाषाई अख़बारों की पाठक संख्या, पूंजी, विज्ञापन और मुनाफा लगातार बढ़ रहा है। हां, इस वृद्धि के बरबस उनके समाचार विचार स्तर को लेकर आप चिंतित हो सकते हैं। पर ये सब समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। दूसरी ओर आज, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर सहित अनेक क्षेत्रिय अख़बार अपना विकास कर रहे हैं। जयपुर में भास्कर और पत्रिका की प्रतियोगिता से क़ीमतें नियंत्रित हुई हैं। गुणवत्ता भी सुधर जाएगी। सच तो ये है कि हिंदी पत्रकारिता अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। हालांकि पेशे के रूप में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण हिंदी पत्रकारिता में बड़ी मात्रा में कर पतवार आ रहे हैं। लेकिन ये स्थिति स्थाई नहीं होगी।

सवाल- इसी संदर्भ में कहा जा रहा है कि हिंदी अख़बारों की विश्वसनीयता घट रही है। जवाब- भारतीय समाज में तुलसीदास के समय से ही त्राहि-त्राहि का भाव व्याप्त रहा है। पिछले 150 सालों से तो ये रोना और तेज़ हुआ है। हर आदमी बताता फिर रहा है कि संकट काल है। कम से कम मैं इस सामूहिक विलाप में शामिल नहीं हूं। भारतीय संस्कृति मूलत विलाप की संस्कृति रही है। नरेंद्र मोहन अख़बार की बदौलत राज्यसभा पहुंच गए तो बड़ा शोर हो रहा है। 1952 से ही ये सब हो रहा है।

सवाल- पत्रकारिता के मिशन बनाम प्रोफेशन होने पर भी बहस हो रही है। आप क्या सोचते हैं ?जवाबः सरकारी सुविधाएं और पैसे लेकर निकलनेवाले अख़बारों की सामाजिक प्रतिबद्धता क्या है? ये एक फरेब है, जो हिंदी में ज़्यादा चल रहा है। पत्रकारिता क़स्बे से लेकर राजधानी तक दलाली और ठेकेदारी का लाइसेंस देती है। मैंने किसी मिशन के तहत पत्रकारिता नहीं की। मेरी प्रतिबद्धिता अपने पेशे यानी पत्रकारिता के प्रति है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान पत्रकारिता मिशन थी। इसलिए वस्तुपरक भी नहीं थी। मिशन की पत्रकारिता हमेशा सब्ज़ेक्टिव होती है। यदि कोई पार्टी, संस्थान, आंदोलन मिशन की पत्रकारिता करे तो समझ में आती है। लेकिन नवभारत टाइम्स, जनसत्ता या हिंदुस्तान क्यों मिशन की पत्रकारिता करे ?

सवाल- मीडिया में वर्चस्व की संस्कृति को लेकर कुछ राजनेताओं ने अच्छा ख़ासा विवाद खड़ा कर दिया है। कांशीराम द्वारा पत्रकारों की पिटाई का मामला ताज़ा उदाहरण है। आपने इससे अपने आपको अलग क्यों कर लिया ?

जवाब- उसमें जातिवादी ओवरटोन ज़्यादा ता। इसलिए मैं अलग हो गया। यदि आप इस पेशे में आए हैं, तो इसकी पेशागत परेशानियों का सामना करें। वरना कोई अतिसुरक्षित पेशा चुन लें। कल्पना कीजिए यही काम किसी सवर्ण मे किया होता तो क्या ऐसा ही विरोध होता ? सवर्ण पत्रकारों ने इस घटना को दलित नेता को ज़लील करने के एक अवसर के के रूप में इस्तेमाल किया। मीडिया में प्रच्छन्न सवर्ण जातिवादी वर्चस्व है। उत्तर भारत में तो अधिकतर अख़बारों में सांप्रदायिक शक्तियां ही हावी हैं। पिछड़ों को सबक सिखाने का बाव आज भी ज़्यादातर महान क़िस्म के पत्रकारों की प्रेरणा बना हुआ है। ये वर्चस्व चूंकि समस्त भारतीय सामज में है, इसलिए मीडिया में भी है।

सवाल- साहित्य और पत्रकारिता के रिश्तों पर आपकी टिप्पणियां ख़ासा विवाद पैदा करती रही हैं। क्या आप अब भी ऐसा मानते हैं कि साहित्यकारों ने पत्रकारिता में गालमेल कर रखा है ?जवाब-भाषा की बात छोड़ दें तो विषयवस्तु या विचार के स्तर पर िकसी भी साहित्यकार संपादक ने हिंदी पत्रकारिता को कोई ज़्यादा मज़बूत किया , ऐसा मैं नहीं मानता। लेकिन ये भी सच है कि आज हिंदी पत्रकारिता की अपनी भाषा बन रही है। सारी दुनिया में पत्रकारिता की भाषा को साहित्य ने अपनाया है। हमारे यहां उलटी गंगा बहाने की कोशिश होती रही। इसे दुराग्रह नहीं तो क्या कहेंगे कि पत्रकारिता की भाषा को साहित्यिक बना दिया जाए।

मैं अक़्सर ऐसी चर्चाएं सुनता हूं कि और मेरी समझ में नहीं आता कि साहित्यकार पत्रकारिता से क्या और क्यों उपेक्षा करते हैं ? आप बेशक़ जैसी मर्ज़ी वैसी साहित्यिक पत्रकारिता करें। लेकिन बजट और विदेश नीति पर पत्रकारिय लेखन आपकी दख़लअंदाज़ी क्यों ? प्रिंट मीडिया के लिए भाषा और शाली की ज़रूरत है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि किसी बड़े विद्वान पंडित या साहित्यकार को संपादक बना दें। हिंदी में अक़्सर लोग शिकायत करते हैं कि पत्रकारिता में साहित्य को तरज़ीह नहीं दी जाती। आप बताइए कि संसार किस भाषा की पत्रकारिता में साहित्यिक ख़बरें प्रमुख रहती हैं। ख़बरों में बने रहने की ईच्छा वैसी ही वासना है , जैसा कि राजनेता पाले रखते हैं। मैंने देरिदा को नहीं दिखाया। आप ये न समझें कि ऐसा मैंने बाज़ार के दबाव में आकर किया। जी नहीं, मैंने यानी को भी नहीं दिखाया। ऐसा इसलिए कि आज तक के दर्शक समुदाय के लिए इन घटनाओं का कोई ख़ास महत्व नहीं है।

