Wednesday, February 17, 2021

देवी दुर्गा ही लगा रही हैं ममता की नैय्या पार

 


बिहार के बाद बहुत जल्द ही पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इनमें से पश्चिम बंगाल, असम और केरल के चुनाव राजनीति के हिसाब से बेहद अहम माने जा रहे हैं। इन राज्यों के चुनावी नतीजे केंद्र की भावी राजनीति और मोदी सरकार के भविष्य की दशा दिशा तय करेगा। असम में बीजेपी की मिली जुली सरकार है। असम में घुसैपेठियों के मुद्दे पर चुनाव लड़ने जा रही बीजेपी के लिए सरकार बचाए रखने की चुनौती है तो वहीं पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अमित शाह और जेपी नड्डा की अगुवाई में पूरी ताकत झोंक रखी हैं। बंगाल में हर पल राजनीति करवट ले रही है। कभी विकास बनाम विनाश का नारा बुलंद किया जाता है तो कभी लड़ाई राम बनाम दुर्गा पर आकर टिक जाती है। टीएमसी नेताओं को लगातार तोड़कर बीजेपी ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि ममता बनर्जी की तानाशाही और मनमानी से पार्टी के लोग ही परेशान हैं। वहीं बेपरवाही दिखाकर सीएम और टीएमसी ममता बनर्जी ये दिखाने की कोशिश कर रही हैं कि इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अपने दम पर सरकार में लौटेंगी। 


बीजेपी की कोशिश है कि बंगाल का चुनाव वो बहुकोणीय बना सके। इसमें वो अपना ज्यादा से ज्यादा फायदा देख रही है। बिहार जीतने के बाद AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी हुगली वाले फुरफुरा शरीफ के साथ मिलकर चुनाव लड़ने जा रहे हैं। हांलाकि टीएमसी उन्हें बाहरी बताकर कुछ यूं जताने की कोशिश कर रही है कि मानों ओवैसी का आना उसे अखर रहा है। क्योंकि ओवैसी 35 फीसदी मुस्लिम वोटरों में सेंध लगाकर कहीं ना कहीं से बीजेपी के लिए जीत की राह आसान करने आए हैं। वहीं कभी टीएमसी के साथ मिलकर कभी चुनाव लड़ने का इरादा रखनेवाले ओवैसी अपने ऊपर लगे आरोपों को झुठलाने में मशगूल हैं। फिलहाल बंगाल का चुनाव में तीन बड़े प्लेयर दिखाई दे रहे हैं। सत्ताधारी टीएमसी का मुख्य मुका़बला कमजोर या यूं कहें कि लगभग खत्म हो चुकी लेफ्ट और कांग्रेस की जगह बीजेपी से है। मैदान में कांग्रेस और लेफ्ट का गठबंधन है। अभी फुरफुरा शरीफ और ओवैसी का गठबंधन जमीनी स्तर पर आकार नहीं ले पाया है लेकिन मीडिया में जरुर छाया हुआ है। 

हिंदी पट्टी के राज्यों को जीतने की आदत बना चुकी बीजेपी बंगाल को भी उसी तरह से ट्रीट कर रही है। वो भूल रही है कि ये माटी राम नाम के फसल नहीं देती। इस राज्य में रामनवमी कभी भी उस उत्साह के साथ नहीं मनाया गया जैसा कि बिहार यूपी में होता है। जिस छटी मैय्या को यादकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के चुनाव में कूदे थे। बावजूद इसके जिस तरह से वो सत्ता में लौटे। वो किसी से छिपा नहीं है। वो छटी मैय्या बंगालियों के लिए कोई गर्व देनेवाला त्यौहार भी नहीं है। बिहार यूपी के लोग वहां पर ये उत्सव जोर शोर से मनाते हैं। बंगाली इसमें सहयोग ज़रुर करता है। लेकिन इसे बिहारियों और मेड़ो (एक तरह से अपशब्द) का पर्व मानता है। 

बंगाल में दुर्गा, काली और जगद्धार्थी जिस तरह से पूजी जाती हैं और बंगालियों में इन देवियों के लिए जिस तरह से आराध्य हैं। उस तरह बंगाल की धरती पर श्रीराम पूजनीय नहीं है। आराध्य नहीं है। बंगालियों में जिस तरह से दुर्गा और काली के लिए जोश उबाल मारेगा, उस तरह से राम के लिए नहीं। बंगाल में राम के लिए दहाड़नेवाले बीजेपी के चाणक्य अमित शाह को इस मर्म को समझना होगा। बंगाल में उनके राम का नारा मावड़ा (बंगालियों की भाषा में बिहार यूपी के लोग) को उद्वेलित जरुर कर सकता है। लेकिन बंगालियों को नहीं। बंगाली आदीशक्ति देवी दुर्गा के समकक्ष किसी को नहीं मानता। ममता ने श्रीराम के नारे को जय सिया राम में बदलकर ये बताने की कोशिश की है कि राम से परहेज़ नहीं है। लेकिन राम को अगर नारी शक्ति सिया का साथ ना मिला होता तो वो मर्यादा पुरुषोत्तम ना बन पाते। बीजेपी के पास फिलहाल इसका कोई तोड़ नहीं है। बंगाल में राम से कहीं ज्यादा श्रीकृष्ण पूजे जाते हैं। इस्क़ॉन वालों ने कृष्ण का बड़ा मंदिर भी बना रखा है। लेकिन कृष्ण भी दो तीन जिलों में ही बेहद पूजनीय हैं। रही बात देवी दुर्गा की तो बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष राम की महिमा के बखान में देवी दुर्गा के अस्तिव को चुनौती देकर सेल्फ गोल कर चुके हैं। उनका ये बयान साथी शुभेंदु अधिकारी के सीएम की कुर्सी पर दावे को कमजोर करने के लिए था कि वो सबसे बड़े राम भक्त हैं। अपेन इस बयान से वो बड़े रामभक्त तो जरुर बन गए हैं लेकिन बीजेपी को बंगालियों के बीच दुश्मन भी बना गए हैं। दिलीप घोष के बयान के बाद बीजेपी के लिए अब उतना जोरदार माहौल भी नहीं रहा, जो चंद रोज़ पहले तक था। फिलहाल जो सियासी माहौल दिख रहा है, वो मोदी, शाह, नड्डा और संघ की पूरी शक्ति के बाद भी टीएमसी बढ़त पर दिख रही है। 

Thursday, December 31, 2020

सोनिया को हटाने की रणनीति को अमलीजामा पहनाने लगे पवार

शायद राजनीति का ही दूसरा नाम मौकापरस्ती है। क्योंकि ये केवल राजनीति में ही रिवाज है कि जब जहां जिससे फायदा मिले, फौरन उसके गले मिले। फायदा निकल जाने पर उसके सीने पर पैर रखकर उससे बड़े फायदे के लिए किसी और के साथ हाथ मिला ले। भारतीय राजनीति में अगर कोई इस कला की राजनीति का उस्तादों का उस्ताद है तो उनका नाम एनसीपी चीफ शरद पवार है। कभी कांग्रेस की कार्यवाहर अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर 1999 में दूसरी बार कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाने वाले पवार ने बाद के दिनों में फिर से सोनिया का पल्लू थामा। क्योंकि दुश्मनी के बाद दोस्ती में ही भलाई दिखी। अभी तक साथ दिख रहे हैं। वो हर मुश्किल घड़ी में सोनिया के लिए ऐसे संकटमोचक बनकर उभरते हैं कि मानों वो सहयोगी पार्टी की नहीं बल्कि कांग्रेस के नेता हों। हाल के महाराष्ट्र चुनाव में कांग्रेस और एनसीपी जब हार गई तब पवार ने वो कारनामा कर दिखाया जो मुमकिन नहीं था। उन्होंने सूरज और चांद को मिलाने वाली कहावत की तरह कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करनेवाली शिवसेना और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली। भले ही वो सरकार लंगड़ा लंगड़ा कर चल रही हो। 

कहते हैं ना कि हाथी के दो दांत होते हैं। खाने के और दिखाने के और। पवार की भी राजनीति में कई मुखौटे हैं। अभी वो दिख तो सोनिया गांधी के साथ रहे हैं। लेकिन पत्ता फेंट रहे हैं कि कैसे सोनिया गांधी की कुर्सी हथिया ली जाए। नब्बे के दशक में राजीव गांधी की मौत के बाद पीएम बबने की हसरत रखनेवाले पवार का सपना सोनिया गांधी ने नरसिम्हा राव को पीएम बना दिया था। जबकि सारे कांग्रेसी सोनिया को चाह रहे थे। पीएम बनने के लिए पवार ने बहुत पापड़ बेले थे। कई कांग्रेसियों को चुनाव में बड़े कॉरपोरेट घराने से मोटी फंडिंग कराई थी। फाइव स्टार होटलों में कई बार दावत भी दी। लेकिन दिल के अरमान आंसुओं में बह गए थे। पवार ेक दिल में वो कसक आज भी बाकी है। 

नरेंदर मोदी की राजनीति के आगे कमजोर हो चुकी कांग्रेस में आज अध्यक्ष और नेतृत्व को लेकर जो संकट और प्रश्नचिन्ह लग रहा है, उसके पीछे भी शरद पवार का ही हाथ है। उनके साथ के ही कांग्रेसी पार्टी में नेहरू गांधी परिवार से बाहर का नया अध्यक्ष खोज रहे हैं। पवार ये भी उकसा रहे हैं कि एक एक सभी नेता सोनिया गांधी के यूपीए अध्यक्ष बने रहने पर सवाल खड़े करें कि जो अपनी पार्टी नहीं संभाल सकती हैं तो कई पार्टियों का समूह यानी यूपीए कैसे संभाल सकती हैं। कई कांग्रेसी कानाफूसी कर भी रहे हैं। लेकिन पवार की नई दोस्त शिवसेना खुलकर ये बात कहने लगी है। 

