<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574</id><updated>2012-02-07T06:21:23.761-08:00</updated><title type='text'>CP Singh</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>66</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-6855653390378777131</id><published>2011-12-13T22:16:00.000-08:00</published><updated>2011-12-13T22:18:52.088-08:00</updated><title type='text'>प्रेम ने तोड़ी मज़हबी दीवार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-ZGKPTnGTp2A/Tug_t_ZmJcI/AAAAAAAAAQ8/Eepd92E8Wew/s1600/neha.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 225px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-ZGKPTnGTp2A/Tug_t_ZmJcI/AAAAAAAAAQ8/Eepd92E8Wew/s400/neha.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5685864588900705730" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बाला साहेब ठाकरे ताउम्र मुसलमानों का घोर विरोध करते रहे....मुस्लिम विरोध की सियासत करते हुए महराष्ट्र में अपनी सियासी ज़मीन मज़बूत की.....उसी ठाकरे की पोती नेता ने नेहा ने एक मुस्लिम लड़के से शादी कर ली....इसके लिए उसने हिंदू धर्म को छोड़कर मुसलमान भी हो गई....ख़बर बेशक़ चौंकाने वाली हो....लेकिन सोलहों आने सच है....हैरानी इस बात की है कि मुस्लिमों के ख़ून के प्यासे होने का दावा करने वाले बाला ठाकरे भी इस शादी में मौजूद थे....अब ये पता नहीं कि वो कलेजे पर पत्थर रखकर आए थे या फिर पोती की खुशी के लिए मज़हब भूला बैठे थे.....वो अपने साथ पूरे परिवार को लेकर शादी के मंडप में पहुंचे....&lt;br /&gt;बाल ठाकरे के तीन बेटे हैं.....बिंदुमाधव ठाकरे, जयदेव ठाकरे और उद्धव ठाकरे...बिंदुमाधव सबसे बड़े बेटे थे...उनका बहुत पहले देहांत हो गया था....उनकी बेटी नेहा का दिल गुजरात के डॉक्टर मोहम्मद नबी हन्नान पर आ गया था.....नबी के पिता बिंदुमाधव के गहरे दोस्त भी थे...इनदिनों बाल ठाकरे के बाग़ी भतीजे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुखिया राज ठाकरे से दोस्ती निभा रहे हैं....दोनों अरसे से चुपके-चुपके ‘दिलजोली’ कर रहे थे....ख़बरों के मुताबिक़, अपने दादा की नीति को देखते हुए दोनों सामाजीक तौर पर ब्याह रचाने से कतरा रहे थे...लेकिन दिल पर ज़ोर नहीं चल रहा था....दोनों ने लगभग तीन महीने पहले कोर्ट में रजिस्टर्ड शादी कर ली....इस शादी की ख़बर जब ठाकरे परिवार को हुई तो हाथों से तोते उड़ गए....लेकिन उनके पास  ‘मुस्लिम जमाई राजा’ को अपनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था....लिहाज़ा इस शादी को मंज़ूरी दे दी...&lt;br /&gt;परिवार ने फैसला किया कि ग्रैंड रिसेप्शन देकर इस शादी को सामाजिक मंज़ूरी दे दी जाए... मुंबई के मशहूर होटलों में से एक होटल ताज लैंड्स एंड में शानदार डिनर दिया गया....इस रिस्पेशन में ठाकरे परिवार से जुड़ी कई हस्तियां मौजूद थीं.....ख़ुद बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और उनकी पत्नी और बच्चों के अलावा राज ठाकरे भी पूरे परिवार के साथ रिसेप्शन में आए....ठाकरे साहेब एक बहुत बड़े गुलदस्ते के साथ पहुंचे......इस शादी को लेकर तरह तरह की ख़बरें आ रही हैं...ठाकरे घराने से जुड़े लोग दावा कर रहे हैं कि इस शादी के लिए नबी ने अपना धर्म बदल लिया है....जबकि नबी घराने के लोग दावा कर रहे हैं नेहा ने धर्म बदल लिया है...लेकिन दोनों ही ख़बरों की पुष्टि नहीं हो पाई है.....&lt;br /&gt;ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी ने प्रेम विवाह कर ठाकरे के पिता केशव सीताराम ठाकरे उर्फ प्रबोधनकार ठाकरे का सपना सच कर दिखाया....ठाकरे भले ही ताउम्र नफरत फैलाने की सियासत करते हों और मुस्लिमों के ख़िलाफ ज़हर उगलकर मराठी अस्मिता का सवाल उटाकर अपनी सियासी मज़बूत करने में सफल हो गए हों....लेकिन उनके पिता ने ताउम्र में प्रेम विवाह का समर्थन किया.....बाला साहेब ठाकरे के पिता प्रबोधनकार ठाकरे अपने समय के बहुत बड़े समाज सुधारक थे....वो महात्मा फूले के विचारों से प्रभावित थे... सत्यशोधक आंदोलन के अगुवा रहे प्रबोधनकार ने बाल विवाह, दहेज, छुआछूत, जातिवाद जैसी घोर सामाजिक कुरूतियों को मिटाने में प्रमुख योगदान दिया। उस जमाने में शादी से पहले प्रेम करने को व्यभिचार समझा जाता था...लेकिन प्रबोधनकार ने समाज और धर्म के ठेकेदारों को चुनौती देते हुए अनेक प्रेमी जोडों की शादियां कराईं....&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्रबोधनकार ठाकरे एक पत्रकार, साहित्यकार, कार्टूनिस्ट औऱ फिल्मी कलाकार भी थे.. केवल चौंतीस साल की उम्र में भाषण कला पर मराठी में किताब लिख दी थी...उस समय इस विषय पर किसी भी भारतीय भाषा में लिखी गई पहली किताब थी....प्रबोधनकार ठाकरे ने कुछ मराठी फिल्मों में भी काम किया था... उनकी प्रतिभा को देखते हुए छत्रपति शाहूजी महाराज ने उनके सामने नौकरी का प्रस्ताव रखा, लेकिन वैचारिक मतभेद के कारण प्रबोधनकार ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया था... वो एक पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित करते थे जिसमें वे प्रबोधनकार के नाम से लिखते थे इसलिए उन्हें प्रबोधनकार ठाकरे के नाम से भी जाना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि अपने पिता के कृतित्व के विपरीत बाला साहेब ठाकरे मराठी अस्मिता के नाम पर क्षेत्रियतावाद और उग्र हिन्दू-राष्ट्रवाद की राजनीति करते है...इसके तहत उत्तर भारतीयों ख़ासतौर पर बिहारियों को बार-बार निशाना बनाया जाता है....90 के दशक में मुंबई में हिन्दू-मुस्लिम दंगो के पीछे शिवसेना की भूमिका जगज़ाहिर है...ये शिवसेना ही है, जो वेलनटाइन्स डे पर प्रेम करनेवालों को पकड़कर पीटते हैं....और इसे हिंदू सभ्यता और संस्कृति के ख़िलाफ़ बताते हैं....कुछ साल पहले सांगली में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने प्यार करने वालों को पकड़ कर गधे से शादी तक करवा दी थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, नेहा ने शादी कर ये साबित कर दिया कि उनकी रग़ों में उनके परदादा केशव सीताराम ठाकरे का ख़ून बहता है....जिसनें सारी ज़िंदगी प्रेम विवाह करने वालों के समर्थन में बिता दी.....उन्होने अपने दादा जी की नीति को दूर से ही सलाम कर दिया....शायद उन्होने परिवार को बेहद क़रीब से देखने के बाद ये फैसला किया होगा....पिता की मौत के बाद चाचा जयदेव और चाची स्मिता ठाकरे का झगड़ा और तलाक़ होते देखा....चाचा उद्धव और राज ठाकरे का झगड़ा देखा.....घर में अपने परदादा के क़िस्से सुने होंगे...इसलिए भी मज़हब की दीवार तोड़कर शादी करने में अचड़न नहीं आई होगी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-6855653390378777131?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/6855653390378777131/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=6855653390378777131&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/6855653390378777131'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/6855653390378777131'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='प्रेम ने तोड़ी मज़हबी दीवार'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-ZGKPTnGTp2A/Tug_t_ZmJcI/AAAAAAAAAQ8/Eepd92E8Wew/s72-c/neha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-8031654781167079244</id><published>2011-08-16T00:03:00.000-07:00</published><updated>2011-08-16T00:04:27.311-07:00</updated><title type='text'>अब अपने पंजे से भी डर लगने लगा है......</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-U8u1KHKRKkQ/TkoWdZ5dGEI/AAAAAAAAAQ0/pgmJeJAifoc/s1600/anna-hazare-fast_110407.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-U8u1KHKRKkQ/TkoWdZ5dGEI/AAAAAAAAAQ0/pgmJeJAifoc/s400/anna-hazare-fast_110407.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5641346177658853442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भगवान ने पंजा हमें भले कामों के लिए दिया है....लेकिन ये नामुराद पंजा धरती पर आने के बाद तरह तरह के धतकरम करता है....यक़ीन न हो तो ज़रा सोच कर देखिए...खून, बलात्कार, हत्या, अपरहण, फिरौती जैसी जघन्य घटनाओं के लिए क्या पंजा ज़िम्मेदार नहीं है? देश के धन को कालेधन में बदलने की कलाकारी क्या पंजा नहीं करता है? देश की सरहद की हिफ़ाज़त के लिए शहीद हो जाने वाले फौजियों की बेवाओं के लिए बने घरों में खादी, खाकी और लाल-नीली बत्ती वाले घुसकर बैठ जाएं तो क्या इसके लिए पंजा ज़िम्मेदार नहीं है? खेल में करोड़ों- अरबों रुपया इधर से उधर हो जाए तो क्या पंजे को ख़बर नहीं होगी? दूरसंचार में अगर एक लाख अट्ठहत्तर करोड़ रुपए का घपला हो जाए तो क्या पंजा गुनाहगार नहीं होगा? &lt;br /&gt;हो सकता है कि आप ये कहकर संतोष कर लें कि पंजे का क्या दोष? पंजा तो वहीं करता है, जो उससे दिमाग़ कहता है...वो दिमाग़ का ग़ुलाम भर है....ये बात एक हद तक सही भी है....लेकिन.इंसानी फितरत अलग होती है...वो सोच को नहीं, अपराध करनेवाले को सबसे पहले गुनाहगार मानता है..&lt;br /&gt;आज पंजे को कोसने का दिल चाह रहा है.....हो सकता है कि इस सोच पर भी धारा 144 या फिर कोई और धारा लागू हो जाए.....लेकिन दिल का क्या करें.....तबीयत हुई तो हुई....अब क़ानून की पेंचदिगियों को समझने का वक़्त नहीं है....अब समय आ चुका है ..लोगों को जगाने का....नींद में सोए लोगों को झकझोरने का....गूंगी-बहरी सरकार को हिलाने का.....ताकि तेरी, मेरी, उसकी बात सुनी जाए....सेंसेक्स और शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के साथ हिचकोले खाती सरकार को अवाम को भी ख़बर लगे..मुट्ठीभर लोगों की चिंता छोड़कर वो अवाम की ख़ातिर सोचे.....उस अवाम के बार में.....जो बीस रुपए की दिहाड़ी पर परिवार पालता है....एख जून की रोटी नसीब हो जाए तो अगले जून की गारंटी नहीं होती...तन पर कपड़ा नहीं होता....बीमार पड़ जाए और किसी खादी वाले की पैरवी न हो तो सफेद कोट वाले कैसे कुत्ते की तरह सलूक करते हैं....मनरेगा में काम मांगने जाते हैं तो सरपंच पहले अपने आदमी का ख़्याल रखता है....और उसे ठेंगे पर...किसी काम के लिए सरकारी दफ्तर चला जाए तो पसीने छूट जाते हैं....&lt;br /&gt;इसलिए तो जनता चीख-चीख कर कह रही है कि देश से भ्रष्टाचार मिटाना है....अवाम की इसी आवाज़ को अन्ना हज़ारे हवा दे रहे हैं....अवाम की ख़ातीर ही आंदोलन छेड़ रहे हैं...क्या यही अन्ना का अपराध है? अन्ना और उनकी टीम ने बस इतना भर गुनाह किया है कि सरकार भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कड़े क़ानून बनाए....चाहें इस देश का जितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो...अगर वो भ्रष्ट है तो उसके ख़िलाफड भी कार्रवाई हो....चाहे प्रधानमंत्री हों....मंत्री, सांसद या फिर अदालत....लोकतंत्र में क़ानून सबके लिए बराबर होना चाहिए....&lt;br /&gt;लेकिन सरकार तो सत्ता मद में चूर है....जब उसने कॉमनवेल्थ घोटाले पर कुछ नहीं सुनाई –दिखाई दिया...जब उसे आदर्श घोटाले में कुछ नहीं दिखा....जब उसे टूजी में कुछ नहीं दिखा.. तो फिर वो भ्रष्टाचार कैसे देख ले....ऊपर से अन्ना की हिम्मत कि वो सरकार की आंख में उंगली डालकर भ्रष्टाचार दिखाने का साहस करे...सत्ता मद में चूर सरकार एक अदने से आदमी की बात क्यों मानें? क्या वो किसी पार्टी के अध्यक्ष हैं, जो उन्हे सिर आंखों पर बिठा ले?  लोकशाही के बीज से जन्मे राजशाही के वो राजकुमार की तरह हैं अन्ना कि उनके कहने भर से प्रधानमंत्री पानी भरने लगें.... अन्ना उस भारत के निवासी हैं, जो सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे बाद में आता है....सरकार की प्राथमिकता में शानिंग इंडिया के लोग बसते हैं.....&lt;br /&gt;तंगेहाल, फटेहाल, भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षित भारत के एक अदले ने निवासी अन्ना और उनकी टीम की इतनी जुर्रत कि वो सरकार को क़नून सिखाए....काम करने का तरीक़ा सिखाए....सरकार का पारा गरम हो गया....खादी का पारा गरम होगा तो खाकी वालों का लाल-पीला होना बनता ही है.....लिहाज़ा अनशन पर आमादा अन्ना को पकड़कर बंद कर दिया....अन्ना की सुर में सुर मिलानेवालों केजरीवाल, सिसोदिया, बेदी जैसे लोगों के भी होश ठिकाने लगाने की कोशिश की...सबको पकड़कर बंद कर दिया...सरकार के इशारे पर चकरघिन्नी की तरह नाच रही पुलिस को इलहाम हो गया कि टीम अन्ना अनशन की ज़िद में धारा एक सौ चवालीस तोड़नेवाली है....अब ये अन्ना लोकशाही के युवराज की तरह तो है नहीं कि किसी में जाकर धारा 144 को तोड़ें- मरोड़ें..और पुलिस खींसे निपोरती रहे....इसलिए पुलिस का ‘पंजा’ टीम अन्ना की गर्दन तक पहुंच गया....&lt;br /&gt;सरकार की दलील देखिए.....क़ानून व्यवस्था को बनाए रखने की चिंता में अन्ना एंड टीम को पकड़ना पड़ा....क़ानून व्यवस्था की फिक्रमंद सरकार अगर इतनी बेताबी रोज़ दिखाती तो क्या दिल्ली में चलती गाड़ी में बलात्कारियों का पंजा आबरू तक पहुंच सकता है? क्या देश की राजधानी में दिन दहाड़े डाका पड़ सकता था.....सरकार साबित कर रही है कि उसकी नज़र में क़ानून व्यवस्था में अवाम की सुरक्षा नहीं है,.....उसके लिए क़ानून व्यवस्था इंडिया के ख़ासमख़ास लोग के लिए हैं....&lt;br /&gt;अन्ना के हाथ में लाठी नहीं है...गोली नहीं है....फिर भी सरकार बौखला रही है....क़ानून के तरह तरह के पाठ पढ़ा रही है.....झपट्टा मारकर पंजे में वोट लेनेवाली सरकार को अभी वो दूसरा पंजा नहीं दिख रहा.....लरज़ती आवाज़ के बाच वो अन्ना के कांपते हुए पंजे की भाषा नहीं पढ़ पा रही है....साल 74 में भी देश ने एक बूढ़े इंसान की लरज़ती हुई सुनी थी....कांपते हुए पंजे देखे थे....आज भी उनकी वो आवाज़ गूंजती है....उस हांड-मांस के बूढ़े आदमी का नाम जयप्रकाश था, जिन्होने पटना की एक रैली में कहा था...’डरो मत....बूढ़ा ज़रुर हो गया हूं लेकिन मरा नहीं हूं..’ इसी के बाद दिल्ली में उद्घोष हुआ था.....रामधारी सिंह दिनकर की भाषा में जनता चीख पड़ी थी.....सिंहासनम खाली करो कि जनता आती है...&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-8031654781167079244?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/8031654781167079244/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=8031654781167079244&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8031654781167079244'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8031654781167079244'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='अब अपने पंजे से भी डर लगने लगा है......'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-U8u1KHKRKkQ/TkoWdZ5dGEI/AAAAAAAAAQ0/pgmJeJAifoc/s72-c/anna-hazare-fast_110407.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-8163221443332853999</id><published>2011-06-22T21:16:00.001-07:00</published><updated>2011-06-22T21:16:59.954-07:00</updated><title type='text'>और कितना झूठ बोलेंगी ममता बैनर्जी?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-bZqRgN72cAE/TgK-NsT55KI/AAAAAAAAAQs/N_h6SH3hbME/s1600/Mamata-Banerjee-West-Bengal-CM.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 224px; height: 203px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-bZqRgN72cAE/TgK-NsT55KI/AAAAAAAAAQs/N_h6SH3hbME/s400/Mamata-Banerjee-West-Bengal-CM.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5621264427354023074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी आजकल दिल्ली में डेरा डाली हुई हैं। दीदी की ईमानदारी और सादगी पर दिल दे चुके पत्रकार हर पल उन्हे घेरे रहते हैं। इस मौक़े का ‘दीदी’ भी भरपूर फायदा उठा रही हैं। जो मन में आ रहा है, मीडिया को बोल रही हैं। मीडिया भी बिना कोई सवाल खड़ा किए उनके जवाब को ज्यों का त्यों छाप देता है। दीदी के बेबाकीपन से कुछ गंभीर सवाल उभरे हैं, जिन पर बहस की पूरी गुंजाइश है। &lt;br /&gt;                ममता दिल्ली में राज्य की ख़स्ताहाल माली हालत का रोना रो रही हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री दादा प्रणब मुखर्जी के सामने खाता बही भी लेकर बैठ चुकी हैं। सरकार को तर्क दे रही हैं कि उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वो राज्य की विधवाओं, विकलांगों और बुज़ुर्गों के पेंशन दे सकें। सूबे की कमाई का सत्तानवें फीसदी पैसा सैलरी देने में ही निकल जाता है। ममता आरोप मढ़ रही हैं कि वाममोर्चा ने चौंतीस सालों में बंगाल को लूट खाया है। बंगाल का दीवाला निकल चुका है। उन्हें विरासत में ऐसे राज्य की कमान मिली है, जो गले तक कर्ज़ में है। &lt;br /&gt;ममता ने ताल ठोककर दावा किया कि उन्हे मनमोहन सरकार से ख़ैरात नहीं चाहिए। वो अपना हक़ मांगने आई हैं। उन्हें सरकार से स्पेशल पैकेज की ज़रुरत नहीं है। ममता का झूठ देखिए अगर उन्हें ख़ैरात या स्पेशल पैकेज नहीं चाहिए तो उनके वित्त मंत्री क्यों ऐसी योजना बनाई है, जिसके ज़रिए केंद्र से बीस हज़ार करोड़ रुपए का पैकेज झटका जा सके। ममता ने केंद्र से राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की मद से पांच सौ करोड़ रुपए की मांग की है। आएला तूफान से बरबाद हुए सुंदरबन के लोगों को आबाद करने के लिए साढ़े चार सौ करोड़ रुपए चाहिए। मोगा टूरिस्ट सर्किट के लिए दो सौ करोड़ रुपए चाहिए। सड़क बनाने के लिए एक सौ पचास करोड़ रुपए चाहिए। तिस्ता सिंचाई योजना के लिए 130 करोड़ रुपए चाहिए। यानी ममता को केंद्र से लगभग चौदह सौ तीस करोड़ रुपए चाहिए। फिर भी ये ख़ैरात नहीं है। &lt;br /&gt;ममता का दूसरा झूठ देखिए। वित्त मंत्रालय के बाहर दावा किया कि उन्होंने एक महीने में ही अपने पिचहत्तर फीसदी वादे पूरे कर दिए। सिंगूर में चार सौ एकड़ ज़मीन किसानों को लौटा दी। दार्जिलिंग स्वायत्त परिषद का गठन कर दिया। दस हज़ार मदरसों को मान्यता दे दी। जंगलमहल अब नक्सलियों की गोलियों से नहीं थर्राता। दूसरी तरफ वो ये भी दावा कर रही हैं कि वो चाहती हैं कि बंगाल के लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान मिल सके। मुख्यमंत्री खुद मानती हैं कि राज्य की जनता को अभी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिली हैं। फिर भी दावा कर रही हैं उन्होने पिचहत्तर फीसदी वादे पूरे कर दिए। जिस राज्य की जनता भूखी हो, प्यासी हो, रहने को घर न हो, तन ढ़कने को कपड़े न हों- फिर भी पिचहत्तर फीसदी वादे पूरे कर दिए। ममता के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि राज्य में कल कारखाने लगाने के लिए वो क्या कर रही हैं। सब हाथ को कैसे काम देंगी। जो राज्य कभी जूट और कॉटन के लिए मशहूर था, उस शोहरत को वो कैसे लौटाएंगीं। बच्चों को अच्छी शिक्षा कैसे मिलेगी। आम लोगों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर और सस्ता इलाज कैसे मिलेगा। ममता के पास कोई जवाब नहीं है। वो केवल सरकारी अस्पतालों के चक्कर लगाती हैं और मीडिया को बुलाकर सबसे बड़े अफसर को सस्पेंड कर देती हैं। टीवी चैनलों और अख़बारों को देखकर जनता मान लेती है कि दीदी वाकई में काम कर रही हैं। &lt;br /&gt;दरअसल ममता मीडिया के ज़रिए केवल अपनी इमेज चमका रही हैं। वो केवल ढिंढोरा पीट रही हैं। थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि वामोर्चा ने पश्चिम बंगाल का बेड़ा गर्क कर दिया। हम अभी पूरे सूबे की बात न करे औऱ केवल राजधानी कोलकाता की बात करें तो असलियत जानकर हैरानी होगी। पिछले एक साल से कोलकाता नगरपालिका पर तृणमूल कांग्रेस का क़ब्ज़ा है। एक साल काफी होता है किसी नगरपालिका के लिए कि वो कुछ बुनियादी ज़रुरतों को पूरा कर सके। कम से राजधानी को बेहतर सड़क तो दे ही सकता है। बिजली के खंबों पर लाइट तो लगवा ही सकता है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पश्चिम बंगाल में झमाझम बारिश के बाद कोलकाता की सड़कों पर घुटने तकर पानी भर गया। कुछ इलाक़ों में पानी गर्दन तक पहुंच गया। यहां तक कि मुख्यमंत्री भी अपनी सरकारी गाड़ी में घंटों फंसी रही। &lt;br /&gt;सबसे अहम सवाल ये है कि ममता कब तक लोगों को सुनहरे सपने दिखाती रहेंगी। कब वो उन बुनियादी ज़रुरतों के लिए काम करना शुरु करेंगीं, जिसके लिए जनता तरस रही है। बहुत हो गया भाषणबाज़ी..जनता पिछले कई दशकों से यही सुनते आई है। आपने डिलीवरी का वादा किया था। अब समय आ चुका है कि आप डिलीवर करके दिखाएं ताकि जनता को लगे कि काम करने के लिए पांच साल का समय बहुत कम होता है। &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-8163221443332853999?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/8163221443332853999/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=8163221443332853999&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8163221443332853999'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8163221443332853999'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='और कितना झूठ बोलेंगी ममता बैनर्जी?'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-bZqRgN72cAE/TgK-NsT55KI/AAAAAAAAAQs/N_h6SH3hbME/s72-c/Mamata-Banerjee-West-Bengal-CM.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-3604466865565455093</id><published>2011-05-30T06:38:00.000-07:00</published><updated>2011-05-30T06:39:20.867-07:00</updated><title type='text'>हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौक़े पर पत्रकार और मीडिया कर्मी की परिभाषा तय हो</title><content type='html'>आज यानी 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है। कम से कम आज के दिन ये बहस ज़रूर होनी चाहिए थी कि आज हिंदी पत्रकारिता किस मोड़ पर है। ज़रूरी नहीं कि इस विषय पर चर्चा के लिए सुनामधन्य पत्रकार अपने न्यूज़ चैनलों पर आदर्श पैकेजिंग ड्यूरेशन के तहत 90 सेकेंड की स्टोरी ही दिखाते या  अधपके बालों वालों धुरंधरों को बुलाकर बौद्धिक जुगाली करते या फिर हिंदी पत्रकारिता की आड़ में अंग्रेज़ी पत्रकारिता को कम और पत्रकारों को ज़्यादो कोसते। टीवी वालों को क्या दोश दें । बौद्धिक संपदा पर जन्मजात स्वयंसिद्ध अधिकार रखनेवाले प्रिंट के पत्रकारों ने भी डीसी, टीसी तो छोड़िए , सिंगल कॉलम भी इस दिवस की नहीं समझा।  कहीं कोई चर्चा नहीं कि क्या सोचकर पत्रकारिता की शुरूआत हुई थी और आज हम कर क्या रहे हैं। &lt;br /&gt;ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी, तकवी शकंर पिल्ले, राजेंद्र माथुर,सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय की ज़माने की पत्रकारिता की कल्पना करना मूर्खता होगी। लेकिन इतना तो ज़रूर सोचा जा सकता है कि हम जो कर रहे हैं , वो वाकई पत्रकारिता है क्या। सब जानते हैं कि भारत में देश की आज़ादी के लिए पत्रकारिता की शुरूआत हुई। पत्रकारिता तब भी हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा कई भाषाओं में होती थी। लेकिन भाषाओं के बीच में दीवार नहीं थी। वो मिशन की पत्रकारिता थी। आज प्रोफोशन की पत्रकारिता हो रही है। पहले हाथों से अख़बार लिखे जाते थे। लेकिन उसमें इतनी ताक़त ज़रूर होती थी कि गोरी चमड़ी भी काली पड़ जाती थी। आज आधुनिकता का दौर है। तकनीक की लड़ाई लड़ी जा रही है। फोर कलर से लेकर न जाने कितने कलर तक की प्रिटिंग मशीनें आ गई हैं। टीवी पत्रकारिता भी सेल्युलायड, लो बैंड, हाई बैंड और बीटा के रास्ते होते हुए इनपीएस, विज़आरटी, आक्टोपस जैसी तकनीक से हो रही है। लेकिन आज किसी की भी चमड़ी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। शायद चमड़ी मोटी हो गई है। &lt;br /&gt;आख़िर क्यों अख़बारों और समाचार चैनलों से ख़बरों की संख्या कम होती जा रही है। इसका जवाब देने में ज़्यादातर कथित पत्रकार घबराते हैं। क्योंकि सत्तर –अस्सी के दशक से कलम घिसते –घिसते कलम के सिपाही संस्थान के सबसे बड़े पद पर बैठ तो गए लेकिन कलम धन्ना सेछ के यहां गिरवी रखनी पड़ी। कम उम्र का छोरा ब्रैंड मैनेजर बनकर आता है और संपादक प्रजाति के प्राणियों को ख़बरों की तमीज़ सिखाता है। ज़रूरी नहीं कि ब्रैंड मैनेजर पत्रकार हो या इससे वास्ता रखता हो। वो मैनेजमैंट पढ़कर आया हुआ नया खिलाड़ी होता है। हो सकता है कि इससे पहले वो किसी बड़ी कंपनी के जूते बेचता हो। तेल, शैंपू बेचता हो। वो ख़बर बेचने के धंधे में है। इसलिए उसके लिए ख़बर और अख़बार तेल , साबुन से ज़्यादा अहमियत नहीं रखते। वो सिखाता है कि किस ख़बर को किस तरह से प्ले अप करना है। सब बेबस होते हैं। क्योंकि सैलरी का सवाल है। ब्रैंड मैनेजर सेठ का नुमाइंदा होता है। उसे ख़बरों से नहीं, कमाई से मतलब होता है। अब कौन पत्रकार ख़्वामखाह भगत सिंह बनने जाए। &lt;br /&gt;कुछ यही हाल टीवी चैनलों का भी है। ईमानदारी से किसी न्यूज़ चैनल में न्यूज़ देखने जाइए तो न्यूज़ के अलावा सब कुछ देखने को मिल जाएगा। कोई बता रहा होगा कि धोना का पहले डेढ़ फुट का था अब बारह इंच का हो गया है। ये क्या माज़रा है – समझने के लिए देखिए ..... बजे स्पेशल रिपोर्ट। कोई ख़बरों की आड़ में दो हीरोइनों को लेकर बैठ जाता है और दर्शकों को बताता है कि देखिए ये पब्लिसिटी के लिए लड़ रही हैं। ये लेस्बियन हैं। ये लड़ाई इस उम्मीद से दिखाई जाती है ताकि दर्शक मिल जाए और टीआरपी के दिन ग्राफ देकर लाला शाबाशी दे। कोई किसी ख़ान को लेकर घंटो आफिस में जम जाता है। सबको पता है कि उसकी फिल्म रिलीज़ होने वाली है। ये सब पब्लिसिटी का हिस्सा है। लेकिन वो अपने धुरंधरों के साथ जन सरोकार वाले पवित्र पत्रकारिता की मिशन में लगा होता है। &lt;br /&gt;इसमें कोई शक़ नहीं कि हिंदी पत्रकारिता समृद्ध हुई है। इसकी ताक़त का दुनिया ने लोहा माना है। अंग्रेज़ी के पत्रकार भी थक हार कर हिंदी के मैदान में कूद गए। भले ही उनके लिए हिंदी पत्रकारिता ठीक वैसे ही हो, जैसा कहावत है- खाए के भतार के और गाए के यार के। लेकिन ये हिंदी की ताक़त है। लेकिन इस ताक़त की गुमान में हमने सोचने समझने की शक्ति को खो दिया। एक साथ, एक ही समय पर अलग अलग चैनलों पर कोई भी हस्ती लाइव दिख सकता है। धरती ख़त्म होनेवाली है- ये डरानेवाली लाल- लाल पट्टी कभी भी आ सकती है।&lt;br /&gt;ये सच है कि एक दौर था जब अंग्रेजी की ताक़त के सामने हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की मानी जाती थी। मूर्धन्य लोग पराक्रमी अंदाज़ में ये दावा करते थे- आई डोंट नो क , ख ग आफ हिंदी बट आई एम एडिटर आफ..... मैगज़िन। लेकिन तब के हिंदी के पत्रकार डरते नहीं थे। डटकर खड़े होते थे और ताल ठोककर कहते थे- आई फील प्राउड दैट आई रिप्रजेंट द क्लास आफ कुलीज़ , नॉट द बाबूज़। आई एम ए हिंदी जर्नलिस्ट। व्हाट वी राइट, द पीपुल आफ इंडिया रीड एंड रूलर्स कंपेल्स टू रीड आवर न्यूज़। आज इस तरह के दावे करनेवाले पत्रकारों के चेहरे नहीं दिखते। लालाओं को अप्वाइनमेंट लेकर आने को कहनेवाले संपादक नहीं दिखते। नेताओं को ठेंगे पर रखनेवाले पत्रकार नहीं मिलते। कलम को धार देनेवाले पत्रकार नहीं मिलते । आज बड़ी आसानी से मिल जाते हैं न्यूज़रूम में राजनीति करते कई पत्रकार। मिल जाते हैं उद्योगपतियों के दलाली माफ कीजिएगा संभ्रात शब्दों में लाइजिंनिंग करनेवाले पत्रकार। नेताओं के पीआर करते पत्रकार। चुनाव में टिकट मांगनेवाले पत्रकार। ख़बर खोजनेवाले पत्रकारों को खोजना आज उतना ही मुश्किल है, जितना कि जीते जी ईश्वर से मिल पाना। इसलिए आज 30 मई के दिन हिंदी पत्रकारिता के मौक़े पर ऐसे पत्रकारों को नमन करें , जिन्होने हिंदी को इतनी ताक़त दी कि आज हम अपनी दुकान चला पा रहे हैं। बेशक़ इसके लिए हमें रोज़ी रोटी और पापी पेट की दुहाई देनी पड़ी। लेकिन आज भी शायद हिंदी पत्रकारिता को बचाए रखने का रास्ता बचा हुआ है। खांटी पत्रकारिता करनेवालों को हम आदर सहित हिंदी पत्रकार कहें और दूसरे लंद फंद में लगे सज्जनों को मीडियाकर्मी कहकर पहचानें और पुकारें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-3604466865565455093?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/3604466865565455093/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=3604466865565455093&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3604466865565455093'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3604466865565455093'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2011/05/blog-post_30.html' title='हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौक़े पर पत्रकार और मीडिया कर्मी की परिभाषा तय हो'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-1940969324638233081</id><published>2011-05-02T04:39:00.000-07:00</published><updated>2011-05-02T04:41:18.298-07:00</updated><title type='text'>लादेन ने उतार दिया पाकिस्तान का मुखौटा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-23P6AzJEumE/Tb6YVBsaV8I/AAAAAAAAAQA/yEaE0-GIUEQ/s1600/dead_2011%252Cbin_laden_dead%252Cbin_laden_killed%252Claden_dead_or_alive%252Claden_dead%252Cosama_bin_laden_body%252Cosama_bin_laden_body_found%252Cosama_bin_laden_body-703725.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 302px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-23P6AzJEumE/Tb6YVBsaV8I/AAAAAAAAAQA/yEaE0-GIUEQ/s400/dead_2011%252Cbin_laden_dead%252Cbin_laden_killed%252Claden_dead_or_alive%252Claden_dead%252Cosama_bin_laden_body%252Cosama_bin_laden_body_found%252Cosama_bin_laden_body-703725.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5602082473494861762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मरते –मरते ओसामा बिन लादेन ने पाकिस्तान का मुखौटा उतार दिया। अमेरिकी ड्रोन हमले में लादेन उस जगह पर मारा गया, जहां पर पाकिस्तान हुकूमत का एक छत्र राज है। पाकिस्तान अब ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि राजधानी इस्लामाबाद से लगभग साठ किलोमीटर दूर पर बसे शहर अबोटाबाद पर क़बालियों का क़ब्ज़ा है। पाकिस्तान  दुनिया से अपना असली चेहरा छिपाए घूम रहा था। वो ताल ठोंककर दावा कर रहा था कि वो आतंकवाद का ख़ात्मा करना चाहता है। वो अपनी सरज़मीं का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने देगा। यही दुहाई देकर पाकिस्तान अरसे से अमेरिका से तोल मोल कर अपनी माली हाली हालत को बचाए रखे हुए था। &lt;br /&gt;भारत बार- बार दुनिया को पाकिस्तान का असली चेहरा दिखा रहा था। लेकिन अपने आका अमेरिकी की मेहरबानियों से पाकिस्तान अपने काले चेहरे पर परदा डाल लेता था। अमेरिकी नेता भी भारत आकर भारत की बात करते थे और पाकिस्तान पहुंचते ही उनका सुर बदल जाता था। फिर भी भारत ने हिम्मत नहीं हारी। धीरज और सब्र के साथ अमेरिका को समझाने में लगा रहा कि वो जिस पाल पोस रहा है, वो काला नाग है। एक दिन वो उसी को डस लेगा।