सवाल- ऐसा कह कर आप पत्रकारिता के लिए साहित्य के महत्व को रद्द तो नहीं कर रहे हैं? क्या आप रघुवीर सहाय, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा और अन्य अनेक साहित्यकारों के पत्रकारीय योगदानों को स्वीकार नहीं करते ?जवाबः देखिए, एक बात साफ कर दूं कि मैं इन लोगों के प्रति बहुत श्रद्धा रखता हूं। साहित्य पढ़ना मेरी आदत है। जो लोग कविता लिखते हैं, वो बहुत कठिन और बड़ा काम करते हैं। मुझे ख़ुद इस बात का अफ़सोस रहता है कि मैं कविताएं नहीं लिख पाता। ये मेरी असमर्थता है। लेकिन ये लोग सिर्फ अच्छे साहित्यकार होने की वजह से संपादक नहीं बने। ये लोग अपने समय के श्रेष्ठ पत्रकार थे। ये उस दौर में सामने आए, जब जब हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्ज़े के हाथों में था। इन लोगों ने इसे नया चमकदार चेहरा दिया।

साहित्य सृजन की एक श्रेष्ठ विद्या है। जैसे चित्रकला, अभिनय, गायन, नृत्य़ आदि। फिर आप बहुच बड़े डॉक्टर , इंजीनियर, नेता, वकील या कुछ भी हों पर इसका मतलब ये नहीं कि आपको संपादक बना दिया जाए। महज़ इसलिए कि आप उस भाषा में लिखते हैं, जिसमें अख़बार निकलता है।

एस.पी, सिंह का ये आख़िरी इंटरव्यू है। 16 जून 1996 को उन्हे ब्रेन हेमरेज हुआ था। जनसत्ता का ये अंक रविवार 15 जून 1996 को आया था। उस दिन मेरे छोटे बाई का जन्मदिन था। उस दिन मैंने अपने पापा से इस ख़बर को लेकर शैलेश जी के सामने मज़ाक भी किया था। लेकिन मुझे अहसास नहीं था कि क़ुदरत मेरे साथ ऐसा मज़ाक करेगी। मैं बग़ैर बरगद की छांव में बारिश में भीग रहा होऊंगा।

Monday, June 23, 2008

हिंदी चैनलों का कोई चरित्र नहीं बन पाया है- एसपी के भाषण का दूसरा अंश


चिंता की बात ये है कि इलेक्ट्रानिक माध्यम व्यावसायिक सामने आया है। व्यानसायिकता ही इसकी प्राथमिकता रहेगी। मैं व्यावसायिकता के ख़िलाफ़ नहीं हूं। क्योंकि इसके ख़िलाफ़ रहते हुए हम उम्मीद करें कि सारा काम सरकार करती रहे तो ये संभव नहीं है। इसके बीच ऐसा कोई सामंज्सय बिठाया जाए ताकि व्यावसायिकता भी बनी रहे और अपसंस्कृति के ख़तरे से भी देश को दूर रखा जा सके। एक तरीक़ा ये है कि इस माध्यम को नियंत्रण से दूर रखा जाए। मुक्त करके ऐसी कोई व्यवस्था बने कि निजी या सरकारी चैनलों की , जो सामाजिक रूप से ज़िम्मेदार भी हों, जो इस चीज़ को समझें कि हमें मनोरंजन की जितनी आवश्यकता है, उतनी ही सूचना और शिक्षा की भी है।
मैं किसी एक राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं लेना चाहता। कल कांग्रेस सत्ता में ती। तेरह दिनों के लिए बीजेपी भी सत्ता में थी। आज संयुक्त मोर्चा है। मुझे काम में कोई अंतर दिखाई नहीं देता। आज थोड़ी परेशानी और बढ़ गई है। क्योंकि उस समय एक सरकार थी। एक प्रदानमंत्री था। हमारे सामने साफ दिशा निर्देश थे कि देश में आप विभेद नहीं फैलाएंगे। दो संप्रदायों को लड़ाएंगे नहीं, आदि आदि। ये सब लिखे हुए हैं, आप पढ़ लीजिए। अलिखित ये होता है कि आप प्रधानमंत्री से अनावश्यक रूप से छेड़छाड़ नहीं करेंगे। कश्मीर के बारे में हम जैसा कहेंगे , वैसा करेंगे। आज 13 प्रधानमंत्री हैं और 26 विचारधाराएं। इन सबके अलग-अलग दिशा निर्देश हैं। इसमें कहीं कोई परिवर्तन नहीं आया है। ये एक ऐसा माध्यम है, अगर इस पर एक बार आप अपना चेहरा देख लें तो अपने चेहरे को बार-बार देखने की आदत पड़ जाएगी।
नौकरशाही की भूमिका ये है कि इसने ये समझ लिया है कि इस देश के ज़्यादातर लोग ग़ैरज़िम्मेदार हैं। हमारा दो प्रतिशत अंग्रेज़ी में बोलनेवाला जो चैटरिंग क्लास है, उसे लोकतंत्र से ही चिढ़ होती जा रही है। लोग फूलन देवी को चुनकर भेज देते हैं। मुलायम सिंह यादव चुनाव जीतकर आ जाते हैं। देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बना देते हैं। इनकी राय ये है कि ये ग़ैरज़िम्मेदार लोग हैं, जो किसी को भी चुनकर भेज देते हैं। कोई भी आकर बैठ जाता है। ये जो देश है, ये जो ढ़ांचा है, ये जो स्टील फ्रेम अंग्रेज़ो ने हमें सौंपा था, इसको बनाए रखने की पूरी ज़िम्मेदारी हमारी है। नौकरशाही अपने बहुत सारे तर्क देती है। सबसे बड़ा तर्क ये है कि आकाशवाणी और दूरदर्शन मुक्त हो जाएं, तो देश की सुरक्षा को ख़तरा है। कश्मीर का मामला है, पंजाब का मामला है, हम लोग ज़ोख़िम नहीं ले सकते। हमारी संस्कृति पर ख़तरा है। लेकिन हम लोग जो समाचार दे रहे हैं, वो सारा झूठ दे रहे हैं। इसकी हमें कोई चिंता नहीं। हम जो मनोरंजन दे रहे हैं, वो तीसरे दर्ज़े से भी घटिया है। कहीं कोई सामाजिक सरोकार नहीं है।
दरअसल कुछ अख़बारवाले आतंकित हैं कि विदेशी आकर हमारा एकाधिकार समाप्त कर देंगे। वो इस तरह का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं। कुछ ऐसे राजनीतिज्ञ और कुछ ऐसे नौकरशाह हैं. जो सत्ता में रहकर इस माध्यम का अपने हित में इस्तेमाल करना चाहते हैं। ये तभी ठोक हो पाएगा, जब निजी चैनल अपने पैरों पर खड़ा होना शुरू कर देंगे। ऐसे निजी चैनल जो भारतीय प्रतिभा के द्वारा संचालित होंगे, जो भारतीय नियमों से चलेंगे और भारतीय ज़मीन से जिनका जुड़ाव बोद्धिक स्तर पर होगा। तभी इन परिस्थितियों में सुधार आएगा।
सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी.सिंह ने अपनी मौत से दस महीने पहले दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग के हिंदी अनुभाग के एक संगोष्ठी में भारत में निजी चैनलों के भविष्य विषय पर अपने ये विचार दिए थे। सितंबर 1996 में उनका ये विचार आज भी प्रासंगिक है।