अस्सी बरस के हो चुके पवार भले अब उतने ऊर्जावान नहीं रह गए हैं, जैसा कि वह 1978 में इंदिरा गांधी और 1999 में सोनिया गांधी से बगावत करते समय थे। लेकिन हसरतें अब भी जवान हैं। थे। वो 1996 96 और 98 की कहानी को दोहराने का इरादा रखते हैं। जब कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन राष्ट्रीय मोर्चा का लीडर टीडीपी सुप्रीमो और आंध्र के सीएम रहे नंदमुरी तारक रामाराव को चुना गया था। इसलिए पवार ऐसा शिगूफा छोड़ रहे हैं कि अगर अतिशक्तिशाली हो चुके नरेंद्र मोदी को हराने के लिए कोई उन तमाम नेताओं को एक मंच पर लाकर मुट्ठी बना सकता है तो वो केवल वहीं है। सोनिया के नाम पर बहुत सारी पार्टियां और नेता नहीं आएंगे। लेकिन वो वो टीएमसी सुप्रीमो ममता बैनर्जी, बीजेडी सुप्रीमो नवीन पटनायक, आरजेडी के लालू यादव, जेडीयू के नीतीश कुमार, यूपी से मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव, तेलंगाना से असदुद्दीन ओवैसी, असम से पूर्व सीएम प्रफुल्ल महंत, टीआरएस के के चंद्रशेखर राव, वीआईएसआर के जगनमोहन रेड्डी, जेडीएस के एचडी देवगौ़ड़ा को लाकर मोदी का तख्ता पलट सकते हैं। अब देखना है कि पवार का पावर सेंटर के लिए ये नया खेल क्या गुल खिलाता है। 


Sunday, December 13, 2020

ममता बैनर्जी संभल जाओ-ठाकुरबाड़ी से ये पंगा हर सरकारों को महंगा पड़ा है

अपनी ज़मीन खो चुकी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की चीफ ममता बैनर्जी पूरी तरह से तानाशाही पर आमादा हैं। बीते दिनों जनवरी 2020 में बंद हो चुपके हत्या के एक केस में टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को हराकर सांसद बने अर्जुन सिंह और विधायक सुनील सिंह के घरों पर सात थानों की फोर्स के जरिए छापेमारी की कोशिश की। जबकि एक दिन पहले ही अर्जन के सहयोगी रहे हालीशहर के एक कार्करता की हत्या समेत छह कार्यकर्ताओं को टीएमसी वालों ने घायल कर दिया। इस घटना ने साबित कर दियाय कि ममता बैनर्जी की सरकार एंड ऑर्डर पर पूरी तरह से फेल हो चुकी है। हिंदी भाषी और मुसलमानों का वोट गभग खो चुकी ममता बैनर्जी बीजेपी के बढ़ते असर से पूरी तरह से घबरा गई हैं। इसलिए वो हिंदीभाषियों और मुसलमानों के बड़े नेता बन चुके सुनील सिंह और अर्जुन सिंह पर लगातार वार कर रही हैं। बहुत पुरानी बात नही्ं है जब कांकीनाड़ा में अर्जुन सिंह के घर के बाहर जय श्रीराम का नारा लगा रहे अर्जुन सिंह के समर्थकों पर भड़ गई थीं। गाड़ी से उतर कर यूपी वालों को वापिस भेजने की धमकी दी थी।



आज ममता को अर्जुन और सुनील अपराधी नजर आते हैं। लेकिन वो उस दिन को भूल गईं कि जब उनके कभी राइट हैंड माने वाले वकील विकास बाु की हत्या में अर्जुन और सुनील पर केस ला था। तब ममता को ये दोनों नेता बाहुली नज़र नहीं आए थे। अपना सबसे खास सहयोगी की हत्या के बाद भाी नोयापाड़ा आकर सुनीलल और अर्जुन को टीएमसी में ले गई थीं। क्योकि तब उन्हें ताक़तवर वामपंथिों को हराने के लिए कद्दावर और ताक़वर लोगों का साथ चाहिए था। अब साथ छूट गया तो पिछले डेढ़ सालों में दोनों नेताओं पर डेढ़ सौ ज़यादा मुक़दमें लाद लिए। ममता बैनर्जी भूल रही हैं कि बंगाल काशी और ऋषिकेश से भी ज़्यादा हिंदुओं के लिए पवित्र जगह है। यहां नारा लगतदा रहा है कि सारा तीरथ सौ बार और गंगासागर बस एक बार। ईश्वर इसी जन्म में पाप और पुण्य का फैसला कर देता है। ममता बैनर्जी समय रहते संभल जाएं। वर्ना रघवंशी ठाकुरों का श्राप लगेगा। मई 2021 में महिषासुर वध हो सकता है। बेहतर हो कि ममता अमेटी कॉलेज नोएडा से पढ़कर निकले अपने भतीजे अभिषेक को शेडो सीएम और टीएमसी चीफ बनने से रोकें। उसी की जह से ममता की ये दुर्गति हो रही है। वर्ना ये ठाकुरबाड़ी टीएमसी के सर्वनाश के लिए तैयार बैठी है।

Friday, November 13, 2020

क्यों हो जाते हैं एक्जिट पोल फेल?

बिहार के चुनाव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सबसे तेज चैनल हो या सबसे पहले वाला चैनल। सबके इलेक्शन प्रीडिक्शन यानी एक्जिट पोल ताश के पत्तों की तरह भरभरा गए। एक बार फिर हर तरह की मीडिया बड़ी बेशर्मी के साथ अपनी गलती पर परदा डालकर बनने वाली अगली सरकार के बहस मुबाहिस में लग गई। लेकिन वो ये भूल गई कि उनके इस धतकरमों से आम जनमानस में मीडिया की साख आज की तारीख़ में कहां पहुंच गई है। एक्ज़िट पोल की रायशुमारी में अपनी राय छिपानेवाला छुप्पा वोटर ये खुलकर कहने में तनिक भी नहीं डरता कि मीडिया तो बिकी हुई है। जो छुप्पा वोटर डर के मारे अगर वो ये नहीं कह पाता कि उसने किसको वोट दिया है या किसको और क्यों देगा। लेकिन मीडिया को खुलेआम दलाल कह पाने की साहस कर पा रहा है। तो यकीनन इसके लिए मीडिया का वो तबका अपराधी है, जो किसी कारणवश चाटुकारिता या भांट चारण की पत्रकारिता करता है। वो जनता को सच नहीं दिखाना चाहता। वो उसे छिपाता है। वो सरकारों और पार्टियों के लिए भोंपू का काम करते हैं। लाइव दिखाते हैं कि फलां साहेब ने पुल का उद्घाटन कर दिया। इस इलाकें में 70 सालों से पुल नहीं था। साहेब ने आज मोर का दाना चुगने को दिया। 70 सालों में आज तक ऐसा किसी ने नहीं किया था। मीडिया अपना राजधर्म भूल जाता है। जबकि होना तो ये चाहिए कि वो सरकारों को बार बार याद दिलाए कि उसने कौन कौन से ऐसे काम हैं, जो नहीं किए। उन बातों को ज़ोर शोर से उठाते रहना चाहिए, जो चुनाव में वादे करके सत्ता में आते हैं। इस नैतिक पतन और एक्जिट पोल के नेपथ्य की कुछ और बातें जल्द ही। 

Friday, October 2, 2020

रेंगनेवाली मीडिया को आज विरोध की आवाज उठाने की ताक़त मिली कहां से?

जैसा कि हर बड़ी घटनाओं के बाद होता आया है कि सरकार अपना नाकामियों को छिपाने के लिए सफेद झूठ बोलती है और जी हुजूरी के आदी अफसर लीपापीती करने में लगे जाते हैं। वो दोषियों को बचाने और आरोपियों की आवाज को अपनी बूट तले कुचलने का हर धतकम करती है। पिछले कुछ चंद सालों में सरकारों ने मीडिया को भी नचाना सीख लिया है। जो सरकार के इशारे पर नाचे, उन्हे भारत से सवाल पूछने का हक मिल जाता है। वो विरोधियों नेताओं का डीएनए निकालने का सरकारी लाइसेंस पा जाते हैं। जो नखरे दिखाते हैं, वो सरकारी विज्ञानों के पैसों की खनक आगे गुलाटी मारने लगते हैं। और जो नैतिकता, आदर्श और सिद्धातों की दुहाई देते हैं, उनके मालिकों-संपादकों को तरह-तरह के मुकदमों में फंसाया जाता है। बाज दफे जेल भी भेज दिया जाता है। 

मीडिया पर नए दौर में ये अघोषित आपातकाल नया नहीं है। देश के सबसे बड़े अंग्रेजी घराने में ये पहली बार हुआ था कि सही खबर छापने के बाद उसे माफी मांगनी पड़ी। प्रिंट में तो छप चुका था। तब भी सरकार के आंख-मुंह और कान रहे एक मोटा भाई को ये खबर रास नहीं आई थी। डिजीटल मीडिया में उल्टी खबर लगाई गई ताकि सरकार खुश हो जाएगा। लेकिन उस दिन शायद टेकनिक साथ नहीं दे रहा था। ऑफिस में तो खबर बदली हुई दिख रही थी लेकिन जब संपादक जी मोटा भाई के पास मोबाइल लेकर जा रहे थे तब खबर पहले वाली ही दिख रही थी। 

आज जब हाथरस में मीडिया के उन तमाम हस्तियों को पीड़िता के परिवार से मिलनेसे रोका गया, तो ये पहली बार हुआ कि मीडिया गोदी से उतर गई। वो उन पुलिसवालों से सवाल करने का हिम्मत जुटा पाई कि उन्हें किस धारा या का कानून के तहत मिलने से रोका जा रहा है। कल तक गोदी में बैठकर न्यूज़ दिखानेवाली मीडिया ये भूल गई कि अपराधों को ना देख पानी वाली जब अंधी हो गई तो भला वो इस घटना पर मीडिया के सीधे सवालों का जवाब कैसे दे सकती थी। वो तो गूंगी भी हो चुकी है और बहरी भी। हर घटना में सरकार कहती है कि ये अपराध हुआ ही नहीं। भारत से सवाल पूछने वाले एक सज्जन दूर की कौड़ी खोज लाए। सरकारी भाषा में बोलने लगा कि पीडिता के साथ रेप हुआ ही नहीं। उनसे कोई ये पूछे कि रेप की बात तो भूल जाइए। कम से कम इस पर तो बोलने की हिम्मत कीजिए कि केस दर्स करने में दस दिन क्यों लगे। और अगर अपराध हुआ नहीं तो सरकार ने क्यों लाखों के केस भेजे। क्यों मीडिया को घरवालों से मिलने रोका गया। क्यों डीएम साहेब को ये कहने की जरुरत पड़ी कि मीडिया आज नहीं तो कल चल जाएगी। लेकिन आपको रहना तो मेरे साथ ही पड़ेगा। कहते हैं ना कि जब की खुद की दाढ़ी में आग लगती है तो कोई पड़ोसी की दाढ़ी का आग पहले नहीं बुझाता। हाथरंसस कांड में टीआरपी है। विज्ञापन है। मुनाफा है। जब सरकार ने मीडिया की इंट्री बैन कर दी तो कमाई में अंधे हो चुके मालिकों ने कथित पत्रकारों को हड़काया होगा। तभी शायद गोदी में बैठकर न्यूज़ दिखानेवाली मीडिया अकबकाते हुए सरकार से सवाल पूछने का साहस दिखा पाई। क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करती तो अगले महीने एक महीने को जीरो बैलेंस वाले अकाउंट में पैसे कहां से आते।    

Wednesday, September 9, 2020

फिल्म स्टार की मौत में मीडिया का महागिद्ध भोज!