&lt;br /&gt;मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद बारत ने पूरी दुनिया को सबूत दिए कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ हैं। लेकिन पाकिस्तान ये दुहाई देता रहा कि वो खुद आतंकवादी से लड़ रहा है। वो दूसरे मुल्क में कैसे दहशतगर्दी फैला सकता है। भारत ने फिर कहा कि इकलौते ज़िंदा पकड़े गए आतंकवादी अजमल क़साब का नाता पाकिस्तान से है। भारत के इस बयान के बाद एक पाकिस्तानी चैनल भी क़साब के घर को दिखाया। उसके मां बाप से बात की। लेकिन पाकिस्तान इस सच को मानने के लिए राज़ी ही नहीं हुआ। वो अपने आका अमेरिका के क़दमों में गिरकर यही रोना रोत रहा कि मुंबई हमले से उसका कोई वास्ता नहीं हैं। &lt;br /&gt;मुंबई हमले ही नहीं, कांधार प्लेन हाईजैक के आतंकवादी भी पाकिस्तान में छुट्टे घूम रहे हैं। मज़हब की आड़ में लोगों को भारत के ख़िलाफ भड़का रहे हैं। उनकी तस्वीरें, उनके भाषण भारत ने पाकिस्तान को दिए। लेकिन पाकिस्तान ने इसे भी मानने से इनकार कर दिया। बात बात परक सच पर परदा डालने में माहिर पाकिस्तान अब किस मुंह से कहेगा कि दुनिया का सबसे ख़रतनाक आतंकवादी उसके देश में कैसे छिपा बैठा था। क्या उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को ख़बर तक नहीं थी। क्या ऐसा मुमक़िन है कि खुफिया एजेंसी को भनक तक न हो या सरकार को इसका अहसास तक न हो। ओसामा जिस जगह पर मारा गया, वो फौजी इलाक़ा है। क्या फौज की इजाज़त के बग़ैर लादेन वहां बस सकता था? अगर फौज को अपने रिहाइशी इलाक़े के बारे में भी जानकारी नहीं थी तो फिर वो सरहद पार की जानकारी कैसे रखती होगी? पाकिस्तान सरकार हर आरोप से इनकार करेगी। लेकिन इस सच को दफन नहीं किया जा सकता कि लादेन की मौत उस ठोर पर हुई है, जहां चांद- सितारे वाला सब्ज़े रंग का परचम लहराता है। इस परचम के अंदर क़ैद है पाकिस्तान का असली चेहरा, ख़ूनी चेहरा, दहशतगर्द चेहरा, जो अब तक अमेरिका को मासूम नज़र आता था। लेकिन क्या इसके बाद भी अमेरिका को पाकिस्तान का चेहरा मासूम नज़र आएगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-1940969324638233081?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/1940969324638233081/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=1940969324638233081&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1940969324638233081'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1940969324638233081'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='लादेन ने उतार दिया पाकिस्तान का मुखौटा'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-23P6AzJEumE/Tb6YVBsaV8I/AAAAAAAAAQA/yEaE0-GIUEQ/s72-c/dead_2011%252Cbin_laden_dead%252Cbin_laden_killed%252Claden_dead_or_alive%252Claden_dead%252Cosama_bin_laden_body%252Cosama_bin_laden_body_found%252Cosama_bin_laden_body-703725.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-7620841572283474741</id><published>2011-04-30T04:02:00.000-07:00</published><updated>2011-04-30T04:19:38.905-07:00</updated><title type='text'>समय कितना जल्दी बीत जाता है-"है न मां"</title><content type='html'>1 मई - इसे पूरी दुनिया मज़दूर दिवस के तौर मनाती है। छात्र और युवा राजनीति के दौरान मैंने भी वर्ग संघर्ष को लेकर ख़ूब नारे लगाए थे। लोगों को याद दिलाता था कि बुर्जुआ और सामंत कभी भी मेहनतकश मज़दूरों को उनका हक़ नहीं देता। ये लाल रंग का झंडा केवल रंग नहीं है। ये झंडा ख़ून से सना हुआ है। ये झंडा इंक़लाब की याद दिलाता है- उठो, बढ़ो और पूंजीपंतियों से अपना हक़ छीन लो। ये लड़ाई आज भी जारी है। लेकिन इस तारीख़ के साथ एक और भी याद जुडी़ हुई है। मेरे हाथ में अब लाल झंडा तो नहीं है लेकिन मेरा दिल लहुलूहान है। 1 मई 2007 - इसी दिन मैंने अपनी मां को खोया। लंबी बीमारी, जो डायबटीज़ ने उन्हे दी, के बाद वो मज़दूर दिवस के दिन हमें अकेला छोड़ गईं। समयचक्र को देखता हूं तो किसी अदृश्य शक्ति का अहसास होता है। 14 जुलाई 1996 को बाबा यानी दादाजी का देहांत हुआ। अगले ही साल 27 जून 1997 को पापा का देहावसान हुआ। इनकी मौत के सदमे से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि ठीस दस साल बाद एक बार फिर मौत ने चुपके से दस्तक दी। वो दिन था- 1 मई 2007। हैरानी की बात है कि एक न्यूज़ चैनल की नौकरी छोड़ने के बाद दूसरी नौकरी पर जाना था। वो चौनल एक बिल्डर का था। बात पक्की हो चुकी थी। दूसरी नौकरी ज्वाइन करने से पहले मैंने घूमने फिरने का कार्यक्रम बनाया। अचानक एक ज्योतिष से मुलाक़ात हुई। उन्होने बताया कि वो चैनल आपके लिए शुभ नहीं है। क्योंकि वो चैनल ही शुभ नहीं है। क्योंकि आप उसे ज्वाइन कर चुके हैं इसलिए आपका जीवन ख़तरे में हैं। या तो किसी हादसे में आपकी मौत होगी या फिर आपकी मौत तभी टलेगी जब कोई आपका बेइंतहा क़रीबी वो मौत अपने सिर ले ले। नई नई शादी हुई थी। बहुत छोटा बच्चा था। मैंने सोचा - कौन है वो जो मेरी मौत को अपने सिर लेगा। फिर मैंने ज्योतिष की बात को यूं ही मानकर पहले दिन नौकरी के लिए घर से निकल पड़ा। सोसाइटी के गेट के बाहर पहुंचते ही हादसे का शिकार हो गया। सुब सुबह नशे में चूर एक महिला रॉंग साइड से फुल स्पीड कार लिए चली आ रही थी। संभलने से पहले कार मेरे ऊपर से गुज़र चुकी थी। होश आया तो ख़ुद को फॉर्टिस अस्पताल में पाया। आंख के ठीक ऊपर चश्मे का एक शीशा आधा अंदर धंसा हुआ था। डॉक्टर मुझे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। कॉस्मेटिक सर्जन डॉक्टर दुधानी एमआरआई का कराने की सलाह दे रहे थे। उन्हे डर था कि कहीं ब्रेन स्ट्रोक न हो गया हो। वो साथियों से कह रहे थे कि अगर ये होश खो बैठा तो बहुत मुश्किल होगी। आंख खोलते ही वो तरह तरह के सवाल पूछने लगे। सर्जरी के बाद डॉक्टरों ने मुझे फिट घोषित कर दिया। एलान कर दिया कि मौत टल चुकी है। लेकिन इसके हफ्ते भर बाद ख़बर आई कि मां नहीं रहीं। देखो मां, मेरी मौत तो तुम अपने सिर ले गई। देखते ही देखते चार साल बीत गए न! हर बार तुम्हे डांटता था कि फलां काम करने के लिए तुमसे किसने कहा था। कुछ हो जाता तो। आज जो होना था, वो हो चुका है। लेकिन अफसोस तुम्हे डांट नहीं पा रहा हूं। वरना कहता- क्या ज़रूरत थी तुम्हे ये सब करने की। लेकिन शायद यही नियति है। क्योंकि ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है।          &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;a href=http://www.yahoodetector.name/ &gt;yahoo detector&lt;/a&gt;,  &lt;a href=http://www.musicfrost.com/ &gt;limewire&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-7620841572283474741?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/7620841572283474741/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=7620841572283474741&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/7620841572283474741'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/7620841572283474741'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='समय कितना जल्दी बीत जाता है-&quot;है न मां&quot;'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-2516884933409168512</id><published>2010-11-03T03:31:00.000-07:00</published><updated>2010-11-03T03:41:20.232-07:00</updated><title type='text'>बचपन की बातें................</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TNE8RmJDQjI/AAAAAAAAAPc/ivvYekGKoSI/s1600/bachpan.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 379px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TNE8RmJDQjI/AAAAAAAAAPc/ivvYekGKoSI/s400/bachpan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5535271690009002546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक बहुक पुराने मित्र है कपिल बत्रा। लगभग एक दशक हो गए उनसे मिले हुए। लेकिन उनकी याद बहुत आती है। सुना है आजकल मुंबई में बसते हैं। बड़े चौनलों के लिए मल्टीकैम का सारा बोझ उटाते हैं। ये बहुत कम लोगों को याद होगा कि ये वही कपिल बत्रा हैं जो न्यूज़ एंकर हुआ करते थे। ये ज़ी टीवी के पहले न्यूज़ बुलेटिन की एंकरिंग कर चुके हैं। आज उनके पुराने खतो किताबत को खंगाला। भुली बिसरी बातें यादें आईं। उनका ये संवाद आज बी ज़ेहन में गूंजता है- जब सूरत ढल जाती है तब सीरत काम आता है। इसलिए टीवी के पत्रकारों तकनीकी तौर पर मज़बूत होना चाहिए। पता नहीं टीवी के तकनीक को कितना सीख पाया हूं और कितना साध पाया हूं। लेकिन कपिल बत्रा के साथ मेरे खतो किताबत के कुछ अंश पेश कर रहा हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद ज़िंदगी बदल रही है!!&lt;br /&gt;जब मैं छोटा था, शायद दुनिया&lt;br /&gt;बहुत बड़ी हुआ करती थी..&lt;br /&gt;मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता&lt;br /&gt;क्या क्या नहीं था वहां,&lt;br /&gt;चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,&lt;br /&gt;बर्फ के गोले, सब कुछ,&lt;br /&gt;अब वहां "मोबाइल शॉप",&lt;br /&gt;"विडियो पार्लर" हैं,&lt;br /&gt;फिर भी सब सूना है..&lt;br /&gt;शायद अब दुनिया सिमट रही है...&lt;br /&gt;जब मैं छोटा था,&lt;br /&gt;शायद शामें बहुत लम्बी हुआ करती थीं...&lt;br /&gt;मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,&lt;br /&gt;घंटों उड़ा करता था,&lt;br /&gt;वो लम्बी "साइकिल रेस",&lt;br /&gt;वो बचपन के खेल,&lt;br /&gt;वो हर शाम थक के चूर हो जाना,&lt;br /&gt;अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है&lt;br /&gt;और सीधे रात हो जाती है.&lt;br /&gt;शायद वक्त सिमट रहा है..&lt;br /&gt;जब मैं छोटा था,&lt;br /&gt;शायद दोस्ती&lt;br /&gt;बहुत गहरी हुआ करती थी,&lt;br /&gt;दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,&lt;br /&gt;वो दोस्तों के घर का खाना,&lt;br /&gt;वो लड़कियों की बातें,&lt;br /&gt;वो साथ रोना...&lt;br /&gt;अब भी मेरे कई दोस्त हैं,&lt;br /&gt;पर दोस्ती जाने कहाँ है?&lt;br /&gt;जब भी "traffic signal" पे मिलते हैं&lt;br /&gt;"Hi" हो जाती है,&lt;br /&gt;और अपने-अपने रास्ते चल देते हैं,&lt;br /&gt;होली, दीवाली, जन्मदिन और नए साल पर &lt;br /&gt;बस SMS आ जाते हैं,&lt;br /&gt;शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..&lt;br /&gt;जब मैं छोटा था,&lt;br /&gt;तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,&lt;br /&gt;छुपन छुपाई, लंगडी टांग,&lt;br /&gt;पोषम पा, कट केक,&lt;br /&gt;टिप्पी टीपी टाप.&lt;br /&gt;अब internet, office,&lt;br /&gt;से फुर्सत ही नहीं मिलती..&lt;br /&gt;शायद ज़िन्दगी बदल रही है.&lt;br /&gt;जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है..&lt;br /&gt;जो अक्सर क़ब्रिस्तान के बाहर&lt;br /&gt;बोर्ड पर लिखा होता है...&lt;br /&gt;"मंजिल तो यही थी,&lt;br /&gt;बस जिंदगी गुज़र गई मेरी&lt;br /&gt;यहाँ आते आते"&lt;br /&gt;ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है...&lt;br /&gt;कल की कोई बुनियाद नहीं है&lt;br /&gt;और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है..&lt;br /&gt;अब बच गए इस पल में..&lt;br /&gt;तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में&lt;br /&gt;हम सिर्फ भाग रहे हैं..&lt;br /&gt;कुछ रफ़्तार धीमी करो,&lt;br /&gt;मेरे दोस्त,&lt;br /&gt;और इस ज़िंदगी को जियो...&lt;br /&gt;खूब जियो मेरे दोस्त,&lt;br /&gt;और औरों को भी जीने दो...&lt;br /&gt;चलो दोस्ती के नाम ही सही&lt;br /&gt;इंसानियत की ख़ातिर ही सही&lt;br /&gt;इस दीवाली पर एक दीया&lt;br /&gt;दोस्ती के भी नाम जलाएं&lt;br /&gt;आओ फिर से दोस्ती के दीप जलाएं&lt;br /&gt;इस दीवाली को पहले की तरह&lt;br /&gt;खुशहाल बनाएं&lt;br /&gt;सभी को ज्योतिपर्व मुबारक हो&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-2516884933409168512?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/2516884933409168512/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=2516884933409168512&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/2516884933409168512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/2516884933409168512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='बचपन की बातें................'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TNE8RmJDQjI/AAAAAAAAAPc/ivvYekGKoSI/s72-c/bachpan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-1677968075863104123</id><published>2010-10-04T05:20:00.000-07:00</published><updated>2010-10-04T05:29:09.292-07:00</updated><title type='text'>सोनिया के वंशवाद से लालू का वंशवाद अलग कैसे</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TKnHXVu179I/AAAAAAAAAO8/J4E7XU7MyM4/s1600/laluaskmeany.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 310px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TKnHXVu179I/AAAAAAAAAO8/J4E7XU7MyM4/s400/laluaskmeany.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5524165621731160018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ये सवाल पिछले पंद्रह सत्रह सालों से मेरी ज़ेहन में कौंध रहा है कि आरजेडी के अध्यक्ष और गंवई नेता लालू प्रसाद यादव क्यों मीडिया की आंखों की किरकिरी हैं। मुसीबत ये कि लालू कुछ करे तो मीडिया पीछे पड़ जाए। लालू कुछ न करें तो भी मीडिया ने उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाए। लालू शुरू से ही मीडिया की आंखों की किरकिरी रहे हैं। ये अलग बात है कि लालू ने कारनामे इतने बड़े -बड़े किए कि मीडिया उन्हे दिखाने और छापने के लोभ से बच नहीं पाया। हंसोड़ अंदाज़ में दिया गया लालू का पंद्रह सेकेंड की बाइट बुलेटिन की टीआरपी को सेसेंक्स की तरह उछाल देता था। लालू प्रसाद ने अपने ओजस्वी बेटे तेजस्वी के हवाले अपनी रीजनीति की विरासत दी तो हंगामा बरप गया। सबने चीखना शुरू कर दिया कि बिहार में लालटेन के लेकर चलनेवाले लालू प्रसाद को अपना राजनीतिक वारिस नहीं मिला। सब साथ छोड़कर जा रहे हैं। यहां तक सगे साले भी पिंड छुड़ा चुके हैं। इसलिए लालू ने तेजस्वी को अपना वारिस घोषित किया। &lt;br /&gt;क्या लालू को इतना हक़ नहीं है कि वो अपने बेटे को वारिस घोषत कर सकें। इससे पहले भी जब वो अपनी पत्नी राबड़ी को बिहार की मुख्यमंत्री बनाया था, तब भी बावेला हुआ था। आखिर ये बावेला उस समय मीडिया क्यों नहीं काटता , तब दूसरे राजनेता अपने नाती-पोतों तक को अपना वारिस घोषित करते हैं ? तब मीडिया को क्यों सांप सूघ जाता है? क्या कभी मीडिया ने ये सवाल खड़ा किया कि किस योग्यता के आधार पर सोनिया गांधी अपने राजकुंवर राहुल गांधी को देश का राज पाट सौंपने जा रही हैं। राहुल में ऐसी क्या काबिलियत दिखी कि वो देखते ही देखते पार्टी के महासचिव बन गए। लोकतंत्र ने राहुल गांधी को ऐसी कौन सी चाबी दे दी है कि वो गंभीर मुद्दे पर प्रधानमंत्री से मिलते हैं। और जो सलाह देकर आते हैं, उसकी घोषणा प्रधानमंत्री कर देते हैं ? क्या खुद सोनिया गांधी राजनीतिक विरासत की थाती नहीं खा रही हैं? अगर वो स्वर्गीय राहुल गांधी की पत्नी या फिर इंदिरा गांधी की बहू नहीं होतीं तो भारतीय राजनीति में उनकी हैसियत क्या होती ? फिर राहुल बाबा की हैसियत क्या होती? राहुल की तरह ही वरूण गांधी भी नेहरू गांधी परिवार के चिराग हैं। उन्हे क्यों नहीं देश का नगीना माना जाता है। क्या केवल इसलिए कि उनकी मां मेनका के साथ उनकी सास इंदिरा की कभी नहीं पटी। क्या इसलिए कि इंदिरा ने उन्हे राजनीतिक विरासत के साथ साथ घरेलू विरासत से भी अलग कर दिया था? क्या मीडिया ने मान लिया है कि राहुल की तुलना में वरुण की योग्यता कम है ? अगर ऐसा है तो मीडिया ने इसके लिए क्या पैमाना तय किया?&lt;br /&gt;जब तथाकथित जगत के ताऊ देवीलाल ने अपने जीते जी चौधरी ओम प्रकाश चौटाला को हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाया तो मीडिया को वंशवाद क्यों नहीं दिखा। जब शेख अब्दुल्ला ने फारूक को वारिस बनाया तब भी मीडिया चुप था। फारूक ने उमर को वारिस घोषित किया , तब भी मीडिया चुप था। अब फारूक और उमर दोनों ही सत्ता की मलाई चाट रहे हैं। माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया राजनीतक वल्दीयत को संभाल रहे हैं। जितिन प्रसाद के बेटे जितेन प्रसाद भी सत्ता के वारिस हैं। मुरली देवड़ा के बेटे मिलिंद भी सत्ता सुख भोग रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा के बेटे दीपेंदर भी सत्ता सुख ले रहे हैं। ऐसे सैकड़ों नाम हैं। लेकिन इन नामों पर मीडिया की नज़र नहीं जाती। मीडिया की नज़र जाती है कि मुलायम सिंह ने कैसे राम गोपाल, शिवपाल, अखिलेश और डिंपल को राजनीति में उतारा। लालू प्रसाद कैसे अपने बेटे को तैयार कर रहे हैं रामविलास पासवान कैसे बिहार चुनाव में चिराग़ का इस्तेमाल करेंगे। आखिर मीडिया को क्यों इस तरह के नेताओं पर नज़र रहती है। क्या इसलिए कि वो दलित और पिछड़े हैं, और इन्ही की लड़ाई लड़ते हैं। वंशवाद के विरोध की राजनीति कर राजनीति में मक़ाम हासिल किया। या फिर मीडिया आज भी जातिवादी सोच से बाहर नहीं निकल पाया है। वो राहुल की विरारत में स्वातसुखाय का अहसास पाता है। &lt;br /&gt;लालू प्रसाद दरअसल आजकल राजनीति के बियाबान में हैं। जब सत्ता के आभामंडल के पायदना थे, तब चाटुकार पत्रकारों की होड़ लगी रहती है। प्रणामा पाति करने के लिए रोज़ दर्जनों पत्रकार सलामी देते थे। अब ये दीगर बात है कि सत्ता में लालू की हैसियत वैसी ही गई है जैसे कि सब्ज़ी बनने के बाद तेजपत्ते की होती है। लालू को तब से करीब से देख रहा हूं, जब उन पर स्वर्गीय चंद्रशेखर का हाथ था। हांलाकि कई दिग्गज पत्रकार मानते हैं कि लालू को लालू बनाने में देवीलाल का हाथ था। नब्बे की दशक की बात है । दलित औऱ बुज़ुर्ग नेता राम सुंदर दास और लालू के बीच बिहार के मुख्यमंत्री के लिए जंग थी। ये जंग लालू ने जीती और पंद्रह सालों तक बिहार का राज पाट किया। इस राज पाट के दौरान बिहार का विकास हुआ या विनाश- ये बहस का मुद्दा है। लेकिन ये तो साफ है कि इन पंद्रह सालों तक लालू का करिश्मा सिर चढ़कर बोला। &lt;br /&gt;पंद्रह सालों तक राज पाट करना बच्चों का खेल नहीं है। लालू ने इस करिश्में को करके दिखाया। बिहार के पिछड़े और दलितों को एक आवाज़ दी, नई ताक़त दी। बाबरी कांड के बाद लालकृष्ण आडवाणी की रथ को रोककर मुस्लिमों का विश्वास जीता। मंडल कमीशन लागू कर जब वी पी सिंह ने देवीलाल को साधने की कोशिश की तो लालू दीवार के साथ खड़े हो गए। भाषणों में सवर्णों के खिलाफ आग उगलने लगे। खुलेआम भूरा बाल साफ करने की चेतावनी देने लगे। भूरा बाल यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला। बिहार में जो पिछड़से सदियों से अगड़ों के पिच्छलग्गू बने हुए थे, उनको ताकत दी। इस दौरान अंग्रेजी दां लोग जिनती आलोचना लालू की करते थे, लालू उनते ही यकीन के साथ पिछड़ों को समझा लेते थे कि ये उनका नहीं , उन लोगों का अपमान है। लेकिन यही लालू से चूक भी हो गई। देखते ही देखते अगड़ी जातियां लालू प्रसाद के खिलाफ लामबंद हो गईं। उनके साथ केवल मुसलमान और यादव रह गए। सत्त्ता मद में चूर लालू में आक्रामकता आ गई। गरूर भी आ गया। बिहार भूलकर लो केंद्र की सरकार बनवाने और गिराने लगे। केंद्र की राजनीति के लिए वो अपनी पत्नी के हवाले बिहार का राजपाट कर गए। पत्नी आई तो साथ में दो भाई भी सक्रिय हो गए। बिहार में जंगलराज का आरोप लगने लगा। अपराधी सक्रिय हो गए। रोज़गार के लिए नौजवान बिहार छोड़ने लगे। ऐसे में लालू की इमेज को जबरदस्त धक्का लगा।  &lt;br /&gt;ख़ैर सवाल ये नहीं है कि लालू ने अपने बाद अपना राज पाट अपनी पत्नी राबड़ी के हवाले क्यों किया। क्योंकि ये परंपरा कांग्रेस में पहले से चली आ रही है। सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष इसलिए नहीं बनी कि उन्होने समाज का कोई बहुत बड़ा काम किया था। वो केवल इसलिए कांग्रेस की अध्यक्ष बनी क्योंकि राजीव गांधी की पत्नी थी। राहुल गांधी भी इसलिए सांसद और महासचिव बने क्योंकि वो सोनिया और राजीव के बेटे थे। फिर लालू के बेटे तेजस्वी को वारिस घोषित कर दिया। फिर इतना कोहरमा क्यों ? भारती राजनीति में लालू पहले आदमी तो नहीं है , जो इस तरह की खानदानी परंपरा क़ायम कर रहे हैं और न ही लोकतंत्र के आखिरी पहरूए। फिर इतना बवाल क्यों ? क्यों नहीं जिस तरह से राहुल बाबा के लिए जयकारा लग रहा है। वैसे ही तेजस्वी के लिए लगे। बाक़ी दोनों की क़िस्मत का फैसला जनता जनार्दन के हाथों में छोड़ दें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-1677968075863104123?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/1677968075863104123/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=1677968075863104123&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1677968075863104123'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1677968075863104123'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='सोनिया के वंशवाद से लालू का वंशवाद अलग कैसे'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TKnHXVu179I/AAAAAAAAAO8/J4E7XU7MyM4/s72-c/laluaskmeany.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-7126332745572007545</id><published>2010-06-26T23:25:00.000-07:00</published><updated>2010-06-27T00:12:24.463-07:00</updated><title type='text'>आज तेरह बरस हो गए.............</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TCb5oyl_OlI/AAAAAAAAAOI/YrtlwOYihYo/s1600/sp.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 160px; height: 230px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TCb5oyl_OlI/AAAAAAAAAOI/YrtlwOYihYo/s400/sp.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487347675168717394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बड़े ग़ौर से सुन रहा था ज़माना तुमको, तुम्ही सो गए दास्तां कहते-कहते&lt;br /&gt;ये शब्द मेरे पिता जी के हैं। पापा की मौत के बाद उनके मुहं से यही निकला था। लोग कहते हैं कि वक़्त सारे घाव भर देता है। लेकिन मैं इसका जीता जागता गवाह हूं। घाव कभी नहीं भरते। जिस पर बीतती है , वही जानता है। हमारे परिवार में ऐसा कोई दिन या लम्हा न होगा, जब परिवार का हर सदस्य उन्हे याद नहीं करता होगा। मेरे परिवार की नियती हो गई है कि मई, जून और जुलाई के महीनों से डर कर रहें। ये महीने हमारे लिए वज्रपात ले कर आते हैं। 1 मई 2007 को मेरी मां का देहांत हुआ। 1 जून 2010 को मेरी दादी जी (आजी) का देहांत हुआ। 14 जुलाई 1996 को दादाजी( बाबा)हमें छोड़कर गए। 27 जून 1997 को पापा चल बसे। पिता जी भी काफी बूढ़े हो चले हैं। &lt;br /&gt;ये दर्द समझना इतना आसान नहीं है। जिस आदमी के सामने उसका छोटा भाई गुज़र गया हो, पत्नी गुज़र गई हो। मां-बाप न हो। वो कितना तन्हा महसूस करता होगा, क्योंकि वो अपने पूरे जीवन में इन्ही चारों पर न्यौछावर रहा। सच मानिए तो मुझे अब किसी त्यौहार या उत्सव में कोई आनंद नहीं आता। सब फीका सा लगता है। पता नहीं क्यों हर त्यौहार और उत्सव पर बीते दिनों की हर छोटी बड़ी बातें दिमाग़ में घूमने लगती हैं। न्यूज़ चैनलों में मैं अब तक बहुत नाट्य रूपांतरण और फ्लैश बैक बहुत दिखाया है। मुझे क्या पता था कि मेरी ही ज़िंदगी में ये असलियत कर तरह चस्पां हो जाएंगी। मेरा परिवार बहुत सिकुड़ गया है। &lt;br /&gt;याद आती हैं कई बातें। लोगों के दिलासे-वादे, अपनापन, पृतभाव का प्रेम- फ्लैश बैक की तरह दिमाग़ में घूमती हैं। पापा के चौथ के बाद पिताजी को कोलकाता लौटना था। राजधानी से रिज़र्वेशन कराया। स्टेशन पर तीन लोग उन्हे छोड़ने आए। उनमे से एक समाजवादी नेता( जब वो मंत्री थे) के बहुत क़रीबी थे। बाक़ी दो सज्जन नामचीन संपादक थे। तीनों ने मुझे समझाया। कहा- हम लोग तुम्हारे साथ हैं। कभी जीवन में ज़रूरत पड़े तो ख़ुद को अकेला मत पाना। हम साथ खड़े मिलेंगे। बहुत पुरानी बात नहीं है। कुछ बरस पहले एसपी सिंह की टीम के एक सदस्य भी मेरे साथ काम करते थे। पद-प्रतिष्ठा में समकक्ष ही थे। लेकिन भौक्काल में नंबर वन। मेरे सामने ही लाला जी को वो बड़ी -बड़ी गोलियां देते थे कि पेट में दर्द होने लगता था। ख़ैर उनकी मेहरबानी से मैं पैदल हुआ। नौकरी की तलाश में था। प्लेटफार्म वाले संपादक बड़े चैनल में बडे़ ओहदे पर थे। मैंने उनको फोन किया। ये सोचकर नहीं कि नौकरी चाहिए। बल्कि 1997 वाले भाव को याद कर। उन्होने कई बार बुलाया। उन्हे सब पता था कि मैं बेरोज़गार हूं, नौकरी की तलाश में हूं। नौकरी का भरोसा भी दिया। लेकिन ये दिलासा बस भरोसा बनकर रह गया। उनका दो नंबरी हमेशा मुझे कहता था कि सीधे बात क्यों नहीं करते। सबको रख रहे हैं। हर बार मैं यही कहता था कि उन्हे सब मालूम है। सुविधानुसार वो ज़रूर देखेंगे। ये विश्वास लेकर चल रहा था। नौकरी उन्होने दिल खोलकर बांटी। नौकरी पानेवालों की योग्यताओं और अनुभव पर नहीं जाऊंगा। लेकिन अफसोस तो अफसोस ही होता है, जब पीड़ा दिल को छू गई हो। लेकिन उन पर से विश्वास आज भी नहीं डोला है। जिन लोगों ने मुझे दिलासा और भरोसा दिया था, आज भी उनके साथ मैं ईमानदारी से भावनात्माक और रागात्मक तौर पर जुड़ा हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि वो लोग काफी भले हैं। &lt;br /&gt;ख़ैर व्यक्तिगत जीवन पर आता हूं। पत्रकारिता में आने का जुनून पापा को देख कर ही पैदा हुआ। लेकिन वो हमेशा इसके विरोधी रहे। वो हमेशा कहते थे कि पत्रकारिता का स्वरूप बदल रहा है। कुछ और करो। रेलवे की नौकरी ही कर लो। लेकिन मेरे पर तो महान पत्रकार बनने का भूत सवार था। एक तरह से बाग़ी बनकर पत्रकार बन गया। पापा को अच्छा नहीं लगा। लेकिन उन्होने मेरी भावना को भी समझा। उन्हे मुझसे कहा कि अगर पत्रकारिता ही करना चाहते हो तो फिर जामिया से कोर्स करो। मैंने पलटकर जवाब दिया कि टाटा-बिड़ला ने न तो एमबीए की पढ़ाई की थी और न ही धर्मवीर भारती से लेकर एमजे अकबर और आपने पत्रकारिता को कोर्स किया है। उन्होने मेरी बात को धैर्य से सुना। उन्होने एक बात बहुत धीरज के साथ मुझसे कही- पत्रकारिता में कुंठित हो जाओगे। बहुत कुछ बदल गया है। आज मुझे लगता है कि उन्होने भविष्य की पत्रकारिता को समय से भांप लिया था। किसी और से भेल ही न की हो, लेकिन हमारे बीच जो नाता था, उसमें वो बेबाकी से सच कह गए थे। क्योंकि पत्रकारिता का जो मौजूदा चेहरा और स्वरूप है, वो किसी से छिपा नहीं है। &lt;br /&gt;घर पर कई बार रविवार और धर्मयुग के पन्ने पलटता हूं। उनके कई लेख देखता हूं। डाकू घनश्याम पर उदयन शर्मा का लेख पढ़ता हूं। आज के दौर के पत्र -पत्रिकाओं के साथ न्यूज़ चैनल देखता हूं। कई बार ख़ुद से पूछता हूं कि क्या मैं यही पत्रकारिता करने के लिए अपनों से लड़ा था। पत्रकारों के स्वभाव , गुण, चित्त , मनोदशा, आकांक्षा और फितरत को पढ़ने की कोशिश करता हूं तो बार बार यही सवाल उभरता है। ऐसे में मैं अपने बेटे अंश सुरेंद्र के साथ खेलता हूं। उसकी तरफ देखता हूं। मन ही मन बुदबुदाता हूं। कहता हूं- सब कर रहे हैं तो तुम क्या राजा हरिशचंद्र हो? फिर कहता हूं- बेटा , कर ले अब नौकरी। घर चला ले। देश बदलने का सपना छोड़। यहां तो सब ऐसे ही चलता है। तुम रहो या न रहो- देश ऐसे ही चलता रहेगा। इसलिए अब मुझे बड़ा चैनल -छोटा चैनल, बड़े पद या छोटे पद की चिंता ही नहीं होती। शायद लोग हंसे। लेकिन सच है कि मेरे मन बस यही भाव है- चाह गई, चिंता गई, मनुवा बेपरवाह। जिनको कछु न चाहिए, वो साहन के साह।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-7126332745572007545?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/7126332745572007545/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=7126332745572007545&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/7126332745572007545'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/7126332745572007545'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='आज तेरह बरस हो गए.............'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/TCb5oyl_OlI/AAAAAAAAAOI/YrtlwOYihYo/s72-c/sp.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-3247641501268958523</id><published>2010-05-04T22:22:00.000-07:00</published><updated>2010-05-04T22:23:42.319-07:00</updated><title type='text'>कांग्रेस क्यों झेल रही है ममता बनर्जी को ?</title><content type='html'>ममता बनर्जी ने कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया है। ममता ने बग़ैर लाग- लपेट के आरोप लगाया है कि कांग्रेस की नीयत ठीक नहीं है । वो सीपीएम को फायदा पहुंचा रही है। ये समझ में नहीं आता कि ममता बार –बार कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाती हैं। फिर भी कांग्रेस झेल रही है। जबकि कांग्रेस का दावा है कि मनमोहन सिंह की सरकार मजबूरी की नहीं मज़बूती की सरकार है। पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस पर आरोप लगाए हैं। लेकिन कांग्रेस की घिघ्घी बंधी हुई है। सोनिया गांधी के इशारे पर कभी अहमद पटेल मनाने जाते हैं तो कभी केशव राव चिरौरी करने जाते हैं। लेकिन ममता ने सबको एक ही लाठी से हांक कर भगा दिया।  &lt;br /&gt;कोलकाता और पश्चिम बंगाल के नगर निगमों के चुनाव को लेकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में तलवारें खिंच गईं। बंगाल में ममता की पिछलग्गू बनी कांग्रेस ज़्यादा सीटों की मांग करने लगी। लेकिन ममता ज़्यादा दरियादिली दिखाने के मूड में नहीं थी। उन्होने कांग्रेस को झिड़क दिया। कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी। इसके बाद ममता ने डंके की चोट पर एलान कर दिया कि राज्य में दोनों पार्टियों का गठबंधन टूट गया है। साथ ही ममता ने कई चौंकानेवाली बातें भी कह दीं। इन बातों को सुनकर ऐसा लगता है कि केंद्र में ममता और सोनिया गांधी की निभ कैसे रही है। &lt;br /&gt;ममता ने मीडिया के सामने आपना दिल खोल कर रख दिया। ममता ने दावा किया कि केंद्र में गठबंधन को बचाए रखने के लिए वो रोज़ ज़हर का घूंट पी रही हैं। ममता का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण को लेकर उनकी नीति साफ है। नंदीग्राम और सिंगूर के समय इसके लिए उन्होने हड़ताल भी की थी। लेकिन मनमोहन सरकार उनकी नीति के खिलाफ है। केंद्र की सरकार भी राज्य की वाम मोर्चे की सरकार की तरह काम कर रही है। अब ये समझ से परे हैं कि मनमोहन सरकार भूमि अधिग्रहण के लिए वाम मोर्चा की नीति पर चल रही है। कांग्रेस गुप-चुप तरीक़े से सीपीएम की मदद भी कर रही है। तो फिर ममता क्यों नीलकंठ बन हुई हैं। क्यों नहीं वो केंद्र से अलग हो जा रही हैं। मंत्रिमंडल से बाहर हो कर भी तो सरकार चलाई जा सकती है। या फिर वो मंत्री की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रही हैं। &lt;br /&gt;क्या वजह है कि ममता बनर्जी केंद्र में गठबंधन नहीं तोड़ पा रही हैं लेकिन राज्य में एक झटके से रिश्ते तोड़ने का एलान करती हैं। क्या राज्य की कांग्रेस और केंद्र की कांग्रेस अलग –अलग है । ममता बनर्जी ने जो अपनी भड़ास निकाली है, वो कांग्रेस के लिए ख़तरमाक संकेत है। ममता का आरोप है कि वो केंद्र में अपमानित हो रही हैं। मंत्रिमंडल में उनका कोटा पूरा नहीं किया गया। ममता की राजनीति करने की अपनी शैली है। ये शैली आक्रामक है। इसी शैली के तहत उन्होने कांग्रेस को याद दिलाना नहीं भूलीं कि केंद्र में कांग्रेस की अकेले की सरकार नहीं है। मनमोहन सिंह की इस सरकार को करूणानिधि और ममता बनर्जी ही आक्सिजन दे रहे हैं। वरना ये सरकार बेमौत मारी जाती। ममता का हुंकार ख़तरनाक संकेत देता है। ममता बेलौस होकर कहती हैं कि जब तक उनके आत्मस्मान पर चोट नहीं पहुंचती , तब तक मनमोहन सिंह की सरकार को कोई ख़तरा नहीं है। &lt;br /&gt;हैरानी इस बात की है कि ममता खुद अलग अलग बयान दे रही हैं। एक तरफ आरोप लगा रही हैं कि भूमि अधिग्रहण को लेकर केंद्र और वाम मोर्चा की सरकार में कोई अंतर नहीं है। दूसरा आरोप लगा रही हैं कि कांग्रेस सीपीएम का साथ दे रही है। तीसरा आरोप लगा रही हैं कि केंद्र में मंत्रियों का उनका कोटा पूरा नहीं हुआ। चौथा आरोप लगा रही हैं कि वो केंद्र की गठबंधन को बचाए रखने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही हैं। इसलिए सब कुछ सह रही हैं। फिर कहती हैं कि जब तक आत्मसम्मान पर चोट नहीं हुआ तब तक सरकार को कोई ख़तरा नहीं है। सवाल ये है कि पहले की सभी आरोपों को पलभर के लिए सच मान लिया जाए तो फिर आत्मसम्मान पर चोट पहुंचाने के और कौन से तरीक़े बचे हैं। क्या ममता इतनी नादान हैं कि उन्हे कुछ समझ में नहीं आ रहा। या उन्हे अच्छी तरह से मालूम है कि उनके समर्थन वापिसी से सरकार का बाल भी बांका नहीं होने वाला। समर्थन देने के लिए बहुतेरी पार्टियां बैठी हुई हैं। अगर वो सरकार से बाहर हो गई तो राज्य में उनका खेल ख़त्म हो जाएगा। जनता में जो भरोसा बना है कि राज्य सरकार की कान उमठेने के लिए ममता केंद्र पर जब तब दबाव डलवा सकती हैं। अगर वो गठबंधन और मंत्रिमंडल से बाहर हो गईं तो किस दम पर वो सीपीएम नेताओं को हूल देंगी।  &lt;br /&gt;दरअसल नगम निगम चुनाव में ममता बनर्जी ने सीट बंटवारों को जानबूझ कर मुद्दा बनाया। ये ममता बनर्जी की राजनीति का हिस्सा है। ममता बनर्जी नहीं चाहतीं कि राज्य में उनकी पिछलग्गू बनी कांग्रेस की ताक़त और हैसियत न बढ़े। ममता बनर्जी का इरादा आनेवाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कम से कम सीटें देने का है। ममता को मालूम है कि अगर नगर निगम चुनाव में उन्होने कांग्रेस को मनमर्ज़ी की सीटें दे दीं। तो फिर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हक़ से भी ज़्यादा सीटें मांगेंगी। इसके अलावा मनमर्ज़ी की सीटों के लिए सुब्रतो मुखर्जी से लेकर प्रणब मुखर्जी तक दबाव बनाएंगे। इसलिए ममता ने कांग्रेस को ज़ोर का झटका धीरे से दिया है। ममता को मालूम है कि कांग्रेस के बग़ैर वो अधूरी हैं। कांग्रेस को भी मालूम है कि ममता के बिना उसकी राजनीतिक हैसियत न के बराबर है। क़यास से ये लगाया जा सकता है कि नगर निगम चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच फिर से गोटी सेट हो जाएगी। क्योंकि विधानसभा चुनाव में दोनों को वोट प्रतिशत का खेल मालूम है। ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस से फिर हाथ मिलाएंगे। उन्हे तब आत्मसम्मान की चिंता नहीं होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-3247641501268958523?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/3247641501268958523/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=3247641501268958523&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3247641501268958523'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3247641501268958523'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='कांग्रेस क्यों झेल रही है ममता बनर्जी को ?'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-3287454294860119300</id><published>2010-04-10T05:01:00.000-07:00</published><updated>2010-04-10T05:04:17.237-07:00</updated><title type='text'>आक्रामक ममता बनर्जी को भी कोई नाथ सकता है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/S8BpLElv3LI/AAAAAAAAAKA/Fn9Gizr2uYg/s1600/mamta-banerjee.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 342px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/S8BpLElv3LI/AAAAAAAAAKA/Fn9Gizr2uYg/s400/mamta-banerjee.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5458478387304586418" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दूसरों के नाम में दम भरनेवाली तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी के भी नाक में कोई दम भर सकता है। ये बात अब साबित हो गई है। जादवपुर से तृणमूल कांग्रेस के सांसद कबीर सुमन ने ममता का जीना मुहाल कर दिया है। पहली बार नहीं है जब कबीर सुमन ने बीच बाज़ार में ममता की पगड़ी उछाली हो। हर बार ममता शर्मसार हुई हैं। लेकिन ममता इतनी लाचार हैं कि वो कबीर सुमन के ख़िलाफ कोई कड़ा फ़ैसला नहीं कर सकतीं। यहां तक कि न डांट सकती हैं और झिड़क सकती हैं। ममता बनर्जी अपने सांसद कबीर सुमन को लेकर केवल सुबक सकती हैं। वो अभी सबके सामने नहीं। अकेले में। हैरानी की बात है कि दूसरों को रूलाने का माद्दा रखनेवाली ममता बनर्जी इतनी लाचार क्यों हैं? आख़िर ये कबीर सुमन कौन सी बला है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जावपुर संसदीय क्षेत्र से इस बार के लोकसभा चुनाव में कबीर सुमन जीत कर आए हैं। उन्होने सीपीएम के दिग्गज सुजन चक्रवर्ती को लगभग 56 हज़ार वोटों से हराया है। जीत के अंतर को देखकर लग सकता है कि कबीर सुमन खेले खाए राजनेता हैं, जिन्होने सीपीएम को दिग्गज को हराया। इस दिग्गज की पश्चिम बंगाल में वैसी ही छवि है, जैसे की बिहार में शहाबुद्दीन या उत्तर प्रदेश में अतीक़ अहमद की है। लेकिन असलियत तो ये है कि कबीर सुमन कोई राजनेता नहीं हैं। पहली बार उन्होने चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से चुनाव जीत गए। दरअसल कबीर सुमन एक पत्रकार थे, एक रंगकर्मी हैं और एक गायक हैं। गायक के तौर पर पूरे पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय हैं। जब वो गाते हैं, तब ज़माना उन्हे ग़ौर से सुनता है। जब बांग्ला अख़बार के लिए पत्रकारिता करते थे, तब से उनकी ममता बनर्जी से जान-पहचान हुई। लेकिन सिंगूर- नंदीग्राम आंदोलन के समय कबीर सुमन और लोकप्रिय हुए। अपने गानों से उन्होने राज्य की वाम मोर्चा सरकार की बखिया उधेड़ दी। इस आंदोलन की अगुवाई ममता बनर्जी कर रही थीं। आंदोलन में कई पत्रकार, साहित्यकार, रंगकर्मी , नाट्यकर्मी भी शामिल थे। ममता ने लोकसभा का टिकट पकड़ाया और वो लोकप्रियता की ट्रेन पकड़कर दिल्ली पहुंच गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबीर ने फिर इस्तीफा दिया है। इससे पहले भी इस्तीफा दिया था। लेकिन इस बार माज़रा कुछ और है। जावपुर विश्वविद्यालय के छात्र नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे आपरेशन ग्रीन हंट का विरोध कर रहे थे। इसके लिए वो जगह- जगह पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इन छात्रों ने आपरेशन ग्रीन हंट का इसलिए भी विरोध किया क्योंकि पुलिस की गोलियों से विश्वविद्यालय के मेघावी छात्र अभिषेक की मौत हो गई। अभिषेक नक्सली हो गया था। नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन के समय वो सक्रिय रूप से भाग लिया। इसी दौरान वो नक्सिलयों के क़रीब आया। अपने प्रताप और ज्ञान से कुछ ही दिनों में किशनजी का ख़ास बन गया। अभी हाल ही में जब मिदनापुर में आपरेशन ग्रीन हंट के दौरान कोबरा की टीम और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई। उसमें विक्रम नाम के नक्सली के मारे जाने की ख़बर आई। ये विक्रम कोई और नहीं बल्कि अभिषेक ही था। नक्सलियों ने उसे विक्रम नाम दिया था।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्रों के इस आंदोलन में कबीर सुमन भी कूद पड़े। उन्होने भी छात्रों के साथ सुर में सुर मिलाकर आपरेशन ग्रीन हंट बंद करने की मांग कर दी। ये ज़िद उन्होने अपनी पार्टी की मुखिया ममता बनर्जी से भी कर दी। लेकिन ममता की मुश्किल ये कि सीपीएम और लेफ्ट ने पहले ही उन पर नक्सली समर्थक होने का आरोप लगाया है। अगर वो अपने सांसद की बात मानकर केंद्र से ऐसी कोई बात करती हैं तो साफ-साफ तौर पर साबित हो जाएगा कि वो नक्सिलयों से हमदर्दी रखती हैं। ऐसे में सीपीएम और लेफ्ट पार्टियां माइलेज लेने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेंगी। दूसरी परेशानी ये कि केंद्रीय गृह मंत्री बेहद ईमानदारी से नक्सलियों के ख़िलाफ़ आपरेशन ग्रीन हंट चलाए हुए हैं। उन्होने साफ तौर पर कहा है कि जह तक नक्सली हिंसा और हथियार छोड़ कर नहीं आते, तब तक उनसे कोई बातचीत नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़ाहिर है कि ममता बनर्जी अपने सांसद की बात नहीं मान सकती। सांसद भी अपनी बात से टस से मस होने को तायार नहीं। उन्होने एसएमएस से इस्तीफा भेज दिया। शायद लोकतंत्र में पहली बार किसी सांसद ने एसएमएस से इस्तीफा भेजा होगा। छात्रों की मीटिंग में उन्होने एलान कर दिया कि उन्होने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी। क्योंकि पार्टी नक्सिलयों के खिलाफ हो रही हिंसा को नहीं रूकवाना चाहती। शायद पहली बार ममता ने सार्वजनिक तौर पर अपनी झल्लाहट दिखाई। ममता ने अपने सांसद को सेंसलेस करार दिया। ममता ने अपनी मजबूरी को रोना रोया। ममता दुहाई दे रही हैं कि कबीर के भेजे में बुद्धि डालने के लिए वो दादा प्रणब मुखर्जी के दर पर भी गईं। लेकिन कबीर के भेजे में कुछ नहीं आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरानी इस बात की है कि जिस दादा से दीदी की नहीं बनती। वो उस दादा के पास क्या सोच कर गई ? पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे में भी दादा-दीदी ख़ूब झगड़े थे। दीदी का आरोप था कि सीपीएम को फायदा पहुंचाने के लिए दादा टिकट बंटवारे में खेल कर रहे हैं। चुनाव के बाद ऐसा क्या हो गया कि दादा सीपीएम को नुक़सान पहुंचाने वाले प्राणी बन गए ? दूसरी बात ये कि कबीर सुमन अगर बिफरते हैं तो क्या वो सरकार के ख़िलाफ बिफरते हैं? जवाब है नहीं। वो अपनी पार्टी में बग़ावत कर रहे हैं। अपनी पार्टी के मुखिया के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। फिर किस हैसियत से दीदी कबीर को लेकर दादा के पास गईं ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका जवाब फिलहाल दीदी के पास नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबीर सुमन शांत प्रजाति के प्राणी नहीं हैं। इससे पहले भी उन्होने एक बार इस्तीफा दिया था। इस्तीफे से दीदी के पसीने छूट गए थे। कबीर सुमन ने आरोप लगाया था कि तृणमूल कांग्रेस का हर छोटा बड़ा नेता घूसखोर हो गया है। अदना से अदना कार्यकर्ता भी काम के बदले में घूस खा रहा है। ममता ईमानदारी का ढोल बंला में पीट रही हैं। सभाओं और जलसों से ये साबित करने पर तुली हैं कि लेफ्ट फ्रंट की सरकार ने पिछले तीस सालों में पश्चिम बंगाल को बेच खाया है। ममता के इस मुहिम को उनके ही सांसद पलीता लगा रहे हैं। कबीर सुमन के बयान से ऐसा लगता है कि सरकार में शामिल हुए अभी तृणमूल कांग्रेस के जुमा-जुमा चार ही दिन हुए हैं और ये लोग अभी से ही देश को लूट रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विधानसभा चुनाव सिर पर है। आज कबीर सुमन चीख रहे हैं। साबित करने में लगे हैं कि जिस नक्सिलयों की मदद से दिल्ली में दीदी की पार्टी राज पाट कर रही है। आज उसी नक्सलियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। इस प्रताड़ना में ममता बनर्जी भी शरीक हैं। वो चाहें तो मनमोहन सरकार को रोक सकती हैं। लेकिन सत्ता की मलाई खाने में लगी ममता को अब नक्सिलयों की फिक्र कहां। दूसरी तरफ , सुमन ये भी साबित करने में लगे हैं कि तृणमूल कांग्रेस के नेता भ्रष्ट हो गए हैं। मंत्री से लेकर संतरी तक रिश्वत खा रहा है। ऐसे में विधानसभा चुनाव में ममता को अपनी साख बचाए रखना बेहद मुश्किल लग रहा है। क्योंकि सीपीएम उनके ही सांसद के बयान को लेकर जनता के बीच जाएगी। हंसते हुए कहेगी कि ये आरोप सीपीएम का नहीं है। ये आरोप उस आदमी का है, जो वर्षों तक ममता के साथ रहा है। ममता की पार्टी का सांसद रहा है। ऐसे मं ज़रूरी है कि बंगाल जीतने का सपना पालनेवाली ममता समय रहते कबीर को क़ाबू कर लें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-3287454294860119300?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/3287454294860119300/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=3287454294860119300&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3287454294860119300'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3287454294860119300'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='आक्रामक ममता बनर्जी को भी कोई नाथ सकता है'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/S8BpLElv3LI/AAAAAAAAAKA/Fn9Gizr2uYg/s72-c/mamta-banerjee.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-5223575526654170263</id><published>2010-01-18T03:50:00.001-08:00</published><updated>2010-01-18T04:04:51.533-08:00</updated><title type='text'>सोनिया का त्याग मजबूरी थी और ज्योति बाबू का त्याग आदर्श</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/S1ROVR_OTlI/AAAAAAAAAJ0/ijzKd71IACk/s1600-h/jb-labour-conf.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 334px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/S1ROVR_OTlI/AAAAAAAAAJ0/ijzKd71IACk/s400/jb-labour-conf.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5428049578401091154" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि ज्योति बसु को इतिहास किस तरह से याद करेगा। क्योंकि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु के व्यक्तित्व बहुत सारे आयाम हैं। इनमें से किसी एक को केंद्र में रखकर ज्योति बसु का ख़ाका तैयार करना आसान नहीं है। ज्योति बसु के व्यक्तित्व, प्रशासन और पार्टी में में नेतृत्व क्षमता का आंकलन करना सहज नहीं है। लेकिन इतना तो तय है कि इतिहास के पन्नों में वो प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकरानेवाले पहले और आख़िरी राजनेता के तौर पर याद किए जाएंगे। वैसे प्रधानमंत्री की कुर्सी तो सोनिया गांधी ने भी ठुकराई। लेकिन उसकी तुलना ज्योति बसु से नहीं की जा सकती। क्योंकि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री को लेकर विरोध था। सोनिया ने बेशक़ प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकराई हो। लेकिन उन्हे मालूम था कि इस पद के लिए उनके सामने कई ब्रेकर हैं। कभी पार्टी के अंदर ही विदेशी मूल का मुद्दा झेल चुकी सोनिया गांधी विपक्ष के भी निशाने पर थीं। लेकिन ज्योति बाबू के सामने कोई अवरोध नहीं था। वो चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे। दुनिया कुर्सी के पीछे भागती है और ज्योति बसु के पीछे प्रधानमंत्री की कुर्सी भाग रही थी। लेकिन पार्टी के अनुशासन में बंधे ज्योति बसु ने मोह तजना ही बेहतर समझा। &lt;br /&gt;देश अभी खिचड़ी सरकार का अनुभव ले रहा था। इस तरह का अनुभव देश ने मोरारजी देसाई और चरण सिंह के भी दौर में देखा था। लेकिन 1996 का दौर काफी बदल चुका था। देश ने दो और समाजवादियों की खिचड़ी सरकार का अनुभव हासिल कर लिया था। विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों से जी खट्टा हो चुका था। देवेगौड़ा की मजबूरियों को भी लोगों ने देखा। ऐसे में सबको समझ में आया कि अगर ज्योति बसु के हाथ में देश की कमान दी जाए तो वो आसानी से सरकार चला लेंगे। लोगों को ये भरोसा उनके मुख्यमंत्रित्व काल से हो गया था। जब कई पार्टियों की मिल जुली सरकार कुछ ही महीने में भरभरा जाती थीं। तब ये बंगाल का लाल बड़ी शान से कई पार्टियों की बाहें थामें नया रेकॉर्ड बना रहा था। ये हुनर ज्योति बसु में ही था कि आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक औऱ सीपीआई को साथ लेकर बग़ैर किसी टांय-टांय के सरकार चला लें। ज्योति बसु की इस इमेज के लिए प्रमोद दास गुप्ता, सरोज मुखर्जी, शैलेन दासगुप्ता औऱ अनिल बिश्वास ने भी ख़ूब मेहतन की। ज्योति बसु का क़द संगठन से भी बड़ा बनाने की कोशिश हुई। लेकिन जिस पार्टी ने ज्योति बसु की इमेज पार्टी से भी बड़ा करने के लिए दिन- रात एक की, उसी पार्टी ने रातों –रात अपने महानायक दो देश की सत्ता की सबसे बड़ी कुर्सी ठुकराने को कहा। ज्योति बसु में भी इतना सत्साहस था कि उन्होने पार्टी के आदेश को सिर माथे से लगाया। लेकिन साथ ही चेता भी दिया कि पार्टी ने ऐतिहासिक भूल की है। &lt;br /&gt;ज्योति बसु की फितरत थी सत्ता से टकराने की। उनकी ये ख़ासियत थी कि सत्ता से टकराने के बावजूद सत्ताधारी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनसे सलाह लेने के लिए चल कर आते भी थे। ज्योति बसु से पहले और बाद में ये सुख किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को नसीब नहीं हुआ है। देश में चाहें इंदिरा गांधी की सरकार रही हो, राजीव गांधी की रही हो, नरसिम्हा राव की रही हो या फिर वीपी सिंह या चंद्रशेखर की सरकार रही। सबको कभी न कभी ज्योति बसु के पास चल कर आना ही पड़ा है।&lt;br /&gt;टकराने की ये आदत ज्योति बसु की बहुत पुरानी रही है। 1957 से लेकर 1967 तक के दौरान टकराने की शैली ने उनका क़द बाक़ी नेताओं से बड़ा कर दिया था। कांग्रेस से अलग होने के बाद बनी मिली जुली सरकार में उन्हे पहली बार मंत्री बनने का सुख मिला। पद मिला श्रम मंत्री का। श्रम की अहमियत को ज्योति बाबू ने ख़ूब समझा। मंत्री होने के बावजूद ज्योति बाबू ने उद्योगपतियों को नकले कस दी। मेहनतकश मज़दूरों के हक़ की लड़ाई लड़ी। ज्योति बाबू की पहचान घेराव मंत्री की हो गई। इसके बाद अगली सरकार में उनका विभाग बदला दिया गया। उन्हे परिवहन मंत्री बनाया गया। परिवहन मंत्री बनने के बाद कोलकाता ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का नक्शा बदलने की बीड़ा उठाया। राज्य आज भी उस परिवहन आंदोलन को याद करता है। सोच आगे की थी इसलिए सत्ता से टकराने में कभी हिचकिचाए नहीं। राजीव गांधी सरकार से हल्दिया पेट्रो केमिकल्स के लिए मदद मांगी। अपने समय की दूरगामी और अतिमहात्वाकांछी अभियान था। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने राज्य की वान मोर्चा सरकार को मदद करने से मना कर दिया। इसके बाद ज्योति बाबू ने जो कर दिखाया, उसे देखकर कांग्रेस भी शर्मिंदा हुई। इस परियोजना के लिए ज्योति बसु ने लोगों से मदद की अपील की। लोगों ने ख़ून बेचकर सरकार को पैसा दिया। सरकारी और ग़ैर सरकारी कर्मचरारियों के एक दिन की पगार दी। आख़िरकार हल्दिया पेट्रोकेमिकल बन कर तैयार हो गया। ये अलग बात है कि वो ज्योति बाबू के सपने को साकार नहीं कर सका। &lt;br /&gt;टकराने की इसी आदत से बंगाल मीडिया का एक बड़ा तबका उनसे खुश नहीं रहता था। ज्योति बसु ने कभी इसकी परवाह भी नहीं की। ज्योति बसु का मानना था कि उनका राफ्ता जनता से है। ऐसे में उन्हे किसी को माध्यम बनाने की ज़रूरत नहीं है। ज्योति बसु का यही बेबाकीपन मीडिया का सालता रहा। मीडिया ने ज्योति बसु की आलोचना करने का कोई मौक़ा गंवाया भी नहीं। अस्सी के दशक के आख़िरी दिनों की बात है। बंगाल के एक बहुत बड़े अख़बार घराने के एक पत्रकार संस्थान से अलग होने के बाद अपना एक अख़बार शुरू किया। धीरे-धीरे अख़बार चल पड़ा। इस अख़बार ने नारा ही दिया था कि वो केवल भगवान से डरता है। अख़बार ने सरकार, सीपीएम और ख़ास तौर पर ज्योति बसु को निशाना बनाना शुरू किया। आज की एक महिला केंद्रीय मंत्री तबके कांग्रेस नेता सुब्रतो मुखर्जी नामक बरगद के सहारे बेल बनकर फल फूल रही थीं। अख़बार का उस नेत्री के साथ अच्छा राफ्ता बन गया। बात जब हद से आगे बढ़ गई तब ज्योति बसुने ख़ुलासा किया कि बड़े घराने के अख़बार समह से निकलने के बाद वो पत्रकार-संपादक महोदय उनके पास मदद मांगेन आए थे। उन्होने उसे सस्ती दर पर न केवल सरकारी ज़मीन दी। बल्कि प्रिटिंग प्रेस खोलने के लिए बैंक से लोन दिलाने में मदद भी की। ज्योति बसु के इस बयान के बाद अख़बार ने माना कि वो मुख्यमंत्री के पास मदद के लिए गया था। लेकिन पत्रकारिता के उद्देश्य से न भटकने की बात की। वो अख़बार 1987 से लगातार हर बार वाममोर्चा के हारने और महिला नेता के मुख्यमंत्री बनने की मुहिम छेड़ता है। ज्योति बसु के निधन के बाद भी उस अख़बार ने पहले पन्ने पर ये सवाल खड़ा किया कि सीपीएम को अब आक्सिजन कौन देगा ?  क्योंकि ज्योति बसु के आक्सिजन से पार्टी चलती थी। ज्योति बसु भी आख़िरी के सत्रह दिनों आक्सिजन के सहारे ज़िंदा रहे। &lt;br /&gt;मीडिया के इसी रोल से ज्योति बसु लगातार चिढ़ते रहे। एक बार सार्वजनिक मंच से उन्होने मीडिया के लिए अपशब्द कहे थे। मीडिया को बहुत बाद में अहसास हुआ कि उन्होने संस्कृत में उन्हे अपशब्द कहे हैं। एक बार ऐसे ही एक महिला नेता राइटर्स बिल्डिंग पहुंच गई। तब वो केंद्र में राज्य मंत्री थीं। सचिवालय पहुंचकर उन्होने हंगामा शुरू कर दिया। एक सीनियर आईपीएस अफसर ने रोकने की कोशिश की तो मंत्री का हूल देते हुए उसे थप्पड़ मार दिया। मीडिया का एक भी कैमरा मार खाते अफसर के लिए नहीं चमका। लेकिन जब उस अफसर ने महिला मंत्री की पिटाई शुरू की तो दनादन फ्लैश चमकने लगे। आपा खो चुके अफसर ने मीडिया को भी नहीं बख़्शा। बहुतों के हाथ –पैर टूटे। मीडिया ने सरकार से माफी मांगने को कहा। दी –तीन दिनों तक धरना-प्रदर्शन भी किया। लेकिन सरकार ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया।  &lt;br /&gt;ज्योति बाबू ने व्यक्तिगत जीवन में समझौता नहीं किया। ज्योति बसु ने कभी धर्म-कर्म में यक़ीन नहीं किया। वो धर्म के विरोधी नहीं थे। लेकिन कट्टर धार्मिकता के घोर विरोधी थे। एक बार उनकी पत्नी कमला बोस ने तारकेश्वर जाकर पूजा करने की ठानीं। ज्योति बसु ने उन्हे रोका नहीं। लेकिन सरकारी गाड़ी देने से मना कर दिया। कमला बसु को लोकल ट्रेन से तारकेश्वर जाकर पूजा करनी पड़ी। अख़बारों ने इस बात को ख़ूब उछाला कि कॉमेरेड ज्योति बसु की पत्नी ने पूजा की। लेकिन किसी अख़बार ने ये नहीं छापा कि मुख्यमंत्री की पत्नी लाल बत्ती वाली या किसी और गाड़ी से तारकेश्वर क्यों नहीं गई ?  &lt;br /&gt;ज्योति बाबू पर मीडिया ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का कोई मौक़ा भी नहीं छोड़ा। सबेस पहले तो ये अभियाना चलाया गया कि पूरे राज्य को कॉमरेड बनाने का बीड़ा उठानेवाले ज्योति बसु अपने इकलौते बेटे को कॉमेरड क्यों नहीं बना पाए ? चंदन बसु क्यों उद्योगपति बन गए ? &lt;br /&gt;हद तो तब हो गई जब राज्य के लोक निर्माण मंत्री और आरएसपी नेता जतिन चक्रवर्ती ने आरोप लगा दिया कि ज्योति बसु की जानकारी में बंगाल लैंप घोटाला हुआ है। मीडिया महीनों बसु के पीछे पड़ा रहा। रोज़ नए-नए घोटाले खोजे जाने लगे। लेकिन बसु ने सफाई नहीं दी। विधानसभा के अंदर तब के कांग्रेस नेताओं (अब के तृणमूल नेताओं ) ने हंगामा किया। ज्योति बसु सयंत रहे। लेकिन जब कांग्रेस विधायकों का शोर कम नहीं हुआ तो उन्होने सदन के अंदर साफ-साफ कहा कि अंदर आपलोग मेरे बेटे के लिए हंगामा करते हो। बाहर उससे दोस्ती निभाते हो। उन्होने सख़्त लहज़े में कहा कि उन्हे मालूम है कि चंदन बसु के साथ कौन-कौन नेता कहां शाम गुज़ारता है। लेकिन वो बोलेंगे नहीं। इतना सुनता ही विधानसभा में सन्नाटा पसर गया। एक दिन ज्योति बसु ने जतिन चक्रवर्ती को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया। जतिन उर्फ जैकी दा ज्योति बाबू के अच्छे दोस्तों में से थे। मरने से पहले उन्होने एक इंटरव्यू में साफ कहा कि बंगाल लैंप घोटाले में ज्योति बाबू का कोई लेना –देना नहीं था। उनका बेटा टेंडर भरने आया था। वो उसे बचपन से जानते हैं। उन्होने चंदन बसु को टेंडर दिलाने में मदद की। लेकिन ये सब ज्योति बसु की जानकारी या निर्देश के बग़ैर हुआ। यानी जो दाग़ मीडिया ने ज्योति बाबू पर लगाए थे, उसे जैकी दा ने जाते-जाते साफ कर दिया। &lt;br /&gt;ज्योति बाबू उत्तर चौबीस परगना के सतगछिया विधानसभा से लगातार चुनाव जीतते रहे। ममता बनर्जी ने कई बार उन्हे अपने ख़िलाफ लड़ने के लिए दक्षिण कोलकाता बुलाया। लेकिन ज्योति बाबू ने इसका जवाब देना भी ज़रूरी नहीं समझा। ममता ने अपनी सबसे ख़ासम ख़ास सहेली सोनल को सतगछिया से मैदान में उतार दिया। सोनल के उम्मीदवार बनने के बाद ज्योति बसु ने बयान दिया कि अब वो प्रचार करने भी नहीं जाएंगे। अब जनता को तय करना है कि वो किसे अपना नुमाइंदा बनाना चाहती है। ममता और कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं ने सतगछिया में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया। नतीजे चौंकाने वाले आए। इतनी कोशिश के बाद भी ममता की ख़ास सहेली बहुत भारी मतों के अंतर से चुनाव हार गई थीं। &lt;br /&gt;भारतीय राजनीति में कई कारणों से ज्योति बाबू को हमेशा याद किया जाएगा। जिस राज्य में जहां कभी कांग्रेस का एक छत्र राज होता था। उस राज्य से कांग्रेस का नामो निशान मिट गया। कांग्रेस को वो राज हासिल करने के लिए ममता बनर्जी का सहारा लेना पड़ रहा है। ये वही ममता हैं, जो कभी बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं। ज्योति बाबू एक ईमानदार राजनेता और मुख्यमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे, जिन्होने एक पैसा भी अपने लिए नहीं बनाया। ज्योति बाबू प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकराने के लिए भी याद किए जाएंगे। क्योंकि उनका त्याग यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से बिलकुल अलग था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-5223575526654170263?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/5223575526654170263/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=5223575526654170263&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/5223575526654170263'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/5223575526654170263'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='सोनिया का त्याग मजबूरी थी और ज्योति बाबू का त्याग आदर्श'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/S1ROVR_OTlI/AAAAAAAAAJ0/ijzKd71IACk/s72-c/jb-labour-conf.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-690162473496267518</id><published>2009-11-17T23:16:00.000-08:00</published><updated>2009-11-17T23:18:21.180-08:00</updated><title type='text'>नोएडा से चलनेवाली मेट्रो के क़िस्से</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SwOfsX8cu9I/AAAAAAAAAJI/KS7zu8F6fUU/s1600/inside-transit.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 245px; height: 330px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SwOfsX8cu9I/AAAAAAAAAJI/KS7zu8F6fUU/s400/inside-transit.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5405339562465344466" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मेट्रो रेल इनदिनों नोएडा भी आने जाने लगी है। इसी के साथ मेट्रो में तरह तरह के प्रजाति के प्राणियों के दर्शन होने लगे हैं। उनकी हरकतें कई बार हंसाती हैं, कई बार गुदगुदाती हैं और कई बार खीज पैदा करती हैं। नियमित मेट्रो में सफर के दौरान कई बातें अक्सर मैंने नोट की है, जिसे मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं। &lt;br /&gt;मेट्रो रेल शुरू होते ही नोएडा के लोगों को अचानक लगा कि वो अब अमेरिका और इंग्लैंड के वासी हो गए हैं। सिटी सेंटर से मेट्रो रेल जब रवाना होती है तब उसमें कई तरह की सवारी होती है। कई ऐसे परिवार होते हैं, जिनके लिए मेट्रो से सफर करना हवाई जहाज़ के बराबर है । इनमें मध्यम वर्गीय परिवार है, निम्न मध्यम वर्गीय भी है और उच्च वर्गीय भी। सब एक साथ एक ट्रेन के एक कोच में। बस कपड़े लत्ते से फर्क़ कर लीजिए। उच्च मध्यम वर्गीय के पुरूष कैपरी, बारमुडा या फिर ट्रैक सूट में। हाथ में अंग्रेज़ी को कोई मोटी सी उपन्यास। महिलाएं जींस टीशर्ट के अलावा सलवार कुर्ता या फिर साड़ी में लखदख। सम कुछ चमचमाती हुई। उंगलियों में हीरे की कई सारी उंगुठियां। गले में चमकता हीरा। बातचीत में हिंदी के शब्दों से नफरत। बोटनिकल गार्डन से ऐसे ही एक बुज़ुर्ग, एक युवा, एक युवती और दो बूढ़ी महिलाएं। रेल के पहले कोच में इंटर करते हैं। बाई तरफ बोर्ड लगा है- विकलांग, बुजुर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षित। इस तरह की आरक्षित वाली कई सीटें हैं। ये सीटें लगभग खाली हैं। लेकिन उनकी नज़र जाती है अनारक्षित सीटों पर। सीट पर कोई दैनिक आफिस यात्री बैठा है। बुज़ुर्ग उससे कहता है – प्लीज़ , नाऊ यू गेट अप। उसने पूछा –क्यों? जवाब- कॉज़, आई एम ओल्ड यार। जस्ट सी, व्हाट रिटेन आन योर बैक सीट- प्लीज आफर दिस सीट हू नीड। अंग्रेज़ी में अकबकाया वो दैनिक यात्री खड़ा हो जाता है और अंग्रेज़ी पढ़ने और पढ़ाने वाले सारे लोग एक एक करके सबको खड़ा कर बैठ जाते हैं। अब इनकी बातचीत शुरू होती है। आई जस्ट पार्कड माई कार एट रजिंदर प्लेस। वी ओल्ड पिपुल कैन अल्सो इंजोय द राइड न। ये सुनकर युवती खिलखिला पड़ती है। संभवत ये युवती उनकी बहू या बेटी है।  तभी फ्रेंच कट युवक अपने ब्लैक बेरी से फोन करता है- ओह पापा- फक। आई फॉरगेट टू कैरी में कैम। यू डू वन थिंग । व्हाट विच कैमरा ?  