हिंदी चैनलों का कोई चरित्र नहीं बन पाया है- एस.पी.सिंह


निजी चैनलों का भारत में भविष्य कैसा है ? पत्रकारिता की शैली में यदि आप मुझसे पूछें तो मैं कहूंगा कि भविष्य बहुत अच्छा है। लेकिन इससे काम चलेगा नहीं। दूरदर्शन को एक तरह से चुनौती मिलनी शुरू हो गई है। कई तरह के चैनल हमारे सामने आ रहे हैं। इन नए चैनलों में भारतीय, विदेशी, निजी और सरकारी चैनल शामिल हैं। चैनल आते है, थोड़े दिनों तक दिखाई देते हैं और फिर ग़ायब हो जाते हैं। निजी चैनल जितने आए हैं, उनमें सफलता का प्रतिशत ज़्यादा नहीं है। व्यावसायिक कोण के बग़ैर किसी चैनल की सफलता या असफलता को आंकना आज के ज़माने में नामुमक़िन है। ये एक ऐसा माध्यम है, जिसमें करोड़ों की पूंजी लगती है। सिर्फ अच्छे कार्यक्रमों के आधार पर किसी चैनल की सफलता को नहीं आंका जा सकता। क्योंकि अगर ऐसा होता, तो डिस्कवरी चैनल एक बहुत सफल चैनल हो गया होता। फिर भी मैं कह रहा हूं कि निजी चैनल का भविष्य बेहद उज्जवल दिखाई देता है। ये कहने के लिए मेरे पास दो आंकड़े हैं। साल 1985 में विज्ञापनों पर 1.5 अरब रुपए ख़र्च किए गए। इसमें 75 प्रतिशत प्रिंट मीडिया पर ख़र्च होता था। 12 प्रतिशत रेडियो पर, 3 प्रतिशत सिनेमा पर और बाक़ी 6 फीसदी आउटडोर यानी होर्डिंग पर ख़र्च होता था। लेकिन साल 1994 में ये रक़म 35 अरब हो गई। यानी 10 साल में लगभग 400 फीसदी का इजा़फा। प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी 75 से घटकर 62 फीसदी हो गई। दूरदर्शन तब भी 12 वें नंबर पर था। अब भी वहीं डटा हुआ है। विज्ञापन राशि का 6 फीसदी हिस्सा सैटेलाइट टेलीविज़न के पास आ गया। इन आंकड़ों से लगता है कि निजी चैनलों का भविष्य बेहद उज्जवल है।

हम अगर हिंदी मीडिया से बार निकलकर उत्तर से दक्षिण बारत पर नज़र डालें तो हमारा दिमाग़ साफ हो जाएगा कि किस पैमाने पर वहां निजी चैनल सफलतापूर्वक चल रहे हैं। वहां पर चार चैनल तो बड़े सफल साबित हो रहे हैं, इनमें सन, जेमिनी, राज और जेजे शामिल हैं। ज़ी हिंदी का सबसे सफल चैनल है। लेकिन उस पर भी लोकप्रियता की दृष्टि से सबसे ज़्यादा देखे जानेवाले कार्यक्रम क्लोज़अप अंताक्षरी, फिलिप्स टॉप टेन औऱ कैंपस ही हैं। इनकी टीआरपी रेटिंग 10 के आस पास रहती है। दूरदर्शन की रेटिंग बहुत ऊंची है। जब महाभारत उफान पर होता है, तो टीआरपी 60-62 के आस-पास रहता है। अगर कृष्णा है तो भी 50-52 से नीचे नहीं जाता। आपकी अदालत जो एक तरह से टीवी पत्रकारिता में एक प्रतिमान क़ायम कर रहा है , वो भी लोकप्रियता में दो फीसदी से ज़्यादा नहीं है। दूसरी तरफ, तमिल के जो चैनल है और वहां पर जो उनके समाचार आते हैं, उन्हे देखने वालों का प्रतिशत 40 से 70 फीसद के बीच रहता है। ये सिर्फ तमिल ही नहीं होता, तेलगू में भी होता है और मलयालम में भी। इस बार जयललिता की हार में सन टीवी की बड़ी भूमिका रही। अंतिम दिनों में रजनीकांत ने जो बयान दिया, उसका असर ये बताता है कि जयललिता की पार्टी तमिलनाडु में पूरी तरह से साफ हो गई। आर्थिक तौर पर भी वो इतने सक्षम हैं कि वो दावे के साथ सरकार से कह रहे हैं कि आप हमें अपलिंकिग की सुविधा दीजिए, बाक़ी सारा इंतज़ाम हम ख़ुद कर लेंगे।