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत मामले में मीडिया ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की है, उससे ये सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मीडिया अपनी हदें भूल गया है। क्या वो जान बूझकर नैतिकता की सारी लक्ष्मणरेखा को पार कर रहा है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत और रिया चक्रवर्ती के ड्रग्स कनेक्शन को लेकर मीडिया ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की है, उससे मीडिया की साख को गहरा धक्का लगा है। कुछेक न्यूज़ चैनल खुद ही जांच एंजेसी बन बैठे। खुद ही अदालत बन गए। खुद ही फैसला सुना दिया। टीआरपी की इस अंधी दौड़ में चैनलों ने रोज नई कहानियां गढ़ी। कभी किसी को विलेन बना दिया। कभी किसी को हीरो बना दिया। उन्होंने इस बात की भी कतई परवाह नहीं की कि उनकी इस तरह के गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता से किसी की छवि तार तार हो रही है या उसके परिवार की इज्जत बीच चौराहे पर नीलाम हो रही होगी। उन्हे मतलब था तो सिर्फ टीआरपी। टीआरपी यानी शुद्ध मुनाफा। 

टीवी न्यूज़ के इतिहास में आज तक किसी के मौत पर मीडिया का महागिद्ध भोजन नहीं देखा थी। लेकिन सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर मीडिया ने ये महागिद्ध भोजन भी देख ले लिया। नंबर और टीआरपी गेम में लगे कुछ चैनल्स ने एक्टर की मौत के बाद अपने विज्ञापनों के रेट भी बढ़ा दिए हैं। इनदिनों दिल्ली की सड़कों पर टीआरपी के दावों को लेकर होर्डिंग्स पटे पड़े हैं। राजपूत की मौत और रिया को लेकर अपनी रिपोर्टिंग शैली से चुछ चैनलों ने शूचिता की मर्यादा को तार तार कर रख दिया। खबर बताते-बताते रिपोर्टर, एंकर और संपादक गण ऐसे चीखने लगते हैं, मानो कि दौरा पड़ गया हो। 

वैसे मीडिया की ये गिरावट की पराकाष्ठा है, जिसकी स्क्रिप्ट उसी दिन से लिखनी शुरू हो थी, जब एक विशेष राजनीतिक दल की विचारधारा को समर्थन करनेवाले चैनल में नाग-नागिन की संभोग कथा, भूत प्रेत का साया, मौत का लाइव दिखाकर टीआरपी हासिल करने की सस्ता हथकंडा अपनाया। ये प्रयोग सफल रहा तो देखा-देखी और भी कूद पड़े। हाल के दिनों में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को पुलिस गिरफ्तार करने गई तो एक चैनल पर कथित संपादक-एंकर अति उत्साह में आकर चिल्लाने लगे- देखो देखो, चोर जा रहा है। इस सरकार में अब एक भी चोर बच नहीं पाएगा। अब आप सोचिए कि पुलिस उन्हे अभी जेल लेकर जा रही है अदालत नहीं, जहां उनके दोषी होने या ना होने का फैसला होगा। लेकिन जनाब खुद ही अदालत बन बैठे। क्या यही पत्रकारिता है।

पत्रकारिता में गिरावट पर बहस अरसे से चल रही है। कांधार हाईजैक कांड के समय एक चैनल ने एक अपहरकर्ता का इंटरव्यू दिखाया था। तब इस बात पर बहस छिड़ी कि क्या उस चैनल को ऐसा करना चाहिए था। उसके बाद ऐसे कई मौके आए, जब मीडिया अपनी सीमाओं को भूलता रहा। मसलन, आरुषि तलवार हत्याकांड में उसके मां-बाप डॉक्टर राजेश तलवार और डॉक्टर नुपूर तलवार के नाम आए। सीबीआई जांच शुरू हुई। उसके बाद महीनों तक मीडिया रोज नई नई कहानियां दर्शकों के सामने परोसता रहा। सुशांत सिंह राजपूत की मौत और रिया की गिरफ्तारी के दौरान कुछ चैनलों ने ये साबित कर दिया कि उनके लिए मान-सम्मान, नैतिकता, आदर्श और सिद्धांत की कोई कीमत नहीं। वो बस मीडिया की आड़ में अपनी विचारधारा, किसी दल या नेता के लिए अगाध आस्था का प्रकटीकरण करने में भरोसा रखते हैं।   

Tuesday, February 11, 2020

दिल्ली के जनादेश की धमक बिहार-बंगाल में भी सुनाई देगी

देश की राजधानी दिल्ली ने एक बार फिर आम आदमी पार्टी यानी आप को प्रचंड जीत का जनादेश दिया है। कांग्रेस की दिवंगत शीला दीक्षित की तरह ही आप के संयोजक और सीएम अरविंद केजरीवाल ने हैट्रिक बना ली। दिल्ली के इस चुनाव को केवल आप की जीत या बीजेपी-कांग्रेस की हार के तौर पर ही नहीं तौला जाना चाहिए। इस चुनावी नतीजों ने दशकों पुराने मिथकों को तोड़ा है और सियासत की नई इबारत लिखने की कोशिश की है। उम्मीद की जा सकती है कि साल 2020 में पढ़े लिखों का शहर माने जानेवाली दिल्ली से चली ये चुनावी हवा धीरे-धीरे पूरे देशभर में फैलेगी।   

पहली बात तो ये है कि दिल्ली नमे सांप्रदायिकता के मुद्दे को नाले में बहा दिया है। इसमें अच्छी बात ये भी है कि सांप्रदायिकता को नकारने वालों में उन प्रदेशों के लोग भी शामिल हैं, जो आज भी राम मंदिर-मस्जिद, मजहब और जाति के जंजीरों से आजाद नहीं हो पाई है। दिल्ली में बस बिहार-यूपी के वोटरों ने साल 2020 के चुनाव में इस जड़ता को तोड़ा है। साथ ही दिल्ली के वोटरों ने ये भी साबित किया है कि ज्यादा चालाकी कई बार बहुत भारी पड़ जाती है। सीएए लागू होने के बाद पहली बार हो रहे किसी चुनाव में आप विकास के नाम पर जब वोट मांगने निकली। तो केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के अध्यक्ष रहे अमित शाह ने बेहद चालाकी से शाहीनबाग के धरने को गद्दारी और देशभक्ति से जोड़ने की कोशिश की। उन्हें उम्मीद थी कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद के चाशनीभरे नारों को दिल्ली की जनती गटक लेगी। लेकिन दिल्ली के लोगों ने अपने जनादेश से जता दिया कि उनके लिए शाहीनबाग, गाली, गोली, पाकिस्तान, इमरान, हिंदू-मुसलमान और गद्दारी को गोली नहीं चलेगी।
दिल्ली के जनता ने केवल फ्री वालों नारों पर भी मतदान नहीं किया है। हां ये सच है कि फ्री वाला नारा एक बड़ा फैक्टर जरुर बना है। लेकिन उसका आंकलन कुछ दूसरे तरीकों से भी किया जा सकता है। दो सौ यूनिट तक बिजली फ्री ने वोटरों में करंट जरुर पैदा किया। लेकिन वो वोटर भी आप के साथ जुड़े जो पहले की सरकारों में बिजली के भारी भरकम बिलों से परेशान थे। इस चुनाव ने ये भी साबित किया कि विकास के नाम पर चुनाव लड़ा भी जा सकता है और जीता भी। दिल्ली के डिप्टी सीएम और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने सरकारी स्कूलों में हुए सुधार और पढ़ाई की गुणवत्ता को आधार बनाया। सीएम केजरीवाल ने फ्री सफर, मुहल्ला क्लीनिक, कच्ची कॉलोनियों में डेवलमेंट जैसी तस्वीरें दिखाई और जनता ने उसे स्वीकारा भी। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि दिल्ली की जनता ने नफरत की आंधी के खिलाफ मशाल जलाने की दिलेरी दिखाई है। दिल्ली की जनता ने बताया है कि उसे विकास चाहिए। उसे अच्छी शिक्षा चाहिए। बेहतर स्वाथ्य सेवाएं चाहिए। बुनियादी और मौलिक सहूलियतें चाहिए। उन्हें मीठी गोली को जरुरत नहीं है कि भारत की हैसियत इतने ट्रिलियन की हो जाएगी। सबके खाते में पंद्रह लाख आ जाएंगे। अब पीओके लेकर रहेंगे। जो सत्तर सालों में नहीं हुआ, वो ऐतिहासिक गलितयों को सुधारने का कड़ा फैसला ले रहे हैं। हमारे सामने पाकिस्तान-अमेरिका गया तेल लेने। आदि-आदि। देश की राजधानी ने सड़ांध की राजनीति को अलविदा कह दिया है। तो क्या उम्मीद की जा सकती है कि दिल्ली की तरह बंगाल और बिहार के होनेवाले चुनावों में वहां के वोटर नक्सलियों को दफन कर देंगे और बांग्लादेशियों को भगा देंगे जैसे गुमराह करनेवाले नारों के झांसे में ना आकर उस पार्टी को वोट देंगे, जो वाकई उनके हित के लिए काम करने का इरादा रखती है। हां, इतना तो तय हो गया है कि दिल्ली के चुनाव में जो फॉर्मूला केजरीवाल ने सेट किया है, वो दूसरे राज्यों में भी मिसाल बनने लगा है। मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल सरकार 75 यूनिट तक बिजली फ्री देने जा रही है तो महाराष्ट्र सरकार सौ यूनिट तक बिजली फ्री देने का विचार कर रही है। 