पापा, यू आर सो डंब। यू रिमेंमबर दैट नाइट वेन आई वाज़ स्लीपिंग एंड यू टोल्ड मी दैट यू गॉट द कैमरा। आई कैप्ट इन योर वार्डरोब। ओह , या या । दैट्स राइट। प्लीज़ कीप विद यू । आई वैल टेक इट लेटर आन। बाई । अब बारी है बूढ़ी महिलाओं की । सी वी आर गोइग बैक टू होम। लैट्स गो टू बाराखंबा । वी वैल हैव सम समोसाज़। दैट ब्यॉय मेक वैरी टैस्टी समोसाज़। एंड यू नो दे सर्व सिज़लिंग सॉस चटनीज़ अल्सो। लेट्स गो देयर। बुज़ुर्ग ने हामी भर दी। &lt;br /&gt;इसी कोच में नोएडा के कुछ मध्यम परिवार के लोग हैं और कुछ मनचले लड़के भी। कपड़े –लत्तों से लड़के काफी मार्डन लग रहे हैं। लेकिन सबके जूते एक जैसे हैं। इन लड़कों की नज़र अचानक एक विदेशी जोड़े पर पड़ गई। इन आठ दस लड़कों ने लड़के-लड़की को फोटो खिंचाने के लिए धर लिया। वो चीख रहे हैं- हे वाट यू आर डूइंग। डोट टच मी। कीप अवे। छोरे चीख रहे हैं- भइइ, फोटू ही तै खिचवाणी है। सब एक साथ ठहाके भी मार रहे हैं। सारे लोग देख रहे हैं। लेकिन कोई जा नहीं रहा। बस सब फुसफुसा रहे हैं- नवादा –होशियारपुर के जाट गूर्जर के छोरे होंगे। तब तक ये लड़के दोनों पर काबू कर लेते हैं और दनादन कई फोटो खींच लेते हैं। सबेस ज़्यादा फोटो लड़की के साथ खिंचवाई गई। फिर वो सेक्टर 18 के स्टेशन पर फतर गए। &lt;br /&gt;एक परिवार मध्यम वर्गीय है। देख के लगता है कि खाने पीने की कमी नहीं होगी। ये परिवार मेट्रो की सुंदरता की तारीफ सुरू कर देता है। इस अंदाज़ में मेट्रो के पीआरओ भी तारीफ नहीं कर पाएंगे। देख भाई, पिलाटफारम कित्ता चमक रहा है सै। भाई, साफ सफाई कराण वास्ते लोगण को लगा रखा सै। ई दरवज्जा ते देख णा, कोई दब दुबा न जाव्वै। &lt;br /&gt;इन गप्प सड़ाक्कों के बीच ट्रेन मयूर विहार मेट्रो स्टेशन पहुंच जाती है। सूट-बूट और ब्रीफकेस के साथ सैकड़ों लोग सवार होते हैं। ट्रेन में अब तिल रखने की ज़रूरत नहीं। बस जो जहां है, वहीं खड़ा है। टस से मस नहीं हो सकता। ट्रेन अब यमुना बैंक से आगे बढ़ चुकी है। बीच के किसी स्टेशन से सवार हुए तीन चार लड़के एक दूसरे की ज्ञान बढ़ाने में लग जाते हैं। एक- यहीं से मेट्रो का केबल चोरी हो गया था। दूसरा- अबे फेंक मत। तुझे कैसा पता ?  पहली बार तो तू हम लोग के साथ जा रहा है। पहला- नहीं यार, पेपर में ख़बर आई थी। चोरों ने केबल चोरी कर ली थी। पूरी देश की अर्थवव्यस्था गड़बड़ा गई थी। दूसरा- देश की अर्थव्यवस्था कैसे गड़बड़ाई बे?  तेरे को कैसे मालूम?  पहला- अर्थिंग का केबल चोरी हुआ था न। इंद्रप्रस्थ स्टेशन आने तक अब सारे लोगों की आवाज़ दब जाती है। सुनाई देता केवल शोर। भई, थोड़ा आगे बढ़ो। घुसने तो दो। हां भई, उतर जाना प्रगति मैदान । रोक थोड़ी न रखा है। थोडा और आगे खिसको। पीछे वाला अलग आवाज़ लगा रहा है- क्या आपको प्रगति मैदान उतरना है ?  नहीं तो फिर आग क्यों खड़े हैं?  पीछे जाइए। उतरने दीजिए। मेट्रो की ये ट्रेन द्वारका की ओर चल पड़ती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-690162473496267518?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/690162473496267518/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=690162473496267518&amp;isPopup=true' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/690162473496267518'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/690162473496267518'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='नोएडा से चलनेवाली मेट्रो के क़िस्से'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SwOfsX8cu9I/AAAAAAAAAJI/KS7zu8F6fUU/s72-c/inside-transit.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-74583637887533765</id><published>2009-08-13T03:09:00.000-07:00</published><updated>2009-08-13T03:15:36.206-07:00</updated><title type='text'>मीडिया ने देश में क्यों फैलाया स्वाइन फ्लू का डर ?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SoPnu8QkTlI/AAAAAAAAAJA/3Sr0pcZ57mE/s1600-h/swine+flu.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SoPnu8QkTlI/AAAAAAAAAJA/3Sr0pcZ57mE/s400/swine+flu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5369389974391377490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जिसे भी हल्का सा बुख़ार हो, बदन में दर्द हो, एक –दो बार उल्टी हो गई हो, आंखों में जलन हो, खांसी हो रही हो और हो सकता है कि नाक भी बह रही हो- पक्का मानिए स्वाइन फ्लू हो गया है। इन लक्षणों को डॉक्टर बेशक़ स्वाइन फ्लू न मानें लेकिन हमारी मीडिया ने इन लक्षणों को स्वाइन फ्लू मान लिया है। इस देश में कुछ अख़बारों और न्यूज़ चैनलों ने स्वाइन फ्लू का ऐसा हौव्वा खड़ा किया है, मानों पूरे देश में महामारी फैल गई हो। हर आदमी डरा सा नज़र आता है। इन लक्षणों में एक भी लक्षण दिखते ही वो डॉक्टरों के पास भागा-भागा जाता है सिर्फ ये पता लगाने के लिए उसे स्वाइन फ्लू है या नहीं? &lt;br /&gt;बीते शुक्रवार को बेटे को बुखार हुआ। पेट में दर्द भी था। एक दो बार उल्टी- दस्त की शिकायत भी हो चुकी थी। इस तरह से वो पहले भी बीमार पड़ता था। मैं उसे चैरीकॉफ और NICE सिरप देता था। वो ठीक हो जाता था। इस बार मैंने इन दवाओं को खुद देने का ज़ोखिम नहीं उठाया। डॉक्टर के पास ले गया । डॉक्टर ने फिर यही दवाएं लिखीं। मैंने डॉक्टर से परेशान होकर पूछा कि लक्षण तो स्वाइन फ्लू से मिलते –जुलते हैं। तो फिर आप टेस्ट क्यों नहीं करते ? डॉक्टर ( जो मेरे घनिष्ठ मित्र भी हैं) ने कहा कि ज़रूरत पड़ी तो जांच भी कर लूंगा। मंगलवार तक बेटा ठीक हो गया। मंगलवार को ही ये लक्षण मुझमें दिखने लगे। एक अंतर ये था कि बदन में बहुत दर्द था। मैं फिर उसी डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने वाइरल की रूटीन दवाएं दीं। मैं भी एक दो दिन में ठीक हो गया। लेकिन इन दो –चार दिन मैं स्वाइन फ्लू के आतंक से परेशान रहा। &lt;br /&gt;अब नज़ारा सरकारी अस्पताल का। रविवार को केंद्रीय गृह स्वास्थ्य मंत्री श्री ग़ुलाम नबी आज़ाद का बयान आ गया कि कोई भी प्राइवेट अस्पताल जांच से मना नहीं कर सकते। मैंनें अपने डॉक्टर को ये बताया। वो मुस्कुराए। बोले – मीडिया का होकर भी नेताओं का बयान नहीं समझते। क्या किसी मंत्री के कह देने भर से इलाज शुरू हो जाएगा। हम क्या कर सकते हैं- हद से हद सबसे पहले आशोलिशन वार्ड बना देंगे। नर्सों और डॉक्टरों को ट्रेनिंग दे देंगे। लेकिन टेस्ट के लिए जो किट चाहिए – वो कहां से आएगा ? वो हमें केवल सरकार ही दे सकती है। अभी तक ये सरकार ने हमें ये नहीं बताया है कि एक किट पर कितना ख़र्च आएगा ?  क्या सरकार इस बीमारी को महामारी मानकर कोई सब्सिडी देगी ?  अभी तक सरकार से किसी निजी अस्पताल का इस बाबत कोई तालमेल नहीं हुआ है। फिलहाल इसका टेस्ट केवल सरकारी अस्पतालों में ही हो सकता है। अब देखिए नोएडा का सरकारी अस्पताल। &lt;br /&gt;नोएडा के सेक्टर 39 का सरकारी अस्पताल। दिल्ली के सरकारी अस्पताल इसके सामने फोर्टिस या अपोलो और मैक्स की तरह नज़र आते हैं। अस्पताल में भारी भीड़। इतनी भीड़ शायद कभी होली – दीवाली के समय ट्रेन के लिए होती होगी। अस्पताल में ही पता चला कि वैसे तो आम तौर पर इस अस्पताल में पास-पड़ोस के गांवों के लोग दिखाने आते हैं। पहली बार इस अस्पताल परिसर में बड़ी-बड़ी गाड़ियां और बड़े लोग नज़र आ रहे हैं। जान-पहचान निकालने के बाद चौकानेवाले तथ्य सामने आए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि सुबह 9 से 11 बजे के बीच वो अमूमन 700 मरीज़ों को देख रहे हैं। सबकी ज़िद है कि स्वाइन फ्लू टेस्ट करो। लक्षण सबके सामान्य वायरल के हैं। अस्पताल में स्वाइन फ्लू जांचने के लिए केवल 22 किट हैं। इन 22 किट में से किसको-किसको जांचा जाए। किट ख़त्म हो जाए तो फिर कहां से आए। लिहाज़ा डॉक्टरों ने जुगाड़ निकाल लिया है। अभी तक ज़्यादातर मरीज़ों को नहीं मालूम कि इसकी जांच कैसे होती है। डॉक्टर अपने हिसाब से जाच कर मरीज़ों को संतुष्ट कर देते हैं। &lt;br /&gt;आख़िर , हमारे देश में स्वाइन फ्लू को लेकर इतना भय क्यों हैं ? ये मीडिया की देन है और मीडिया अपनी इस नकारात्मक भूमिका से बाग भी नहीं सकता। हर एक घंटे पर ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी- अभी –अभी पुणे में स्वाइन फ्लू से 1 और की मौत। ये लाल पट्टी देख-देखकर लोगों का लाल खून सफेद पड़ गया है। तरह –तरह के डॉक्टरों को पकड़ कर स्टूडियों में बिठा रखा है। बताते कम हैं और डराते ज़्यादा है। ये डॉक्टर और चैनल ये नहीं बताते कि जहां से बीमारी शुरू हुई, वहां कितने लोग मरे। कितनी बीमार हुए और कितने ठीक हुए। अगर ये बता दिया को दुकान नहीं बंद हो जाएगी? &lt;br /&gt;स्वाइन प्लू की शुरूआत अमेरिका से हुई। मेक्सिको से शुरू हुई यह बीमारी अब तक दुनिया के 167  देशों में  फैल चुकी है। अब शुरूआत अमेरिका से । अमेरिका में लगभग 6500 लोगों को स्वाइन फ्लू हुआ। इस फ्लू की वजह से लगभग 436 लोगों की मौत हुई। यानी 6064 लोग इस स्वाइन फ्लू से बच कर निकले। अर्जेटीना में 7 लाख 60 हजार लोगों को स्वाइन फ्लू हुआ। केवल 337 लोगों की मौत हुई। संक्रमण और मौत के बीच का अंतर देखिए। आस्ट्रेलिया में करीब 25 हजार लोगों को स्वाइन फ्लू है। केवल 85 लोगों की मौत हुई है। ब्रिटेन में एक लाख से ऊपर लोगों को ये बीमारी हुई है और केवल 36 लोगों की मौत हुई है। भारत में अभी स्वाइन फ्लू केस की संख्या एक हज़ार के पार भी नहीं हुई है। मौत की भी संख्या 17 है। फिर भी हाय तौबा। आख़िर इस भय का वातावरण पैदा करने वाले कौन लोग हैं ? इससे उनके क्या फायदा है ? किसी को डराने का सुख तो केवल सैडिस्ट नेचर में होता है। क्या इस नेचर के लोग भय का माहौल पैदा कर रहे हैं ? या फिर इसके पीछे विशुद्ध धंधे और मुनाफे का खेल है। डराओ और पैसे बनाओ ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-74583637887533765?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/74583637887533765/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=74583637887533765&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/74583637887533765'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/74583637887533765'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='मीडिया ने देश में क्यों फैलाया स्वाइन फ्लू का डर ?'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SoPnu8QkTlI/AAAAAAAAAJA/3Sr0pcZ57mE/s72-c/swine+flu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-2011994513914531288</id><published>2009-07-03T06:28:00.000-07:00</published><updated>2009-07-03T06:31:30.812-07:00</updated><title type='text'>रेल बजट से साबित हुआ ममता और लालगढ़ का रिश्ता</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Sk4ICru7Q9I/AAAAAAAAAIw/Mt5Yqesaq_Q/s1600-h/Mamta_Banerjee.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 304px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Sk4ICru7Q9I/AAAAAAAAAIw/Mt5Yqesaq_Q/s400/Mamta_Banerjee.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354225849182405586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट को झटका देने का तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और रेल मंत्री ममता बनर्जी कोई भी मौक़ा नहीं छोड़ रही। चाहें इसके लिए उन्हे रेल बजट की ही आड़ क्यों न लेनी पड़े। इसमें कोई शक़ नहीं कि तैंतीस साल बंगाल में राज कर रहे लेफ्ट फ्रंट को ममता बनर्जी लगातार पानी पिला रही हैं। हालिया लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा का क़िला ढ़हाने के बाद ममता ने नगरपालिकाओं के भी चुनाव में वाम मोर्चा को पटखनी दी हैं। लेकिन वाम मोर्चा को हाशिए पर लाने और मुख्यमंत्री बनने की छटपटाहट में रेल बजट का इस्तेमाल करना कहां तक सही है। &lt;br /&gt;रेल मंत्री के रेल बजट को ग़ौर से देखिए- पता चलेगा कि ममता ने कितने प्यार से अपने विरोधियों की रेल बनाई है। ममता का खेल समझने से पहले एक बार रेल मंत्रालय का हिसाब किताब समझ लेते है। देश में कुल 6909 रेलवे स्टेशन हैं। इनमें से 1721 स्टेशन कंप्यूटर से जुड़े हुए हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि इन 1721 स्टेशनों पर ही कंप्यूटर से रिज़वर्शन होता है। आधुनिक भारत में बाक़ी 5188 रेलवे स्टेशनों का हाल राम भरोसे हैं। सवाल ये है कि इन 5188 स्टेशनों के मुसाफिर भी बाक़ी मुसाफिरों की तरह किराया देते हैं। लेकिन उन्हे वो सुविधाएं स्टेशनों पर नहीं मिलती, जिसका फायदा बाक़ी के स्टेशनों के मुसाफिर उठाते हैं। यानी आज़ादी के 62 साल बाद भी देश के 5188 रेलवे स्टेशनों की हालत वैसी ही है, जैसा कि अंग्रेज़ छोड़ गए थे। &lt;br /&gt;अब रेल का ख़र्चा पानी का हाल समझ लेते हैं। रेलवे कर्मचारियों की तनख़्वाह की हम बात नहीं करेंगे। न ही उनको मिलने वाले डीए की। हम बात करेंगे साल में एक बार मिलनेवाली सुविधा की। रेल मंत्रालय अपने हरेक कर्मचारी को साल में एक बार फ्री पास देता है, जिसमें वो अपने परिवार के साथ यात्रा कर सकता है। रेलवे के क़रीब साढ़े तेरह लाख कर्मचारी हैं। एक कर्मचारी के परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं तो ये संख्या 54 लाख होती है। साल में एक बार रेलवे के ख़र्चे पर ये परिवार घूमने आता-जाता है। अब इसमें उन लोगों की संख्या भी जोड़ लें, जो रेलवे के कर्मचारी तो नहीं हैं लेकिन हमारे और आपके टैक्स के पैसे से घूमते हैं। सांसद, पूर्व सांसद, विधायक और पूर्व विधायक को फ्री में एसी क्लास से आने जाने का पास मिलता है। इस पास के सहारे ये माननीय पत्नी या पति और अपने एक सहायक के साथ सफर करते हैं। अगर टिकट वेटिंग लिस्ट में है तो हेडक्वार्टर कोटा की मेहरबानी से जनरल कोटा का हक़ मारकर माननीय का टिकट कनफर्म कर दिया जाता है। ऐसी सहूलियत पुलिसवालों को है। हम इसमें देश को आज़ाद कराने वाले परवानों को नहीं जोड़ रहे । क्योंकि सहीं मायनों में वो इसके हक़दार हैं। इस आंकड़ों को जोड़ें तो पाएंगे लगभग 65 लाख लोग हर साल रेल के पैसे पर देश घूमते हैं। &lt;br /&gt;अब बात फिर से ममता के खेल की। ममता ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की है कि जिससे देश के लोगों को बुरा लगे। क्योंकि ममता ने गुढ की भेली में लपेटकर कुनैन की गोली दी है। अब आपको समझ में आसानी से ये बात आएगी, जिस देश में 5188 स्टेशनों पर मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, उसे ममता कैसे आदर्श स्टेशन बनाएंगी ? दूसरी बात ये कि दो बार पहले रेल बजट पेश कर चुकीं ममता ने असलियत देश के लोगों से छुपाई क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ममता ने यात्री किराया या माल भाड़ा नहीं बढ़ाया। आम आदमी ये सुनकर ही मंहगाई के इस दौर में राहत की सांस लेगा। मज़दूर तबका भी ख़ुश हो ले। गांव-देहात से शहर-महानगरों में चाकरी करनेवाले मज़दूर 299 रूपए में 1500 किलोमीटर तक और 399 रूपए देकर 3500 किलोमीटर तक सफऱ कर सकता है। पंद्रह सौ रूपए महीना कमाने वाला आदमी पच्चीस रूपए की पास पर रोज़ाना सौ किलोमीटर तक सफर कर सकता है। ममता की ये पहल क़ाबिल ए तारीफ हैं। लेकिन रेलवे का टिकट या पास देनेवाला बाबू उस मज़दूर से मज़दूर होने का पहचान पत्र मांगे तो वो क्या दिखाएगा ? क्या देश में मज़दूरों के लिए मज़दूरी कार्ड है? इस देश में ऐसे अनगिनत स्टेशन हैं, जहां दिन में कुल दो बार कोई ट्रेन आती या जाती हैं। ऐसे में पंद्रह सौ रूपए महीने कमानेवाला मज़दूर उस पास को लेकर कहां मज़दूरी करने जाएगा और कब घर लौटकर आएगा ?&lt;br /&gt;युवा भी खुश होगा। युवाओं के लिए नई ट्रेन चलेगी। लेकिन युवाओं के लिए अलग से ट्रेन क्यों  चलाई जा रही है – ये समझ से परे हैं। क्या इस यूथ ट्रेन में युवा डांस करते हुए चलेंगे ? या फिर इस ट्रेन में पब, मॉल या हॉल जैसी कोई सुविधा होगी ? या फिर ममता ने ये मान लिया है कि देश का नौजवान बूढ़े औऱ प्रौढ़ लोगों के साथ सफऱ करने में असहज महसूस करता है या फिर उसे तकलीफ होती है। &lt;br /&gt;ममता बनर्जी ने कहा है कि 375 स्टेशनों को आदर्श स्टेशन बनाया जाएगा, इसमें से तीन सौ नौ स्टेशनों की पहचान कर ली गई है। ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन भाषण में वो पहले ही कह गई है कि इन स्टेशनों पर शौचालय और बैठने के इंतज़ाम के साथ मूलभूत सुविधाएँ दी जाएंगी। ममता ने जिन स्टेशनों की पहचान की है, उसका नाम सुनेंगे तो आप चकरा जाएंगे। कोलकाता और बंगाल का एक भी स्टेशन और हॉल्ट ममता ने नहीं छोड़ा है। इस योजना का दुखद पहलू ये है कि वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री रहने के बाद भी ममता बनर्जी अपने शहर के स्टेशनों को शौचालय या मुसाफिरों के बैठने की जगह का इंतज़ाम नहीं करा सकीं ? हम ये सवाल ममता से कोलकाता से मुत्तलिक पूछ रहे हैं , पूरे बंगाल को लेकर नहीं। ममता के इस आदर्श स्टेशनों में आदि श्पतोग्राम, आगरपाड़ा, अलीपुरद्वार, कालना, बागबाज़ार, बैरकपुर, बेलगाछिया, बैद्यबाटी, चंदननगर, बैंडेल, बर्दवान, आसनसोल आदि हैं। अगर इस सूची को ध्यान से पढ़ें तो 309 में से सवा सौ से ज्यादा नाम बंगाल के हैं। ममता जिन वजहों का हवाला देकर इन स्टेशनों को आदर्श बनाने का दावा कर रही हैं, वो केवल और केवल वोट बैंक की राजनीति है। इन सारे स्टेशनों को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। कोलकाता के दोनों बड़े स्टेशनों सियालदाह और हावड़ा को वो विश्वस्तरीय बना रहीं हैं। बाकी बचे तीन बड़े स्टेशन आसनसोल, दुर्गापुर और रानीगंज में वो तमाम सुविधाएं पहले से हैं, जिसकी कमी दूर करने की बात ममता कर रही हैं। बाक़ी जितने स्टेशनों का वो नाम ले रही हैं वो हावड़ा और सियालदाह रूट के लोकल स्टेशन हैं। इन स्टेशनों पर मुसाफिरख़ानों की ज़रूरत तो होती नहीं हैं। बैठने की जगह और शौचालय बहुत पहले ग़नी ख़ान चौधरी दे गए हैं। बाक़ी कई ऐसे स्टेशनों के नाम हैं, जो स्टेशन नहीं हाल्ट हैं। यानी ममता इन स्टेशनों के सुधार के नाम पर लोकल लोगों को दिहाड़ी देंगी। ताकि वो जनसभाओं में दावा कर सकें कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हर हाथ को काम दिया है। सरकारी पैसा पानी की तरह उनके लिए बहाया है। &lt;br /&gt;आख़िर में बात ममता और लालगढ़ के रिश्तों की। वाम मोर्चा पहले से ही आरोप लगा रहा है कि ममता बनर्जी के नक्सलियों से रिश्ते हैं। ममता की शह पर वो आतंक फैला रहे हैं। लेकिन सत्ता की ऐसी मजबूरी होतीं है कि राज्य सरकारों की बात कई बार केंद्र को सुनाई नहीं देती। बंगाल में हावड़ा में पहले से ही रेल काऱखाना है। ममता ने कहा कि रेल को ख़ूबसूरत डिब्बों की ज़रूरत है। ख़ूबसूरत डिब्बों के नाम पर कल तक जर्मनी से डिब्बे मंगाने वाले मंत्रालय ने देश में ही डिब्बा बनाने का फैसला कर लिया। लेकिन इसमें ममता को कर्नाटक से लेकर बिहार तक में कोई संभावना नज़र नहीं आईं। उन्होने इस काम के लिए लालगढ़ में कारखाना बनाने के एलान कर दिया। अब लालगढ़ में ज़मीन आसमान से तो आएगी नहीं। वो किसानों से ज़मीन लेंगी। यानी इस मोर्चे पर ममता सिंगूर और नंदीग्राम की नीति को छोड़ देंगी। यहां सेज़ बनाने पर उनका विरोध नहीं हैं। इस इलाक़े में ज़मीनें लालगढ़ के लोगों की हैं। जब वो ज़मीनें देंगे तो सरकारी मुआवज़ा पाएंगे। फिर रेल कोच फैक्ट्री में काम करेंगे। ममता चाहतीं तो कोलकाता से सटे मध्यमग्राम, श्रीरामपुर, चंदनगर, भद्रेश्वर में रेल फैक्ट्री बनवा सकती थीं। लेकिन उन्होने चुना लालगढ़ को ही। इसी लालगढ़ में लालक़िला को ध्वस्त करने का अरमान छिपा है और छिपा है नक्सलियों से राजनीतिक दलों के रिश्ते। ये रिश्ते अब गुमनमी में नहीं हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-2011994513914531288?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/2011994513914531288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=2011994513914531288&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/2011994513914531288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/2011994513914531288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/07/blog-post_03.html' title='रेल बजट से साबित हुआ ममता और लालगढ़ का रिश्ता'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Sk4ICru7Q9I/AAAAAAAAAIw/Mt5Yqesaq_Q/s72-c/Mamta_Banerjee.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-4011250330383331786</id><published>2009-07-02T04:12:00.000-07:00</published><updated>2009-07-02T04:14:08.859-07:00</updated><title type='text'>मां, माटी और मानुष की वजह से लेफ्ट की मिट्टी दरकी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkyWbjLnUYI/AAAAAAAAAIo/kNCMezSh7iM/s1600-h/CPI_Edited_0.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 230px; height: 230px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkyWbjLnUYI/AAAAAAAAAIo/kNCMezSh7iM/s400/CPI_Edited_0.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353819457081266562" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लोकसभा चुनाव के बाद नगरपालिका, पंचायत और परिषद के चुनावों में भी वाम मोर्चा को मुंह की खानी पड़ी है। लोकसभा की तरह कई नगरपालिका भी वाम मोर्चा के हाथ से ऐसे निकले, जैसे कि मुट्ठी से रेत सरकती है। वाम मोर्चा सकते में हैं, सदमें में हैं। वहीं, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन जश्न में डूबा है। अब सवाल ये कि क्या मतदाताओं ने एक बार फिर वाम मोर्चा को नकारा है और तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन को जनादेश दिया है। या फिर लोगों की जो नाराज़गी है, उसे अभी तक लेफ्ट दूर नहीं कर पाई है और एक के बाद एक धक्के खा रही है। &lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल में सोलह नगरपालिकाओं के लिए चुनाव हुए। इसमें से तेरह नगरपालिकाओं पर ममता बनर्जी और साथियों का झंडा लहराया। इसके साथ ही इन तेरह नगरपालिकओं से वाम मोर्चा का झंडा बेरंग होकर उतर गया। पिछले तैंतीस साल से बंगाल पर राज कर रही लेफ्ट पार्टियां केवल तीन नगरपालिकाओं पर लाल झंडा लहराने में क़ामयाब हुई है। विरोधियों के क़ब्ज़े से लेफ्ट केवल जलपाईगुड़ी की मालबाज़ार नगरपालिका ही छीन सकी है। लेकिन लेफ्ट को ये जीत भी बेहद मामूली सीट से नसीब हुई है। इस नगरपालिका पर पिछले दस साल से बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस का राज था। पिछले चुनाव में लेफ्ट और गठबंधन को बराबर सीटें मिली थीं। इसके बाद लॉटरी के ज़रिए सत्ता तय की गई और ये लॉटरी गठबंधन के हाथ लगीं। इस बार भी मालबाजार नगरपालिका में लेफ्ट पार्टी को केवल एक वार्ड के ज़रिए सत्ता हाथ लगी है। पंद्रह वार्डों में से आठ पर लेफ्ट को और सात वार्ड पर कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस को जीत मिली है।  इसके अलावा गंगारामपुर और राजारहाट-गोपालपुर नगरपालिका पर लेफ्ट को जीत नसीब हुई है। जबकि दमदम, दक्षिण दमदम, उलबेड़िया, आसनसोल, मध्यमग्राम, महेशतला, सोनारपुर –राजपुर नगरपालिका वाम मोर्चा के हाथ से निकल गए। &lt;br /&gt;अगर हम हर नगरपालिका, पंचायत और परिषद के नतीजों को तफसील से देखें तो साफ पता चलता है कि लेफ्ट फ्रंट को जहां भी जीत मिली है, वो बेहद मामूली अंतर से हैं। जबकि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस गठबंधन को हर जगह अप्रत्याशित जीत मिली है। अपवाद के तौर पर दक्षिण दिनाजपुर की गंगापुर नगरपालिका में 18 सीटों में से लेफ्ट को 12 और गठबंधन को 6 सीटों पर जीत मिली है। जबकि राजराहट-गोपालपुर में 35 वार्ड में से लेफ्ट को 19 और कांग्रेस –तृणमूल गठबंधन को 15 वार्डों पर जीत नसीब हुई है। एक वार्ड से निर्दल जीता है। यानी साफ तौर पर ये नगरपालिका भी लेफ्ट के हाथ से जाते-जाते बची है। &lt;br /&gt;हैरानी की बात है कि उत्तर चौबीस परगना के तीनों नगरपालिका लेफ्ट के हाथ से फिसल गए। जबकि इस ज़िले में सीपीएम के दिग्गज सुभाष चक्रवर्ती, नेपाल देब भट्टाचार्य, असीम दासगुप्ता, अमिताभ नंदी जैसे दिग्गज नेता हैं। लेकिन लाल क़िला को भरभराने से नहीं रोक पाए। दक्षिण दमदम के 35 वार्डों में से लेफ्ट को केवल 11 वार्डों पर जीत मिली है। जबकि गठबंधन को 24 वार्डों पर जीत मिली है। दमदम के 22 वार्डों में से तृणमूल को 13 और लेफ्ट को केवल 9 वार्डों पर जीत मिली है। मध्यमग्राम नगरपालिका के 25 वार्डों में से 18 पर कांग्रेस और तृणमूव कांग्रेस जीती है। महानगर से दूर दराज ज़िलों की बात करें तो उत्तर दिनाजपुर के इस्लामपुर नगरपालिका के 17 में से 13 वार्ड पर गठबंधन जीता है और लेफ्ट को तीन वार्डों से संतोष करना पड़ा है।  &lt;br /&gt;आख़िर लेफ्ट के नसीब में अब हार क्यों लिखी है। लोकसभा चुनाव में बात समझ में आ रही है कि नंदीग्राम के तूफान ने वाम मोर्चा के तंबू को उखाड़ फेंका था। आइला तूफान को बीते अब ख़ासा समय हो गया, फिऱ भी लेफ्ट अपनी वजूद नहीं बचा पा रहा। जीत के जश्न में डूबे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेता इसे मां, माटी और मानुष की जीत बता रहे हैं। अगर इसका राजनीतिक मतलब निकालें तो जिन तीन बिंदुओं पर लाल क़िला खड़ा था, वो तीनों बिंदु अब उसके विरोधियों के हाथ में हैं। महानगर कोलकाता और या दूर –दराज़ का कोई गांव- हर जगह से महिलाओं के साथ बलात्कार और दुराचार की ख़बरें आती रहती हैं। महिलाओं के ख़िलाफ हो रहे अत्याचार परिवारों को लेफ्ट से दूर करने का काम किया है। दूसरा बिंदु ये है कि बरगा आंदोलन के बाद लेफ्ट ने गांवों और किसानों का दिल जीत लिया था। शहरी मतदाता भले ही तर्कों के आधार पर वाम को ख़ारिज कर देता था। लेकिन केत खलिहान की भावनाएं लेफ्ट के साथ होती थीं। लेफ्ट नारा भी देता था कि वो निरपेक्ष नहीं वो मेहनती मानुषों के पक्ष में हैं। लेकिन सिंगुर के बाद लेफ्ट सरकार की खेत खलिहानों और किसानों के लेकर नीति को पोल खुल गई। सर्वहारा के नारे पर टिका वाम के लिए अब सर्व हारा ही हो गया है। तीसरा बिंदु मानुष का है। यानी गांव हो या शहर – हर जगह लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। बेरोज़गारी बढ़ी है। राज्य सरकार रोज़गार देने में असफल रही है। कभी जूट और सूती मिलों के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश तक में मशहूर रहे राज्य में एक-एक कर सारे कारखाने बंद होते गए। रोज़गारों से रोज़गार छिनें और नए बेरोज़गारों की संख्या लगातार बढ़ती गई। पूरे देश में उत्तम शिक्षा के लिए मशहूर राज्य में शिक्षा का राजनीतिकरण हुआ। ये तमाम वजहें , जिनकी वजह से लेफ्ट को नुक़सान उठाना पड़ा। लोकसभा चुनाव में जब तृणमूल के सुलतान अहमद ने उलबेड़िया में हन्नान मोल्ला को हराया या फिर हावड़ा से अंबिका बनर्जी जीते या दमदम से पुराने कांग्रेसी सौगत राय ने अमिताभ नंदी को हराया तो समीक्षा में बात निकलकर सामने आई कि लोगों के मन लेफ्ट के लिए ग़ुस्सा था। वो लोकसभा में फूटा है। कांग्रेस और तृणमूल कहने लगे कि अब बारी विधानसभा की है। लेकिन एक तबका ये मानता रहा कि लोगों के दिल में जो गुबार था , वो निकल चुका है। लेफ्ट को इस हार से सबक मिली है। लेकिन नगरपालिका के चुनावों ने साबित कर दिया है कि लेफ्ट के लिए खोई हुई ज़मीन हासिल करना अब बेहद चुनौतीभरा काम है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-4011250330383331786?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/4011250330383331786/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=4011250330383331786&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/4011250330383331786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/4011250330383331786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/07/blog-post_02.html' title='मां, माटी और मानुष की वजह से लेफ्ट की मिट्टी दरकी'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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को सौंप दी। अभी किसी को नहीं मालूम कि इस रिपोर्ट में क्या है ? आयोग ने क्या सिफारिश की है ? लेकिन इस रिपोर्ट को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। इसका राजनीतिक पहलू समझने से पहले एक बार इस आयोग के बारे में समझ लें। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के दस दिन के बाद केंद्र सरकार ने 16 दिसंबर 1992 को लिब्राहन आयोग का  गठन किया। सरकार ने तीन महीने के भीतर जांच रिपोर्ट देने को कहा था। यानी आयोग को 16 मार्च 1993 तक अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपना था। लेकिन आयोग को ये काम करने में सत्रह साल लग गए। इसी के साथ इस आयोग ने भारत में एक रिकार्ड भी क़ायम कर लिया है। देश में सबसे ज़्यादा समय तक काम करने का रिकार्ड अब लिब्राहन आयोग के नाम है। इस आयोग को 48 बार एक्सटेंशन यानी विस्तार दिया गया। आयोग ने एक सौ दो लोगों ,जिनमें आरोपी भी शामिल हैं, के बयान लिए। 399 बार सुनवाई की। सरकार के दस करोड़ रुपए के ख़र्चे पर अपनी रिपोर्ट सत्रह साल बाद सरकार को सौंप दी। बताया जाता है कि आयोग ने चार साल पहले ही रिपोर्ट तैयार कर ली थी। लेकिन सौंपी अब है। इसकी वजह तो नहीं मालूम। लेकिन एक बात सबको मालूम है कि जस्टिस लिब्राहन और आयोग के वकील अनुपम गुप्ता के बीच छत्तीस का आंकड़ा था और वो बाद में आयोग से अलग भी हो गए थे। &lt;br /&gt;अब बात इस रिपोर्ट की राजनीति की। हिंदुत्व की लहर पर सवार होकर सत्ता सुख पा चुकी बीजेपी क्या इस रिपोर्ट से सांसत में हैं ? ऊपर से देखने में एक बार ऐसा महसूस तो हो सकता है। क्योंकि बीजेपी और उसकी परिवार के कई दिग्गज आरोपी हैं। लेकिन सच ये नहीं है। सच तो ये है कि राजनीतिक भंवर में फंसी बीजेपी के लिए ये रिपोर्ट आक्सिजन जैसा है। याद करें चुनाव से पहले हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी का हालत सांप –छुछुंदर जैसी थी। बीजेपी तय नहीं कर पा रही थी कि वो हिंदुत्व की लहर पर सवार हो या फिर सूडो सेक्युलर की छवि के साथ मैदान में उतरे। वरूण गांधी के विवादास्पद बयान के बाद कई दिनों तक बीजेपी के दिग्गज नेताओं की दुविधा पूरे देश ने देखा है। चुनाव के बाद बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी ने स्वीकार किया था कि देश दो दलीय राजनीति की तरफ बढ़ा है और मतदाताओं ने बीजेपी को खारिज किया है। &lt;br /&gt;बीजेपी को अच्छी तरह से मालूम है कि चुनाव में हुए घाटे की भरपाई इसी रिपोर्ट से संभव है। अगर किसी आरोपी के ख़िलाफ सरकार कार्रवाई करेगी तो सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा होगा। चुनाव के समय विकास के नाम पर एकजुट हुए मतदाता पोलोराइज़ेशन के इस दौर में फिर से धर्म के नाम पर बंटेगें। &lt;br /&gt;रिपोर्ट पेश होने के बाद बीजेपी नेताओं और बीजेपी से अलग हो चुके नेताओं के बॉडी लेंग्वेज पर ग़ौर कीजिए। हालिया मध्य प्रदेश चुनाव में गोते खाने के बाद बीजेपी में लौटने की राह तक रही उमा भारती फिर से फायर ब्रांड मुद्रा में आ गईं। सत्रह साल पहले की तस्वीर सबको याद होगी, जिसमें मस्जिद टूटने के बाद उमा भारती बीजेपी के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी के साथ गलबहियां करते देखी गई थीं। उमा भारती ताल ठोंककर सरकार को चुनौती दे रही हैं कि उन्हे सरेआम सूली पर लटाकाया जाए। उमा भारती दावा कर रही हैं कि वो मस्जिद गिराए जाने की ज़िम्मेदारी एक अच्छे सेनापति की तरह लेने को तैयार हैं। कल तक यही उमा भारती और बीजेपी के दिग्गज दावा कर रहे थे कि जो कुछ भी हुआ , साज़िश के तहत नहीं हुआ। ये घटना अप्रत्याशित थी। &lt;br /&gt;रिपोर्ट पेश होते ही बीजेपी के दिग्गज अरूण जेटली, राजनाथ सिंह आदि लालकृष्ण आडवाणी से मिले। ज़ाहिर इस रिपोर्ट के असर को लेकर रणनीति बनी होगी। &lt;br /&gt;पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद इस रिपोर्ट को फुल टॉस बॉल की तरह लिया। सीना तानकर कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने। साथ ही लगे हाथ आयोग की उम्र पर सवाल खड़े कर दिए। मांग कर डाली की कि इसकी भी जांच होनी चाहिए। ये मांग करते समय शायद रविशंकर प्रसाद ये भूल गए कि इस दरम्यान बीजेपी ने भी छह साल तक शासन किया है। भव्य मंदिर बनाने की बात करते समय ये भी भूल गए कि उनकी सरकार के दौरान अयोध्या में राम मंदिर की लड़ाई लड़नेवाले पुराने साधू परमहंस ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। सरकार ने विशेष दूत भी भेजा था और लालकृष्ण आडवाणी ने एनडीए के एजेंडे में राम मंदिर न होने की बात कर विवाद से पल्ला झाड़ लिया था। कांग्रेस भी इस पर राजनीति करने का मौक़ा नहीं छोड़ रही। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बीजेपी नेताओं का नाम लिए बग़ैर राशन पानी लेकर धावा बोल दिया। दावा करने लगे कि दोषियों के ख़िलाफ सरकार किस तरह का कार्रवाई का इरादा रखती है। उनका ये दावा अंतर्मन से कम राजनीतिक दिल से ज़्यादा लगता है। &lt;br /&gt;बीजेपी और कांग्रेस नेताओं के बयानबाज़ी के विशुद्ध तौर पर राजनीतिक मतलब है। बीजेपी चाहती है कि इस मुद्दे पर उनके नेताओं को घसीटा जाए। उनके नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की बात हो और शहीदी मुद्रा में आकर राजनीतिक लाभ कमाएं। वहीं , कांग्रेस भी इसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिए अल्पसंख्यक राजनीति की मौक़ा नहीं छोड़ रही। लेकिन उसे बहुसंख्यक वोट खोने का भी डर सता रहा है। कांग्रेस को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर उसने इस रिपोर्ट पर कार्रवाई शुरू की तो घाटा कांग्रेस को होगा और लाभ बीजेपी को। इसलिए बयानबाज़ियों से काम चला लिया जाए। अल्पसंख्यकों को फिर से ये अहसास कराया जाए कि सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस अब भी उनके साथ खड़ी है। &lt;br /&gt;अब सवाल ये है कि सरकार आयोग की सिफारिशों पर क्या करेगी। चूंकि अपने देश का राजनीतिक इतिहास रहा है कि कोई भी जांच कमीशन ईमानदार जांच के लिए नहीं गठित की जाती। उसका इस्तेमाल राजनीतिक मतलबों के लिए होता है। इन आयोगों को बनाने वालों की नीयत और मंशा शुद्ध तौर पर राजनीतिक होती हैं। इसलिए आयोगों की रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। आज़ादी के बाद से लेकर अब तक कई रिश्वत कांड को लेकर आयोग बने। लेकिन आज एक बार भी ऐसा नहीं सुनने में आया कि दोषी को कड़ी सज़ा मिली है। ऐसा ही मामला जैन हवाला कांड में भी हुआ। नानवटी आयोग ने गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी सरकार को क्लीन चिट दी। सिख विरोधी दंगों के आरोपी अब भी सज़ा नहीं पाए हैं। दरअसल , सरकार चाहें जिस किसी भी पार्टी की हो, वो आयोगों के ज़रिए लीपापोती करती है। सच पर परदा डाला जाता है। अरसा ग़ुज़रने पर लोगों के ज़ख़्म खुद ही सूख जाते हैं। नेताओं के बिरादरी को मालूम है कि जनता की याददाश्त कमज़ोर होती है और वो इसी का फायदा उठाते हैं। भले ही इससे लोकतंत्र की साख पर बट्टा लगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-8953028393077718673?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/8953028393077718673/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=8953028393077718673&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8953028393077718673'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8953028393077718673'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='आयोगों के ज़रिए सरकारें करती हैं लीपापोती'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Sks7I2G_DBI/AAAAAAAAAIg/radm2scc-JE/s72-c/babri-masjid.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-3281918648038452656</id><published>2009-06-30T05:52:00.000-07:00</published><updated>2009-06-30T07:03:46.224-07:00</updated><title type='text'>बाबरी मस्जिद की कहानी – 17 साल बाद उसी की ज़ुबानी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkobGHB3_dI/AAAAAAAAAIY/J8-xRIOtPiM/s1600-h/babri_masjid_demolition_20050228.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 370px; height: 372px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkobGHB3_dI/AAAAAAAAAIY/J8-xRIOtPiM/s400/babri_masjid_demolition_20050228.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353120898863332818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सत्रह साल हो गए मुझे टूटे हुए, भरभराए हुए। इबादत की जगह को पैरों से रौदा गया। नफरत से तोड़ा गया। लेकिन क्या मैं अकेले टूटा हूं ? मैं इन सत्रह सालों में बार –बार यहीं सोचता रहा। मुझे लगता है कि मैं अकेले नहीं टूटा। इस ज़म्हूरी मुल्क की इज्ज़त टूटी। देश का ईमान टूटा। गंगा –जमुनी तहज़ीब टूटी। राम-रहीम की दोस्ती टूटी। एक –दूसरे का एतबार टूटा। रिश्तों की डोर टूटी। दिलों का तार टूटा। अब आप सोचिए क्या मैं अकेले टूटा था ?&lt;br /&gt;मुझे चाहें जिसने भी बनाया हो। जिस भावना से बनाया हो। लेकिन मुझे जगह तो मर्यादा पुरशोत्तम श्रीराम ने ही दी। मैं सैंकड़ों साल से उनके साथ रहा। वो भी मेरे साथ सैकड़ों साल से जुड़े रहा। उनके बगल में मेरे होने से उन्हे कोई तकलीफ नहीं हुई। मेरे साथ उनके होने से मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई। मैं उनकी नज़रों से होली खेलता था। दीवाली के पटाखे फोड़ता था। नवरात्रा मनाता था। दशहरा मनाता था। मेरी नज़रों से वो ईद की मीठी सिवइयां खाते थे। हम दोनों को एक दूसरे से कोई तकलीफ नहीं थी।&lt;br /&gt;मुझे तोड़ने के लिए मुट्ठी भर लोगों ने देश में फतवा जारी किया। वो फतवा किसी मज़हब का नहीं था। किसी ईमान का नहीं था। किसी इंसान का नहीं था। ये फरमान राम का नहीं था। क्योंकि कोई भी मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना। ये तो सत्ता के लालची उन उन्मादियों का तुलग़की फ़रमान था, जिन्हे दीन ओ ईमान से कोई मतलब नहीं थी। उन्हे मतलब था तो हम दोनों के सहारे हुक़ूमत की चाबुक पाने से।&lt;br /&gt;मैं टूट रहा था। मुझ पर हमले हो रहे थे। मुझमें हिम्मत थी सब सहने की। मुझे सब सहना भी चाहिए था। ये मुल्क का तक़ाज़ा था। क्योंकि मैं भी इस देश की माटी से बना था। वतन का क़र्ज़ दूध के भी क़र्ज से बड़ा होता है। मैं सह रहा था । दर्द पड़ोसी को हो रहा था। मेरे राम को हो रहा था। वो दिल ही दिल रो रहे थे। सोच रहे थे कि हजारों साल पहले जंग कर जिस रावण का ख़ात्मा कर चुके थे, वो चेहरे फिर से दिखने लगे हैं। जिन्हे दूसरों को तकलीफ देख कर आनंद आता है। वो मुझसे शायद कह रहे थे- घबराना नहीं। टूटना नहीं। सब सहना है । सब सहकर फिर से मुल्क को मजबूत बनाना है। मज़हब की तालीम देनी है। चौपाइयों और दोहों से फिर समझाना हैं कि हमारे बदन का लहू एक जैसा हैं, एक रंग का है। इसलिए हम दोनों का ख़ून भी एक है। लेकिन लोग नहीं समझ रहे थे। रथ जहां –जहां से निकला था, अपने पीछे काला धुआ छोड गया था। इस गुबार में लोगों के ख़ून काले पड़ गए थे और आंखें लाल हो गई थीं। बहुत सी औरतें की चूड़ियां टूटीं। बहुत सी माओं का आंचल सूना हुआ। कई बच्चों के सिर से मां- बाप सका साया उठ गया। बहुत ख़ून बहा- हम दोनों के नाम पर। लेकिन हम दोनों ने तो ऐसा नहीं कहा था । फिर क्यों बहा ख़ून ? किसके लिए बहा ख़ून ? &lt;br /&gt;सबने मुझे टूटते हुए देखा। लेकिन क़ानून को देखने –समझने में सत्रह साल लग गए। सुना था मैंने इंसाफ में देर ज़रूर है, लेकिन मिलता ज़रूर है। सुना है कि क़ानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, हमसे भी लंबे। सत्रह साल बाद क़ानून को सब पता चल गया। किसने मुझे तोड़ा। क्यों मुझे तोड़ा। लेकिन क्या गुनाहगार सज़ा पाएंगे ? या फिर मेरे और राम के मज़हब में जो लिखा है, वहीं होगा। सबको ऊपर सज़ा मिलेगी। क्योंकि हमारे वार में आवाज़ नहीं होती। लेकिन जाते –जाते आपसे गुज़ारिश है। आप मत टूटना कभी । आप टूटेंगे तो मुल्क टूटेगा, ज़म्हूरी ताक़त टूटेगी, गंगा जमुनी तहज़ीब टूटेगी, मज़हब की तालीम टूटेगी। याद रखिएगा- ग़लतियां बाबर की थी, जम्मन का घर फिर क्यों जले। दफन है जो बात, उस बात को मत छेड़िए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-3281918648038452656?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/3281918648038452656/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=3281918648038452656&amp;isPopup=true' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3281918648038452656'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3281918648038452656'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/06/blog-post_30.html' title='बाबरी मस्जिद की कहानी – 17 साल बाद उसी की ज़ुबानी'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkobGHB3_dI/AAAAAAAAAIY/J8-xRIOtPiM/s72-c/babri_masjid_demolition_20050228.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-5829461305484551780</id><published>2009-06-29T05:49:00.000-07:00</published><updated>2009-06-29T05:51:39.342-07:00</updated><title type='text'>अगर हमें राहुल बाबा नहीं मिलते तो देश कैसे चलता ?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Ski4xf4LJaI/AAAAAAAAAIQ/LTI1tZRO6uE/s1600-h/rahul.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 321px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Ski4xf4LJaI/AAAAAAAAAIQ/LTI1tZRO6uE/s400/rahul.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352731317640045986" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;19 जून को इस देश –दुनिया में बहुतेरे का जन्मदिन रहा होगा। लेकिन ख़बर बनी राहुल गांधी के जन्म दिन की। इसी दिन राहुल बाबा इस धरती पर अवतरित हुए थे। अवतार का उनतालिसवां साल था। जश्न का अंदाज़ भी जोशीला था। जन्मदिन के मौक़े पर कई दरबारियों और चारण नीति के समर्थकों ने राजकुंवर राहुल गांधी और राजमाता सोनिया गांधी के घर के बाहर जमकर भांगड़ा पाया। अगर किसी को राजकुंवर या राजमाता शब्द खटके तो उसके आगे लोकतांत्रिक शब्द जोड़ सकते हैं। अतिउत्साही राहुल प्रेमियों ने 139 किलो का केक भी काटा। ये तो गनीमत है कि उम्र के साथ एक सौ किलो का केक काटा। इरादा तो एक हज़ार 39 साल जीने का आशिर्वाद देने का था। लेकिन दिल्ली में फटाफट उन्हे 1039 किलो का केक मिला नहीं होगा। ख़ूब नाचे गाए। तालियां बजा बजाकर जुग जुग जीने का आशिर्वाद दिया। साथ –साथ घोड़ों को भी नचाया। घोड़ा भी ख़ुश होकर नाचा होगा। सोचा होगा- जब प्राणियों में सर्वोच्च मनुष्य दिल खोलकर नाच रहा है तो वो इस पुनीत पावन कर्तव्य का हिस्सा बनकर स्वर्ग जाने का रास्ता पा रहा है। &lt;br /&gt;ये लोकतंत्र हैं। लोकतंत्र में सबको अपनी मर्ज़ी से जीने, करने और बोलने का अधिकार है। इसी लोकतंत्र के लिए हमारे देश के कई लोगों ने अंग्रेज़ों की लाठी-गोलियां खाईं। जान दी। शहीद कहलाए। इसी लोकतंत्र का फायदा राहुल प्रेमियों ने उठाया और राहुल गांधी ने भी। लोकतंत्र में शायद ज़रूरत से ज़्यादा आस्था रखनेवाले राहुल प्रेमियों ने कभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 175 किलो का केक काटने का इरादा नहीं दिखाया। शायद उन्हे मालूम है कि लोकतंत्र ने जितनी ताक़त राहुल बाबा को दी है , वो ताक़त भला पीएम में कहां ? उन्होने पीएम को विनती करते हुए सुना है- मैं राहुल जी को मंत्री बनाना चाहता हूं। लेकिन वो मान नहीं रहे हैं। इन प्रेमियों ने इसके अलावा मंत्री के नामों की कांट – छांट करते राहुल के बारे में भी ख़ूब सुना है। राहुल बाबा को पूरे देश में घूमकर अपनी मां के साथ विपक्ष की बखिया उधेड़ते भी देखा है। सत्ता के सुख में मदांध नेहरू –गांधी परिवार को होते देखा है। &lt;br /&gt;ये नज़ारा राहुल बाबा आंखों से नहीं देख पाए। वो तो उस दिन लंदन में छुट्टियां बिता रहे थे। अब पता नहीं वहां कोई भारतीय न्यूज़ चैनल देखा कि नहीं, जिसमें जन्माष्टमी की तरह राहुल चालीसा पढ़ा और दिखाया जा रहा था। देखें होंगे तो यक़ीनन बेहद खुश हुए होंगे। जन्मदिन के मौक़े पर राहुल के लंदन में होने से अपन लोग बेहद खुश हुए। बेचारा राहुल देश को सेक्युलर, मज़बूत सरकार और लोकतंत्र के लिए दिन रात एक किया था। सरकार बनाने के लिए क्या क्या जतन किए। मंत्रियों के नाम तय करने में अपने दिमाग़ का कितना दही किया। इतना सब करने में 39 साल का जवान राहुल बाबा कितना थक गया होगा। बेचारा विलायत में अपनी थकान उतार रहा होगा। खुश होना चाहिए। ठीक वैसे ही, जैसे कि हम उनके परदादा जवाहर लाल नेहरू के कोट फ्रांस से धुल कर आने की ख़बर सुनकर अपन लोग खुश होते थे। &lt;br /&gt;अगर राहुल बाबा न होते तो देश कैसे कलावती को जानता। ये अलग बात है कि बेचारी कलावती नहीं समझती कि राहुल बाबा के पास कितने काम हैं। देश चलाना है। नौजवानों को जगाना है। संगठन खड़ा करना है। राहुल बाबा ने उसे एक पहचान दी है। पूरा देश अब उसे जानता है। लेकिन वो राहुल बाबा से टाइम लिए बग़ैर मिलने दिल्ली आ धमकी। नहीं मिल पाई। उसे बुरा तो बहुत लगा होगा। लेकिन समझ गई होगी कि बेचारे राहुल के पास कितना काम है। इतना काम है कि उन्हे अपनी कलावती से मिलने का वक़्त नहीं मिला। चुनाव से पहले जब उनके पास समय था तो महाराष्ट्र जाकर उससे नहीं मिले थे ! ये अहसान तो वो भूल ही जाती है। &lt;br /&gt;सोचिए , अगर राहुल बाबा नहीं होते तो देश में दलितों का उद्धार कौन करता। कौन उत्तर प्रदेश के गांव में जाकर दलित की चारपाई पर सोता, उनकी रोटी खाता। अगर राहुल बाबा न होते तो कैसे विदेशों के मंत्री उत्तर प्रदेश के गांव और दलित का घर देख पाते। इन विदेशियों ने बड़ी मुश्किल से स्वीकार किया था कि भारत अब सांप-संपेरों का देश नहीं रहा। दिल्ली की चमक और मुंबई की धमक को देखकर मान बैठे थे कि भारत बदल गया है। धन्य हों राहुल बाबा, जो आपने अज्ञानी विदेशी मंत्री को उत्तर प्रदेश के गांव में दलित के घर पहुंचाकर उसका ज्ञानचक्षु खोल दिया। &lt;br /&gt;राहुल बाबा देश को आगे बढ़ाने के लिए कितना काम कर रहे हैं। युवा शक्ति की फौज खड़ी कर रहे हैं। देश युवाओं के हाथ में हो-इसके लिए वो युवाओं को आगे ला रहे हैं। अगर कलावती और राम सरेखन का बेटा-बेटी-बहू पढ़े लिखे होते तो उन्हे भी ज़रूर आगे लाते। अब अनपढ़ भरे पड़े तो वो क्या कर सकते हैं। वो कोशिश तो कर ही रहे हैं। राजेश पायलट के बेटे, माधवराव सिंधिया के बेटे, गनी ख़ान चौधरी की भांजी आदि –आदि को आगे ला रहे हैं। मंत्री बना रहे हैं। &lt;br /&gt;राहुल बाबा को मंत्री नहीं बनना है। वो साफ कहते हैं- टैम ना है। अरे भई, इतना काम कर रहे हैं तो टैम कैसे मिलेगा। राहुल ये जानते हैं कि मंतरी- संतरी बनकर क्या होगा। बनना तो एक दिन पीएम ही है। पापा बने, दादी बनी, परदादा बने। एक दिन वो भी बनेंगे। पीएम की कुर्सी कौन सी भागी जा रही है ससुरी। कई बार तो ऐसा लगता है कि राहुल धार्मिक भी हैं। रामायण ख़ूब पढ़ी होगी। खड़ाऊं पूजन समझते होंगे। तभी तो मां-बेटे ने मिलकर मनमोहन सिंह को पीएम बना रखा है। भले आदमी हैं। सज्जन पुरूष हैं। वो बेईमानी नहीं करेंगे। खड़ाऊ शासन चलाते रहेंगे। जब सम्राट की ईच्छा होगी तो वो ख़ुद तख़्त ओ ताउस संभाल लेगा। सोनिया और राहुल दोनों ही लोकतंत्र और संविधान में अगाध आस्था रखते हैं। संविधान कहता है कि संसदीय दल का नेता ही प्रधानमंत्री होगा। संसदीय दल तय करेगा कि उसका नेता कौन हो। इसके बाद प्रधानमंत्री तय करेगा कि मंत्रिमंडल में कौन –कौन होगा। लेकिन मां- बेटे दोनों को मालूम है कि मनमोहन सिंह भद्र पुरूष हैं। राजनीति के नौसिखिए हैं। वो संसदीय दल को कह नहीं पाएंगे कि मुझे नेता चुनो। मीठा बोलनेवाले मनमोहन सिंह जी किसी को ये कह नहीं सकते कि आपको मंत्री नहीं बना सकता। उन्होने मनमोहन सिंह की इस बारे में भी मदद की है। चुनाव से पहले ही फरमान जारी कर दिया – मनमोहन ही पीएम होंगे। पीएम बनवा कर छोड़ा। आख़िर भले लोगों का साथ कौन नहीं देगा ? इस परिवार ने तो हमेशा देश का भला ही सोचा है। अगर इस परिवार ने आपातकाल नहीं थोपा होता तो जनता को लोकतंत्र का मतलब कैसे पता चलता ? लोकतंत्र पहले से कहीं ज़्यादा और मज़बूत कैसे होता ? हमारे देश के लोग भी जानते हैं कि इसी में उनकी भलाई है। शायद उन्हे भी कुछ मलाई मिल जाए। ऐसे में अगर भांगड़ा पा दिया तो कौन सा आसमान टूट पड़ा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-5829461305484551780?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/5829461305484551780/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=5829461305484551780&amp;isPopup=true' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/5829461305484551780'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/5829461305484551780'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/06/blog-post_29.html' title='अगर हमें राहुल बाबा नहीं मिलते तो देश कैसे चलता ?'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Ski4xf4LJaI/AAAAAAAAAIQ/LTI1tZRO6uE/s72-c/rahul.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-1927708873152136121</id><published>2009-06-23T05:34:00.000-07:00</published><updated>2009-06-23T05:51:51.895-07:00</updated><title type='text'>हर पल , हर लम्हा याद आते हैं पापा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkDP2YasoZI/AAAAAAAAAII/eyCWOjMf_8U/s1600-h/all-three.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 133px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkDP2YasoZI/AAAAAAAAAII/eyCWOjMf_8U/s400/all-three.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5350504890490462610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सत्ताइस जून को पापा को हमसे बिछड़े बारह साल पूरे हो जाएंगे। इन बारह साल के दौरान एक भी पल ऐसा नहीं रहा होगा, जब पापा की याद न आई हो। हर मोड़ पर पापा याद आए। चाहें वो मौक़ा ख़ुशी का रहा हो या फिर ग़म का। कभी अकेले में बैठकर सोचता हूं तो लगता है कि दुनिया में कितना अकेला हूं। एक –एक कर के वो सब साथ छोड़ गए, जिसकी कभी मैंने कल्पना नहीं की। चाहें वो मेरी बुआ ( बाबा की बुआ) हों, बाबा हों, पापा हों, नाना हों या फिर मम्मी। &lt;br /&gt;अभी हाल की बात है। कोलकाता में कुछ लोग पापा का जन्मदिन मना रहे थे। इसके बाद एक मूर्धन्य पत्रकार ने एक वेब साइट पर स्टोरी की। एसपी की याद में हुई संगोष्टी में वक्ता आठ और सुनने वाले पांच। मैंने उस ख़बर में पाया कि पापा का जन्म दिन की तारीख़ वो नहीं हैं, जिसे वो मना रहे हैं। ये अलग बात है कि पापा ने जीते जी कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया। उनका मानना था कि धरती पर आकर कोई महान काम नहीं किया है, जो इसका जश्न मनाऊं। ये ढकोसला, दिखावा और आडंबर है। पापा का जन्मदिन मनानेवाले अगर उनके क़रीबी होते तो शायद उनकी भावना को समझकर जन्म दिन नहीं मनाते। &lt;br /&gt;इस ख़बर को देखकर मैंने अपनी आपत्ति भेजी। इसके बाद महोदय का मेल आया कि हम पहली बार नहीं मना रहे हैं। इसमें एम.जे.अकबर आ चुके हैं। इसमें पापा के बड़े भाई नरेंद्र प्रताप भी आ चुके हैं। इसमें सीपीएम के दिग्गज मोहम्मद सलीम और न जाने कितने तरह के बुद्धिजीवी आ चुके हैं। महोदय ने ये भी दावा किया कि एसपी तो उनके असली हीरो हैं। वो उनके जीवन के नायक हैं। मैंने उन्हे कुछ दस्तावेज़ भेजे। वो महोदय सक्रिय पत्रकार नहीं हैं। शायद साहित्य से उनका कोई नाता है। अचरज है कि जो पत्रकार दिन रात पापा के साथ रहे । उन्हे अपना आदर्श मानते रहे। उन्होने तो कभी पापा के अपनों की ख़बर नहीं ली। लेकिन इस पेशे से इतर कोई पापा के अपनों की ख़बर रखता है। मैंने उन महोदय से ये पूछा कि आप जन्मदिन मनाएं। मुझे एतराज़ नहीं क्योंकि उन्होने मीडिया में सार्वजनिक संपत्ति तो पहले ही बनाया जा चुका है। लेकिन आप ये बताएं कि आप एस पी को अपना रियल लाइफ हीरो मानते हैं तो कुछ किलमीटर चल कर आपने अपने हीरो के अपनों की ख़बर ली ? आपके हीरो की मां कैसी हैं? किस हाल में हैं ? पापा की जो सबसे क़रीबी जीवन की रहीं हैं वो हैं मेरी मम्मी यानी उनकी भाभी। आपने क्या उनकी कभी सुध ली। महोदय का जवाब इस पर नहीं आया। &lt;br /&gt;ख़ैर , कई मौक़ों पर पापा बेसाख्ता याद आए। जब मेरी शादी हो रही थी तो ठीक उससे पहले मैं, मेरी मम्मी, मुझे जन्म देने वाले पिता और छोटा भाई ख़ूब रोए। शादियों के मौक़ों पर नाच-गाना होता है। मेरे घर में मातम मन रहा था। सबको पापा की याद आ रही थी। हम इसलिए नहीं रो रहे थे कि पापा होते तो नौकरी देते। तरक्की देते। ग्लैमर का रास्ता खोलते। या आगे बढ़ने का मौक़ा देते। हम इसलिए रो रहे थे कि अगर मेरी शादी से सबसे ज़्यादा ख़ुशी किसी को होती तो वो पापा ही होते। मम्मी ये कह कर रो रही थीं कि कितना अच्छा होता कि सुरेंदर बहू को मुंह दिखाई देता। ससुर बनता। देखती कि साहेब बना सुरेंदर बहू से घूंघट करवाता है कि नहीं? जब मेरा बेटा हुआ तो एक बार फिर सब रोए । फिर वहीं ग़म । पापा होते तो अपने पोते को देख फूले नहीं समाते। इस बार अस्पताल में ही मम्मी ने पूछा कि बेटे का कुछ नाम सोचे हो? मैंने कहा कि मम्मी , अभी नहीं। इस बारे में घर में जाकर बात करेंगे। मैं अपनी मां से कैसे कहता कि मेरे बेटे की जान ख़तरे में है। पैदा होते ही उस पर मौत मंडराने लगा है। अस्पताल में इस दौरान मैं अकेले में बार –बार यही सोचता था कि क्या यहीं मेरी नियती है कि पापा भी नहीं और बेटा भी नहीं ? बच्चे की मां बार बार कहती कि बेटे का कहां रखा हैं। मैं उस बार दिलासा दिलाता- अभी तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है। तुम्हारी तबीयत ठीक होते ही उसे तुम्हारे पास ले आऊंगा। मम्मी पूछती थीं कि इतने दिनों तक डॉक्टर बच्चे को जच्चे से अलग नहीं रखते । ये कैसा अस्पताल और डॉक्टर है, जो बच्चे को जच्चे से दूर रख रहे हैं ? मैं दिल्ली के उन तमाम मंदिरों, मस्जिदों, गिरजघरों और मज़ारों पर गया। ये सब वहीं जगहें हैं, जहां मैं पापा की ज़िंदगी की दुआओं के लिए कई बार गया था। इस बार मेरे साथ नंदलाल थे। नंदलाल को बहुत कम लोग जानते होंगे। नंदलाल पापा की गाड़ी चलाया करते थे। बहुत लंबे समय तक। ख़ैर , डॉक्टरों ने बच्चे को सुरक्षित घोषित कर दिया। इसके बाद बारी आई – बच्चे की नाम की। पारिवारिक परंपराओं से उलट मैंने बेटे का नाम तय करने का फैसला किया। घरवालों ने नाम सुना तो बेहद ख़ुश हुए। सबका बस एक ही सुझाव था- इसके नाम में जात-पात न हो। इसका सरनेम सुरेंद्र हों। आख़िरकार मेरे बेटे का नाम रखा गया अंश सुरेंद्र । &lt;br /&gt;अस्पताल में सबने लाख जतन किए कि किसी तरह पापा बच जाएं। ख़ून के रिश्तों से भी बढ़कर दिबांग ने दिन रात एक कर दिया था। क़मर वहीद नक़वी जी दिलासा देते थे कि नक्षत्र बताते हैं कि वो जल्द ही अस्पताल से ठीक होकर लौंटेंगे। संजय पुगलिया का अस्पताल आकर कोने में कुछ देर तक ख़ामोश खड़े रहना। अमित जज, नंदिता जैन, रामकृपाल जी और कमेलश दीक्षित का लगातार आना-जाना। राम बहादुर राय जी की कोशिश - पूजा पाठ और हवन के ज़रिए अनहोनी को टाला जाए। सबसे मिलकर लगता था कि नहीं , पापा लौटेंगे। मुझे विवेक बख़्शी दिलासा दिलाता था कि सब ठीक हो जाएगा। रात को कई बार मैं दीपक चौरसिया, आशुतोष,  अंशुमान त्रिपाठी, राकेश त्रिपाठी और धर्मवीर सिन्हा रूकते थे। इस विश्वास के साथ कि पापा लौंटेंगे। लेकिन सब बेकार।&lt;br /&gt;जब उनके पार्थिव शरीर को लेकर हम घर आने लगे तो मैं थरथरा रहा था। मैंने रामकृपाल चाचा से आग्रह किया कि वो मेरे साथ बैठें। मेरे अंदर हिम्मत नहीं है। सहीं में, पापा के बग़ैर ये सोचकर ही हिम्मत जवाब दे गई थी। मैं फूट फूटकर रो नहीं पा रहा था। जिसका  मैं अंश था , उसे ही मैं जलाने जा रहा था। श्मशान में पापा के बगल में बैठकर ख़ूब रोया। ख़ैर, मैं तो उनका अंश था। मैंने एम जे अकबर और सीतराम केसरी को भी फूट- फूटकर रोते देखा। मेरे साथ दिबांग ने भी एक तरह से पुत्र धर्म का निर्वाह किया। पापा को धू- धू जलते देख मैं बौखला उठा। मेरे पिता मेरे पास आए और कहा- ये सच है। तुम्हारा बाप मर गया। बाप वो नहीं होता, जो जन्म देता। बाप वो होता , जो उसे लायक बनाता है। बस इतना याद रखना – भले ही अपने बाप की इज्ज़त न बढ़ा सको लेकिन बट्टा मन लगाना।  &lt;br /&gt;कोशिश कर रहा हूं कि अपने वादे पर खरा उतरूं। दुनिया को ख़ामोशी के साथ बदलते देख रहा हूं। ऐसे में पापा और ज़्यादा याद आते है। वो अक्सर अकेले में समझाया करते थे कि अगर झूठ नहीं बोल सकते तो दिल्ली में बोलना बंद कर दो। सफल रहोगे। ये दिल्ली है। लेकिन क्या करूं। हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग, रो-रो के अपनी बात कहने की आदत नहीं रही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-1927708873152136121?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/1927708873152136121/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=1927708873152136121&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1927708873152136121'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1927708873152136121'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/06/blog-post_1425.html' title='हर पल , हर लम्हा याद आते हैं पापा'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkDP2YasoZI/AAAAAAAAAII/eyCWOjMf_8U/s72-c/all-three.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-1021791043881094314</id><published>2009-06-23T01:52:00.000-07:00</published><updated>2009-06-23T01:53:50.456-07:00</updated><title type='text'>एस.पी.सिंह</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkCYEd-WZDI/AAAAAAAAAIA/ShdCukVjpPM/s1600-h/Youth+SP.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 279px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SkCYEd-WZDI/AAAAAAAAAIA/ShdCukVjpPM/s400/Youth+SP.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5350443559849190450" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ये तस्वीर उन दिनों की है, जब पापा रविवार में थे। लगभग 32 साल पुरानी तस्वीर है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-1021791043881094314?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/1021791043881094314/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=1021791043881094314&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1021791043881094314'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1021791043881094314'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/06/blog-post_23.html' title='एस.पी.सिंह'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-684472565969671128?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/684472565969671128/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=684472565969671128&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/684472565969671128'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/684472565969671128'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/06/blog-post_22.html' title='एस.पी. सिंह'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/Sj-FHKi45_I/AAAAAAAAAH4/EiJnP39ui18/s72-c/front+page.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-5726708408184104430</id><published>2009-06-13T03:25:00.001-07:00</published><updated>2009-06-13T03:27:01.860-07:00</updated><title type='text'>पापा, मैं और श्मशान घाट</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SjN-xAVWQVI/AAAAAAAAAHw/1WeAelfW54U/s1600-h/17.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 245px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SjN-xAVWQVI/AAAAAAAAAHw/1WeAelfW54U/s400/17.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346756562987139410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मैं भी दिल्ली आकर पत्रकारिता करने लगा। शुरूआत में मुझे दैनिक आज के श्री सत्य प्रकाश असीम जी, दैनिक हिंदुस्तान के के.के. पांडेय जी और साप्ताहिक हिंदुस्तान के श्री राजेंद्र काला जी ने बेहद प्रोत्साहित किया। लेकिन सहीं मायनों में मुझे श्री आलोक तोमर जी ने करंट न्यूज़ के ज़रिए मुझे ब्रेक दिया। पाक्षिक से साप्ताहिक बनने वाली अमित नंदे की पत्रिका की टीम में मुझे आलोक कुमार, कुमार समीर सिंह , अनामी शरण बबल और फोटोग्राफर अनिल शर्मा जैसे दोस्त मिले। मैं दिल्ली में रहकर भी पापा के साथ नहीं रहता था। शुरू में तकलीफ हुई । लेकिन पापा ने साफ कहा कि जहां मेरी मदद हो आ जाना । लेकिन इस महानगर में तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है। तुम्हे आटा –दाल का भाव मालूम होना चाहिए। ख़ैर नब्बे के दशक में मुझे ढ़ाई हज़ार रुपए पगार मिलते थे। पापा ने बस इतना ही कहा था कि कांक्रीट के इस महानगर में राजमिस्त्री भी इतना कमा लेता है। एक अच्छी लाइफ स्टाइल के लिए ये पैसे कम है।