दक्षिण के चैनलों की तरह स्थिति हिंदी के चैनलों में नहीं बन पा रही। क्यों नहीं बन पा रही क्योंकि हिंदी के चैनलों का कोई चरित्र नहीं बन पाया है। सिर्फ सिनेमा का क्लिप लेकर आप एक लड़का और एक लड़की को ले लें और वो तरह-तरह से उछलता रहे। कभी सड़क पर, कभी चिड़ियाघर में- इस तरह के बीस प्रोग्राम आप आप हम झोंक दें और उम्मीद करें कि वो सफल हो जाएंगे। नहीं होंगे। हर तरह के प्रोग्रामों की एक सीमा होती है। अभी स्थिति ये है कि हम परीक्षण के दौर से गुज़र रहे हैं। यानी एक अंताक्षरी सफल है तो आप सौ अंताक्षरी के लिए तैयर हो जाइए। हामार बौद्धिक दिवालियापन इस हद तक है कि अगर एक हनुमान चल रहा है तो दूसरे भी आ गए हैं। मैं ये बात दावे के साथ कह रहा हूं कि तीसरे हनुमान भी आ जाएंगे। ये सिर्फ निजी चैनलों की बात नहीं है। हमारा जो दूरदर्शन है, वहां भी कल्पनाशीलता की कमी है। आज उनकी सबसे बड़ी चिंता है कि उनकी टीआरपी रेटिंग कैसी है।

हमारे देश में अशिक्षितों की संख्या सबसे ज़्यादा है। टीवी 44 फीसदी निरक्षर लोगों के घर तक पहुंचता है। पश्चिम में सैटेलाइट या इलेक्ट्रानिक मीडिया का जब हमला हुआ तब कमोबेश उस समाज में शिक्षा का एक स्तर पहुंच चुका था। जहां पर लोग कम से कम 90 प्रतिशत और कुछ जगहों पर 100 प्रतिशत साक्षर थे। वहां पर जब इसका हमला हुआ तो इसकी जो बुराइयां है, वो लोग झेल गए। हमारा देश तो वैसे भी वाचक परंपरा का देश रहा है। हम लिखने पर विश्वास कम करते हैं और बोलने में ज़्य़ादा। हमारे ज़्यादातर काव्य बोलकर लिखे गए हैं। ऐसे देश में जो बीच का स्थान था, उसे हम फलांग कर आगे निकल गए हैं। अशिक्षित लोगों के पास अब हम इतने सशक्त माध्यम लेकर जा रहे हैं , जो दृश्य भी है और श्रव्य भी । किस हद तक ये माध्यम उनको प्रभावित कर सकता है, ज़रा इसके बारे में सोचें और इसके बारे में विचार करें। इस माध्यम का अच्छा उपयोग करें तो अच्छी बात होगी। लेकिन उपयोग बुरा हुआ तो स्थिति बहुत गंभीर हो जाएगी।

क्रमश:

सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. सिंह ने सितंबर 1996 में दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग के हिंदी अनुभाग के एक सेमिनार में भाषण दिए थे। भाषण का बाक़ी का अंश जारी है।

Sunday, June 22, 2008

27 जून को एस.पी. की ग्यारहवीं पुण्यितिथि


इस सत्ताइस जून को सुरेंद्र प्रताप सिंह के देहांत के ग्यारह बरस पूरे हो रहे हैं। उपहार अग्निकांड के बाद 16 जून को उनके दिमाग़ की नसें फट गई थी। सबसे पहले उन्हे विमहेंस में एडमिट कराया गया। हालत बिगड़ने पर दोपहर में उन्हे अपोलो हॉस्पिटल में एडिमट कराया गया। ये बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि 26 जून की देर रात को उनके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया। वो इंसान, जो दिमाग़ की वजह से लोकप्रिय रहा है। 27 जून की सुबह दिल ने भी धड़कने से इनकार कर दिया।

याद है मुझे वो रात, जब डॉक्टरों ने हमें मानिसक तौर पर तैयार रहने को कह दिया था। उनकी पत्नी पर जो बीत रही थी, उसे बता पाना बेहद मुश्किल है। लेकिन जो मेरे साथ गुज़रा , उसे आज तक मैं नहीं भूला पाया हूं। जिस बरगद की छांव में मैं पला था, अचानक उसके गिरने की कल्पनाभर से मैं मटियामेट हो चुका था। मुझे अहसास हो चुका था कि मैं कमज़ोर हो चुका हूं। दिमाग़ी-ज़ेहनी तौर पर।