Tuesday, August 6, 2019

खल गया एक सच्चे समाजवादी का जाना

सुषमा स्वराज नहीं रहीं। ये ख़बर सुनते ही सदमा सा लगा। सैद्धांतिक तौर पर उनकी पार्टी को नापसंद करने के बावजूद मैं उनको पसंद करता था। वजह बहुत साफ थी और वो ये कि वो बेहद व्यावहारिक और सादगीपसंद महिला थीं। आडंबरों से दूर। उनसे मेरी पहली मुलाकात नब्बे के दशक में दिल्ली के लोधी रोड वाले बंगले पर हुई। मुलाकात की वजह बने थे स्वर्गीय पत्रकार आलोक तोमर। आलोक जी के साथ उनके बेहद मधुर संबंध थे। पहली ही मुलाकात में ऐसा लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिले हैं। उस मुलाकात में हमारे साथ अब इंडियन एक्सप्रेस के सीनियर फोटोग्राफर अनिल शर्मा भी थे। उस मुलाकात की तस्वीर संभव है कि अनिल ने संभालकर रखी हो। उसके बाद तो न जाने कितनी बार उनसे मुलाकात हुई। कई बार मैं फोनकर मिलने जाता था। कई दिनों तक मुलाकात नहीं हो पाती थी तो खुद फोनकर संसद भवन बुलाती थीं। उस समय मेरे पास पीआईबी कार्ड नहीं होता था। सो मिलने के लिअ अपनी सेकेट्री से गेट पास पहले से ही बनवा कर रखती थीं।

67 साल की उम्र में सुषमा जी कई ऐसे काम कर गईं, जिसके लिए वो हमेशा-हमेशा के लिए याद किया जाएगा। 25 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बन जाना। फिल्म इंडस्ट्री को उद्योग का दर्जा दिलाना। दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने के बाद क्राइम को कंट्रोल करने के लिए की गई उनकी पहल-मैं रात भर जागूंगी ताकि दिल्ली वाले चैन की नींद सो सके। इस ऐलान के साथ रात को अचानक दिल्ली में गश्त लगाना। बैल्लारी के चुनाव में हार जाने के बाद सिर मुंडाने का ऐलान और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की उनसे ऐसा ना करने की अपील- एक बेहतर सियासी रिश्ते की मिसाल छोड़ देना। गीता को वापस भारत लाना। मुझे याद है कि टीवी पर चलनेवाले एक विज्ञापन को लेकर सुषमा जी बहुत व्यथित थीं। लेकिन वो उसे रोक नहीं पा रही थीं। निजी बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा-चंदन टीवी पर......विज्ञापन को देखे हो। बांसुरी (उनकी बिटिया) ग्यारह साल की हो चुकी है। बताओ वो विज्ञापन देखकर क्या सोचेगी। क्या ये विज्ञापन बच्चों के साथ बैठकर देखा जा सकता है। बाद मे मंत्री बनने के बाद उन्होंने उस विज्ञापन को बैन किया।
सुषमा जी ना केवल लाल कृष्ण आडवाणी और दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की प्रिय थी। बल्कि समाजवादी विचारधारा वाले नेताओं दिवंगत चंद्रशेखर, जॉर्ज फर्नांडीस, दिवंगत चौधरी देवीलाल की भी दुलारी थीं। वो दिल्ली मे डी 4 की सदस्य रहीं। डी 4 यानी अटल-आडवाणी के युग में संसद में कांग्रेस और यूनाइटेड फ्रंट सरकारों को घेरने के लिए धारदार भाषण देनेवालों का एक समूह, जिनमें दिवंगत प्रमोद महाजन, अरुण जेटली, वेकैंय्या नायडू और सुषमा स्वराज। उनका मीडिया से भी बहुत शानदार नाता रहा। वो मीडिया वालों से जब मिलती थीं-बतियाती थीं तो लगता ही नहीं था कि वो बहुत बड़े कद की नेता हैं। उनसे जब फोन पर बात नहीं हो पाती थी तो वो कॉलबैक करती थीं। ऐसी थी समाजवाद प्रकृति-प्रवृति की सुषमा स्वराज। उनका जाना सही मायनों सबको खल गया। सुषमा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि। 


Tuesday, April 30, 2019

मोनू आलम की पेंटिंग्स

लखनऊ में मेरे एक मित्र हैं। मोनू आलम। अगर कोई इन्हे पहली बार मिले तो ये विशुद्ध तौर पर एक खालिस बिजनेसमैन ही लगते हैं। उस रेस्टोरेंट से ज्यादा मुनाफा नहीं हो रहा है। धंधा ठीक-ठाक ही है। प्लाजा वाली दुकान घाटे में जा रही है। अब हाई कोर्ट के पास रेस्टोरेंट खोलेन जा रहा हूं। अमां मिया, रेस्टोरेंट-रेस्टोरेंट बहुत हो गया। अब गोमतीनगर में फ्लैक्स छापने की मसीन लेकर डाल दी है। वगैरह-वगैरह। ये रही मोनू की बाहरी छवि। लेकिन जब इनके किसी रेस्टोरेंट में घूमते हुए इनके केबिन में जाएंगे तो धूल फांकती लेकिन कपड़ों से ढंकी तस्वीरें बेतरतीब से पड़ी हुई मिलेंगी। तस्वीरें आपको ललचाएंगी। अच्छी लगेगी। पूछने पर मोनू आलम का जवाब होता था- यार, रात को खाली था। वक़्त नहीं कट रहा था तो बना डाली।

आप भी देखिए इनकी पेंटिंग्स को और पसंद आए तो दीजिए दाद।


Monday, February 11, 2019

अमित शाह अगर राजनीति के चाणक्य तो प्रियंका भी चाचा चौधरी

कांग्रेस की नई राष्ट्रीय महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रोड शो कर वाहवाही लूटी, उससे साफ हो गया है कि यूपी की राजनीति में तेजपत्ते की तरह निकालकर फेंक दी गई कांग्रेस को नई जिंदगी मिलनेवाली है। लखनऊ की गली-गली से राहुल गांधी के साथ प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया का काफिला निकला तो लोगों ने फूल बरसा कर करवट लेती राजनीति के गवाह बनने का संकेत दे दिया। इतिहास गवाह है कि नवाबों की नगरी लखनऊ में अर्से से बीजेपी ना केवल कांग्रेस बल्कि सपा और बसपा पर भी भारी पड़ती रही है। लेकिन भीड़ ने प्रियंका-राहुल को देखकर जिस तरह से जोश दिखाया और सिर्फ एक लफ्ज़ राहुल की जुबान से निकलने पर नारे लगाने लगी कि चौकीदार चोर है। उससे साफ हो गया है कि प्रदेश में कांग्रेस अब घुटने के बल नहीं रेंगनेवाली। 
दरअसल यूपी की सियासत में मरणासन्न हो चुकी कांग्रेस को जिंदा करने की गरज से राहुल गांधी कभी अकेले लड़े। कभी सपाइयों का साथ मिला। लेकिन मरी हुई लाश की तरह पड़ी कांग्रेस किसी भी तरह घी पी नहीं पा रही था। सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चले शिवभक्त राहुल का अचानक शायद रामायण को वो किस्सा याद आ गया होगा जब मूर्छित लक्ष्मण को होश में लाने के लिए राम ने हनुमान से संजीवनी बूटी मंगाई थी। चुनाव में राम मंदिर बनाने के शोर और होड़ के बीच राहुल चुपके से प्रियंका को लाए। प्रियंका का राजनीति में आना ही गजब हो गया। टीवी डिबेट का हिस्सा हो गईं। बीजेपी वाले सीधे प्रियंका की खूबसरती पर हमला बोलने लगे। कोई कहने लगा कि अब उम्र ढल गई है। क्रेज ही ना बचा। कोई चॉकलेटी कहने लगा। राहुल अपनी रणनीति में सफल रहे।
प्रियंका को जाननेवाले जानते हैं कि उनका चुनाव मैनजमैंट बेहद शानदार रहा है। नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के कब्जे से सोनिया गांधी ने बड़ी मुश्किल से कांग्रेस को छीना और परिवार के वफादार सतीश शर्मा को रायबरेली से उम्मीदवार बनाया तब बीजेपी ने तब के राजनीति के चाणक्य कहेजाने वाले राजीव गांधी के कजिन अरुण नेहरू को मैदान में उतारा। सोनिया ने नौसिखिया प्रियंका को जिम्मेदारी दी। चुनाव में सतीश शर्मा पर नेहरू बहुत भारी पड़ रहे थे। लेकिन प्रियंका ने आखिरी दांव चला और वो था इमोशनल डॉयलाग। प्रियंका ने लोगों से भावुक सवाल किया कि क्या वे लोग उस आदमी को संसद भेजना पसंद करेंगे, जिस पर मेरे पापा ने आंख मूदकर भरोसा किया। लेकिन उसी आदमी ने सत्ता के लिए पापा की पीठ में छूरा घोंपा। पापा अब इस दुनिया में नहीं है। नतीजा आया तो सतीश शर्मा भारी बहुमत से जीते और अरुण नेहरू चौथे नंबर पर।
इसी तरह से जब सोनिया गांधी ने कर्नाटक के बेल्लारी से चुनाव लड़ा तो बीजेपी ने सुषमा स्वराज को उतारा। बीजेपी के लिए खनन माफिया के नाम से बदनाम रेड्डी बंधु खुलेआम मैदान में आ गए। सोनिया की हार तय हो चुकी थी। सुषमा ने भी ऐलान कर दिया कि अगर वो चुनाव हार गईं तो विधवा की तरह सिर मुंडा लेंगी। जिस दिन नतीजे आ रहे थे, उसमें कई दौर में सोनिया काफी पीछे चल रही थीं। लेकिन ऐन वक्त पर बाजी पलट गई और सोनिया जीत गईं। इस जीत की स्क्रिप्ट प्रियंका ने ही लिखी थी। प्रियंका ने बेल्लारी में भी भावुक बातें कही थीं। प्रियंका ने कहा था कि जिसने उसके पापा की हत्या की, उसको भी हमारे परिवार ने माफ कर दिया। सुषमा जी आप सुहागिन हो। मांग में सिंदूर आपकी दमकती है। हिंदू रिवाज में सिर सिर्फ वहीं मुंडवाती हैं, जिनका सुहाग उजड़ जाता हो। मैं आपसे अपील करती हूं कि आप ये कसम तोड़ दीजिए। बिना बाल के सिंदूर में आप अच्छा नहीं लगेंगी। आप सदा सुहागिन रहो यही भगवान से प्रार्थना है। इमोशनल अपील और चुनाव प्रबंधन में माहिर अगर प्रियंका राजनीति में आई हैं तो सत्ता पक्ष में घबराहट होना जायज है।     