&lt;br /&gt;बहरहाल , पापा जब भी कलकत्ता जाते, मुझे पहले ही बता देते कि इस तारीख़ को जा रहा हूं, तुम भी पहुंच जाना। पापा हवाई रास्ते से पहुंचे और मैं अपनी छुक –छुक से उनसे एक दिन पहले पहुंच जाता। ऐसा ही एक वाकया है। मुझे कुर्ता पायजमा पहनने का बड़ा शौक़ हैं। ये शौक़ पापा को भी था। उन्होने मुझे दिल्ली में भी कुर्ता पायज़ामे में देखा था लेकिन कुथ कहा नहीं। इस बार जब वो कोलकाता गए तो एक बैग मेरे हवाले किया। उसमें दर्जन भर से ज़्यादा कुर्ता पायजामा था। मैं बैग खोलते ही हैरान था। इतने में पापा कमरे में आए और कहा- सब डिज़ाइनर्स हैं। पहना करो ऐसा कि अच्छा लगे, दिल को भी और आंखों को भी। &lt;br /&gt;शाम चार बजते ही पापा का बुलावा आया- घूमने जाना है। इस घूमते का मतलब होता था कि चलो बाप-दादाओं ने जो संपत्ति छोड़ गए हैं, उसे देखकर आते हैं। मेरे बाबा ने कोलकाता के गारूलिया में बहुत सारे बाड़ी बनवाए थे। बंगाल में बाड़ी वैसे ही होता है , जैसे कि मुबंई में चॉल। एक –एक बाड़ी में अस्सी सौ कमरे होते थे बरामदों के साथ। साथ में काफी खुला मैदान भी होता था। बीस पच्चीस बाड़ियों का चक्कर लगाने का मतलब होता था- डेढ़ से दौ घंटे। इस दौरान कई लोग पापा से मिलते थे। पापा बेहद खुलकर उनसे बात करते थे। बातचीत भी घर परिवार या समाज या राजनीति की नहीं। कोई मिल गया तो शुरू हो गई शिकायत- मालिक, ज़रा अशरफिया को डांट दीजिए। आज कल वो बिलाटर ( बांग्ला देशी दारू) पीकर मुहल्ले में सबको गाली बकता है। वो इस बात को भी ध्यान से सुनते थे। थोड़ी दूर जाने पर जग्गू रिक्शा वाला मिलता था। उससे मिलकर वो बेहद खुश होते थे। जग्गू बताता था कि उसके घर में आजकल क्या चल रहा है। बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। वो पापा को क्लास मेट था, जो बेरोज़गारी की वजह से रिक्शा चलाता था। रास्ते में सूरज चौधरी मिलते थे। पापा उससे भी बहुत घुलकर बात करते थे। वो भी पापा के बहुत पुराने दोस्त थे। नगरपालिका में वॉरमैन का काम करते थे। वो सुबह चार बजे जाकर पानी का बटन आन करते थे और सुब नौ बजे आफ । फिर सुबह 10 बजे आन करने थे और दोपहर बारह बजे आफ। फिर शाम को चार बजे आन करते थे और रात नौ बजे आफ। शहर में पानी आने और न आने के लिए अगर कोई ज़िम्मेदार था तो वो सूरज चचा थे। इस बात को गारूलिया शहर का बच्चा जानता था। पापा उन्हे प्यार से सूरजा कहते थे। सूरज चचा खेल के भी बेहद शौकीन थे। वो अपने समय में स्थानीय क्लब की ओऱ से श्याम थापा और सुब्रतो बनर्जी जैसे फुटबालरों के खिलाफ भी खेल चुके थे। बचपन में हम सूरज चचा को देधकर डरते थे। क्योंकि उनका वो सवा छह फीट लंबे और वेस्ट इंडीज के खिलाड़ियों वाले रंग के थे। सूरज चचा से बतियाने के बाद पापा श्मशान घाट पहुंचते थे। श्मशान से सटा ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा भी हमारा था, जहां बच्चे खेलते थे। &lt;br /&gt;श्मशान में घुसते ही बड़ा से पीपल और बरगद का पेड़ था। तब .ये हमारे इलाक़े का इकलौता श्मशान घाट था। लकड़ी से लाशें जलाई जाती थीं। इसी श्मशान में हमनें अपनी बुआ का अंतिम संस्कार किया था। वही बुआ, जिन्होने मुझे , मेरे पापा और मेरे बाबा को पाला था। यहां पहुंचते ही मुझे बुआ याद आती थीं और पापा को ? केवल बुआ ही नहीं , उनके बाबा भी याद आते थे। ये वो लम्हा होता था ,जब पापा मेरे कंधे पर हाथ रख कर खड़े होते थे। क्योंकि उस समय मेरे परिवार में किसी भी बेटे की इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि वो अपने पिता के बराबर या सामने खड़ा हो सके। पापा मेरे कंधे पर हाथ रखकर श्मशान को देखते थे। आसमान को देखते थे। फिर पीपल के नीचे बने चबूतरे पर हम दोनों बैठ जाते थे। यूं ही लगभग पांच –दस मिनट। हममें कोई बातचीत नहीं होती थी। हम दोनों विपरीत दिशाओं में देखते थे। अचानक पापा अठकर खड़े होते थे और मैं उनके पीछे- पीछे घर की ओऱ चल देता था। इसी तरह मेरी पापा से आख़िरी मुलाक़ात श्मशान घाट में ही हुई। लोदी रोड का श्मशान घाट। जहां इससे पहले मेरे परिवार से किसी का अंतिम संस्कार नहीं हुआ था। दाह संस्कार के बाद मैं इस बार पापा को छोड़कर अकेले घर लौटा। मेरे साथ पापा नहीं थे। श्मशान सच हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-5726708408184104430?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/5726708408184104430/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=5726708408184104430&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/5726708408184104430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/5726708408184104430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='पापा, मैं और श्मशान घाट'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SjN-xAVWQVI/AAAAAAAAAHw/1WeAelfW54U/s72-c/17.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-4701160677567898629</id><published>2009-06-12T05:31:00.000-07:00</published><updated>2009-06-12T07:04:48.970-07:00</updated><title type='text'>27 जून को पापा की बरसी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SjJL7gOrREI/AAAAAAAAAGs/u5GvQz1DDKA/s1600-h/sp1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 243px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SjJL7gOrREI/AAAAAAAAAGs/u5GvQz1DDKA/s400/sp1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346419193278055490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बड़ी मुश्किल होती है, जब किसी बेइंतहा क़रीबी के बारे में लिखना पड़े। कुछ यही हाल मेरा है। पुष्कर पुष्प जी ने एस. पी. सिंह यानी पापा के बारे में मुझे कुछ लिखने को कहा। मैं बिलकुल वैसा ही काम रहा हूं , जैसा कि किसी आंधी तूफान में बरगद का बड़ा पेड़ उखड़ जाए । इसके बाद लोग उसकी फुनगी से पूछें कि ये कैसे हुआ ? &lt;br /&gt;एसपी को मैं पापा कहता हूं। वो मेरे सगे पापा नहीं हैं। न हीं उन्होने समाज के सामने ढोल पीटकर और न ही लिखा-पढ़ी कर मुझे बेटा बनाया। रिश्तों की उलझन में समझना चाहें तो वो मेरे चाचा थे। जब मैं बोलना सीख रहा थी तब मेरे बाबा ( दादाजी), आजी ( दादी जी) और मम्मी ने कहा कि ये पापा हैं। तब से उन्हे पापा कह रहा हूं। बचपन में बड़ी मुश्किल होती थी सगे पापा और पापा के संबोधन को लेकर। लेकिन घरवालों ने इसका भी तोड़ निकाल दिया। पापा बंबई में नौकरी करने लगे और दोनों पापा की पहचान अलग करने के लिए मुझे सिखा दिया गया—कहो, बंबईया पापा। जब मैं थोड़ा समझदार हुआ तो ख़ुद ही इस संबोधन से बंबइया को निकाल दिया। &lt;br /&gt;पापा ने कभी मुझे चाचा का प्यार नहीं दिया। मुझे हमेशा बेटे का ही प्यार और दुलार मिला। हम दोनों को रिश्ते में कभी ये अहसास नहीं रहा कि वो मेरे सगे पापा नहीं हैं, वो केवल चाचा हैं। ये तो दिल्ली वालों की देन हैं, जो मुझे बेटे के तौर पर नहीं, भतीजे के तौर पर जानने लगे। मुझे याद है कि पापा एक बार बीबीसी के नरेश कौशिक जी के साथ गप्पे लड़ा रहे थे। नरेश जी लंदन से आए हुए थे। मैं कमरे में दाख़िल हुआ तो नरेश कौशिक ने मेरे बारे में पूछा तो पापा ने कहा – बेटा है। उनकी आंखे हैरत से फैल गईं। पूछा- एसपी, तुम्हारा इतना बड़ा बेटा ? पापा ने हंसकर कहा- बेटे और भतीजे में कोई फ़र्क़ होता है क्या? एक बार सुहासिनी अली घर पर पर आईं। मुझे देखते ही कहा कि अरे, ये तो जवानी का एसपी है। पापा से मज़ाक का रिश्ता रखनेवाले किसी ने जवाब दिया- हमारे यहां, पड़ोसियों से शक्ल नहीं मिलती।&lt;br /&gt;मेरे बाबा चार भाई थे। मेरे बाबा तीसरे नंबर पर थे। चार में से तीन बाबा कोलकाता में ही रहते थे। लेकिन सबसे बड़े बाबा कभी भी ग़ाज़ीपुर छोड़ने को राज़ी नहीं हुए। ये तीनों बाबा कभी ग़ाज़ीपुर बसने को राज़ी नहीं हुए। बड़का बाबा साल छह महीने में कोलकाता घूमने के लिए आते थे। हम बच्चे चारों को बाबा ही कहते थे। लेकिन कई बार आजियों को समझ में नहीं आता कि हम किस बाबा की बात कर रहे हैं। रिश्तों के इस उलझन को दूर करने का रास्ता निकाला गया। सबसे बड़े बाबा का नाम बड़का बाबा। दूसरे वाले बाबा का नाम दुकनिया बाबा। ये नाम इसलिए क्योंकि बड़े अफसर बनने से पहले अपने जवानी में वो मोटर गाड़ियों और गहनों के दुकान के मालिक थे। सबसे छोटे बाबा का नाम रखा गया बुच्ची बाबा। उनकी भाभियां उन्हे प्यार से घर में बुच्ची बुलाती थीं। इससे सब बाबाओं का संबोधन साफ हो गया। अब तीन बाबा तो रहे नहीं, सबसे छोटे बाबा की उम्र ख़ासी हो गई है। बाबा के चारों भाइय़ों के अलगाव का होश तो मुझे नहीं हैं लेकिन इसका दर्द मैंने हमेशा अपने पापा और बाबा दोनों में ही पाया। &lt;br /&gt;मेरे पिता जी तीन भाई। सबसे बड़े मुझे जन्म देनेवाले पापा ( नरेंद्र प्रताप) , उसके बाद पापा ( सुरेंद्र प्रताप ) और उसके बाद छोटे चाचा ( सत्येंद्र प्रताप) । मेरे अलावा एक और भाई है। मुझे पालने पोसने में घर के जिन लोगों ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई, वो थे मेरे बाबा । उन्होने मेरी पढ़ाई लिखाई का सारा बोझ उठाया। इसके अलावा हमारे घर में बुआ थीं। वो मेरे बाबा की बुआ थी, जो विधवा होने के बाद बाबा के साथ यानी हमारे साथ रहती थीं। उन्होने केवल मुझे ही नहीं, बल्कि मुझसे पहले के पीढ़ी के लोगों को पाला पोसा। उन्होने पापा को भी पाला था। मुझे याद हैं, मैं सोया रहता था तो वो फूल ( पीतल या कांसे की तरह के बर्तन) के एक बड़े से कटोरे में ढ़ेर सारा दूध, गुढ़ की भेली और रोटियां मीसकर मुझे खिलाती थी। मैं नींद में ही खाते रहता था। मेरी मां घर का सारा काम काज करती थीं।   &lt;br /&gt;मेरे समय में कोई प्ले स्कूल था नहीं। मुहल्ले में ही एक प्राइमरी स्कूल था। जिसमें कुल चार जमात तक पढ़ाई होती थीं। उसमें मेरा दाख़िला करा दिया गया। मैं गदहिया गोल ( नर्सरी ) में जाने को तैयार नहीं था। रो रहा था। ख़बर बाबा को लगी। बाबा आए। बग़ैर किसी पूछताछ के गाल पर ज़ोरदार तमाचा रसीद किया। बगल में खड़ी मेरी सबसे छोटी बुआ ने मेरी ऊंगली पकड़कर स्कूल पहुंचा दिया। बाबा ने मुझे पहली और आख़िरी बार थप्पड़ मारा। मेरे बाबा सारा जीवन फैशन परस्ती और दिखाने से नफ़रत करते रहे। अगर घर में कोई भी लेटेस्ट फैशन के कपड़े या बालों में दिख जाए तो समझिए मुसीबत टूट पड़ी। बाबा की सोच थी कि फैशन से बिगड़ने का रास्ता बेहद क़रीब होता है। ज़िंदगी में मैंने जो पहली पतलून पहनी , वो मेरे मामा ने पहनाया। ज़िंदगी में जो पहली जींस पहनी , वो पापा ने दिए। जो पहली घड़ी पहनीं, वो भी पापा की दी हुई थी। पापा जब भर आते , तो वो मेरे छोटे भाई के लिए तरह तरह के उपहार लाते। इसमें वॉकमैंन से लेकर साइकिल तक शामिल है। लेकिन मुझे हमेशा तोहफे में किताबें मिलीं। इसमें कई किताब लल्ला जी ( योगेंद्र कुमार लल्ला, संयुक्त या सहायक संपादक, रविवार) भेजते थे। पापा ने मेरे छोटे भाई को मसूरी को स्कूल में पढ़ाया भी। पापा, मेरे छोटे भाई को बेहतरीन स्कूलों में पढ़ाते रहे और मैं सरकारी स्कूलों और कॉलेज में पढ़कर पापा के पेशे में आ गया। पापा , हमेशा मुझे पत्रकारिता में आने से रोकते रहे। कहते रहे कि कुछ और करो। लेकिन मुझ पर तो सनक सवार थी- पत्रकार बनने की। ख़ैर पापा ने मुझे रास्ता दिखाया। दो टूक में कह दिया – पत्रकार बनने का विरोध नहीं करूंगा लेकिन मुझसे कभी नौकरी की उम्मीद नहीं करना। वो अपने वचन पर आख़िरी वक़्त तक क़ायम रहे। करियर में मुझे शैलेश जी मिले, जिन्होने मुझे टीवी पत्रकार बनाया और बहुत बाद में श्री संजय पुगलिया मिले, जिन्होने मुझे आगे बढ़ाया। &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;27 जून को एस. पी.सिंह की पुण्यतिथि हैं। अगर आपके पास एसपी से जुड़ी कोई याद या तस्वीर है तो हमें ज़रूर भेजें।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-4701160677567898629?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/4701160677567898629/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=4701160677567898629&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/4701160677567898629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/4701160677567898629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/06/27.html' title='27 जून को पापा की बरसी'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SjJL7gOrREI/AAAAAAAAAGs/u5GvQz1DDKA/s72-c/sp1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-28222934461051067</id><published>2009-03-28T00:46:00.000-07:00</published><updated>2009-03-28T01:16:01.432-07:00</updated><title type='text'>आई एम ए कॉम्पलैन ब्यॉय</title><content type='html'>अस्सी कब के पार चुके लालकष्ण आडवाणी पर टीनएजर बनने का शौक़ चर्राया हुआ है। उन्हे किसी ने समझा दिया है कि हिंदुस्तान पर राज करना है तो नौजवानों को साथ लेना होगा। नौजवानों का मूड समझना होगा। नौजवानों के साथ चलना होगा। नौजवानों की तरह चलना होगा। आडवाणी को ये बात मुगली घुट्टी की तरह पिला दी गई है। जवानी का मंत्र समझते ही आडवाणी ने सबसे पहले कहा- या....हू.... यानी याहू पर चैट। कहने को वो टेक्नोफ्रेंडली बने। क्योंकि वो सिर्फ बोलते रहे , टाइप करनेवाले प्राणि और थे। इस चैट में भी आडवाणी ज़्यादातर आड़े-मेड़े, तिरछे सवालों से बचते रहे। बस ये साबित करने की कोशिश करते रहे कि नौजवानों की तरह वो भी इंटरनेटच पर चैट कर सकते हैं। बैल्कबैरी फोन का इस्तेमाल करना जानते हैं। थ्री जी -वी जी सब उनकी जेब में है। ब्लॉग-ब्लॉग भी खेलना उन्हे आता है। &lt;br /&gt;मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी है- बूढ़ी काकी। इसमें एक पंक्ति काफी प्रासंगिक है। लिखा है- बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुर्नागमन होता है। शायद ये बात आडवाणी पर भी लागू होती है। पंद्रहवी लोकसभा चुनाव में वो ये नहीं बोल रहे कि वो देश को आगे ले जाने के लिए औरों से बेहतर क्या कर सकते हैं। उनका कहना है कि देश ने इतना कमज़ोर प्रधानमंत्री ( मनमोहन सिंह को) नहीं देखा। सरकार तो दस जनपथ से सोनिया चला रही हैं। अरे भाई, जब और वाजपेयी मिलकर सरकार चला रहे थे तो सच बोलिए- नागपुर आपलोगों को चलाता था या नहीं। मदनदास देवी जैसे नेता आपलोगों से क्यों मिलने आते थे। गिरिराज किशोर और अशोक सिंघल को क्यों मनाना पड़ता था। &lt;br /&gt;ख़ैर , आप करें तो चमत्कार और मनमोहन करें तो कोई और कार्य.......अब आडवाणी जी ताल ठोंक रहे हैं कि मनमोहन में हिम्मत हो तो टीवी चैनल पर बहस कर दिखाएं। कांग्रेस ने मना कर दिया तो दावा कर रहे हैं कि जो आदमी बहस नहीं कर सकता, वो सरकार क्या चलाएगा। आडवाणी जी, मैं भी इस देश का नागरिक हूं। जितना हक़ आप रखते हैं कि किसी को चैलेंज करने का , उतना ही लोकतांत्रिक हक़ मेरा भी है आपको चैलेज करने का। मुझे ये समझा दीजिए कि गाल बजाने और सरकार चलाने में क्या मेल है। क्या आप ये साबित करना चाहते हैं कि जो ज़्यादा बोलने में उस्ताद होगा, देश -सरकार केवल वहीं चला सकता है। फिर तो कम बोलनेवाले कभी सरकार चला ही नहीं सकते। &lt;br /&gt;आडवाणी जी, आप किसी कुटिया से कोई भी शिलाजीत खाएं, देश को फर्क नहीं पड़ता। आप सिंकारा पिएं या एनर्जिक 32 खाएं, इससे भी देश को फर्क नहीं पड़ता। हार्लिक्स पिए, बॉर्नविटा खाएं या कुछ और - इससे भी अपने जैसे लोगों को फर्क नहीं पढ़ता। आपको नेट पर चैट करना आता है या नहीं, या ब्लॉगिंग में आप माहिर हों या नहीं- अपन जैसे मतदाताओं को फर्क नहीं पड़ता। हमें तो फर्क पड़ता है उससे, जो अच्छी सरकार देने की कोशिश करे। जिसके सरकार में कोई सहयोगी पार्टी प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री पर अंबानी घराने से घूस खाने का आरोप न लगाए। जो सरकार दंगा करानेवालों को बचाव न करती हो। जो सरकार, आतकंवादियों को सिर आंखों पर बिठाकर अफ़गानिस्तान छोड़ने न जाती हो । जिस सरकार का आधा समय कभी ममता बनर्जी और जयललिता को रूठने-मनाने में न जाता हो। जो कभी ये न कहे कि मंदिर वहीं बनेगा, फिर कहे- पार्टी बिल्डिंग बनाने का काम नहीं करती। सरकार , जो कहे , सो करे। &lt;br /&gt;आडवाणी जी एंड पार्टी से विनम्र आग्रह है कि अगर वो इन तमाम बातों को मानेंगे तो देश की जनता उन्हे ताज देगी। अगर 92 की तरह फिर काठ की हांडी चढ़ाने की कोशिश की तो जनता उन्हे बनवास देगी। जनता को फर्क नहीं पड़ता कि आप धोती कुर्ता में हैं या फिर अट्ठारह साल के नौजवान की तरह कैपरी और टी शर्ट में - जिसके सीने पर आसमान ताकती ऊंगली हो और प्यार भर चार अक्षर। &lt;br /&gt;आडवाणी जी, चुनाव भर आपसे ऐसे ही बातें करता रहूंगा। &lt;br /&gt;आपका एक मतदाता&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-28222934461051067?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/28222934461051067/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=28222934461051067&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/28222934461051067'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/28222934461051067'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='आई एम ए कॉम्पलैन ब्यॉय'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-8829675052007108974</id><published>2009-02-08T02:28:00.001-08:00</published><updated>2009-02-08T02:31:45.948-08:00</updated><title type='text'>राम का नाम बदनाम न करो !</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SY60hvWOLZI/AAAAAAAAAF8/22OcF-CcjMk/s1600-h/babri.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 250px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SY60hvWOLZI/AAAAAAAAAF8/22OcF-CcjMk/s400/babri.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5300372303200005522" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;18 साल बाद बीजेपी को एक बार फिर मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम की याद आई है। ये याद तब आई है, जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। ये याद तब आई है, जब पार्टी मुसीबत में है। कहते हैं न कि मुसीबत के समय ही भगवान याद आते हैं। यही हाल लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, वेकैय्या नायडू, अरूण जेटली , सुषमा स्वराज और रविशंकर प्रसदा की है। अगर चुनाव सिर पर नो होता, आंतकवाद, महंगाई जैसे चुनावी चमकदार शस्त्र टूट नहीं गए होते और पार्टी की हालत पतली न होती तो शायद फिर राम याद न आते। क्योंकि बीजेपी ने अपने शासनकाल में एक बार साबित तो कर ही दिया है- बीजेपी के नेता ठाठ में और हमारे राज जी बेचारे हैं टाट में। बीजेपी एक बार फिर लोगों के आंखों में धूल झोंकने आई है। लोगों को एक बार फिर आपस में बांटने आई है। बीजेपी एक बार फिर हमारे संवेदानाओं के साथ खिलवाड़ करने आई है। बीजेपी एक बार फिर हमारे घाव को हरे करने आई है। बीजेपी एक बार फिर काठ की हांडी को चढ़ाने आई है। बीजेपी को एक बार श्री राम की याद सताई है। &lt;br /&gt;समाज के एक बड़े हिस्से की शिकायत है कि अपनी गद्दी बचाने के लिए मांडा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन का ब्रम्हास्त्र चलाया था। बात तो की थी कि इससे देश के दबे-कुचले, वंचित-शोषित लोग आगे आएंगे। तो फिर ये आलोचना बीजेपी के लिए क्यों नहीं ? बीजेपी ने भी तो देश को बांटने का काम किया था और आज भी कर रही है। सत्ता की भागीदारी पाने के लिए ( दूसरी तरफ से नाक पकड़कर) लेफ्ट के साथ वी.पी.सिंह की सरकार का साथ दिया था। फिर बीजेपी को लगा कि थोड़ी सी और मेहनत की जाए तो सत्ता की चाबी मिल जाएगी। कथित लौहपुरूष का रथ पूरे देश में निकला। जिधर से भी गुज़रा, अपने पीछे सांप्रदायिकता का काला धुंआ छोड़ गया। जिधर -जिधर से आडवाणी का रथ गुज़रा , उसके गुज़रते ही उस इलाक़े में ज़हर घुल गया। क्या -क्या पापड़ नहीं बेले बीजेपी ने ? अयोध्या में राम मंदिर बनाने का वादा किया, समान क़ानून संहिता और संविधान के अनुच्छेद 371 को ख़त्म करने का वादा किया था। चुनावी मंच से बीजेपी के नेता जब ये वादा करते थे तो लोगों को लगता था कि ये लोग गंगा में खड़े होकर हाथ में तांबे का लोटा, तुलसी का पत्ता, गोबर और गंगा जल लेकर वादा कर रहे हैं। ये लोग नेता नहीं हैं। ये तो अपने हैं, जो अपने दिल की बात कर रहे हैं। ये उन लोगों की सोच थी, जो इस देश में बहुसंख्यक हैं। राम मंदिर बनाने के लिए बीजेपी ने साध्वी ऋतंभरा, साध्वी उमा भारती, विनय कटियार जैसे फायर ब्रांड नेताओं को मंच पर उतारा। शाखाओं से बाहर निकलकर पहली बार मंच से लोगों सं संवाद क़ाय़म करने के लिए इन नेताओं जो शैली और बोली चुनी, वो लोगों के तन बदन में आग लगा देती थी। ऐसे अनगिनमत मंचों , रैलियों और भाषणों का गवाह रहा हूं मैं। &lt;br /&gt;1. राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। &lt;br /&gt;2. याचना नहीं अब रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा।&lt;br /&gt;3. बाबर के औलादों से ख़ून का बदला लेना है।&lt;br /&gt;ये नारे थे बीजेपी के । समझ सकते हैं आप कि इन नारों ने बहुसंख्यक समाज पर कैसा असर डाला होगा। भाषण भी ऐसे कि एक तबके का लहू खौल जाए। साध्वी की ज़ुबां से - बहुत सहा है। अब नहीं सहेंगे। नहीं चाहिए कटा हुए देश और कटे हुए लोग। इस अंश का अर्थ परिभाषित करने की ज़रूरत है क्या ? &lt;br /&gt;मुझे याद है कि बीजेपी का ये सपना बहुसंख्यक समाज का सपना हो गया था। जूट मिल में जिस मज़दूर की दिहाड़ी अस्सी से सौ रुपए की थी, उसने भी पांच सौ रूपए का योगदान दिया था। संघ और बीजेपी के कार्यकर्ता आम लोगों को समझाने में क़ामयाब हो गए थे कि इन्ही ईंटों से उनके राम की मंदिर बनाई जा रही है। एक ईंट की क़ीमत पांच सौ रूपए हैं। ऐसे अनगिनत पैसे बीजेपी और संघ के पास ताकि "अजोधा" राम मंदिर बन सके। &lt;br /&gt;बीजेपी सरकार में आई। पहले अपनी तेरहवीं मना कर विदा हुई और फिर तेरह महीने के फेरे में पड़ कर बाहर हुई। लोगों को  लगा कि अगर बीजेपी को जनादेश पूरा मिला होता तो शायद उनका सपना अब तक पूरा हो गया होता। इसके बाद के चुनाव में लोगों ने और उत्साह के साथ बीजेपी को वोट दिया। बीजेपी अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पांच साल सरकार चलाने में क़ामयाब रही। लोगों को लगा कि इस मर्तबा उनका सपना पूरा होगा। &lt;br /&gt;राम जन्म भूमि न्यास के तब के मुखिया महंत परमहंस जी ने चेतावनी दे दी कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मंदिर का काम शुरू नहीं कराया तो प्राण तज देंगे। उनकी ज़िद और लोकप्रियता का अंदाजा़ बीजेपी नेताओं को था। क्योंकि उनके इसी सपने को सत्ता के लिए बीजेपी ने नारे में बदल दिया था। प्रधानमंत्री के विशेष दूत भागे-भागे अयोध्या गए। महंत को समझाने बुझाने का प्रयास किया। लेकनि वो टस से मस नहीं हुए। तब के उप प्रधानमंत्री ( मुझे याद नहीं कि तब तक वो " लौह पुरूष " बन पाए थे या नहीं) लाल कृष्ण आडवाणी ने दो टूक कह दिया कि मंदिर नहीं बन सकता। क्योंकि केंद्र में बीजेपी की सरकार नहीं है। केंद्र में मिली -जुली सरकार है। केंद्र में बीजेपी की नहीं , एनडीए की सरकार है। इस मुद्दे ( राम मंदिर ) पर सबकी राय एक नहीं है। अब पता नहीं कि आज की तारीख़ में आडवाणी या शिष्य ये न कह दें कि उन्होने ऐसा नहीं कहा। मीडिया ने उनकी बातों को तोड़ा- मरोड़ा। उनके कहने का ये मतलब नहीं था। उनके कहने का गडलत मतलब निकाला गया। महंत परमहंस जी इस दुनिया से विदा हो गए । लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हो पाया। &lt;br /&gt;बीजेपी इस बार भी अकेले चुनाव नहीं लड़ रही। इस बार भी उनके संग एनडीए है। क्या इस बार एनडीए राम मंदिर बनाने के लिए मान गया है ?  क्या ओम प्रकाश चौटाला, नीतीश कुमार , बीजू पटनायक आदि से इस बारे में बात हो गई है ? अगर नहीं तो बीजेपी इस बार भी मंदिर कैसे बनाएगी ? क्या एनडीए के सहयोगी दलों को एतराज़ नहीं होगा ? &lt;br /&gt;नागपुर में बीजेपी कहती है कि राम मंदिर बनाने के लिए तमाम अड़चनों को दूर करेगी। सरकार में आते ही फास्ट ट्रैक कोर्ट बना देगी। ताकि जल्द ही विवाद का हल निकल जाए। यानी बीजेपी ये मान कर चल रही है कि वो जो फास्ट ट्रैक कोट्र बनाएगी, उसका जज ये फैसला देगा कि जिस जगह पर बीजेपी चाहती है , वहीं पर मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम का जन्म हुआ था। आतातायी बाबर ने मंदिर ने तोड़कर मस्जिद बना दिया था। फास्ट ट्रैक कोर्ट वही सब कहेगी , जो बीजेपी चाहती है। क्या इस लोकतांत्रिक देश में ये संभव है ? &lt;br /&gt;बीजेपी अगर सत्ता में आने के बाद कहती कि वो राम मंदिर बनाने के लिए कोशिश कर रही है, तो उन लोगों को बुरा नहीं लगता, जो राम मंदिर बनते हुए देखना चाहते हैं। लेकिन चुनाव से पहले एक बार फिर मंदिर बनाने का गदा भांजकर बीजेपी ने मंदिर भक्तों के मन में एक बार फिर शक़ के बीज बो दिए और वो लोग सोचने को मजबूर हो गए हैं कि हर चुनाव के पहले ही बीजेपी को राम की याद क्यों आती है ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-8829675052007108974?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/8829675052007108974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=8829675052007108974&amp;isPopup=true' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8829675052007108974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/8829675052007108974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/02/blog-post_08.html' title='राम का नाम बदनाम न करो !'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SY60hvWOLZI/AAAAAAAAAF8/22OcF-CcjMk/s72-c/babri.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-126484166136336241</id><published>2009-02-02T22:45:00.000-08:00</published><updated>2009-02-02T23:26:48.250-08:00</updated><title type='text'>क़समें, वादे, प्यार- वफ़ा सब- बातें हैं , बातों क्या फ़िज़ा</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SYfxeP1uxPI/AAAAAAAAAFs/P2gMl1fPi9c/s1600-h/fiza.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 227px; height: 250px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SYfxeP1uxPI/AAAAAAAAAFs/P2gMl1fPi9c/s400/fiza.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298468988574942450" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बदली की ओट में चांद क्या छिपा, फ़िज़ा ही बदल गई है। फ़िज़ की ज़िंदगी में जब बहार की जगह अमावस की रात होगी तो वो बदलेगी ही। हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम चंद्रमोहन उर्फ चांद मोहम्मद और अनुराधा बाली उर्फ फ़िज़ा की मोहब्बत को नज़र लग गई। अब चांद मोहम्मद कुछ कह रहे हैं और फिज़ा कुछ और। ऐसे हालात में फ़ैज़ अहमद फैज़ बेसाख़्ता याद आते हैं। उन्होने लिखा है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग&lt;br /&gt;मैंने समझा था इक तू है तो दरख़्शां है हयात&lt;br /&gt;तेरा ग़म है तो ग़म ए दहर का झगड़ा क्या है&lt;br /&gt;तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सोहबत&lt;br /&gt;तेरी आंखों के सिवाए दुनिया में रक्खा क्या है&lt;br /&gt;तू जो मिल जाए तो तक़दीर निग़ाह हो जाए&lt;br /&gt;यूं ना था मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ैज़ अहमद फैज़ की इस कृति की कुछ आख़िरी पंक्तियां यूं है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे&lt;br /&gt;अब भी दिलकश है तेरा हुस्नमगर क्या कीजे&lt;br /&gt;और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवाए&lt;br /&gt;राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इसे पढ़ने के बाद चांद मोहम्मद और फिज़ा की मोहब्बत भरी दास्तां पर टूटी सितम का अंदाज़ा लगा सकते हैं। अभी कुछ महीने भी नहीं बीते थे कि चंद्रमोहन ने अपनी अनुराधा बाली के लिए घर बार, पत्नी, बच्चा, मां- बांप, भाई -बहन - सबको तज दिया था। यहां तक कि हरियाणा के डिप्टी सीएम की कुर्सी भी। अनुराधा ने भी अपने चंद्रमोहन के लिए पति छोड़ा। सरकारी वकील की बड़ी नौकरी छोड़ी। यहां तक कि औरत का सबसे बड़ा गहना - लाज को भी मुहब्बत के लिए तिलांजलि दे दी। शादी में आनेवाली बाधाओं को दूर करने के लिए मज़हब तक बदल लिया। चंद्रमोहन चांद बन गया और अनुराधा बन गई चांद की फ़िज़ा। दोनों बाहों में बाहें डाले दुनिया के सामने आए। चांद ने कहा कि पहली पत्नी सीमा के रहते ज़िंदगी में घुटन आ गई थी। कहने का कुछ यूं अंदाज़ था कि जिंदगी में अब तो बहार आई है। अब इसी फिज़ा में ज़रा सुक़ून तो लेने दो। फ़िज़ा भी फूले नहीं समा रही थी। बरसों बाद आंचल में प्यार बरस रहा था। दोनों की मुहब्बत भरी कहानी ने मटुकनाथ और जूली की कहानी को भी पीछे छोड़ दिया। सबसे हॉटेस्ट लव स्टोरी बनी फ़िज़ा और चांद की लव स्टोरी। इस जोड़ी को देखने के लिए मीडिया की भी बेताबी देखते बन पड़ती थी। याद आता है इस जोड़े के प्रेस क्लब में बुलाया गया था। इस जोड़े की ख़बर लेने मेरे साथ मेरे वरिष्ठ सहयोगी उमेश जोशी और साथी रोहिल पुरी भी गए। मेरे आदरणीय परवेज़ अहमद साहेब ने प्रेस क्लब में चचा ग़ालिब को याद करते हुए दुआएं दी थी। शायद चचा की आड़ में वो इस जोड़े को ताक़ीद भी कर रहे थे। उनके स्वागत करने का तरीक़ा कुछ यूं था- ये इश्क़ नहीं आसां ग़ालिब बस यूं समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। इस दौरान दोनों ने साथ जीने मरने की क़समें खाई। मज़हब बदलने पर सफ़ाई दी। हुस्न के जुनून में खोए राजनेता को ये स्वीकारने में भी गुरेज नहीं था कि दिल की बाज़ी जीतने में वो कुर्सी की बाज़ी हार गए हैं। वो बस फिज़ा को निहार रहे थे। दुनिया को दिखा रहे थे कि देखो, मेरे पास मलिका ए हुस्न है। &lt;br /&gt;फिर एक दिन यकायक चांद कहीं खो गया। फिज़ा बदल गई। फिज़ा ने कहा- मेरे शौहर को मार पीट कर अगवा किया गया है। ये काम उनके छोटे भाई कुलदीप विश्नोई ने किया है। कुलदीप ने आरोप को नकारा। शाम क धर्म की नगरी हरिद्वार में चांद निकला। चांद का कहना था कि वो अपनी मर्ज़ी से हरिद्वार में उग आया है। वो धर्मयात्रा पर है। वो कोई बच्चा नहीं, जो कोई उसे अगवा कर लेगा। शायद ये बेवफाई, ये जुदाई फ़िज़ा से बर्दाश्त नहीं हुई। उसने बहुत सारी नींद की गोलियां खा ली। वो अपनी मुहब्बत को शायद रूसवा होते नहीं देखना चाहती थी। उसे उम्मीद थी कि चांद उसके आंगन में ज़रूर लौटकर आएगा। क्योंकि उसकी चांदनी से चमकता है। लेकिन चांद नहीं आया। उसने खुलकर बेवफाई की बात करने लगी। दुनिया को मोबाइल पर प्रेम रस दिखाया। रोई, ज़ार-ज़ार रोई। दिल से रोई। फफक कर रोई। क्योंकि उसका चांद उससे दूर जा चुका था। चोट काई नागिन की तरह उसने एलान कर दिया- चांद ने फ़िजा की केवल मुहब्बत देखी है, दूसरा चेहरा नहीं देखा। सच कहा फ़िज़ा ने। महबूबा के दो चेहरे होते हैं। ये हर आशिक़ जानता है। एक वो जब वो हर लम्हा चंद्रमुखी दिखती है और अपने अंदर सूरजमुखी छिपाए रखती है। &lt;br /&gt;चांद और फिज़ा की इस लव स्टोरी, जिसका नाम है- कमबख़्त इश्क़ 2008। शायद इसी तरह के अंजाम को देखकर कभी ये लिखा गया होगा- &lt;br /&gt;क़िस्मत को देखिए , कहां टूटी कमंद&lt;br /&gt;जबकि दो -चार हाथ लमे बाम रह गया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-126484166136336241?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/126484166136336241/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=126484166136336241&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/126484166136336241'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/126484166136336241'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='क़समें, वादे, प्यार- वफ़ा सब- बातें हैं , बातों क्या फ़िज़ा'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SYfxeP1uxPI/AAAAAAAAAFs/P2gMl1fPi9c/s72-c/fiza.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-6216513766906155684</id><published>2009-01-26T04:21:00.000-08:00</published><updated>2009-01-26T04:59:45.035-08:00</updated><title type='text'>अब गांव में भी ये देखने को नहीं मिलता</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SX2zskV-tHI/AAAAAAAAAFU/MppLouNW40g/s1600-h/Bicycle.