सेरोगट मदर के बारे में दुनिया जानती है लेकिन सैरोगट फादर का अंदाज़ा शायद न होगा। वो मेरे पिता नहीं थे। फिर भी वो मेरे पिता थे। मेरे पिता तीन भाई। सबसे बड़े मेरे पिता एन.पी., उसके बाद और एक चाचा। एन.पी. और एस.पी में बचपने से बहुत दोस्ती थी। दोनों एक दूसरे पर हमेशा क़ुर्बान होने को तैयार। मेरे पिता जी के दो बेटे हुए। बड़ा मैं और मुझसे छोटा एक भाई। एस.पी. ने बचपन में मुझे अपने बेटे का दर्जा दे दिया। ये दर्जा रागात्मक, भावनात्मक था। इसके लिए किसी क़ानूनी लिखत पढ़त की ज़रूरत हम लोगों ने नहीं समझी। पापा मेरी मां के बेहद दुलारे थे। वो उनके लिए देवर भी थे और बेटे भी। अक्सर लोगों से हंसी - मज़ाक से बचनेवाली मेरी मां उनसे मज़ाक कोई मौक़ा नहीं छोड़ती थी। याद है मुझे वो दिन। तब वो रविवार पत्रिका के संपादक थे। होली के दिन घर पर आए। मां मेरी होली नहीं खेलती थीं। पापा को देखते ही वो स्टील के एक मग में रंग भर कर ले आई औऱ पापा के ऊपर फेंक दिया। हालांकि मैं मां से ज़्यादा क़रीबी तौर पर जुड़ा हुआ था। लेकिन पापा के घर में घुसते ही मां की ये हरकत मुझे पसंद नहीं आई और मैंने उसी मग को मां की पेट पर मार दिया। मां दर्द से छटपटा उठीं और मेरे गाल पर पापा की एक ज़ोरदार चपत लगी। उस समय मैं बहुत छोटा था। लेकिन ये क़िस्सा आज भी मुझे सोचना पर मजबूर करता है कि मैं अपनी सगी मां से ज्यादा प्यार करता था या फिर पापा से।

अस्पताल में पापा के रहने के दौरान हमने लाख जतन किए। ख़ून के रिश्तों से भी बढ़कर दिबांग का रात-दिन एक करना। संजय पुगलिया की मायूस होती आंखें। अपना काम काज छोड़कर अमित जज और नंदिता जैन की मेहनत। राम बहादुर राय जी की कोशिश - पूजा पाठ और हवन के ज़रिए अनहोनी को टाला जाए। सुबह तीन बजे राय साहेब का आदेश देना- भैरव बाबा मंदिर से पुजारी को बुलाकर महामृत्युंजय जाप कराना। लेकिन सब बेकार गया।

ख़ैर पापा की मौत के बाद जब उनके पार्थिव शरीर को लेकर हम घर आने लगे तो मैं आपे में नहीं था। मैंने रामकृपाल चाचा को कहा कि वो मेरे साथ उस गाड़ी में बैठें , जिसमें बग़ैर प्राण के पापा थे। घर से कांधे पर पापा की अर्थी लेकर जब मैं चला तो यक़ीन मानिए मैं सब कुछ लुटाकर चला जा रहा था। जिसका अंश था मैं, उसे मैं जलाने जा रहा था। शम्शान घाट पर बहुत सारे लोग थे। उनमें से एक थे सीताराम केसरी , जो पापा को अपने बेटे की तरह मानते थे। उनका फूट फूटकर रोना याद है मुझे। पापा को आग के हवाले किया। मेरे साथ दिबांग ने भी पुत्र धर्म का निर्वाह किया। पापा को धू- धू जलते देख मैं बौखला उठा। मेरे पिता मेरे पास आए और कहा- सच स्वीकार करो। तेरा बाप मर चुका है। अब तुम इस दुनिया में बगैर बाप के हो। इससे पहले मेरी पंडित जी से भिड़ंत हो चुकी थी। वो मुझे मुखाग्नि पर जो़र दे रहा था। मैं उसे समझाने की कोशिश कर रहा था कि जिस व्यक्ति ने ज़िंदगीभर मेरे मुंह में अन्न देने की कोशिश की है, उसके मुंह में मैं बदले में आग कैसे दे दूं। ये कैसा धर्म है। पंडित को ये बाते समझ में नहीं आ रही थीं। लेकिन मैंने वहीं किया , जो मेरा धर्म कहता था। मैंने कपाल क्रिया से भी मना कर दिया।

रात को पापा के कमरे में अकेले बैठा था। कोलकाता से निर्मल दा आ चुके थे। मना करने पर भी उन्होने आज तक चैनल लगा दिया। दूरदर्शन पर संजय पुगलिया दिखे। आवाज़ भर्राई हुई और आंखों में नमी। इसे मैने पढ़ लिया था। मैं कमरे से बाहर चला गया। लेकिन संजय की नम आंखे और रूधी आवाज आज भी मुझे हौसला देती है। वो चेहरा बताता है- अगर मैं अकेला हूं तो संजय भी तन्हा हैं। इसलिए आज मैं ख़ुद को अकेला नहीं पाता।

Friday, June 20, 2008

ग़रीब कृष्णा कैसे देगा बेगुनाही का सबूत ?