Tuesday, February 5, 2019

पुलिस कमिश्नर तो बहाना है बंगाल में बीजेपी को मटुआ वोट पाना है

सीबीआई बनाम कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के मसले पर सुप्रीम फैसले को बीजेपी और टीएमसी अपने अपने हिसाब से भुना रही है। दोनो ही पार्टियां अदालत के इस फैसले को अपनी नैतिक जीत से जोड़ रही हैं। लेकिन असली लड़ाई तो कुछ और ही है। दरअसल हाल के कुछ उपचुनावों, विधानसभाओं के नतीजों ने बीजेपी को आईना दिखा दिया है। बीजेपी को समझ में आ गया है कि साल 2019 में फिर से सत्ता पाना है तो हिंदी पट्टी प्रदेशों में साल 2014 की तरह पूरा जोर लगाने का कोई तुक नहीं है। इसलिए बेहतर हो गैरहिंदी प्रदेशों पर फोकस किया जाए। बंगाल में बीजेपी को मुकाबला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से करना है जो रणकौशल में चतुर और जुझारु तेवर की राजनेता हैं।
देश के पूर्वी सिरे के इस राज्य में लोकसभा की 42 सीटें हैं। बीजेपी ने 23 सीटें जीतने का टारगेट तय कर रखा है। वो चाहती है कि कम से कम 50 फीसदी सीटें उसकी झोली में आ जाएं। बीजेपी ने एक खास सोच के तहत अपना ध्यान पश्चिम बंगाल की तरफ लगाया है। विपक्षी पार्टियों की एकजुटता, किसानों के संकट के कारण सुस्त पड़ती ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी और भारतीय राजनीति की पहचान रही सत्ताविरोधी लहर सरीखे कई कारण हैं जो बीजेपी हिंदी पट्टी राज्यों में 2014 सरीखा अपना प्रदर्शन नहीं दोहरा सकती। लिहाजा  बीजेपी के लिए भारत के पूर्वी तट के राज्यों पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी हो गया है। इस पट्टी में आंध्र प्रदेश, ओड़िशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 144 सीटें हैं। इस पट्टी में बीजेपी का प्रदर्शन 2014 में खास अच्छा नहीं रहा था जबकि उस वक्त लहर बीजेपी की थी।
आबादी की बुनावट और सियासी माहौल की खासियत के कारण पश्चिम बंगाल बीजेपी के लिए चुनाव में पांसा पलट देने वाला राज्य साबित हो सकता। बीजेपी पश्चिम बंगाल में दशकों तक कुछ खास असर न जमा पाई। लेकिन हाल के दिनों में बीजेपी अब मुख्य विपक्षी के रूप में उभरी है। बंगाल में बिहार-यूपी से आकर बसे लोगो का पूरा समर्थन मिल रहा है।  बीजेपी के हिमायती ब्राह्मणों-ठाकुरों और कायस्थ वोटरों की तादाद बढ़ी है। 
बीजेपी को पता है कि ममता बनर्जी एक कद्दावर नेता हैं और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में सिरमौर की भूमिका निभाने का सपना उनके दिल में भी है। बीजेपी बड़े नपे-तुले अंदाज और अपने को काबू में रखते हुए हमले कर रही हैं। जोर लोगों से संपर्क साधने, मुख्यमंत्री पर निशाना साधने और राज्य की आबादी की खास बुनावट को अपने हक में भुनाने पर है। 
बीजेपी ने पूरबियों के अलावा मटुआ जाति के लोगों को टारगेट किया है। नरेंद्र मोदी और मटुआ धर्म की नेता बीनापानी देवी की मुलाकात और मोदी के मटुवा सम्मेलन में भागीदारी बेहद अहम है। धर्म की बुनियाद पर प्रताड़ना के शिकार हुए लोगों को मटुआ कहते हैं, जो  अविभाजित भारत के बंगाल में रहते थे। बंगाल का यही इलाका पूर्वी पाकिस्तान कहलाया और आखिर में बांग्लादेश बना। मटुआ लोगों को बांग्लादेश से भगा दिया, जिसे कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में बसा दिया। देश के बंटवारे के वक्त इस समुदाय के लोगों की संख्या ज्यादा बढ़ी और ये लोग हावड़ा, दोनो चौबीस-परगना, नदिया, माल्दा, कूचबिहार और उत्तरी और दक्षिणी दिनाजपुर मे बस गए। संख्या के एतबार से पश्चिम बंगाल की अनुसूचित जातियों में मटुआ लोग दूसरे नंबर पर हैं। मटुआ समुदाय के लोगों की तादाद 3 करोड़ है। जो लोग 1971 के बाद भारत पहुंचे उन्हें संदिग्ध मतदाता की श्रेणी में रखा गया है। मटुआ लोगों की पूर्ण नागरिकता की मांग बीजेपी के नागरिकता संशोधन विधेयक में है। इसमें बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए लोग हैं। 
सो, ये समझना मुश्किल नहीं कि मोदी ने पैंतरे से काम ना लेते हुए आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भ्रष्टाचार का प्रतीक बता रहे है। इसलिए सारदा घोटाला रोज वैली स्कैम की आड़ में सीबीआई के जरिए सीएम के करीबी पुलिस कमिश्नर पर शिकंजा कसकर ममता को बदनाम करने की रणनीति है। साफ है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी का सारा दारोमदार मोदी पर है और मोदी ने भी साबित किया है कि धोनी की तरह वो भी बेस्ट फिनिशनर हैं। 

Monday, February 4, 2019

मोदी जी, याद रखें इस ममता में दया नहीं है

आ.सू.संवाददाता- पश्चिम बंगाल के पुलिस कमीश्नर राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ की कोशिश के विरोध में देश ने शायद पहली बार तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का बेहद तीखा और हमलावर अंदाज देखा हो। लेकिन पश्चिम बंगाल की जनता के लिए ये तेवर नया नहीं है। राजनीति में विरोध के कारण ही ममता की पैदाइश हुई और इसी विद्रोही तेवरों की वजह से वो मां-माटी-मानुष का नारा लगाते हुए जनता के बीच गईं। इसी आक्रामक राजनीति चरित्र के चलते ही जनता ने ममता का राजतिलक किया।
दरअसल, ममता अस्सी के दशक में तब के दिग्गज नेता रहे सुब्रतो रॉय और अभी के राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री सौगत रॉय की देन है। दरअसल हुआ यूं ममता युवा कांग्रेस की राजनीति कर रही थीं। तब उन्हे उनके मुहल्ले कालीघाट के लोग भी बहुत कम पहचानते थे। उस समय देश में सीपीएम नेता और सीएम रहे ज्योति बसु का जलवा-जलाव जलाल हुआ करता था। अचनाक एक दिन लोगों ने अखबार में तस्वीर देखी। तस्वीर में ममता अपने साथियों के साथ सीएम का काफिला रोककर कार की बोनट पर मां चंडी की तरह डांस कर करते दिख रही थीं। ये विद्रोही तेवर लोगों के दिलों में उतर गया। खबर राजीव गांधी तक पहुची और वो बंगाल महिला कांग्रेस की मुखिया बन गईं। लेकिन पद ने तल्ख तेवरों को कम नहीं होने दिया। सूती साड़ी और हवाई चप्पल में वामपंथी सरकार के नाक मे दम करती रहीं। सांसद चुनी गईं और राजीव गांधी की सरकार में राज्य मंत्री भी बनीं।
एक मूक वधिर लड़की से सीपीएम नेता के बलात्कार की घटना को लेकर बतौर मंत्री वो मुख्यमंत्री से मिलने ईँ तो उन्हें रोका गया। वो धरने पर बैंठी तो केंद्रीय मंत्री को पुलिस ने पीट दिया। फिर क्या था देखते ही देखते उनका कद राज्यमंत्री से भी ज्यादा बड़ा हो गया। जब कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के पास तब भी ममता ने अपना जिद्दीपन और अड़ियाल रवैया नहीं छोड़ा। सत्ता से उनका टकराव बढता गया और एक दिन वो पार्टी से रुखसत हो गईं। अलग पार्टी बनाई। जनता के बीच गईं। टाटा नैनो कार मुद्दे पर मजदूरों और किसानों की राजनीति करनेवालों को घुटने के बल ला दिया। जनता ने ममता को दिल से इंकलाबी मानकर तैंतीस साल से सत्ता पर काबिज वामपंथियों को सरकार से हटाकर ममता को बिठा दिया।
टकराना ममता की फितरत है। चाहें वो पार्टी हाईकमान हो, राज्य की सरकार हो या फिर सत्तानशीं सरकार। ममता खपैरल वाली घऱ में रहती हैं। शादी ब्याह और बाल-बच्चों के चक्करों से मुक्त हैं। खाली हाथ की राजनीति करनेवाली ममता कभी भयभीत नहीं होतीं। दूसरी अहम बात ये किइस महिला नेता का नाम बेशक ममता है लेकिन राजनीति में उन्होंने कभी दया नहीं दिखाई। विरोधियों को मात देने में जनता ने हर बार ममता का कठोर कलेजा ही देखा है। इसलिए कहा जा सकता है कि ईडी और सीबीआई करे जरिए बेशक अखिलेश यादव, मायावती, राबड़ी देवी, मीसा भारती, चंद्रबाबू नायडू एक बार कांप जाएं। लेकिन ममता अपने कठोर सियासी इरादों के साथ सत्ता से टकराने का माद्दा दिखाकर बंगाल में बीजेपी की इंट्री की राह इतनी आसान होने देनेवाली नहीं।   