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SX2zskV-tHI/AAAAAAAAAFU/MppLouNW40g/s400/Bicycle.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5295586315109053554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिनों से एक मंज़र नज़रों के सामने घूम रहा है। ये मंज़र, ये दृश्य मैंने कई बार छुटपने में देखा है। दिमाग़ में अब भी वो शॉट फ्लैश बैक की तरह घूमते रहता है। लेकिन अब देखने को नहीं मिलता। कई बार कोशिश की तो पाया कि अब हिंदुस्तान का गांव भी बदल गया है। सरकारी नारा झूठ नहीं है कि गांव बदल रहा है।&lt;br /&gt;छोटा था तो अक्सर देखता था कि कोई नौजवान पतली , कच्ची-पक्की गलियों में चमचमाती हुई अपनी नई साइकिल को पूरी रफ्तार के साथ चला रहा होता था। साइकिल के आगे बने कैरियर में एक ट्रांजिस्टर होता था, जो अपनी पूरी दम-खम के साथ चिल्ला रहा होता था। उन दिनों जो गाने सबसे पॉपुलर होते थे, वो ट्रांजिस्टर पर सुनने को मिलता था। अक्सर दुपहरिया में सुनने को मिलता था- फुलौड़ी बिना चटनी कैसे बनी ? आग लगे सैंय्या तोहार ,भांग के पिसाई में -केतना दर्द होला,राति के कलाई में। इन गानों को फुल वॉल्युम में सुनाने वाला बांका नौजवान ख़ुद को उस गांव या मुहल्ले का सबसे बड़ा कैसेनेवा समझता था। कई बार इस तरह के नौजवानों की कलाई में सुनहरे रंग की घड़ी चमचमा रही होती थी। पूछने पर पता चलता था कि ये एचएमटी की काजल है। अब ज़रा पोशाक को भी देख लीजिए। कोई भी महीना हो- नौजवान थ्रीपीस सूट या फिर सफारी सूट में होता था। अमूमन ये रंग ब्राउन या फिर क्रीम कलर का होता था। जूता भी लाल रंग या यू कहें कि टैन कलर का होता था। और मोजा- उसका रंग शायद सर्वप्रिय था। लाल रंग का मोजा। ये पहचान थी उस ज़माने की नए दुल्हे की। जिसके पास नई साइकिल, काजल की घड़ी, ट्रांजिस्टर , थ्री पीस सूट और लाल जूता- मोजा हो , समझ लीजिए नया नवेला दुल्हा बना है। इस पहचान को मैंने कई बार कई राज्यों के कई गांवों और क़स्बों में तलाशने की कोशिशश की। कई लोगों से बात की। पूछा - देखा है अब कहीं ऐसा दुल्हा? हर जगह से एक ही जवाब - आजकल ये सब कहां होता है? गांव भी तो बदल रहा है। क्या वाकई हमारे देश का गांव बदल गया है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-6216513766906155684?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/6216513766906155684/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=6216513766906155684&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/6216513766906155684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/6216513766906155684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/01/blog-post_26.html' title='अब गांव में भी ये देखने को नहीं मिलता'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SX2zskV-tHI/AAAAAAAAAFU/MppLouNW40g/s72-c/Bicycle.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-6639066162556389836</id><published>2009-01-17T01:32:00.000-08:00</published><updated>2009-01-17T02:22:03.655-08:00</updated><title type='text'>सरकार क्यों चाहती है मीडिया पर अंकुश लगाना ?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SXGxPnkQgYI/AAAAAAAAAFM/g7SiIE-CEFE/s1600-h/BAPU.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 166px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SXGxPnkQgYI/AAAAAAAAAFM/g7SiIE-CEFE/s400/BAPU.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5292205919014257026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर कांग्रेस की सरकार मीडिया का गला घोंटने की तैयारी कर रही है। सरकार केवल नियमों में बदलाव करना चाहती है। क्योंकि सरकार को लगता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया को अपनी जि़म्मेदारी की समझ नहीं है। सरकार कहती है कि देश पर आतंकवादी हमलों और दंगों के समय में टीवी चैनलों की रिपोर्टिग सही और संयमित होनी चाहिए। यानी सरकार ये कह रही है कि अब तक टीवी चैनलों ने सधी हुई रिपोर्टिंग नहीं की है। क्यों ? शायद सरकार इसका जवाह अभी नहीं दे पाए। लेकिन बार-बार वो मुंबई आतंकवादी हमले की रिपोर्टिंग का हवाला दे रही है। इसलिए सरकार चाहती है कि टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग पर सरकार की लगाम हो। अगर सरकार अपनी मंशा में क़ामयाब हो जाती है , तो फिर क्या होगा ? &lt;br /&gt;फ़र्ज़ कीजिए किसी शहर में दंगा हो गया हो। सुबह सात बजे की बुलेटिन की शुरूआत ऐसे होगी। नमस्कार , मैं हूं ओम सिंह और आप देख रहे हैं .... चैनल। अभी -अभी ख़बर मिली है कि सूरत में दंगे हो भड़क गए हैं। लेकिन अभी हम आपको ये नहीं बताएंगे कि किस समुदाय के बीच दंगा हो रहा है। दंगा किसने शुरू किया। इस दंगे में कितने लोग मारे गए हैं। कितने लोग घायल हुए हैं। कितने दुकान-मकान जलाए गए हैं। इस दंगे का असर शहर , राज्य और देश पर क्या पड़ रहा है। क्योंकि सरकार ने हमें ये सब बताने को मना किया है। इस बारे में हम आपको शाम पांच बजे के बाद बता पाएंगे। आप य न सोचें कि हमारे पास रिपोर्टर नहीं है। ये फाइव विंडों में देखे मनीष मासूम अभी खुमार उतारने में लगे हैं। विवेक वाजपेयी किसी पुलिसवाले से गपिया रहे हैं। दीपक बिस्ट की नज़रें कुछ खोज रही हैं। योगेंद्र प्रजापति को किसी का इंतजार है औऱ रोहिल पुरी अपने लैपटॉप पर कुछ देख रहे हैं। ये सब दफ्तर में ही हैं। लेकिन रिपोर्टिंग पर नहीं जाएंगे। गाड़ी भी , सीएनजी भी है और कैमरापर्सन भी । हमें सरकार ने बताया है कि बल्लीमारान में शादी ब्याह का वीएचएस फिल्म बनानेवाले रऊफ चाचा से बात हो गई है। वो हमें पैंतीस सेकेंड का विज़ुअल दे देंगे। डीएम साहेब अपनी बाइट भी 20 सेकेंड का भेज देंगे। डीएम साहेब ही बताएंगे कि दंगा कब , कैसे शुरू हुआ। हम मौक़े पर मौजूद चश्मदीदों-गवाहों ज़ाकिर, अरूण , विनीत, अल्ताफ और सीता बेन की बात पर भरोसा नहीं करेंगे।  &lt;br /&gt;सुबह नौ बजे का बुलेटिन। नमस्कार . मैं हूं ओम सिंह और आप देख रहे हैं .... न्यूज़। सबसे पहले आपको बताते हैं कि गुजरात में दंगा हुआ है। लेकिन इस बारे में अभी आपको कुछ नहीं बताएंगे। क्योंकि एख घंटे पहले ही हमने इस बारे में आपको जानकारी दी थी। डिटेल में शाम को पांच बजे के बाद बताएंगे। फिलहाल सबसे बड़ी ख़बर, प्रधानमंत्री ने राजीव फ्लाई ओवर का उदघाटन किया है। इस पुल के बनने से अब लोदी रोड आने जाने में काफी आसानी होगी। लोगों को ट्रैफिक में नहीं फंसने होगा। मिनटों की दूरी सेकेंडों में पूरी होगी। प्रधानमंत्री ने यूपीए अध्यक्ष के कहने पर इस पुल को बनवाया है। यूपीए अध्यक्ष को बहुत तकलीफ होती थी जब प्रियंका के पति राबर्ट के दोस्तों में आने जाने में परेशानी होती थी। उनके सभी दोस्तों के पास लाल औऱ नीली बत्ती की सुविधा नहीं है। दूसरी बड़ी ख़बर, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री फौरन अमेठी रवाना हो गए हैं। वहां वो शिओ देवी से मिलेंगे। शिओ दंवी के पांच बच्चे हैं और पति कैा देहांत हो गया है। गुज़र-बसर करने में दिक़्क़त हो रही है। कांग्रेस के युवराज कल उनके यहां रात को ठहरे थे। लट्टू से लेकर पंखा तक उसके घर में नहीं है। युवराज से उनकी तकलीफ देखी नहीं गई। उन्होने अपने मम्मी से इस बारे में बात की। मम्मी ने प्रदानमंत्री से सब कुछ ठीक करने को कहा। प्रधानमंत्री ने ग्रामीण विकास मंत्री को भेजा है। अह शिओं देवी के घर के सामने से स्वर्णिम योजना गुज़रेगी। रोज़गार गारंटी योजना के तहत शिओं देवी को 365 दिन काम मिलेंगा। बिजली मंत्री आज शाम को घर जाएंगे। शिओ देवी के घर पर लट्टू लगवाएंगे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री थोड़ी देर में पहुंचेगे। बच्चों को स्कूल में एडमिशन कराएंगे। तो देखा आपने - कांग्रेस का हाथ , ग़रीबों के साथ है। फिर मिलेंगे , नमस्कार। &lt;br /&gt;शाम पांच बजे- सबसे पहले बात गुजरात दंगे की । डीएम ने कहा है कि सूरत में मुर्गी पकड़ने के लिए मुहल्ले के दो गुटों में संघर्ष हो गया। प्रशासन ने फौरन पुलिस बल तैनान कर दिए। हालात सामान्य हैं। अफ़वाह फैलानेवालों की ख़बर ली जाएगी। &lt;br /&gt;कुछ ऐसी ही न्यूज़ बुलेटिन देखे जाएंगे। क्योंकि सरकार के इशारे पर नाचने का हुक़्म होगा। ये हुक़्म लोकतंत्र में क़ानून की आड़ में होगा। क्योंकि इलेक्ट्रानिक मीडिया से देश की अखंडता , अक्ष्णुता और एकता ख़तरे में न पड़े। टीवी चैनलों ने मुंबई हमले के समय क्या दिखाया। सब स्क्रीन पर होटल के बाहर के शॉट्स दिखे। सभी कैमरापर्सन और रिपोर्टर होटला से ढ़ाई-तीन सौ मीटर दूर खड़े थे। सरकार का बयान हास्यास्पद है कि आतंकवादी टीवी देखकर चौकस हो रहे थे। यानी वो आतंकवादी सरहद पार कर सिर्फ टीवी देखने आए थे और टीवी देख देखकर आग लगा रहे थे। हथगोले फेंक रहे थे । गोलियां चला रहे थे। लोगों की हत्या कर रहे थे। ये इनकाउंटर कई घंटे चला था। यानी आतंकवादी अख़बार भी पढ़ रहे होंगे। किस पन्ने पर कितने कॉलम में ख़बर है। फोटो है कि नहीं। इटंरनेट भी पढ़ रहे होंगे। सरकार कहती है तो शायद ऐसा ही हुआ होगा। &lt;br /&gt;सोनिया की सासू मां इंदिरा गांधी ने अपने लाड़ले संजय गांधी के साथ मिलकर आपातकाल की घोषणा कर दी। अख़बारों और पत्रिकाओं पर हंटर चलने लगे। जिन रीढ की हड्डी वाले पत्रकारों ने रेंगने से मना कर दिया , उन पर ज़ुल्म हुए। जेल बेजे गए। क्योंकि उनसे देश को ख़तरा था। लोकतंत्र बहुत देऱ तक किसी की तानाशाही बर्दाश्त नहीं करता। चुनाव में लोकंतंत्र ने मां- बेटे को ऐसी सज़ा दी, जो उनका परिवार कभी भूल नहीं सकता। पहली बार देश की सत्ता नेहरू-गांधी परिवार के हाथ से निकल गई। इसके बाद इंदिरा की मौत के बाद राहुल गांधी ने मानहानि विधेयक लाने की कोशिश की। लेकनि पत्रकारों के इंक़लाबी तेवर देखकर वो अपने क़दम पीछे हटने को मजबूर हो गए। तब प्रियरंजन दासमुंशी उनके बेहद क़रीबी सलाहकारों में से होते थे। अअ यही काम मनमोहन सिंह कर रहे हैं और इस सरकार में फिर प्रियरंजन दासमुंशी शामिल हैं। जब तक लिखने की आज़ादी है- अपन लिख सकते हैं। मनमोहन जी, इंदिरा- संजय और राजीव के फैसले और जनता के फैसले को याद कीजिए और फिर जो मन में आए कीजिए। क्योंकि देश प्रेम तो सिर्फ आप लोगों को ही आता है। हम पत्रकारों का क्या है ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-6639066162556389836?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/6639066162556389836/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=6639066162556389836&amp;isPopup=true' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/6639066162556389836'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/6639066162556389836'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/01/blog-post_17.html' title='सरकार क्यों चाहती है मीडिया पर अंकुश लगाना ?'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SXGxPnkQgYI/AAAAAAAAAFM/g7SiIE-CEFE/s72-c/BAPU.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-7330656447484999132</id><published>2009-01-15T02:55:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T03:31:17.844-08:00</updated><title type='text'>लालू की जय हो</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SW8edGJhWQI/AAAAAAAAAFE/dEgzEEDz2PU/s1600-h/lalu.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 294px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SW8edGJhWQI/AAAAAAAAAFE/dEgzEEDz2PU/s400/lalu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291481572399208706" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अपने रेल मंत्री लालू प्रसाद भी कमाल के हैं। परदे के पीछे चाहें उन्हे जो भी अफसर चलाता हो लेिकन टीवी पर आकर वही लोगों को चराते हैं। िपछले कई बरस से रेल बजट पेश के दौरान क़ामयाबी के गीत गाते हैं। किराया नहीं बढ़ता । पब्लिक भी ख़ुश हो जाती है। लेकिन लालू कब चुपके से किस मद में भाड़ा बढ़ा देते हैं, ये बात ढोल बजाकर नहीं बताई जाती। आज में लालू के महान काम का एक नमूना पेश करने जा रहा हूं। &lt;br /&gt;12 जनवरी को मेरे एक रिश्तेदार बनारस से दिल्ली आ रहे थे। मुझे उनका रिसीव करने जाना था। घर से निकलने से पहले सोचा कि क्यों न हाई टेक रेलवे से पता करके स्टेशन जाया जाए। क्योंकि इन दिनों रेल गाड़ियां देर से चल रही हैं। रेल मंत्रालय ने अख़बारों में कई बार बड़े बड़े विज्ञापन दिए। कई नंबर फ्लैश किए। लालू जी जापान में बुलेट ट्रेन देखकर भारत में दौड़ाने की घोषणा कर रहे थे। मेरे लिए ये किसी चमत्कार से कम नहीं था। मुझे खुशी हो रही थी कि टैक्स देने का सुख हमें मिलेगा। अच्छी गाड़ियां और स्टेशन सिर्फ विदेशों में ही नहीं मिलेंगे। इसी सोच के साथ मैंने कई नंबरों पर फोन घुमाया। लेकिन मेरा भ्रम टूटना लगा। किसी भी नंबर पर किसी ने भी फोन नहीं उठाया। इसके बाद मैनें रेलवे की हाई टेक सिस्टम का इस्तेमाल करने की सोची। मैंने 139 पर फोन किया। हाई टेक सिस्टम था भई। बताए गए निर्देशों का पालन करने लगा। नारी स्वर में - भारतीय रेलवे पूछताछ सेवा में आपका स्वागत है। हिंदी में जानकारी के लिए एक दबाएं। मैंने एक दबा दिया। फिर ट्रेनों की आवाजाही के लिए कुछ और नंबर दबाने का निर्देश आया। वो भी कर दिया। इसके बाद ट्रेन नंबर पूछा गया। शिवगंगा एक्सप्रेस जब बनारस से दिल्ली आती है तो उसका नंबर 2559 होता है और जाते समय उसका नंबर 2560 हो जाता है। रेलवे पूछताछ कंप्यूटर सिस्टम में आने और जाने की गाड़ियों के नंबर दर्ज होने का मैने जो अनुमान लगाया था, वो ग़लत निकला। आगमन की जानकारी के लिए ट्रेन नंबर लिखने का निर्देश आया। मैने किया। फिर प्रस्थान स्टेशन का एसटीडी या स्टेशन कोड पूछा गया। जान कर आपको हैरानी होगी कि आगमन के लिए और प्रस्थान के लिए रलवे के अलग अलग संदेश नहीं थे। अगर आप 2559 नंबर ट्रेन का लिखकर एसटीडी कोड बनारस का लिख दें तो बनारस पहुंचने का टाइम बताया जाएगा। और अगर दिल्ली का एसटीडी लिख दें तो दिल्ली का। यानी रेलवे के हिंदी अफसर आगमान और प्रस्थान का सही मतलब नहीं जानते। ख़ैर - जानकारी मिली कि सुबह सात बजकर पच्चीस मिनट पर आनेवाली शिवगंगा एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से एक घंटा तीस मिनट के विलंब से यानी 8 बजकर 55 मिनट पर आएगी। &lt;br /&gt;स्टेशन पहुंचने के बाद पता चला कि प्लेटफॉर्म टिकिट नहीं मिलेगी। मेरी जो रिश्तेदार आ रही थी, वो काफी बुज़र्ग हैं और अकले सफ़र कर रही थीं। वो सामान के साथ अकेले कैसे बाहर आ पाएंगी- मैं इसी सोच में था। कोई रास्ता नहीं सूझ नहीं रहा था। मैंने एक रेलवे पुलिस को अपनी परेशानी बताई। उन्होने सुझाव दिया- पांच रुपए का टिकिट मिलेगा ग़ाज़ियाबाद ईएमयू का । ले लीजिए। मैंने उनसे पूछा कि कोई परेशानी नहीं होगी। उन्होने कहा- कोई पूछे तो बोल दो, ग़ाज़ियाबाद जाने की सोच कर आया था। ज़रूरी काम आ गया, वापिस जा रहा हूं। या अप डाउन दोनों ले लो। मैंने कहा- सर, प्लेटफार्म टिकिट न बेचने का मक़सद तो यही है न कि प्लेटफार्म पर फालतू भीड़ न हो। फिर तो सब यही करते होंगे। उन्होने तल्ख़ आवाज़ में कहा- सब करते हैं। आपको ज़रूरत है, आप भी कर लो। आप क़ानून की किताब क्यों पढ़ रहे है। मैं टका सा रह गया। &lt;br /&gt;अंदर गया। बहुत सारी ट्रेनें देर से चल रही थी। लेकिन माइक बार -बार माफी इस बात पर मांगी जा रही थी कि मुंबई से दिल्ली आनेवाली राजधानी एक्सप्रेस लेट है। बाकी ट्रेनों के लिए कोई माफी नहीं। मुझे लगा कि शायद ये सेवा चुनिंदा गाड़ियों के लिए रेल मंत्री जी ने बनाई होगी। हवाई जहाज़ वाले मुसाफिर रेल में आ जाएं, तो ऐसा करना पड़ता होगा। 9 .15 तक शिवगंगा एक्सप्रेस नहीं आई तो मैंने दुबारा 139 आप्शन का सहारा लिया। लेकिन वहां को तोता अब भी 8. 55 की रट लगाए था। 139 नंबर पर एख और आप्शन था, रेलवे कर्मचारी से बात करने का। मैंने बात की। फिर एक नारी स्वर। प्राइवेट कॉल सेंटर की तरह। मैडम ने पूरी पूछताछ की। कौन सी ट्रैन है। क्या नंबर है। कहां से कहां जा रही है। मैंन कहा -मैंडम आपको ट्रेन नंबर बता दिया है। आपका कंप्यूटर क्या ये नहीं बता सकता कि इस नंबर की ट्रेन कहां से कहां जाती है। मैडम बुरा मान गईं। ख़ैर उन्होने भी वहीं टाइम बताया जो लालू जी का रट्टा तोता बोल रहा था। मैनें कहा- मैंडल आप अपनी घड़ी देख लें। 8.55 हुए ज़माना बीत गया है। उन्होने कहा- मेरे पास यही लिख कर आ रहा है। मैं क्या करूं। मैंने कहा- मैंडम सही टाइम कहां से मिलेगा। उन्होने कहा- स्टेशन पर जाकर पूछताछ से पता करें। मैंने कहा- मैंडम - अगर उसी तरह से लाइन में लगकर बाबा आदम ज़माने वाले सिस्टम से ही चलना है तो काहें का ये सब टंटा पाल रखे हैं। जनता का पैसा पटिरयों पर बहा रहे हैं। विज्ञापन देते हैं। ग्लोबल मंदी है। जब बाबा आदम सिस्टम ही फॉलो करना है तो ये सब बंद कर ख़र्च कम करो। मैडम ने वैसे कहा तो नहीं - लेकिन फोन रखने का अंदाज़ बता गया कि ये सलाह पसंद नहीं आई। ख़ैर, उसके बाद से मैं ये सोच रहा हूं कि एक न एक दिन बुलेट ट्रेन भारत में भी दौड़ेगी। लेकिन कैसे। जैसे जापान में चलती है या फिर जैसे अपने यहां सभी ट्रेनें चलती हैं। सोचिए। हम भारतीय जनता केवल सोच ही सकते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-7330656447484999132?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/7330656447484999132/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=7330656447484999132&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/7330656447484999132'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/7330656447484999132'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='लालू की जय हो'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SW8edGJhWQI/AAAAAAAAAFE/dEgzEEDz2PU/s72-c/lalu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-3740197074975195231</id><published>2008-12-13T00:14:00.000-08:00</published><updated>2008-12-13T01:03:15.543-08:00</updated><title type='text'>कांग्रेस को मरवा देंगे मोइली</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SUN6Pg6j5HI/AAAAAAAAAE8/eLZHNQoKr-8/s1600-h/moliy.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SUN6Pg6j5HI/AAAAAAAAAE8/eLZHNQoKr-8/s400/moliy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5279197595160536178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस के नेता वीरप्पा मोइली बहुत दूर की कौड़ी खोज कर लाएं हैं। लेकिन उनकी कौड़ी को देखकर ऐसा लगता है कि वो कांग्रेस की ही वोट बैंक की मटकी फोड़ने के लिए है। विधानसभा चुनावों से पहले यूपीए सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किया था। इन सिफारिशों को लारने के पीछे सरकार की क्या सोच होगी। सीधे-सीधे इसका मतलब वोट बैंक की राजनीति से था। सरकार कर्मचारियों की तनख़्वाह बढ़ाकर अपना वोट बैंक बढ़ाने का इरादा रखती थी। लेकिन लगता है कि कांग्रेस के पुराने दिग्गज वीरप्पा मोइली कांग्रेस की ही लुटिया डूबो देंगे। वो जिस तरह की सिफारिश लेकर हाज़िर हुए हैं, वो सरकारी कर्मचारियों को ख़ून ख़ौलाने के लिए काफी है। &lt;br /&gt;सरकारी कर्माचारी अपनो काम काज के तौर तरीक़ों , बर्ताव, आचरण और दफ्तर को कितना समय देते हैं- ये सब जानते हैं। ये आज से नहीं, आदि -अनादि काल से चला आ रहा है। सरकारी कर्मचारियों की इमेज रही है कि वो न तो समय पर आफिस जाते हैं और न ही समय से आफिस से निकलते हैं। रेल मंत्री लालू प्रसाद ख़ुद इसके गवाह हैं। वो आफिस टाइम पर रेल भवन के गेट पर खड़े हो गए थे। मीडियावाले भी थे। देर से आनेवालों को ख़ूब फटकार लगाई। कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी। फिर हुआ क्या। कितनी बार रेल मंत्री फिर से रेल भवन के गेट पर खड़े मिले। सच उन्हे भी मालूम है। वो भी बेहतर नतीजे चाहते हैं। लेकिन कोई न कोई ऐसी मजबूरी है कि उनके हाथ पांव बंध गए हैं। मोइली साहेब चाहते हैं कि हर कर्मचारी का चौदह साल पर काम काज की समीक्षा हो। अगर उसका काम काज और बर्ताव संतोषजनक नही है तो इस बारे में उस कर्माचारी को बताया जाए। फिर 20 साल बाद उसकी काम काज की समीक्षा हो। अगर वो पैमाने की कसौटी पर ख़रा नहीं उतरता है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाए। मोइली चाहते हैं कि जिस तरह से प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारी काम करते हैं, उसी अंदाज़ में सरकारी कर्मचारी काम करें। &lt;br /&gt;लेकिन क्या संभव है। आप वाकई प्राइवेट कंपनियों की तरह रिज़ल्ट चाहते हैं तो प्राइवेट कंपनियों की पॉलिसी को अपनाएं। सालाना इंक्रेमेंट का इंतज़ाम करें , जो कर्मचारी के काम काज और व्यवहार के आधार पर हो। क्या सरकार ऐसा कर पाएगी। पहला रिव्यू चौदह साल पर ही क्यों। हर छह महीने या साल भर पर क्यों नहीं। मोइली राम के वनवास की तरह चौदह साल की सूई पर क्य़ों अटके हैं। मोइली की चले तो वो आईएएस, आईपीएस और आईआरएस में भी व्यवस्था ठीक कर दें। वो नहीं नहीं चाहते कि सिविल सर्विस की परीक्षा देनेवाला तीस साल के ऊपर का हो। वो नहीं चाहते कि जनरल कैटेगरी के  उम्मीदवार 25 साल की उम्र के बाद सिविल सर्विस की तैयारी में दिखे। उनकी नज़र एससी, एसटी और ओबीसी के भी उम्मीदवारों पर है। उनकी चलें तो वो उन बालिकाओं के सपनों की हत्या कर दें जो पहली बार या दूसरी बार या तीसरी बार मंज़िल नहीं पा लेते तो भी हौसला नहीं खोते । वो कोशिश करते रहते हैं। मोइली जी इन कोशिशों पर विराम लगाने के पक्षधर हैं। मोइली से पहले मोरारजी देसाई ने भी कई सिफारिशें की थीं। उनका क्या हश्र हुआ। एससी, एसटी और ओबीसी की आरक्षण को लेकर बी पी मंडल ने भी सिफारिशें तैयार की थी। लंबे समय तक वो सरकारी दफ्तरों में धूल फांकती रही। अगर राजनीतिक मजबूरी नहीं होती तो वो सिफारिशें भी लागू नहीं होतीं, जिसे लोग मंडल कमीशन के तौर पर याद करते हैं। &lt;br /&gt;मोइली साहेब ऐसे समय सिफारिशों का पिटारा लेकर आए हैं, जब कांग्रेस तीन राज्यों विधानसभा चुनाव जीती है। इस जीत से पहले सरकार को वेतन आयोग की सिफारिशों को कर सरकारी कर्मचारियों को ख़ुश करना पड़ा था। अब लोकसभा चुनाव सिर पर है। ऐसे में क्या आपको लगता है कि सरकार खेले खाए नेता वीरप्पा मोइली की सिफारिशों को माल लेगी और अपनी सरकार की क़ुर्बानी दे देगी ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-3740197074975195231?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/3740197074975195231/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=3740197074975195231&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3740197074975195231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3740197074975195231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2008/12/blog-post_13.html' title='कांग्रेस को मरवा देंगे मोइली'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SUN6Pg6j5HI/AAAAAAAAAE8/eLZHNQoKr-8/s72-c/moliy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-3628981208298162810</id><published>2008-12-09T05:10:00.000-08:00</published><updated>2008-12-09T05:32:38.329-08:00</updated><title type='text'>जो कहा था, वहीं हुआ दिल्ली में</title><content type='html'>&lt;&lt;br /&gt;मित्रों, एक बार फिर हाज़िर हूं एक नए लेख के साथ। नया कहना तो ग़लत होगा। लेकिन उसी बात को मैं फिर से कहने जा रहा हूं लेकिन अपने कुछ मित्रों की प्रत्रिक्रियाओं के साथ , जिन्होने मेरा लेख पढ़कर ईमानदारी से अपनी बात कही थी।&lt;br /&gt;मैने जो लेख लगभग सवा दो महीने पहले लिखा था, उसके पीछे चिंतन था, विश्लेषण था, भूत , वर्तमान और भविष्य का समिश्रण से निकला परिणाम था। मेरा ये शुरू से मानना रहा है कि देश की राजधानी दिल्ली में बीजेपी का समर्थन करनेवाले ऐसे कई सारे कट्टर मतदाता हैं, जो भीड़ में ख़ूब बीजेपी के लिए तर्क करते हैं। कैमरे और गनमाइक के सामने ख़ूब भाषण देते हैं। अपने बुज़ुर्ग पिता को संघ के शाखा में जाने के लिए ख़ूब प्रेरित करते हैं। लेकिन मतदान के दिन ऐसे कट्टर समर्थक पप्पू बन जाते हैं। रज़ाई ओढ़कर ख़ूब सोते हैं। उन्हे लगता है कि लोकतंत्र के महापर्व को सफल बनाने के लिए उन्होने अपने भाषणों से अपना काम कर लिया है। इनमें ज़्यादातर ऐसे लोग हैं, जिन्हे काम से बहुत कम फुर्सत मिलती है। मतदान का दिन अगर शुक्रवार या शनिवार पड़ गया तो भाग्य खुल गए। पैसा तो ख़ूब कमाया लेकिन परिवार के साथ समय बांटने का समय नहीं मिला। ऐसे समय को अपने परिवार के लिए देते हैं और आस पास के ख़ूबसूरत शहरों में छुट्टियां मनाने चले जाते हैं। यही रह जाती है बीजेपी की कोशिशें धरी की धरी। इस बार के चुनाव में हर जगह लड़ाई विकास बनाम नकारात्मक  प्रचार के बीच था। बीजेपी कहती थी कि कांग्रेस शासन में आतंकवाद फल फूल रहा है। लचर क़ानून है। फिर सवाल ये कि बीजेपी के शासन काल में राजस्थान, गुजरात , लोकतंत्र के स्तंभ संसद , लालक़िला, - कहां कहां नहीं आतंकवादी हमले हुए। पोटा का सोटा भी था। फिर बीजेपी ने क्या कर लिया। क्यों बीजेपी के दिग्गज लौह पुरूष की अगुवाई में ख़तकनाक आंतकवादियों को छोड़े। सवाल ये कि बीजेपी कैसे आतंकवाद को क़ाबू करेगी। बीजेपी के तमाम तर्क पढ़े लिखे लोगों को नहीं हज़म हुए। मंहगाई रोकने के लिए उनके पास कौन सा जादू का डंडा चलाएगी। बीजेपी के पास जवाब नहीं था। हर रोज़ इतवार नहीं होता। हर चुनाव में धार्मिक भावनाएं भड़काकर और उन्माद पैदा कर वैतरणी पार नहीं होती। दूसरी सोच ये थी कि पूरी दिल्ली में लोग बीजेपी -बीजेपी कर रहे थे। लेकिन पश्चिम दिल्ली के अलावा उनकी कहीं हवा नहीं लग रही थी। बाहरी दिल्ली में जो भी वोट बीजेपी को मिले, वो नाराज़ किसानों के ते। कंझावला के मुआवज़े को लेकर वो शीला सरकार से खुश नहीं थे। इसलिए बीजेपी को वोट दिया। मैंने अपने पहले के लेख में जो आंकड़ा दिया था, नतीजा भी लगभग वहीं है। मैंने कम से 42 और और ज़्यादा से ज़्यादा 45 सीटों का अनुमान लगाया था। नतीजा बी 42 सीटों का है। नीचे आप उस समय का लेख पढ़ सकते हैं, जिसमें मैने बीजेपी के नए महाजन अरूण जेटली का भी ज़िक्र किया था और विजय कुमार मल्होत्रा के नेतृत्व का भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-3628981208298162810?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/3628981208298162810/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=3628981208298162810&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3628981208298162810'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/3628981208298162810'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='जो कहा था, वहीं हुआ दिल्ली में'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-1137633990558902899</id><published>2008-11-21T22:31:00.000-08:00</published><updated>2008-11-21T22:35:53.326-08:00</updated><title type='text'>बीजेपी को महंगी पड़ेगी कांग्रेस</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SSeoHODnTbI/AAAAAAAAAEs/AN_RbPSuri0/s1600-h/arun.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 338px; height: 350px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SSeoHODnTbI/AAAAAAAAAEs/AN_RbPSuri0/s400/arun.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5271366730846260658" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt;दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने नारा दिया है &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;–&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt; मंहगी पड़ी है कांग्रेस। ये नारा बीजेपी के नए चाणक्य अरूण जेटली की दिमाग़ की उपज है। उन्हे लगता है कि जिस तरह से नारों के दम पर उन्होने गुजरात का युद्द जीत लिया था, वैसे ही दिल्ली जीत लेंगे। लेकिन कंप्यूटर युग में आंकड़ों के सहारे राजनीति करनेवाले जेटली भूल गए कि चमकदार नारों से चुनावी जंग नहीं जीती जाती। अगर ऐसा ही होता तो बीजेपी के महापराक्रमी दिवंगत प्रमोद महाजन का इंडिया शाइन का नारा टांय-टांय फिस्स नहीं होता और न ही अटल &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;–&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt; आडवाणी के सत्ता सुख के सपनों पर पानी फिरता। जेटली ने एमसीडी ( दिल्ली नगर निगम ) के चुनावी नतीजों को चरम-परम सत्य मानकर चुनावी चक्रव्यूह तैयार कर लिया। उन्हे सौ फीसदी यक़ीन था कि जिस तरह से नगर निगम के चुनावों में दिल्ली के मतदाताओं ने सीलिंग के मुद्दे पर नाराज़ होकर कांग्रेस को जड़ से उखाड़ फेंका है। ठीक वैसे ही विधानसभा के चुनावों में महंगाई और आतंकवाद से परेशान दिल्ली की जनता कांग्रेस को फिर से जड़ से उखाड़ देगी। अब जेटली साहेब को कौन समझाए कि डेटा में उलझी राजनीति में सपने देखना अच्छी बात है। लेकिन दिन में आंखें खोलकर सपने देखने में ख़तरा ज़्यादा होता है। &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt;दिल्ली के मतदाताओं की बात करें तो देश के दूसरे राज्यों, शहरों और महानगरों से इसकी मानसिकता बेहद अलग है। यहां के मतदाताओं की सोच ये है कि वो देश की राजधानी का मतदाता है। जातिगत और धार्मिक समीकरण इस राज्य में मुद्दों के आगे कमज़ोर पड़ जाते हैं। बीजेपी ने महंगाई की डुगडुगी सबसे पहले पीटनी शुरू कर दी। लेकिन शुरूआती दौर में बीजेपी को समझ में आ गया कि ये डुगडुगी बहुत देर नहीं बजेगी। दिल्ली का मतदाता जानता है कि महंगाई केवल दिल्ली में नहीं है। ये तस्वीर देश &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;–&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt;दुनिया की है। ऊपर से शीला सरकार के हाथ में दूसरे राज्यों की तरह ताक़त नहीं है। अगर महंगाई केंद्र की थोपी हुई है तो बीजेपी शासित राज्यों में मंहगाई क्यों है। क्यों नहीं जनता की भलाई के लिए बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें राजस्व का घाटा सहकर जनता को मंहगाई से बोझ से बचा रही हैं। दरअसल बीजेपी 1998 के चुनाव में जो प्याज़ के आंसू रो चुकी है, उसका बदला वो मंहगाई के ज़रिए चुकाना चाहती है। लेकिन इस मुद्दे पर बीजेपी का दाल नहीं गल रही। &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt;दिल्ली में एक के बाद एक कई बम ब्लास्ट हुए। बीजेपी को लगा कि इस मुद्दे को ज़ोर शोर से उछालने पर सत्ता का लड्डू हाथ लग सकता है। आतंकवाद की आड़ में उसने लोगों को डराना शुरू कर दिया। मतदाताओं को समझाने में लग गए कि शीला और कांग्रेस सरकार के रहते आतंकवादियों के हौंसले बेहद मज़बूत है। आम आदमी महफूज़ नहीं है। कांग्रेस सरकार ने पोटा ख़त्म कर दिया। लेकिन ये नारा भी फिस्स हो गया। कई इलाक़ों में मतदाताओं ने बीजेपी उम्मीदवारों से सीधे पूछ लिया कि केंद्र में जब बीजेपी की सरकार थी तब संसद पर हमला क्यों हुआ। केंद्र में जब एनडीए की सरकार थी तब आतंकवादियों ने काठमांडु से प्लेन हाइजैक कर कांधार ले जाने में कामयाब कैसे हुए। एनडीए सरकार की नीति इतनी सख़्त थी तो सरकार ने आतंवादियों को छोड़ा क्यों। बीजेपी के शासनकाल में गुजरात और राजस्थान में आतंकवादी वारदातें कैसी हुई। एनडीए के राज में पाकिस्तानी सेना आतंकवादियों के साथ करगिल में कैसे घुस गए। एक साथ इतने सारे बेचैन करनेवाले सवालों के जवाब बीजेपी अभी तक नहीं तलाश पाई है। &lt;span style=""&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt;कांग्रेस ने बीजेपी के हर निगेटिव प्रचार का पॉज़िटिव जवाब दिया। कांग्रेस ने दो टूक पूछा कि दिल्ली में विकास के काम हुए हैं कि नहीं। दिल्ली में फ्लाई ओवर्स बनें हैं कि नहीं। दिल्ली में फुटओवर ब्रिज बने हैं कि नहीं। दिल्ली में हरियाली बाक़ी शहरों से ज़्यादा है कि नहीं । अनधिकृत कॉलोनियों को प्रोविज़नल सर्टिफिकेट दिए गए हैं कि नहीं। इन कॉलोनियों में पानी, बिजली , सड़क की सुविधा दी गई है कि नहीं। दिल्ली में 32 सरकारी अस्पताल हैं कि नहीं। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे दसवीं के इम्तिहान में पास होने का रिकार्ड बना रहे हैं कि नहीं। बीजेपी एक बार फिर इतने सारे सवालों को सुनकर चकरा गई। बीजेपी के चाणक्य अरूण जेटली दूर की कौड़ी खोज कर लाए। ढ़िंढोरा पीटकर कहने लगे कि ये विजय कुमार मल्होत्रा की देन है। मल्होत्रा ने 1967 में जो सपना देखा था, वो अब पूरा हो रहा है। विकास पुरूष मल्होत्रा ने 67 में पहला फ्लाई ओवर बनवाया था। अब बीजेपी से कोई ये पूछे कि मल्होत्रा के बाद मदन लाल खुराना सत्ता में आए। साहिब सिंह वर्मा आए। सुषमा स्वराज आईँ। लेकिन उन्होने क्यों नहीं विजय कुमार मल्होत्रा के सपने को साकार किया। ये सपने शीला सरकार को ही क्यों साकार करने पड़े। &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt;इस बीच राजेंद्र नगर सीट से बीजेपी प्रत्याशी पूरनचंद योगी की रहस्यमय हालत में मौत हो गई। उनकी लाश घर में पंखे से लटकी हुई मिली। लेकिन बीजेपी के बड़े नेता इसे दबाने में लगे रहे। तीन बार के विधायक की मौत को ज़्यादा तूल नहीं देना चाह रहे थे। क्योंकि बीजेपी नेताओं को शक़ है कि अगर जांच ने चुनाव से पहले रफ्तार पकड़ ली तो पार्टी की फज़ीहत हो सकती है। इस रहस्यमय मौत में बीजेपी के स्थानीय नेताओं की साज़िश हो सकती है। क्योंकि तीन बार के विधायक योगी को टिकिट पाने के लिए इस बार दिन रात एक कर देना पड़ा था। ये एक औऱ बड़ी वहज है, जिसकी वजह से बीजेपी की इमेज और भी ख़राब हुई है। रही सही कसर बीजेपी की नेता पूनम आज़ाद ने पूरी कर दी। उन्हे टिकिट नहीं दिया गया। उन्होने खुलकर बीजेपी में पंजाबी लोगों का इज्ज़त है। भोजपुरी बोलनेवालों से बीजेपी बैठकों में चटाई बिछाने का काम कराती है। शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ खड़े बीजेपी उम्मीदवार विजय जॉली की प्रैस कांफ्रेस में बीजेपी कार्यकर्ताओं में जूते चप्पल चलने से और भी फज़ीहत हुई हैं। &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:16;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:16;"  lang="HI" &gt;दिल्ली के चुनावों में बीजेपी का डेटा गणित ये है कि 70 विधानसभा सीटों में कम से कम 60 पर उनकी जीत होगी। इतना आत्मविश्वास आज तक किसी भी पार्टी में नहीं देखा गया।बीजेपी को लगता है कि दिल्ली में बीएसपी के ताक़तवर होने से कांग्रेस कमज़ोर होगी। लेकिन वो भूल रही है कि बीएसपी कई जगहों पर बीजेपी का खेल बिगाड़ रही है। अभी तक का चुनावी गणित जो संकेत दे रहा है , उसके मुताबिक़, शीला सरकार के पांच मंत्री भारी बहुमत से जीत रहे हैं। योगानंद शास्त्री को कड़ी चुनौती मिल रही है। 69 सीटों में से कांग्रेस को अगर 42 से 45 सीटें मिल जाए तो हैरानी वाली बात नहीं होनी चाहिए। तब जाकर शायद एक बार फिर बीजेपी को ये बात समझ आ जाएगी कि चमकदार नारों के शस्त्र के सहारे चुनावी जंग नहीं जीती जाती। &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1239897313559897574-1137633990558902899?l=hinditvmedia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/feeds/1137633990558902899/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1239897313559897574&amp;postID=1137633990558902899&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1137633990558902899'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1239897313559897574/posts/default/1137633990558902899'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hinditvmedia.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='बीजेपी को महंगी पड़ेगी कांग्रेस'/><author><name>Chandan Pratap Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09595423436631301175</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://bp3.blogger.com/_-6zdpRrPIso/SA8ygU3VhII/AAAAAAAAABg/wweTJzZ5uUY/S220/3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SSeoHODnTbI/AAAAAAAAAEs/AN_RbPSuri0/s72-c/arun.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1239897313559897574.post-7913696030891275078</id><published>2008-10-29T02:19:00.000-07:00</published><updated>2008-10-29T02:55:44.859-07:00</updated><title type='text'>फिर मुंबई में बचेगा क्या, बाबाजी का घंटा?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SQgy44JXcsI/AAAAAAAAAEk/Z0Kea8AEJoU/s1600-h/rajthackeray.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 250px; height: 175px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_-6zdpRrPIso/SQgy44JXcsI/AAAAAAAAAEk/Z0Kea8AEJoU/s400/rajthackeray.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5262512117308158658" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फिर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;छिड़&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जंग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गैर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मराठी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मराठियों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बीच&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दुकान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चलाने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;राज&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उद्धव&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;म्यान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;तलवार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;निकाल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ली&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सब&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सुर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चीख&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;इंच&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ज़मीन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ग़ैर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मराठियों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;घराने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चीख&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; -&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पुकार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;विधवा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;विलाप&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अति&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उत्साही&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पराक्रमी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;शामिल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हैं।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बीच&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सड़क&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; , &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बीचे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चौराहे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पब्लिक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ट्रांसपोर्ट&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ज़रिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सफर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;करनेवालों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मराठियों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गाज&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गिरने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लगी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मारे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कुछ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दशक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पहले&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बात&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कार्टून&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बनाने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;धंधा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;छोड़कर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;राजनीति&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दुकान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;खोली।&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;धंधा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चमकाने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिंदूवादी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नारा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिया।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;केसरिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रंग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सहित&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पूरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लहराने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लगा।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अपार&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जनसमर्थन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देखकर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सत्ता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सुख&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चौंधिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गए।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बीजेपी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सत्ता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सुख&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दरकार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;थी।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दोनों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मिले।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;राज्य&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मिलकर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सरकार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चलाई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;केंद्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दूसरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कांधा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिया।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दोनों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सोच&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जैसी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दोनों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बात&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जैसी।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लेकिन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;यहां&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चतुर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;निकले।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उन्होने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिंदुओं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बंटवारा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिंदू&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;घराने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नज़रों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;वो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उनकी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बिरादरी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिंदू&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बीजेपी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अखंड&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भारत&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नारा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;था।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उसकी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सहयोगी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;शिवसेना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उससे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उपजे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;झाड़&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फूंस&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अब&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;खंड&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; -&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;खंड&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भारत&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नारा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बीजेपी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सपना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देखा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;था&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नारा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;था&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अब&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उसे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उसकी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ही&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सहयोगी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पार्टी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चूर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चूर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रही&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;डंके&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चोट&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एलान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;धरती&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;इंच&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ज़मीन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दूसरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;प्रदेशों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;न&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क़ानून&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;डर।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;न&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोकतंत्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सम्मान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;न&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;किसी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;परवाह।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ग़ैर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मराठियों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;घराने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ऐसे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हालात&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पैदा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मानों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;वो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अपने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिस्सा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बल्कि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ग़ुलाम&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कश्मीर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पाकिस्तान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कोई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिस्सा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हो।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नफ़रत&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बीज&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बोई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रही&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;इसका&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;असर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दूसरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिस्सों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देखने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मिल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;इसका&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ये&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मतलब&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हुआ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;काम&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;करनेवाले&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;साथ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जनता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;वही&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सलूक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;करे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; , &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उनके&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;साथ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पंजाब&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; , &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हरियामा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिमाचल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;प्रदेश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उत्तर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;प्रदेश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; , &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मध्य&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;प्रदेश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;राजस्थान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बिहार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पश्चिम&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बंगाल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जैसे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सूबों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पांच&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फिर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ऐसा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;होना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चाहिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोकसभा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;राज्यसभा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चुनकर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;आए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;शिवसेना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नुमाइंदों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;साथ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;वहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सलूक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;होना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चाहिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सांसद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उन&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जगहों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;छेक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिल्ली&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;होने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिल्ली&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सदियों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बसनेवाले&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पास&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ढंग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मकान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फिर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्यों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हम&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मराठियों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;शानदार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सरकारी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फ्लैटों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बंगलों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दें।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हक़&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उनका&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिल्ली&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;आ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रहने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अगर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिल्ली&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दूसरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;प्रांत&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;तमाम&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;प्रदेशों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;खोलकर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;स्वागत&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;करते&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;इससे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जुदा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्यों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ? &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कल्पना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;करके&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देखिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अगर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बंगाल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;खदेड़ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लगें&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पंजाब&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हरियामा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;खदेड़ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लगें&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ? &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बैंगलुरू&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोग&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहरी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लोगों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;खदेड़ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लगें&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ?&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फिर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;होगा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;घराना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अनिल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुकेश&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अंबानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;निकालना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पसंद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;करेंगे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ? &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नुस्ली&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;वाडिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;निकालना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पसंद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;करेंगे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ? &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रतन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;टाटा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रास्ता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिखाएंगे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ? &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कल्पना&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कीजिए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अगर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिलीप&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कुमार&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सायरा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बानो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अमिताभ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बच्चन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बच्चन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;शाहरूख&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ख़ान&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गौरी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रतन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;टाटा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अंबानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;वाडिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अभिषेक&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ऐश्वर्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रानी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुखर्जी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;श्री&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;देवी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जितेंद्र&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एकता&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कपूर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;आदि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;आदि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुबईं&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बाहर&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अपने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;प्रदेशों&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;लौट&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;जाए&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; , &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सूरत&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;होगी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ? &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ठाकरे&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;घराने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दिया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;क्या&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ?&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;गेटवे&lt;/span&gt;&lt;span s