देश की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा को अब पूरी दुनिया जानती है। पहली बार लोगों ने नोएडा का नाम तब सुना, जब निठारी गांव में बच्चों का कंकाल मिला था। दूसरी बार , लोगों ने नोएडा का नाम फिर तब सुना , जब चौदह साल की एक बच्ची आरूषि की हत्या हो गई। दोनों ही बार लोगों ने नोएडा का नाम अपराध के ज़रिए जाना। दुनिया के सामने नोएडा की सही तस्वीर सामने आई है। अगर लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है तो नोएडा अपराध की राजधानी है। पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबलियों को ये जगह बहुत रास आता है। ये वहीं इलाक़ा है, जहां से डी पी यादव और मदन भैय्या जैसे लोगों के पैर मज़बूत हुए हैं।
चौदह साल की आरूषि मशहूर डीपीएस की छात्र थी। माता- पिता भी काफी पढ़े लिखे और सभ्रांत हैं। पिता डॉक्टर राजेश तलवार डेंटिस्ट हैं तो मां नूपुर तलवार भी एक डॉक्टर। घर की इकलौती चिराग़। माता पिता ने लगभग तीन दशक पहले लव मैरिज की। औलाद के लिए बहुत मन्नतें मांगी । तब जाकर कहीं घर में आरूषि की खिलखिलाहट सुनाई पड़ी। लेकिन ये हंसी चौदह साल सा ज़्यादा की नहीं रही। चौदह साल घर में मातम छा गया। आरूषि की हत्या हो गई। उसके साथ ही पैंतालीस साल के नेपाली नौकर हेमराज की भी ख़ून हो गया। जितनी मुंह, उतनी बातें। हत्या के आरोप में पिता धरे गए। बवाल हुआ। सीबीआई ने कंपाउंडर कृष्णा को हत्या के आरोप में धर लिया। लेकिन अफवाहों को ज़ोर नहीं थमा। नाजायज़ रिश्तों की भी बात चली। किसी ने आरूषि और हेमराज में रिश्ते की बात छेड़ी तो किसी ने राजेश और डॉक्टर अनिता दुर्रानी के रिश्तों की बात की। बात अदला-बदली तक भी पहुंच गई। लेकिन अभी तक सही कहानी सामने नहीं आई है।
कृष्णा कुछ और कहता है। सीबीआई कुछ और कहती है। कृष्णा अदालत को कहता है कि उसने आरूषि और हेमराज को नहीं मारा। लेकिन सीबीआई कहती है कि कृष्णा ने ही डबल मर्डर किया है। कृष्णा कहता है कि उसे इस हत्या के बारे में कुछ नहीं मालूम। लेकिन सीबीआई कहती है कि कृष्णा को सब कुछ मालूम है। कृष्मा कहता है कि उसे नहीं मालूम कि किस हथियार से दोनों का ख़ून हुआ है औऱ वो हथियार कहां है। लेकिन सीबीआई कहती है कि उसे सब मालूम है। कृष्णा कहता है कि जब उसने ख़ून नहीं किया तो उसके कपड़े पर ख़ून के छींटे कैसे होंगे। सीबीआई कहती है कि कपड़े बरामद कराओ। सीबीआई ने कृष्णा को पॉलिग्राफिक टेस्ट, नार्को टेस्ट और ब्रेन मैपिंग भी करा लिया। सीबीआई कहती है कि ये सब कृष्णा की मर्ज़ी से हुआ। कृष्णा कहता है कि सीबीआई ने उससे ज़बरदस्ती की। सीबीआई के ज्वाइंट डिरेक्टर अरूण कुमाऱ झा कृष्णा को लेकर बंगलुरू धमक गए नार्को टेस्ट कराने। सीबीआई के इतने बड़े अधिकारी को ध्यान भी नहीं रहा कि इसके लिए अदालत का आदेश चाहिए। जब हॉस्पिटल ने मना किया तो अदालती आदेश लेकर आए। सीबीआई इनती जल्दी में क्यों है? अगर कृष्णा के पास भी पैसा होता, दौलत होती, अमीर होता, तो क्या सीबीआई ऐसे सलूक कर पाती। डीपी यादव के बेटे विकास यादव के नार्को टेस्ट कराने में कैसे पसीने छूटे थे , सीबीआई भूल गई ? सीबीआई की जांच को हम सही कैसे मान ले क्योंकि सीबीआई ने अब तक जितनी जाच की है, उस पर सवाल उठे हैं। चाहें वो बोफोर्स का मामला हो या आरोपी अक्तोवियो क्वोत्रिकी को बैंक से धन निकालने का मामला। सीबीआई के हर फैसले पर सरकार के इशारे पर नाचने का आरोप है। क्या सीबीआई की जांच ग़रीबों के लिए अलग और अमीरों के लिए अलग होती है ? सीबीआई ने दम भरा था कि ये केस 24 घंटे में हल होनेवाला केस है। लेकिन क्या हुआ... 24 घंटे तो बीत गए।