Monday, January 21, 2019

इसलिए साथी दलों के नखरे सह रही है बीजेपी

परदेसी परदेसी जाना नहीं... शायद बीजेपी के इन दो बड़े नेताओं का दिल आजकल यही गाना गुनगुना रहा है क्योंकि लोकसभा चुनाव आते ही पुराने साथी दोस्ती तोड़ने की खुलेआम धमकी दे रही है। बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए में हर राज्यों की पार्टियां बीजेपी को आंखें दिखा रही हैं। सीधे-सीधे पॉलिटिकल बार्गेनिंग कर रही हैं। नरेंद्र मोदी- अमित शाह को खुलएमा कह रही हैं कि या तो मेरी शर्त मानों या फिर भांड़ में जाओ। धमकी देनेवाली बड़ी पार्टियों में महाराष्ट्र की शिवसेना, बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी, आरएलएसपी, यूपी में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल सोनेलाल गुट और असम की असम गण परिषद जैसी पार्टियां हैं। सबके पास अपने अपने बहाने हैं। लेकिन सबकी निगाहें ज्यादा हिस्सेदारी पर है। सब ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़कर अपनी ताकत बढ़ाना चाहती हैं।
बात अगर महाराष्ट्र की करें तो शिवसेना कोई छोटी मोटी पार्टी नहीं है। ये बात मोदी और शाह अच्छी तरह से जानते हैं। वो ये भी जानते हैं कि अगर शिवसेना ने बहिया झटक दी तो सीट जीतने में लाले पड़ जाएंगे। शिवसेना अपनी ताकत को जानती है इसलिए कभी मंदिर तो कभी किसी और बहाने से मोदी और शाह पर हंटर चलाती रहती है और ये दोनों जुबानी कोड़े सहने को मजबूर होते हैं। बिहार में बड़े भैय्या बने जेडीयू के नीतीश कुमार बड़े ही तेज निकले। दो सीटें जीतनेवाली जेडीयू 40 सीटों में से अकेले 17 सीटों पर लड़ने का ऐलान कर चुकी है। बाकी की सीटों पर बीजेपी रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को क्या दे और कितने पर वो लड़े उसे समझ में नहीं आ रहा।
यूपी में भी ओमप्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल नाम में दम दम किए हुए हैं। दोनों ही मंत्री हैं एक मोदी की तो दूसरे योगी। एक खुलेआम योगी-मोदी को निंदा करता है तो मैडम योगी के किसी प्रोग्राम में जाती ही नहीं। एक के पास कुर्मियों को ठेका तो दूसरे के पास राजभर वोटों का। अब बीजेपी करे भी तो क्या करे। असम में असम गणपरिषद अलग ताव दिखा रही है। दक्षिण में बीजेपी के पुराने साथी अभी शांत हैं लेकिन तेलंगाना में पुराने साथ टीआरएस के कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव ने बहाना खोजकर साथ छोड़ दिया। अब अगर बीजेपी को वहां कमल खिलाना है तो केसीआर के आगे हाथ जोड़ना पड़ेगा। ओड़ीशा में बीजेपी के नवीन पटनायक कभी एनडीए में थे। आज नहीं है। ऐसे ही पश्चिम बंगाल में टीएमसी की ममता बैनर्जी भी एनडीए में थी। वो आज बीजेपी को पानी पिला रही हैं। साउथ के सुपर स्टार रजनीकांत और कमल हासन अलग पार्टी बनाकर ताल ठोक रहे हैं। बीजेपी केवल हिंदी पट्टी के मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली और हरियाणा में राहत की सांस ले रही है, जहां कोई धौंस दिखाने वाला नहीं है। लोकसभा चुनाव से पहले साथियों के इन तेवरों को देखते हुए मोदी और शाह के दिल से यही तराना निकल रहा होगा- ना जाओ सैय्या छुड़ा के बहियां कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगी...

Saturday, January 12, 2019

इस गठबंधन के पीछे छिपी हैं कई गहरी राजनीति


आखिरकार लखनऊ में आज वहीं स्क्रिप्ट पढ़ी गई, जिसे मैंने विधानसभा चुनावों के दौरान और नतीजों के बाद पढ़कर अपने दर्शकों और पाठकों को वाकिफ करा दिया गया। पुरानी अदावत को भुलाकर आज समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी नरेंद्र मोदी को रोकने के लिेए एक हो गई। अखिलेश यादव कम सीटों पर भी लड़ने को तैयार थे। लेकिन मायावती ने दरियादिली दिखाते हुए गेस्ट कांड को भुलाकर अपने भतीजे को बराबर का हक दिया। इस गठबंधन में कांग्रेस सतही पर दिखाई नहीं देती। सरसरी नज़र में यही दिखाई पड़ता है कि बुआ और बबुआ ने बाबा राहुल गांधी और आंटी सोनिया गांधी के लिए रायबरेली और अमेठी की सीट छोड़ दी है।
लेकिन इस गठबंधन ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए है। पहला सवाल तो यही कि क्या बुआ-बबुआ ने बाबा को ये बताने की कोशिश की है कि यूपी में उनकी हैसियत केवल दो सीटों भर की है। या फिर इसके पीछे कोई चाल है। पर्दे के पीछे एक गणित तो ये समझ में आ रहा कि राहुल गांधी ने इन दिनों सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ ली है। अगर ये दोनों कांग्रेस को साथ लेते मुस्लिमों को वोट बिखर जाता, जो बीजेपी विरोधी गठबंधन को नुक़सान पहुंचाता। हो सकता है कि सोची समझी रणनीति के कांग्रेस को बाहर रखा गया या खुद कांग्रेस बाहर रही ताकि वो अगड़ों के वोट बैंक को बीजेपी और नरेंद्र मोदी के पक्ष में एक जुट किया जा सके।
दूसरा तर्क ये भी पेश किया जा रहा है कि कांग्रेस ने इतिहास के पन्नों को पलटा तो समझा कि उसके पास हनुमान वाली ताकत तो है लेकिन कोई याद दिलानेवाला नहीं है। 2014 के नतीजों से घबराई कांग्रेस ने डब साल 2009 का नतीजा देखा तो पाया कि अकेले लड़कर वो 21 सीटें जीतने में सफल रही। ऐसे में राहुल ने तय किया कि आखिर क्यों किसी के भरोसे युद्ध लड़ा जाए। क्यों ना अकेले ही फिर से मैदान में उतर कर देखें। तीसरा पहलू ये भी बताया जा रहा है कि राहुल ने मायावती और अखिलेश की बढ़ती बार्गेनिंग पॉवर को देखते हुए एक और फॉर्मूले पर विचार किया। आंकड़ों को देखकर पाया कि बहुत बुरी हालत में भी सदी वोट मिलते रहते हैं। अलग अलग लड़ने पर बीजेपी की ताकत को कम किया जा चुका है। ऐसे में बार-चौद फीसदी वोट के साथ कुछ नए उभरती ताकतों को साधा जाए तो समीकरण बदल सकते हैं। ऐसे में नई नवेली पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के नेता शिवपाल सिंह यादव मुफीद दिखाई पड़ते हैं। उन्हें भी एक साथी की तलाश है। अगर राहुल और शिवपाल हाथ मिला लें तो सॉफ्ट हिंदुत्व वाले वोट को मुस्लिम और यादव मतदाताओं के साथ जोड़ा जा सकता है। इन सबके इतर एक सवाल ये भी तैर रहा कि जिस तरह से 254 साल पहले मुलायम और कांशीराम ने मिलकर बीजेपी को उड़ाया था, क्या वो करिश्मा ये नई पीढ़ी कर पाएगी। सवाल बहुतेरे हैं। फिलहाल तेल देखिए और तेल की धार देखिए। क्योंकि राजनीति संभावनाओं का खेल है।

Thursday, January 10, 2019

कांग्रेस-बीजेपी के लिए केवल सत्ता की सीढ़ी हैं आराध्य प्रभु श्रीराम!

राम मंदिर बनाने को लेकर हवा में अक्सर तैरनेवाला ये नारा अब वाकई हकीकी लगने लगा है कि राम लला हम आवेंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे लेकिन तारीख नहीं बताएंगे। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि मालिकाना हक को लेकर नई तारीख मुकर्रर होने से आम लोगों की जेहन में बस यही सवाल तैर रहा है कि क्या वाकई सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस वाकई इस मसले पर कोई संजीदा हल चाहती हैं। या फिर दोनों ही पार्टियां सत्ता के लिए अपने अपने हिसाब से इसे जिंदा रखना चाहती है। एक को चुनावी साल में हिंदुओं के जज्बात को उकेर का सत्ता का रास्ता दिखाई देता है तो दूसरे को सब्जबाग दिखाकर परस्ती का रास्ता अपनाकर सत्ता की सीढ़ी दिखाई दे रही है।

जैसा कि अंदेशा था वैसे ही मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने जस्टिस यूयू ललित के बीजेपी के दिग्गज नेता कल्याण सिंह के वकील होने का पुराना हवाला देते हुए सवाल खड़े कर दिए। जब इंसाफ करनेवाले की नीयत पर पहले से सवाल खड़े हो जाए तो इंसाफ पर सवाल उठना लाजिमी है। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि राजीव धवन पर कांग्रेस समर्थक होने का आरोप है। 2019 में किसी तरह से फिर से सत्ता हासिल करने में लगे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को सॉफ्ट हिंदुत्व पर चलने पर कोई एतराज नहीं है। वो जनेऊ भी दिखाते हैं और मानसरोवर जाकर सबसे बड़ा शिवभक्त होने का दम भी भरते हैं। ताकि उन्हें वोटों को रिझा सके। लेकिन मुस्लिम वोट को फिसलने देना भी नहीं चाहते। तो क्या उन्ही के इशारे पर आज फिर सुनवाई ली।
सवाल बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत पर भी है। सवर्णों के आरक्षण, तीन तलाक और हलाला पर सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसलों को मानने से इनकार करनेवाली सरकार मंदिर के मसले पर कोर्ट का फैसला मानने की बात करती है। सुप्रीम कोर्ट ने सवर्णों को आरक्षण देने से मना किया तो एससी एसटी एक्ट में बदलाव कर अगड़ों का गुस्सा कम कर करने के लिए मोदी सरकार बिल ले आई। तीन तलाक पर भी संसद में बिल ले आई। ये दीगर बात है कि वो पास नहीं करा पाई। अगर मंदिर को लेकर वाकई उसी नीयत साफ है तो वो इसको लेकर संसद में बिल क्यो नहीं लाती। साफ है कि चुनावी साल में दोनों ही पार्टियां मंदिर-मस्जिद के झगड़े को जिंदा रखना चाहती हैं।

Thursday, December 13, 2018

क्या मायावती ने अपने फायदे के लिए बुना राहुल के लिए पॉलिटिकल हनीट्रैप?

हिंदी पट्टी के तीन प्रदेशों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीएसपी ने विधानसभा चुनाव के दौरान काग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को खूब आंखें दिखाई। ये संदेश दिया कि उनकी सियासी हैसियत राष्ट्रीय पार्टी से कमतर नहीं है। लेकिन  चुनाव बाद जब नतीजे आए और कांग्रेस बहुमत से दो फर्लांग दूर रह गई तो मायावती ने फौरन बिन मांगे राहुल गांधी को समर्थन दे दिया। उनकी देखा-देखी समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को सपोर्ट कर दिया। अगर मायावती के कांग्रेस के सामने बिछने के अंदाज की गहराई को देखें तो समझ एक नजर में ये समझ पाना मुश्किल है कि समर्थन देना उनकी मजूरी है या फिर कोई गहरी सियासी चाल। तमाम नफा-नुकसान को तौलने के बाद इसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि ये बहनजी का तिकड़म है। अपने सियासी फायदे की खातिर उन्होने राहुल गांधी को फंसाने के लिए हनीट्रैप बिछाया है। 

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे बहुजन समाज पार्टी के लिए अच्छे संकेत लेकर नहीं आए, जिसकी आस लगाए मायावती बैठी थी। छत्तीसगढ़ में मायवती ने जिस तरह चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस से मुह मोड़कर कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाने वाले पूर्व सीएम अजीत जोगी से हाथ मिलाया था, उससे छत्तीसगढ़ में त्रिशंकु विधानसभा के आसार दिखने लगे। कुछ चैनलों के एग्जिट पोल ने अजीत जोगी और मायवती के गठबंधन को किंगमेकर के तौर पर पेश भी कर दिया। लेकिन वोटों की गिनती के दौरान ही हालात कुछ और हो गए। नतीजों में छत्तीसगढ़ में बहुजन समाज पार्टी को करीब 4 फीसदी वोट मिले और उसे सिर्फ 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा। कुछ यही हाल राजस्थान का भी रहा, जहां बीएसपी को 4 फीसदी वोट तो मिले। लेकिन सीट एक भी नहीं मिली। हालांकि एमपी में वो दो सीटें हासिल करने में कामयाब रही।
बीएसपी भले ही सीटों के गणित में पिछड़ गई हो। लेकिन पार्टी ये संकेत देने में सफल रही है कि अगर कांग्रेस 2019 में यूपीए का कुनबा बड़ा करना चाहती है तो बीएसपी के बिना बात नहीं बनेगी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में जिस तरह सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा होने के बाद भी कांग्रेस जैसे-तैसे करके सरकार में आई। ऐसी सूरत और हालात में इन दोनों राज्यों में अकेले दम पर लोकसभा चुनाव लड़ना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर होगा।
मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस और बीजेपी के बीच केवल एक फीसदी वोटों का फासला रहा।   ऐसे में कांग्रेस के लिए भी मुफीद रहेगा कि इस राज्यों वो अगर 4-5 फीसदी वोट शेयर वाली बीएसपी को अपना साथी बना ले तो राह आसान हो जाएगी। बीएसपी को फायदा ये होगा कि उसे राष्ट्रीय पार्टी होने का तमगा कायम रहेगा।
कांग्रेस को समर्थन देते समय मायावती ने ये पहले ही साफ भी कर दिया कि ये सपोर्ट  केवल बीजेपी को रोकने के लिए है। अगर 2019 में कांग्रेस महागठबंधन बनाना चाहती है तो उस समय शर्तें अलग होंगी। अगर यूपी को खंगाले तो बीएसपी सुप्रीमो मायावती और एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले कई बार कांग्रेस को इशारों ही इशारों में उसकी कमजोरी का अहसास कराया है। हालांकि अब इन तीन राज्यों के नतीजों के बाद कांग्रेस के सुर और तेवर हो सकता है कि बदला हुआ नज़र आए। लेकिन बीएसपी के वोट शेयर को देखते हुए कांग्रेस के लिए माया की अनदेखी करना आसान नहीं होगा।

Friday, October 19, 2018

राम ने शंबुक को क्यों मारा?

न्यूज़ डेस्क- आज पूरा देश दशहरा और विजयादशमी के जश्न में डूबा है। उत्तर पूर्वी भारत के लोग महिषामर्दिनी करनेवाली देवी दुर्गा की जीत का जश्न विजयादशमी के तौर पर शुभो बिजॉया कहकर मना रहे है तो उत्तर भारत और हिंदी पट्टी के लोग महापंडित, महाज्ञानी, महाबलशाली, महाप्रतापी और शिव के सबसे परम भक्त रावण पर अयोध्या के मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम की जीत की खुशी में दशहरा मनाएंगे। राव ण का पूतला फूंककर अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश देंगे। आज तुलसीदास के रामायण के पात्र श्रीराम के राम के कुछ अनजाने पहलुओं को समझना है तो अलग अलग भाषाओं में लिखे रामायण के पात्र राम के चरित्र को समझना होगा। 
बाल्मिकी से लेकर तुलसीदास के रामायण में बाली वध, दलित की सबसे पहली हत्या यानी शंबुक वध और सीता के साथ हुए बर्ताव को जिक्र है। बाल्मिकी रामायण में जिक्र है कि राम ने  बाली का धोखे से क़त्ल किया। राम से बाली कहता है- “आप हतबुद्धि है। आप धर्म-ध्वजी है। दिखाने के लिए धर्म का चोला पहने हुए है। आप वास्तव में अधर्मी है। आपका आचार-व्यवहार पाप-पूर्ण है। आप घास-फूंस से ढके हुए कूप के सामान धोखा देने वाले हैआप कामेच्छा के गुलाम है। क्रोधी है,मर्यादा में न रहने वाले है। चंचल है। राजाओं की मर्यादा का बिना विचार किए किसी को भी अपने तीर का निशाना बना सकते है।”
बाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड और उत्तर रामचरित में शुद्र तपस्वी शम्बूक की ह्त्या से साफ़ जाहिर है कि श्री राम अत्यंत निर्दयी और अत्याचारी राजा थे। शम्बूक की हत्या को रामायण में बाल्मीकि ने श्रीराम के ही मुख से इस तरह वर्णन किया है। राम ने घोर तपस्या करते शम्बूक से पूछा-“तुम्हे किस वस्तु के पाने की इच्छा है? तपस्या से संतुष्ट हुए इष्ट-देवता से वर के रूप में तुम क्या पाना चाहते हो-स्वर्ग अथवा दूसरी कोई वस्तु? कौन-सा ऐसा पदार्थ है, जिसके लिए तुम ऐसी कठोर तपस्या करते हो, जो दूसरों के लिए दुष्कर है? तापस ! जिस वस्तु की इच्छा के लिए तुम इस घोर तपस्या में लगे हुए हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ. इसके सिवा यह भी सही-सही बताना की तुम ब्राह्मण हो या दुर्जय क्षत्रिय? तीसरे वर्ग के वैश्य हो अथवा शुद्र? तुम्हारा भला हो। मेरे इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर देना।
शम्बूक ने उत्तर दिया-“हे महायशस्वी राम! मैं शूद्र हूं। मैं निसंदेह स्वर्ग लोक जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूं। मैं इसलिए यह उग्र तपस्या कर रहा हूं। काकुत्स्थाकुल भूषण राम मैं झूठ नहीं बोलता।. देव लोक पर विजय पाने की इच्छा से तपस्या में लगा हूं। आप मुझे शुद्र जानिए। मेरा नाम शुद्र है। राम के ही शब्दों में-“उस शुद्र के मुंह से ये बात निकली ही थी, मैंने आव देखा ना ताव।  म्यान से तलवार खीच ली और उससे शम्बूक का सिर धड़ से अलग कर दिया।”
अपनी पत्नी सीता पर तो राम ने मुसीबतों के पर्वत ही तोड़ डाले। 14 सालों के बनवास के बाद उनके चरित्र पर संदेह किया गया यानी चरित्र की शुद्धता का सबूत देने के लिए उन्हें अग्नि में कूदना पड़ा। सीता कहती है-“मेरा चरित्र शुद्ध है तो भी मुझे दूषित समझ रहे है। मैं सर्वथा निष्कलंक हूं। सम्पूर्ण जगत की साक्षी अग्नि देव ! मेरी रक्षा करें। सुमित्रानंदन ! मेरे लिए चिता तैयार कर दो। मेरे इस दुख की एक ही दवा है। मिथ्या कलंक से कलंकित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती।”


अग्नि परीक्षा के बाद भी राम की तसल्ली नहीं हुई। तंग आकर सीता को कहना पड़ा- “मैं मन, वाणी और क्रिया के द्वारा केवल श्रीराम की ही आराधना करती हूं। अगर यह कथन सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दे। सभी लोगों के देखते-देखते जानकी रसाताल को प्रयाण कर गई। सीता की आत्महत्या से राम के निर्दयी और अत्याचारी पक्ष अच्छी तरह उजागर हो जाता है।
बाल्मीकि रामायण के उत्तराखंड के सर्ग ४२ श्लोक १७-२१ में राम सीता का राजकीय उद्यान विहार का वर्णन इस तरह किया है। अशोक वनिका …१७…पान्वाश्न्गत:(२१) अर्थात : रामचंद्र ने अपने अंत:पुर से सटे हुए समृद्ध राजकीय उपवन में विहारार्थ प्रवेश किया और वे फूलों शोभित तथा ऊपर से कुश या बिछावन बिछाये हुए एक सुन्दर आसन पर बैठ गए। राजा काकुत्स्थ वंश में उत्पन्न रामचंद्र ने सीता जी को हाथ से पकड़ कर पवित्र मेरेय नामक मद्य को,जैसे इन्द्र शची को पिलाते है, वैसे ही पिलाया.।चाकर उत्तम पकाए हुए मांस तथा नाना प्रकार के फल रामचंद्र के भोजनार्थ शीघ्र लाए। रामचंद्र के समीप जाकर नाच-गान में प्रवीण अप्सराएं, नाग-कन्याएं, किन्नरियां और अन्य गुणी और रूपवती स्त्रिया  मदिरा के नशे में मतवाली होकर नाचने लगीं। 

Tuesday, August 14, 2018

काहे की आज़ादी और किसकी आजा़दी!