Thursday, March 20, 2008

आडवाणी के राम मतलबी हैं

कथित लौह पुरूष लालकृष्ण आडवाणी के राम मतलबी हैं। मेरा ये कहना अनायस नहीं है, सपाट नहीं हैं। बहुत सारे तर्कों -वितर्कों के आधार पर मैं बीजेपी के लौह पुरूष को फरेबी कह रहा हूं। संघियों को अगर आपत्ति है, तो वो इस बहस में ज़रूर शामिल हों।
कहने को पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी लौह पुरूष हैं। लेकिन असलियत में वो ज़ुबान से मोम पुरूष हैं। अपनी बात कहकर कब मुकर जाते हैं, इसका उन्हे ख़्याल भी नहीं रहता। अपनी आत्मकथा में उन्होने दावा किया है कि दुनिया की कोई भी ताक़त अब अयोध्या में राम मंदिर बनने से नहीं रोक सकती। अपनी पीठ थपथपाते हुए वो लिखते हैं कि 90 के आंदोलन के दौरान उन्होने जो बुनियाद खड़ी कर दी है, अब उसे हिला पाना नामुमक़िन है। आडवाणी अपनी किताब में भी राजनीति करने से बाज़ नहीं आते। लिखते हैं कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अगर फच्चर नहीं किया होता तो राम मंदिर मुद्दे का हल निकल गया होता। अब सवाल ये है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद चंद्रशेखर, नरसिंह राव, एच डी दैवेगौडा़, इंद्र कुमार गुजराल भी तो प्रधानमंत्री बने। फिर क्यों नहीं राम मंदिर का मुद्दा सुलझ गया ? औरों की बात तो छोड़िए- राम के कंधे पर सवार होकर अटल बिहारी वाजपेयी की बारात कई बार देश की सत्ता पर काबिज़ हुई। इस बारात में लालकृष्ण आडवाणी ही सहबाला थे। फिर क्यों नहीं अयोध्या में राम मंदिर बना दिया ? आडवाणी लिखते हैं कि राम मंदिर के मुद्दे पर बीजेपी ने एनडीए में एकराय बनाने में क़ामयाबी हासिल कर ली थी। अगर ये सच है कि संसद से क़ानून बनाकर ये हुक़्म जारी करा देते कि अयोध्या में किसी और धर्म का झंडा नहीं लहराएगा। बनेगा तो सिर्फ वहां राम मंदिर ही। ऐसा वो कर सकते हैं। लोकतंत्र में उन्हे ऐसा करने का अधिकार था। सवाल जनभावना का था। सवाल बहुसंख्यक समुदाय का था। उन्हे बहाने की कोई ज़रूरत नहीं थी। जब पूरा देश गुजरात का नंगा नाच देख रहा था तो लोकतंत्र का नीरो बांसुरी बजा रहा था। साबित करने पर तुले थे कि उनका लाल नरेंद्र मोदी जो भी कर रहा है, वो जायज़ है।
दूसरी बात ये कि राम मंदिर मुद्दे पर जब एनडीए सरकार में एका थी तो क्यों साधु-संतों का सड़कों पर उतर कर आंदोलन करना पड़ा। उस दौरान आडवाणी ने संतों को सार्वजनिक तौर पर संदेश दिया था- याद रखें, ये बीजेपी की सरकार नहीं है। ये एनडीए की सरकार है। अयोध्या में बिफरे पड़े एक बाबा को मनाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना दूत अयोध्या भेजा था। वो बाबा भी ऐसे वैसे नहीं थे। काफी बुज़ुर्ग थे और चालीस के दशक से राम मंदिर का अलख जगा रहे थे। अब वो बाबा राम के प्यारे हो गए। बड़े अरमान थे उनके कि एक बार राम मंदिर में मत्था टेक कर ही जगत को अलविदा कहें। नब्बे के दशक में बीजेपी के मोहक नारे के छलावे के मोह में वो बाबा भी फंस गए थे। जो दुनिया की सब मोब तजकर बेचारे साधु संत बने थे। याद कीजिए- मंडल के आंदोलन के दौरान वाजपेयी ब्रिगेड का नारा- सौगंध राम की खाते हैं हम , मंदिर वहीं बनाएंगे। राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। गंगा -जमुनी तहज़ीब में बंधे देश में नारा लगा- बाबर के औलादों से ख़ून का बदला लेना है। जिस हिंदू का ख़ून न खौला, ख़ून नहीं वो पानी है। जो मंदिर के काम न आए, वो बेकार जवानी है। याद है वो दिन भी , जब राम मंदिर बनाने के लिए पूरे देश से ईंट जमा किया गया था। राम के भक्तों ने पांच - पांच सौ रूपए एक ईंट के चुकाए थे। ताकि अयोध्या में मंदिर बन सके। जनभावना को भड़कानेवाली फौज 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में हंगामा बरपाया। देखते ही देखते बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया। बीजेपी के बड़े नेताओं और न जाने इनके कितने तरह के संगठनों ने नारा भी लगाया। बजरंग दल, हनुमान दल, वानर दल और न जाने कितने तरह के दल के बजरंगी अयोध्या में तैनात थे। ज़ोर ज़ोर से नारा लगा- एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो। मस्जिद के भरभराते ही अब की रूठी और तब की दुलारी उमा भारती ने मुरली मनोहर जोशी से गलबहियां कर लिया था। सत्ता के भूखे नेताओं ने एक के बाद एक बयान देने शुरू कर दिए। मस्जिद तोड़ने का इरादा नहीं था। हमने नहीं उकसाया। उन्माद को क़ाबू कर पाना संभव नहीं था। वाजपेयी जी की तंद्रा टूटी। बयान आया - जो हुआ, बहुत बुरा हुआ। शर्मसार है देश । अटल जी ने पहले इससे पल्ला झाड़ा। फिर सेहरा बांधने से भी नहीं हिचके। करोड़ों लोगों का वोट बीजेपी को सिर्फ इसलिए मिला था ताकि सत्ता में आते ही राम का मंदिर बनवाएं।
याद कीजिए बीजेपी के और सारे कई वादे। सत्ता में आए तो देश में एक क़ानून होगा। क्या बना सबके लिए एक क़ानून ? 370 खत्म कर देंगे। क्या ख़त्म हुआ 370 ? इन नारों के लिए फायर ब्रांड साध्वी ऋंतभरा को उतारा गया था। जो खुलकर कहती थीं- नहीं चाहिए कटा हुआ देश औऱ कटे हुए लोग। सत्ता में आते ही बीजेपी सब भूल गई।
आडवाणी के राम छलिया हैं। ये राम सिर्फ चुनाव की आहट पाकर जगते हैं। ये रोम रोम में नहीं बसते। चुनाव के समय अयोध्या से निकलकर पूरे देश में बसते हैं। आडवाणी के राम चुनावी हैं।
हमारे राम मायावी हैं। कृपालु हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय हैं। वो अंतर्यामी हैं। वो मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं। छल कपट से दूर रखते हैं। हमारे राम सिर्फ मंदिरों में नहीं बसते। हमारे राम मन में बसते हैं। हमारे राम रोम -रोम में बसते हैं। हमारे राम चुनावी नहीं है। हमारे राम हर पल हमारे साथ रहते हैं। वो हमारी आत्माओं में बसते हैं। वो इधर भी बसते हैं, उधर भी रचते हैं। वो हिंदुओं के राम है। वो मुसलमानों के राम हैं। वो सिख, ईसाई, पारसी , युहूदी सबके राम हैं। हमारे राम जय श्री राम नहीं है। हमारे राम- जय राम जी की हैं। हमारे राम ज़ाकिर भाई के भी मन में हैं। इसलिए वो हमेशा पलटकर जवाब देते हैं- राम राम भाई जान । हमारे राम गांधी जी में बसते थे। मरते वक़्त भी राम का दामन नहीं छोड़ा। हमारे राम महान है।