यक़ीन मानिए कि ये वाक्य लिखते वक़्त हाथ कांप रहे हैं और आत्मा रो रही है। लेकिन मन कह रहा है कि सच लिखना बंद मत करो। भले ही मुट्ठी भर लोग आपको देशद्रोही, समाजवादी या वामपंथी करार दें। ये वाक्य देश की असली सच्चाई को उजागर करती है। क्योंकि आजादी के बाद सत्तर सालों तक कांग्रेस की सरकारें थीं तो कई बार भगवा और गैर कांग्रेसी की सरकारें रहीं। लेकिन दिल पर हाथ रखकर कहिए कि इस देश में क्या बदला। सड़कें चौड़ी हो गईं। सड़कें चमकदार और घुमावदार हो गईं। सिर के ऊपर से दनादन हवाई जहाज़ों के गुज़रने की संख्या ज़्यादा हो गई। आज़ादी से पहले वाली रेलगाड़ियां अब चमकदार हो गईं। आप सोच रहे होंगे कि इतना कुछ बदलने की बात मैं खुद कर रहा हूं तो फिर ऐसी आज़ादी पर सवाल खड़े कर रहा हूं।
ये बात इसलिए लिख रहा हूं कि क्योंकि कान में देवरिया और मुज़्ज़फ़रनगर की अबोध बालिकाओं की चीखें गूंजती है। दिन में मानवता की बात करनेवाले कैसे सूरज के मुंह चुराते ही असली चेहरों के साथ छोटी-छोटी बालिकाओं को दिखते होंगे। पार्टियां चाहें कोई भी हों। झंडों का रंग चाहें कोई भी हो। लेकिन फितरत सबकी एक जैसी है। सत्ता में होते हैं तो जांच बिठाने का नाटक करते हैं और जब सत्ता से बाहर होते हैं तो हाथों में तख्तियां, बैनर और मोमबत्ती के साथ नज़र आते हैं। याद कीजिए उस दौर को जब देश में निर्भया कांड हुआ था। उस दौर में जिस तरह से देश की मुट्ठियां भींच गई थीं तो लगा था कि समाज अब किसी रावण को पैदा नहीं होने देगा। कानून बदला गया। बड़ी बड़ी बातें की गईं। लेकिन आज भी हर राज्य में आबरू महफूज़ नहीं है। सिर्फ आबरु ही क्यों! जि़ंदगी तक महफूज़ नहीं है।

जो सत्तर साल में नहीं हुआ, वो आज हो रहा है। सत्ता की चाबी दे दो भ्रष्टाचार मिटा दूंगा। ग़रीबों के साथ डटकर खड़ा रहूंगा। ये नारा देनेवाली दोनों ही पार्टियां यानी बीजेपी और आम आदमी पार्टी दिल्ली पर काबिज़ है। फिर भी उस नगरी में तीन बच्चियां भूख से तड़प कर दम तोड़ देती हैं। अभी इस शोरगुल और लीपापोती का शोर खत्म भी नहीं होता है कि ग़ाज़ियाबाद में भी भूख से एक मौत हो जाती है। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इस तरह के वाकए आए दिएन सुनने को मिलते हैं। लेकिन सरकारें और विपक्ष अपने अपने फायदे और नुक़सान के लिहाज़ से तथ्यों को तोड़ मरोड़ देते हैं। इन घटनाओं को देखकर मुझे रिपोर्टिंग का वो दौर याद आता है। ओड़ीशा में एक जगह बालासोर। वहां पर मैंने एक जनजाति के लोगों को भूख मिटाने के लिए चींटियां खाते हुए देखा था। ये रिपोर्ट एक साप्ताहिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। बिहार में एक जनजाति है। उसे मूसहर कहते हैं। इस जाति के लोग मूस यानी चूहा खाकर अपनी भूख मिटाते हैं। ये उस प्रदेश की सूरत हैं, जहां सुशासन बाबू की सरकार है। सबका साथ सबका विकास का नारा देनेवाली पार्टी भी सत्ता में है। उस राज्य में परिवर्तनकारी लालू यादव और कांग्रेस की सरकारें रही हैं। लेकिन जो तस्वीर सदियों पहले थीं, वो आज भी बदस्तूर है। ये उस देश की भयावह तस्वीर है, जहां लाखों-करोड़ों अनाज भंडारण के सही रख-रखाव के अभाव में सड़ जाते हैं।

आज भी हमारे देश की पार्टियां, नेता और सरकारें मूल समस्याओं पर बात करने को तैयार नहीं होतीं। अगर भूख की बात कीजिए तो पलटकर सुनने को मिलता है गौ माता की पूजा करो। रोज़गार की बात कीजिए तो सुनने को मिलता है सबसे पहले देश। लॉ एंड ऑर्डर की बात कीजिए तो नारा आता है कि राम राज्य आ गया। अब तो बस मंदिर बनना बाक़ी है। हमारी सरकारें बताती हैं कि सिर्फ दिल्ली ही दिल्ली में पचास फीसदी से ज़्यादा लोग अमीर है। मुंबई में साढ़े छह हज़ार करोड़पति बसते हैं। शेयर बाज़ार लगातार कुलांचे भर रहा है। जीडीपी तो बस आसमान छूने को बेताब है। हमारा सीना फूलकर इतना कूप्पा हो गया है कि पाकिस्तान और चीन को तो छोड़िए दुनिया का सबसे ताक़तवर देश अमेरिका का राष्ट्रपति भी कोर्निश करने को बेताब रहता है। हम दुनिया के छठे सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति हैं। एक तरफ चमकदार नारे हैं। टीवी चैनलों और अख़बारों में बदल चुके भारत की ख़बरों की ज़़ेर ए बहस है। दूसरी तरफ मुंह चिढ़ाती कड़वी सच्चाई है। इसलिए बहुत दुखी मन से खुद से ही ये सवाल कर रहा हूं कि ये कैसी आज़ादी है। ये काहे की आज़ादी है। हमारे पुरखों ने खून से सींचकर जो आज़ादी हमें दिलाई, उसकी मलाई कौन काट रहा है।

Wednesday, July 25, 2018

बीजेपी को रोकने के लिए राहुल आगे बढ़ा सकते हैं किसी महिला नेता का नाम

न्यूज़ डेस्क- 2019 के लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। कांग्रेस ने राहुल गांधी को 2019 में पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इस फैसले के कुछ देर बाद ही यूपीए में कांग्रेस के सहयोगी दल के सुर बदलते हुए​ दिखाई नहीं दे रहे हैं। ऐेसे में कांग्रेस ने भी संकेत दे दिए हैं कि पीएम पद के लिए वह सहयोगी पार्टियों के नेताओं का समर्थन करने को तैयार है, बशर्ते वो उम्मीदवार आरएसएस समर्थित न हो। पार्टी के बड़े नेताओं की रणनीति है कि बीजेपी को 2019 में सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस राज्‍यों में विभिन्न दलों का गठबंधन बनाने पर गौर करेगी। दरअसल लोकसभा चुनाव में मोदी को मात देने के लिए विपक्षी दल एकजुट होकर मुकाबला करना चाहते हैं लेकिन नेतृत्व को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। विपक्षी खेमे में ऐसी अटकलें हैं कि अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर किसी महिला को पेश किया जाए। ऐसे में बीएसपी नेता मायावती और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी का नाम उभरकर सामने आ रहा है।

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी को 2019 के लिए पीएम पद के चेहरे के तौर पर पेश किया है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि पार्टी का निर्णय सटीक, सपाट और स्पष्ट है। राहुल गांधी हमारा चेहरा हैं, हम उनके नेतृत्व में जनता के बीच जाएंगे। अब पार्टी के नेताओं का कहना है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए वह क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार है। हालांकि कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस के लिए रास्ता इतना आसान नहीं है पार्टी को सपा, बसपा और राजद की शर्तें भी स्वीकार करनी होगी।
आरजेडी ने इशारों-इशारों में राहुल की पीएम पद की दावेदारी पर सवाल उठाए थे। वहीं तेजस्वी के बाद मायावती ने भी कांग्रेस को दो टूक संदेश देते हुए कहा कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में गठबंधन तभी संभव है, जब उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीटें मिलेंगी। अगर इस समझौते में सम्मानजनक सीटें नहीं मिलती हैं तो भी उनकी पार्टी अकेले लड़ने को पूरी तरह तैयार है। सूत्रों के अनुसार राहुल की दावेदारी पर सहयोगी दलों की नाराजगी को देखते हुए कांग्रेस ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। दरअसल पार्टी किसी भी कीमत पर महागठबंधन में बिखराव नहीं चाहती है।
राहुल गांधी खुद भी विपक्षी गठबंधन की किसी महिला उम्मीदवार के लिए पीछे हटने के लिए तैयार है। कहा जा रहा है कि आरएसएस समर्थित व्यक्ति के अलावा वह किसी के भी प्रधानमंत्री बनने पर सहज हैं। वहीं मंगलवार को महिला पत्रकारों से बातचीत करते हुए राहुल गांधी ने भी कांग्रेस की इसी राजनीतिक लाइन को आगे बढ़ाते हुए कहा था कि वह किसी भी ऐसे प्रत्‍याशी का समर्थन करेंगे जो बीजेपी और आरएसएस को हराएगा।