Wednesday, March 19, 2008

ये अपुन का आंदोलन है बीड़ू

मोहनदास करमचंद गांधी किसी पार्टी विशेष या नेता विशेष की थाती नहीं हैं। ये दीगर बात है कि ऐसे लोगों को दो अक्तूबर और 30 जनवरी को ही बापू की याद आती है। इन ख़ास दिनों पर ऐसे तबकों के लोग दहाड़ मार कर रोने लगते हैं । समाज को नसीहत देने लगते हैं कि ग्लोबल होने के बावजूद बापू को मन भूलो। ये बात मैं इसलिए कह रहां हूं कि बापू की नीतियों को बड़े बड़े गांधीवादी भी कई बार भूल जाते हैं। लेकिन इस देश की राजधानी में अब भी एक ऐसा कोना है, जहां के बच्चों में बापू का मूलमंत्र रचा बसा है।
नेशनल हाइवे नंबर चौबीस पर सड़क चौड़ा करने का काम चल रहा है। मयूर विहार से ग़ाज़ियाबाद जानेवाली पतली सड़कों इतना चौड़ा बनाया जा रहा है ताकि लोगों को आने जाने में अब घंटों ट्रैफिक में न फंसना पड़े। ये सारी क़वायद कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर है। बहरहाल, मयूरविहार फेज़ वन से आगे बढ़ते ही एक गांव आता है समसपुर। इसके उल्टे हाथ पर बसा है पटपड़गंज। हाइवे पर ही ग़ाज़ीपुर गांव आता है। सरकार समसपुर से लेकर ग़ाज़ीपुर तक सड़कों को चौड़ा कर रही है। इसके लिए सड़कों पर ईंट, पत्थर से लेकर चारकोल तक का अंबार लगा है। सड़क जब चौड़ी होगी, तब की तब। फिलहाल ईंट, पत्थरों की वजह से सड़क तंग हो गई है। ऐसे में आफिस आने जाने वालों की दिक़्क़तें और बढ़ गई हैं। हद तो तब हो जाती है जब दो पहिए पर सवार जाबांज़ ख़तरनाक करतब दिखाते हुए बाइक दौड़ाते हैं। बाइकसवारों को इतनी जल्दी होती है कि जहां से सूई भी नहीं गुज़र सके, वहां वो पहिया घुसा देते हैं। बस किसी तरह आफिस या घर जल्दी पहुंच जाए।
सड़क पर ईंट, पत्थर के अलावा मिट्टी भी पड़ी है। गाज़ीपुर गांव के बच्चों ने अपनी मेहनत से मिट्टी को समतल कर खेलने लायक़ मैदान बना लिया। आख़िर वो खेले भी तो कहां। उनके गांव में क्रिकेट या फुटबॉल का मैदान तो है नहीं। न ही उनके मम्मी - पापा, माफ कीजिएगा- माता पिता उन्हे किसी एम्युसमेंट पार्क, वॉटर पार्क, मॉल्स लेकर जाते हैं। न ही उन्हे खेलने के लिए बार्बी डॉल या पोको मैन जैसे खिलौने देते हैं। बच्चे तो ठहरे बच्चे। लिहाज़ा उतर आए सड़क पर खेलने। उन बच्चों को ये भी मालूम है कि सड़क पर खेलना ख़तरे से खाली नहीं है। लेकिन वो भी बचपने के आगे मजबूर हैं। वो निपट देहाती खेल खेलते हैं। गिल्ली-डंडा, रूमाल चोर, डॉक्टर-नर्स। लेकिन उन्हे तब खीज होती है जब जल्दी जाने की होड़ में बाइकवाला सड़क छोड़कर मिट्टी पर अपनी बाइक सरपट दौड़ाने लगता है। इससे उन खेल का ख़राब हो जाता है। एक दो बार की बात हो तो वो मान भी जाएं। यहां तो हर लम्हा किसी न किसी को जल्दी पड़ी होती है। उन्होने कई बार बाइकवालों को समझाया- अंकल, इधर बाइक मत चलाओ। लेकिन बाइकवालों की कान पर जूं नहीं रेंगी। बच्चों के ऐसे समय में बापू की याद आई। पता नहीं कि ये मुन्नाभाई एमबीबीएस का कमाल था या स्कूकी किताबों का असर। लेकिन उनका आइडिया धांसू था। एक शाम जब मैं घर लौट रहा था तो लगा कि आज जरूरत से ज़्यादा जाम है। वक़्त ज़्यादा लग रहा है। गाड़ियां रेंग भी नहीं पा रही हैं। किसी तरह थोड़ा आगे बढ़ा तो पाया कि आज बच्चों की संख्या बहुत ज़्यादा है। पता नहीं उन्होने रातों रात कहां से वानर सेना तैयार कर लिया था। सारे बच्चे मिट्टी वाले लाइन से लेकर बीच सड़कों पर आ गए थे। न कोई नारा, न कोई बैनर-पोस्टर, न किसी पार्टी का झंडा। जब लोग उनसे हटने का आग्रह करते थे तब उनका यही जवाब होता था कि क्या आपने हमारी बात कभी मानीं ? लोगों का सब्र जवाब दे रहा था। लेकिन उपाय भी नहीं था। कई लोगों ने बच्चों से वादा किया कि आइंदा वो रंग में भंग नहीं डालेंगे। गाड़ी सड़क पर ही चलाएंगे। तब जाकर कहीं बच्चों ने रास्ता खाली किया। मेरे मुंह से बस यही निकला - बापू तेरे देश में ........